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Shalinee Pankaj

Abstract


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Shalinee Pankaj

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तेरे मेरे रिश्तेदार

तेरे मेरे रिश्तेदार

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बचपन कितना मासूम होता है न अपने पराये का भेद नही। सब अपने लगते है। पूरा संसार घर लगता है। गाँव भी शहर लगता है। दूर के नातेदार भी करीबी लगते है। काश ! ये बचपन वाली जिंदगी कभी खत्म ही न हो।

9वी पढ़ती थी जब हमारी जिज्जी(बड़े पिता जी की बेटी) की शादी लगी।

हमारा सयुंक्त परिवार था। कितने लड़के वाले देखने आते थे। पूरे घर मे अफरा-तफरी मच जाती थी। नाश्ते से लेकर डिनर तक का इंतजाम और इस बीच रिश्तेदारों को बुलाना। नही तो नाराज हो जाते थे। चाहे शादी लगे या नही पर देखने आने का भी न्योता दिया जाता था। रिश्ता न होने पर तरह तरह की बातें होती थी। हर बार जिज्जी से तरह तरह के प्रश्न पूछे जाते थे। इस बार रिश्ता तय हो गया। सगाई की तिथि निकल गयी।

सगाई का न्योता गाँव भर में दे आये पापा। सगाई के दिन जिज्जी खूब सुंदर लग रही थी। जीजू भी सुंदर लग रहे थे। कुछ हमउम्र लड़कियां जिज्जी से जलने लगी। अरे ये क्या हरे रंग की साड़ी पहनी है। लड़के की बुआ ने कटाक्ष किया। जिज्जी को लाल साड़ी में लेकर आये। कुछ कानाफूसी होने लगी। दुल्हन जैसे सज गयी है। जिज्जी रुआँसी हो गयी। बड़ी माँ और मम्मी मेहमानों में व्यस्त थे। एक लड़के वाले दूसरे स्वयं के रिश्तेदार कोई कहीं मीनमेख निकाल रहा। तो कोई लड़के वालों के टांग खींचने में लगे। किसी का कॉल आ रहा स्टेशन लेने आए,जबकि स्टेशन से घर के लिए गाढ़ी आराम से मिल जाती है। पर मौके में सभी परीक्षक बन जाते है। आज सगाई वाले दिन कोई अपने व्यय से घर तक पहुंचना नही चाह रहे थे।

इस बीच स्टेज में जीजू ने सबसे नजरें बचाकर गुलाब दे दिया। जिज्जी ने थैंक्स कहा। न जाने कितने लोगों ने इस घटना को अपने खुरापाती दिमाग में कैप्चर कर लिया। सगाई तो हो गयी अच्छे से। सगाई के बाद लड़का-लड़की स्टेज में बात किये। नमक मिर्च लगाकर सबने बात को पूरी तरीके से बिगाड़ा। दादाजी तक बात पहुँची। मम्मी,व बढ़ी माँ को फटकार लगाई गई कि हमारे संस्कार में कमी है।

अगले दिन पापा की मौसेरी बहन आई। घर में कोई नही था। सब नजदीक के पहाड़ी में देवी का मंदिर है दर्शन करने गए थे। सगाई की हड़बड़ी में पापा उन्हें बुलाना भूल गए थे। आते ही जिज्जी पर बिफर गयी। भाई भूला तो भुला भतीजी क्यों भूल गयी। जिज्जी को सुनाते जा रही थी साथ ही जिज्जी को शादी के लिए शगुन की साड़ी लाई वो भी दिखा रही। हम चाय बनाकर लाये। उसे भी सरका दी। सोने की बाली जिज्जी के हाथ मे देते हुए बोली तेरी शादी के लिए बनवाई हूँ। अपनी भड़ास निकालने के बाद शांत हुई। अपने बैग से अमरूद निकाली और खाई। शुगर वाली है जिज्जी ने बहुत मनाया,पर नही मानी शाम की बस वापस लौट गई। एक गिलास पानी के अलावा कुछ भी नही खाई हमारे घर में। दादाजी को पता चला। तो बहुत दुःख हुआ साथ ही ऐलान किये की शादी के कुछ दिन पहले खुद ही लिवाने जाएंगे। दादाजी ने फोन में बात कर बुआ को मना लिया।

