ख़तरे में चौथा स्तंभ
ख़तरे में चौथा स्तंभ
जग का अजब हुआ है हाल।
सच का जग में पड़ा अकाल।
दिखलाता दिन-रात सभी को-
सच पर झूठ का पर्दा डाल।
क्यों सच इतना मुंहचोर हुआ।
क्यों ग़लत झूठ का शोर हुआ।
चौथा पाया इस लोकतंत्र का-
क्यों आज इतना कमजोर हुआ।
कुछ होता और कुछ दिखता है।
हर ख़बर यहां अब बिकता है।
बस झूठी सच्ची बात बना कर-
दिखलाता है और लिखता है।
हर ख़बर यहां व्यापार करें।
छुप छुप कर घातक वार करें।
धोखेबाजी जनता के संग -
हर टीवी और अखबार करें।
