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गृहणी से  लेखिका
गृहणी से लेखिका
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© Sandhya Chaturvedi

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मेरी उम्र 16 साल थी। जब मैं b.a. फर्स्ट ईयर की स्टूडेंट थी।

अग्रिम पढ़ाई सरस्वती शिशु मंदिर से की थी और सातवी कक्षा की पढ़ाई ना कर के सीधा आठवीं में एडमिशन मिल गया था।जिस वजह से मैने 15 साल की उम्र में ही इंटर की परीक्षा फर्स्ट डिवीजन में पास कर ली थी।

बी ए में पहली बार मनोविज्ञान विषय लिया था।जिसे पढ़कर मुझे आगे psychology में रुचि बढ़ गई थी और मैं एक साइकोलोजिस्ट या साइकोलॉजी प्रोफेसर बनना चाहती थी।

अभी बी ए के एग्जाम खत्म ही हुए थे।तो नानी के घर पर आये हुई थी ।उस दिन कोई छोटी दावत थी।

हम सब बच्चे मिल कर खेल रहे थे। तभी मेरी बड़ी दीदी ससुराल से आई,दीदी ने मम्मी को बताया कि पास वाले घर के लड़के से उस की मौसी सास की बेटी की रिश्ते की बात चल रही है, जिस वजह से आने में देर हो गयी।

मम्मी ने कहा कि लड़का पड़ोस में तो चल कर बात कर आते हैं और तृप्ति यानी कि मेरी शादी की बात कर लेते है।

मुझे उस समय शादी या इन सब चीजों में कोई रुचि नहीं थी।

सो मामा के बच्चों के साथ मिलकर खेलते रहे।

एक घण्टे बाद माँ और मौसी पड़ोस से लोटी तो उन दोनों के चेहरे पर खुशी के भाव थे।उन के बड़े बेटे की शादी पड़ोस में ही हुई थी और घर मे सब छोटे भाई की शादी भी साथ करवाने का सोच रहे थे,तो शादी दस दिन बाद है।

सारी बातें तय हो गई।उधर मुझसे ना तो किसी ने कुछ पूछा ना ही मुझे कुछ समझ आ रहा था कि ये सब क्या हो रहा है।

पापा से कहा था कि पापा मुझे शादी नहीं करनी, पढ़ाई करनी है तो माँ ने बोल दिया था कि सिर्फ शादी हो रही हैं विदाई नहीं होगी।

तेरे ससुर जी से बात कर ली है ,वो लोग भी पढ़े लिखे घर से ही है।उन्होंने कहा है कि जब तक चाहो पढ़ना।

दिल मे सुकून मिला ।अगले दिन मम्मी ने कहा कि अब कॉलेज नही जाना है जब तक शादी ना हो जाये। देखते ही देखते दस दिन यूँ ही गुजर गए और शादी का दिन भी आ गया।शादी वाले दिन जब तक हल्दी( तेल) ना चढ़ जाये। तब तक वर वधु को खाना नही देते हैं। शाम के 6 बज गए।रस्म खत्म होते होते।

जल्दी से हल्दी चढ़ी और मम्मी बोली नहा कर तैयार हो जाना बारात 7 बजे तक आ जायेगी।

यहाँ मुझे तो जोर की भूख लग रही थी।कोई कुछ सुनने को भी तैयार नहीं।

रात 9 बज गए बारात जब गयी तो स्टेज से उतरते ही मैं रोने लगी।सब ने पूछा क्या हुआ क्यों रो रही है किसी ने कुछ कहा?

मैने सर हिलाकर ना करते हुए कहा,की ये शादी बहुत बुरी होती हैं।जिस की शादी उसी को सुबह से खाना नहीं दिया।मुझे नहीं करनी शादी।

तब चाची ने चुप करा कर बोला,चल पहले कुछ खाले।

बच्ची थी तो उस समय बुद्धि भी छोटे बच्चों जैसी थी।

जैसे तैसे शादी की रस्मे पूरी हुई।दीदी रस्मो के लिए अलग अलग साड़ी पहनाती तो मैं बार बार बोलती की यार एक बार ही पहना दो जो पहनाना है।हर दो घन्टे में साड़ी बदल देते हो।

शादी के बाद विदाई नहीं हुई थी।बस हर रविवार ससुराल जाना होता था।शाम को घर वापस।सब कुछ ठीक था।