जीजा जी का परिवार खुले विचारों वाला था। कभी कभी फोन आता दादाजी से लेकर सभी बात करते पर जिज्जी की बात नही हो पाती थी। जीजाजी का ट्रेनिंग लग गया। शादी एक वर्ष के लिए स्थगित कर दी गयी। इस बीच जीजा जी चाहते थे, जिज्जी से मिलना। पर ये बात सोचना भी महाभारत शुरू होने से कम न था। जीजाजी नाराज हो गए जिज्जी से। शादी तक उनका कभी फोन नही आया। जो भी रिश्तेदार आते अब यही कहते कि गुड़िया के लिए भी रिश्ता देखो। ये सुनते ही मैं पैर पटकते निकल जाती थी। ये मेरा गुस्सा दिखाने का तरीका था।

कार्ड बंट गएशादी की तिथि नजदीक आ गई। तिलक समारोह वाले दिन हम खाना परोस रहे थे कि गुड़िया के लिए ये लड़का कैसा रहेगा। किसी ने पापा को कहा ये सुनते ही खाना परसना छोड़ कर अंदर भाग गई। थोड़ी जिज्ञासा हुई,हालांकि अभी 10वी में थी । शादी का इरादा तो नही था। फिर भी खिड़की की ओट से झांकने लगी इतनी बड़ी पंगत में एक ही कमउम्र का सुंदर सा लड़का बैठा था। गोरा पर थोड़ा,थुलथुला बदन का। उम्र ही ऐसी थी कि पहली नजर में दिल दे बैठी उसे। विदा होते समय उस लड़के ने हमारे हाथ में एक खत दिया, की जीजा जी ने दिया। हमने सहर्ष रख भी लिया,की जिज्जी के लिए होगा। रात में नींद नही आ रही थी,हमने वो पत्र निकाला।

"शादी तो तुमसे ही करेंगे गुड़िया"

तुम्हारा

पवन

और नीचे फोन नम्बर लिखा था।

अचानक उस लड़के का चेहरा सामने आ गया। शादी का इरादा तो अब भी नही था। हमने खत फ़ाड़कर कूड़ेदान में डाल दिया।

अगले दिन से हल्दी रश्म शुरू हो गयी। तीसरे दिन जिज्जी के फेरे थे। पर इन तीन दिनों में कभी फूफा नाराज,तो कभी बुआ रुठ जाती थी। चाची को पूछे नही इसलिए एक कोने में पढ़ी। छोले में प्याजतो कभी फुल्की शीत गयी। संगीत में लोकगीत नही बजे। गाढ़ी स्टेशन तक नही गयी। और तो और पूजा रूम रिश्तेदार के जाने से सब रिश्तेदारों की रूठने की जुगलबंदी चल रही थी। घर के लोग ही त्रस्त हो गए।

बारात आई,द्वारचार हुआ। जिज्जी की सहेलियाँ जिज्जी को स्टेज तक ले गयी तो कुछ नातेदार नाराज हो गए। नानी जी की लाई साड़ी मां ने पहन ली तो दादी नाराज। मौका था,मौसम था,दस्तूर भी बन गया। कुछ बाराती भी नाराज हो गए,खाने को लेकर। फेरे के समय दोनों पक्ष में बाते हो गयी नियमो को लेकर। सब भूल गए बेटी की विदाई थी। एक पिता की जीवन की जमापूँजी आज पानी की तरह बह गई इकलौती बेटी के विवाह में। पर रिश्तेदार तो जैसे भावशून्य हो गए थे।

सुबह के समय जिज्जी की विदाई हुई। सब रो रहे थे। पर जिज्जी की विदाई के बाद कानाफुसी शुरू हो गयी कि अपनी विदाई में जिज्जी दहाड़े मारकर नही रोई, रोते रोते गश खाकर नही गिरी। और हमारे समय में ऐसा होता था,वैसा होता था,न जाने कितने लोगों का उदाहरण दिया गया।

