Sarita Maurya

Romance


4.0  

Sarita Maurya

Romance


उनके सदके

उनके सदके

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युवा जोश, रेशम से झूमते बाल और हाथ में माइक के साथ या माइक के बिना भी जब वो बोलना शुरू करता तो लोग झूमने लगते, जब गाता तो आस-पास के लोग कहते ‘‘लो कलयुग का किशन कन्हैया।" साथ ही ये भी जोड़ देते ‘‘गलत जगह और गलत घर में पैदा हो गया।" हालांकि उसे कभी समझ नहीं आया कि जहां जिस घर में वो जन्मा था उसके लिए गलत कैसे हो सकता था। सारी सोच और सामाजिक चर्चाओं से परे उसका हुनर लोगों को अपनी तरफ खींच ही लेता था। कॉलेज के दिन यूं ही गुजर रहे थे। उसे भी कहां पता था कि कोई एक जोड़ी आँखें उसका पीछा करती रहती हैं, और जैसे ही वो थोड़ा ज्यादा भीड़ में विशेषकर लड़कियों की भीड़ में होता था तो एक हसरत भरी निगाह उसे दूर से ताकती रहती थी। दुबली-पतली सी छरहरी काया उसपर जमाने भर का भोलापन और सामाजिक दूरी के अहसास ने मानो एक दीवार खड़ी कर रखी थी। वो बहुत दिनों तक इन हसरत भरी निगाहों से अनजान और दूर नहीं रह सका बल्कि अब मानो उसे भी अपने आस-पास वो मीठी नज़र अच्छी लगने लगी थी और अनजाने अनकहे वो भी दूसरों से घिरा होकर ये सोचता कि क्या वो उसे देख रही थी? कहीं उसे धोखा तो नहीं हो रहा? कक्षा में भी गाहे-बगाहे एक दूसरे पर नज़र पड़ती तो लगता मानो एक दूसरे की चोरी बाकी साथी पकड़ न लें। वो बात करना चाह कर भी अपनी हसरतों को दिल में लिए एक दूसरे को अनदेखा करके निकल जाते। कशमकश में दो साल यूं ही गुज़र गये। 

पिछले कुछ दिनों से कॉलेज थोड़ा सूना सा हो चला था। पता चला कि अब वो थोड़ा कम ही आयेगा क्योंकि उसे अपने पारिवारिक व्यवसाय में घरवालों का हाथ जो बंटाना था। बड़े भाई की मदद के लिए और अपनी सीख के लिए उसे कॉलेज के साथ ही कैफे में समय देना था। बहुत समझाने पर भी जब मन नहीं माना तो वो पहुंच गई दुकान पर अपनी पढ़ाई की किताब लेकर, दूसरे दिल की धड़कनें उसे देखकर इतनी तेज हुईं कि समझ नहीं आया क्या करे या कहे। बस वह पूछती गई और वो बताता गया। नज़रों ने अपना काम किया और धड़कनों ने अपना। चाहे इसे हारमोन का असर कहा जाये या डोपामाइन का स्राव, भावनायें तो भावनायें ही थीं और इन भावनाओं ने दोनों को ही रीति-रिवाज, समाज हर चीज़ से परे कर दिया। दोनों को जब ये बात असहनीय लगी कि उनके घरवाले उनके लिए अलग-अलग रिश्ते ढूंढ रहे थे तो उन्हें या तो अपने रास्ते बदलने की चुनौती थी जिसमें सदा के लिए बिछोह और विरह के साथ अपने आने वाले आगामी साथी के साथ नाइंसाफी थी, या फिर विद्रोह की कांटों भरी डगर थी जिसपर एक दूसरे का साथ तो था लेकिन कितना लंबा ये पता नहीं था। जीवन सुखद भी हो सकता था, या दोनों या दोनों में से एक की जान भी जा सकती थी। 

निर्णय का यही सही समय था और उन्होंने वही किया जो उन्हें ठीक लगा क्योंकि जीवन एक ही मिला था और उन्हें जितना भी जीना था वो दबाव में नहीं वरन् स्वयं के निर्णय से जीना था।

दोनों घरों में तूफान बरपा हो गया। सबने यही कहा ‘‘संभव ही नहीं’’, तुझे कोई और नहीं मिला था /मिली थी क्या? कैसे बताया जाये कि वैज्ञानिक भाषा में कहे जाने वाले ये रसायन जब अपना काम करते हैं तो भावनायें अपना संतुलन बदल देती हैं और जब गहराई से डोपामाइन स्रावित हो जाये तो कुछ नई रचना हो जाती है। दोनों घरों के तूफान ने उनके कदम कमजोर करने की बजाय और मजबूत कर दिये।

रूढ़ियों, विरोध की नीति, सामाजिकता और दुनियावी सोच के अनुसार उनके लिए तानों, छींटाकशी, चरित्रहनन और जलालत का दौर प्रारम्भ हो गया। लेकिन ये दिल तो मानते ही नहीं थे मानों अलग-अलग शरीरों में एक ही के लिए बसी धड़कनें हों। उनके इस निर्णय ने उन्हें विवाह बंधन में तो बांध दिया लेकिन सामाजिक स्वीकृति नहीं दिला पाये। किसी ने घायल किया तो किसी ने जान से मारने की कोशिश की। किसी ने आर्थिक नुकसान कर दिया तो किसी ने कैरियर में रोड़े अटका दिये। यहां तक कि भरे-पूरे परिवार के बावजूद बीमारी और चोट से घायल अस्पताल में चक्कर लगाते समय सिर्फ एकदूसरे का ही सहारा होता था। बच्चों के जन्म के समय भी उसे सास, ननद, मां या बहन का साथ मिला तो सिर्फ उसी से जिसके लिए उसने सबकुछ छोड़ा था।

बुरा दौर गुज़र गया दोनों ने अपनी मेहनत, लगन और आपसी प्यार के सहारे जीवन के सर्द-गर्म कई बसंत पार कर लिए। आज उसे विदेश से उसके काम की सराहना के लिए प्रमाणपत्र मिला था, लोग बधाइयां भेज रहे थे। शिल्पा ने सिकंदर की तरफ भरपूर नज़र डाली और बोली आपने मेरे प्यार का मान रखा सिकसा मुझे गर्व है तुमपर’’। सिकंदर ने अपने दिलो-दिमाग में वही अनुभूति महसूस की जो कॉलेज के जमाने में उसे दीवाना बनाया करती थी, और बोला हम अपने बच्चों को जाति और धर्म से परे इंसानियत की तालीम देंगे शिल्पा, एक नई इंसानियत को पहचान देना हमारे देश में बहुत जरूरी है। शुभ्रा गवाह थी इस प्रेम स्निग्ध जोड़े की और सोच रही थी काश हम हमारे देश में शिल्पा और सिकंदर के जैसे इतने उदाहरण बना पाते कि सिकंदर को लोग उसके नाम से नहीं उसके हुनर उसकी इंसानियत से परखते और शिल्पा को उसके नाम की बजाय उसकी भावनाओं और दृढ़ता से जानते। ये भी तो एक तरीका हो सकता है नये सामाजिक विकास का जहां अल्लाह की दुआओं के साथ सरस्वती का चित्र भी सजा हो। और अरमानों को ये पता हो कि वे जिसे चाहें चुन सकते हैं। इस हंस और हंसिनी के प्यार के सदके, शुभ्रा सोचते-सोचते मुस्कुरा उठी क्योंकि पीछे कहीं एक गीत बज रहा था-आओ मिल जायें हम सुगंध और सुमन की तरह।



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