इसी बीच एग्जाम पास आ गए और वहाँ लड़के वालों ने विदाई की मांग की। 4 मई को विदाई थी और 5 मई को मेरा इंग्लिश का एग्जाम था।एग्जाम में ही विदाई आ गयी।यहाँ विदाई की रस्म चल रही थी।मेरा ध्यान मेरे एग्जाम में था।

रात दो बजे विदाई हुई और दोपहर को एग्जाम था।

जैसे तैसे एग्जाम खत्म हुए अब और ये साल तो बीत गया।

आखिरी साल बहुत मुश्किल से गुजरा।एक तरफ परिवार में नये होने और सब से छोटी होने के कारण संघर्ष ज्यादा करना पड़ा सब के दिल में खुद के लिए जगह बनाने के लिये।फिर पढ़ाई के साथ साथ पहली बार माँ बनने का भी अनुभव और वो ही जब खुद आप व्यस्क ना हो तो मुश्किल होता हैं।जब एग्जाम आये उस समय नौ महीने गर्भ से थी।प्रक्टिकल में एग्जामिनर ने किया पहला सवाल इतनी जल्दी शादी क्यों करनी,क्या पढ़ाई नही करनी आगे?

प्रेग्नेंट हो तो फिर एग्जाम क्यों दे रही हो?

मेरा जवाब था-सर शादी घर वालों ने कर दी,एग्जाम खुद अपनी मर्जी से दे रही हूँ।

दूसरा सवाल पूछा - प्रेक्टिकल कर लिया ,किस विषय पर किया है और जाने को बोल दिया क्योंकि गर्मी अधिक होने से तबियत ठीक नहीं थी।

फिर पहले बेटे को जन्म दिया और उसी महीने 18 साल पूरे किए जिंदगी के।

एक बच्चा जल्दी हो जाने से बच्चा दानी में सूजन आ गयी थी जिस वजह से दुबारा माँ बनने से पहले चार बार गर्भपात हो गया और एक बेटे को जन्म देने के बाद भी ससुराल में तानों के दौर से गुजरना पड़ा।

आप सबने ये तो सुना ही होगा कि अपने समाज मे बांझ यानी जिस के बच्चा ना हो, लोग उस का मुँह देखना अपशगुन मानते हैं।लेकिन एक माँ जिसने की वंश के चिराग को जन्म दिया हो उसे सुबह उठते ही ये सुनाना कि बांझ भली एक बांझ बुरी।

एक बांझ का मुँह देख लिया आज तो दिन बुरा निकलेगा।

कैसा महसूस होता होगा जरा सोचिये??

जब कि इस बात का कारण भी उम्र से पहले उन के घर मे एक स्वथ्य बच्चे को जन्म देना हो।जिस वजह से एक नहीं दो नही चार बार गर्भपात हो और फिर भी तानें सुनने को मिले।

खैर वो कहावत है कि ईस्वर जिस का साथ दे वो हर मुसीबत को पार कर लेता है और आप के खिलाफ बोलने वालों का मुँह भी बंद हो जाता है तो नोकरी के चलते पति मुंबई शिफ्ट हो गए और उसी दौरान पुनः गर्भ धारण हुआ तो मुंबई के डॉ के कुशल ईलाज से एक बार फिर एक बेबी बॉय को जन्म दिया।

इस दौरान बड़े बेटे को सात महीनें तक खुद से दूर रखना पड़ा।जिस के कारण वो भी डर और प्यार की कमी से सहमा हुआ मिला।

डर की वजह से बेड-वेटिंग(डर की वजह से बिस्तर गीला करना) शुरू हो गयी थी उस की और गोलू मोलू बदन से एकहरा बदन हो गया सात महीने में उस का।

लेकिन धीरे धीरे सब ठीक हो गया।पढ़ाई का समय तो नही मिला ,लेकिन बच्चों पर ध्यान देने में उम्र गुजर गई।

जिंदगी यू ही गुजरती रही,संध्या सिर्फ एक माँ थी।सारी इच्छा मर चुकी थी।लगा कि खुद का नही अब बच्चों का भविष्य बनाना है।

ट्यूशन छुड़वा कर खुद ही बच्चों की पढ़ाई करवाई।ज्यादा ऊंचा स्कूल में एडमिशन इसलिए नही करवाया क्योंकि फीस महंगी होती हैं।

