STORYMIRROR

Hajari lal Raghu

Drama

3  

Hajari lal Raghu

Drama

आकुलता

आकुलता

1 min
410

तेरी आकुलता से,

मेरी व्याकुलता बढ़ जाती !

तेरे मन की व्यथा,

मौनता से व्यक्त करती !


ऐसी गाथा,

जैसे भार से दबा वट वृक्ष !

विशालता उसकी,

अदम्य सहास से दृश्यती !


जो युगों-युगों से,

उन पृष्ठों को लिखता रहा !

एक पुन: उभरती,

नव पीढ़ी के नव प्रबल नव राग में !


जो स्वर राग का लय,

तेरी आकुलता में बनता !

मेरी व्याकुलता की संगत में,

नव अंकुरित जीवन होता !


Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Drama