ये हमारे घर की पहली शादी थी पर रिश्तेदारों का ऐसा रूप अक्सर शादियों में देखने को मिलता। शादी के बाद जिज्जीजीजू के साथ बहुत खुश थी। उनके बीच झगड़े नही होते थे,बहस होता था। जीजू को हमारे रिश्तेदारों से शिकायत तो जिज्जी अपने। ससुराल वालों से त्रस्त और जब भी जीजा जी शुरू होते,जिज्जी भी रिश्तेदारों के बारे में बोलने लग जाती। सुखद दाम्पत्यजीवन जीवन के बाद भी। "तेरे मेरे रिश्तेदार" की तू, तूमैंमैं की वजह से कड़वाहट आने लगी थी।

जिज्जी कई बार रोते रोते फोन लगाती। ये सब देखकर हमने दृण संकल्प लिया कि कोर्टमेरिज करूँगी। घर में विरोध कर खूब पढ़ाई की,इस बीच पवन जो जिज्जी के ससुराल से रिश्तेदारी में आता था। विवाह के लिये कई बार प्रस्ताव आया।

पवन हमे पसन्द करता था। अब मुझे भी पवन अच्छा लगने लगा। पर जिज्जी की शादी के 8 साल बाद भी जीजू से झगड़ा होता है रिश्तेदारों को लेकर। हमने फिर से मन बना लिया। इंटरकास्ट मैरिज कर लूँगी। पढ़ाई के साथ हमारा आत्मविश्वास भी बढ़ चुका था।

घर के लोग कुछ दिन नाराज होंगे फिर मां जाएंगे।

जब भी कोई लड़का शादी के लायक लगता पवन का चेहरा याद आ जाता जो हमसे बेइंतहा मुहब्बत करता था।

हमारे कॉलेज का आखिरी दिन,अंतिम पेपर था। इसके बाद तो कहीं न कहीं शादी करनी थी। पर पवन हमारी बेरुखी को जानना चाहता था,की अगर कोई है तो अपने तरफ से ही रिश्ते के लिए मना कर देगा। उस दिन पवन के साथ पहली बार कॉलेज के बाहर केन्टीन में बात हुई। पवन जवाब चाहता था। जब मैंने मन की बात बताई की मैं नही चाहती कि हमारे बीच झगड़े हो वो भी दूसरे की वजह से। पवन को हंसी आ गयी। मैंने बहुत गुस्से से उसको देखा और एक सांस में कह गयी। "कि तुम क्या जानो बेटी की विदाई क्या होती है। घर,परिवार,पहचान सखियां,सरनेम तक बदल जाता है। तुम्हारी कोई बहन नही न,सब छोड़कर लड़की जब ससुराल जाती है,और उसके ससुराल वालों के साथ अगर पति भी गलतियां ढूंढने लगे तो कोई लड़की बर्दाश्त नही कर पाती,क्योंकि उसका तो सब छूट गया न। "पवन बिना कुछ बोले वहाँ से चला गया।

फिर कई बार पवन का घर आना हुआ,पर बात नही हुई।

जाने क्यों अब अच्छा नही लग रहा था। मेरे इतने करीब से सच्चा प्यार गुजर गया,ओर मैं महसूस भी नही कर पाई।

उस दिन छत में थी हल्की बारिश शुरू हो गयी।

मैं आँखे बंद कर भीग रही थी कि पवन आया। इससे पहले की मैं नीचे जाती पवन ही छत में आ गया। हम दोनों के बीच मौन था। बारिश की बूंदे हम दोनों को भिगोए जा रही थी। तभी पवन ने आगे बढ़कर मेरा माथा चुम लिया,सब गिला-शिकवा पानी की बूंदों के साथ धूमिल हो गया।

हम परिणय सूत्र में बंध गए। सात फेरे,सात वचन के साथ पवन ने आठवां वचन भी दिया कि कभी हमारे बीच"तेरे मेरे रिश्तेदार" की बात नहीं होगी।"


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