मेरी हमेशा से सोच रही हैं कि अगर शिक्षा अच्छे से की जाये तो जरूरी नहीं की स्कूल महंगा हो।

सही ज्ञान तो बुक को पढ़कर आता है और बेटे ने इसे यथार्थ कर दिखाया।दसवीं में 93% अंक ला कर।

फिर अचानक से जेठ जी की हार्ट अटैक से मृत्यु हो गयी और सब को मुंबई छोड़नी पड़ी।

बेटे का मन नही था कि वो मथुरा में पढ़ाई करें, उस की योग्यता को देख कर उसे उस की नानी के घर हल्द्वानी शिफ्ट किया दो साल के लिए और उस ने अपनी मेहनत और लगन से 92.5% इंटर में ला कर ।jee main और एडवांस दोनो को क्लियर कर के,

Iit कानपुर में एडमिशन ले लिया।

एक बड़ी जिम्मेदारी पूरी हुई।अभी छोटे की जिंदगी और सँवारानी बाकी थी।

एक दिन विंटर वैक्शन में बड़े बेटे के हाथ मेरी पुरानी डायरी लगी, जिसमे शेर और शायरी लिखी थी। साथ ही एक दो कविताएं भी।

जिसे पढ़कर उस ने कहा आप अच्छा लिखते हो अखबार में छपवाओ इन को ताकि और भी लोग पढ़ सकें।डायरी में भला कौन पढ़ेगा इन को और इस तरह अपने बेटे के उत्साह मिलने पर काव्य समूह से जुड़ी और बहुत कुछ सीखा।

मेरी जिंदगी का खाली पन जिस की वजह से अवसाद भरी बोझिल जिंदगी आज एक खुशहाल जिंदगी में बदल गयी।मेरा खोया हुआ आत्मविश्वास फिर वापस आ गया।मुझे जो लगता था कि मुझे कुछ भी करने का मौका नही मिला,लोग मेरे मरने पर मुझे मेरे नाम से भी नही पहचानेगे।आज ये अवसाद दूर हो गया और जो जिंदगी नींद की गोलियां खा कर एक बेचारी सी कट रही थी।वो एक प्रतिभा बन कर चमक रही हैं।

चाँद ना सही एक तारा हूँ मैं।

डूबीे हुए कस्ती का किनारा हूँ मैं।

खुद पर यकीन करना जरूरी हैं दोस्तों,

खुदा का एक अनमोल सितारा हूँ मैं।

अपनी लगन से बहुत सी पत्रिका और अखबारों से जुड़ पाई।मैं खुद को खुशनसीब समझती हूँ कि आज अमेरिका से लेकर अबॉर्ड तक के अखबारों में मेरी रचनाएँ छप चुकी है।

साहित्यिक क्षेत्र में सराहनीय कार्य के लिए सम्मान पत्र भी मिले हैं और बहुत शीघ्र ही गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड का हिस्सा भी बनने जा रही है मेरी एक रचनाजो देश के सबसे बड़े सांझा अंक के लिए चयनित है।

छः सांझा संकलन का हिस्सा भी बन चुकी हैं रचनाएँ और वो सब भी निःशुल्क ।शुरू में परिवार में बहुत विरोध भी हुआ,तब कसम खायी की बिना आर्थिक मदद के खुद को साबित कर के दिखाऊंगी।

जानती हूँ ये कोई बड़ी उपलब्धि तो नहीं पर तृप्ति इस बात से है कि लोग आप को आप की योग्यता और नाम से पहचानते हैं।

यकीन मानिये की लगन से दुनिया मिलती है।हाउसवाइफ एक जिम्मेदारी का काम है, लेकिन फिर भी आज की दुनियां में हाउसवाइफ को रेस्पेक्ट नहीं मिलता।कोशिश करें कि कुछ ऐसा करें कि आप के जाने के बाद भी आप का नाम रहें।

आज अगर गुगल करें तो खुद का नाम और रचना देख कर जो प्रसन्नता मिलती है अतुलनीय हैं।

अगर आप मे प्रतिभा हैं और कुछ करने की लगन है तो देर से ही सही पर मंजिल अवश्य मिलेगी।

स्त्री समाज सोच

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