Shalinee Pankaj

Abstract


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Shalinee Pankaj

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"काश जी भरके बात कर पाती अम्मा

"काश जी भरके बात कर पाती अम्मा

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आज सफाई करते हुए पुरानी डाईरी हाथ लग गई सब ठीक से रखी पर डाईरी वापस रह गई। दोपहर का खाना बनाई फिर अपने सारे काम निपटा धुप में बैठने जाने लगी की अचानक डाईरी की याद आ गई और उसे उठा कर गुनगुनी धुप में जा बैठी और डाईरी के कुछ पन्ने भी ना पलट पाई की अम्मा की तस्वीर सामने आ गई। जब आखरी बार उनसे मिली थी गुलाबी साड़ी झुरिर्यो भरा चेहरा आँखों में उमड़ता प्यार का सैलाब हलके सफ़ेद सर के बाल और देहरी में खड़ी अम्मा हाथ हिलाते हुए जल्दी आना कहना उनका आखिरी शब्द कान में गूंजने लगा मैंने डायरी बन्द कर दी आसुओं की धार बह निकली आँखों से तरह तरह के विचार भावुक मन में कोंधने लगे क्यों पराई हो जाती है बेटियां क्यों मन भर रह ना पाती माता पिता के साथ क्यों रिश्ते नाते सब बदल जाते है और उसे अपना घरौंदा कहि और बनाना पड़ता है ..इन तमाम सवालो के बाद मन किया की एक बार पढ़ ही लूँ डायरी माँ की यादों को जी लूँ पल भर ....

काश!काश इक टीस सी निकल गई दिल से ...मालूम था जो चला गया वो वापस तो नही आ सकता। बात उन दिनों की है जब शादी के बाद ससुराल गई और जब घर की याद आई तो उसे मैने डायरी में उकेरना शुरू कर दिया। सीधी साधी गांव से थी बनावटी बाते समझ से परे वैसे तो ससुराल में कोई कमी नही थी आर्थिक रूप से भी और सयुंक्त परिवार साथ में बुआ सास रहती थी जिनके देखे मैं थरथर काँपती थी वो थी ही इतनी तेज काय कर रही बहुरिया दोपहर में जब सब आराम करते भोजन पका रसोई समेट कर मैं भी कुछ देर के लिए कमरे में जाती पर उनको मेरा कमरे में जाना खलता था फिर धीरे से प्रतिदिन कोई काम ढूंढ कर रखना

गेंहू साफ़ कर दे कभी भाजी थोड़ के रख दे और मैं सारे काम करती अम्मा का ही संस्कार था सबका सुनती और सब को खुश करने की कोशिश में मैं खोने लगी तब जरा सा भी वक्त मिलता तो बस डायरी लिखती एक इंसान ही तो है की अपने मन की बातें किसी से कह दे तो मन हल्का हो जाता है पर यँहा तो सब अपने में ही शादी के बाद एक लड़की की जिंदगी कैसे बदल जाती है अपने ही घर के लिए पराई हो जाती है। बचपन से युवावस्था की दहलीज तक जो माँ के आँचल पकड़ चलती थी एक झटके से कैसे उसे उन्ही से मिलने के लिये मौको की बाट जोहनी होती है।

पायल माँ की लाड़ली। माँ ही जिसकी दुनिया हुआ करती थी कब एक छोटे से गांव की गलियों से कस्बा फिर शादी के बाद रायपुर पहुँच गई विकास हुआ भैया भाभी कस्बे में रहने लगे पर अम्मा बाबूजी गांव में ही रह गए तब मोबाइल यूँ आम ना हुआ करता था और फोन की सुविधा भी एक्का दुक्का मतलब सिर्फ बहूत जरुरी में किसी के घर जा या यूँ कहे नही ही थीसुविधा पायल को ससुराल में माँ की बहूत याद आती वंहा भी तो माँ थी। माँ तो माँ होती है सहेली की अम्मा भी मुझे कितना प्यार करती लगभग सभी सहेलियों की पर यंहा की माँ में ममता नजर ना आती मन तुलना करने लग जाता जब जब दिल चोट खाता ख़ुशी या गम माँ अक्सर याद आती धीरे धीरे पायल

ससुराल की हो गई अब उसे माँ और सासु माँ के बीच का फर्क भी समझ आया एक बेटा भी जब गोद में आया तो माँ का क्या होती है ये जान बच्चे को खिलाते खिलाते गला रुंध गया। अब जब से माँ बनी हर कदम पे अम्मा याद आती जब बच्चे को बुखार आये तो माँ भी इस तरह रात जागती रही होगी। घर में सबका ध्यान रखती ठण्ड का मौसम हो गर्मी माँ देर रात तक चूल्हे के पास रहती ताकि सबको गर्म रोटियां खिला सके

पायल अपने भाई बहनो में सबसे छोटी थी। और उस समय जब लड़कियो की जल्दी शादी हो जाती पर छुटकी होने के कारण बाकि की अपेक्षा उसकी थोड़ी विलम्ब हुई। पायल जब ससुराल से नोकरी में गई रहने तो उसे लगा की अब अम्मा से मिलने जल्द जायेगी पर ऐसा ना हो पाया। हर बार ऐसी परिस्थितियां बन जाती की उसका जाना मुश्किल हो जाता फिर बच्चे का स्कूल अब समय मिलता तो ससुराल जाते पर

अम्मा पीछे छुटने लगी जिम्मेदारियां अब और बढ़ने लगी पर जैसे जैसे माता पिता की उम्र बढ़ती है सर के बाल सफेद होते है शरीर में तकलीफ होती है तो और यादें बढ़ जाती है कंही ना कंही उनके खो देने का भय बलवती होने लग जाता है। ऐसा ही कुछ पायल के साथ हो रहा था बहुत दिनों बाद अम्मा से मिली तो वो कमजोर लग रही थी थोड़ी बीमार रहती थी। पर कितने भी दिन बाद मिलती कितना भी मिलती एक कसक रह जाती कितनी सारी बातें होती थी जो अम्मा से कहना होता पर समयाभाव और मिलने की ख़ुशी में दिल की बातें दिल में रह जाती थी। पायल जब भी माँ से मिलने जाती तो माँ पहले की तरह गरमा गरम रोटी सेकती फिर घी चुपड़ती रोटियों में और फिर कितनी दुबर हो गई बोल खिलाती थी दोपहर में बालो में तेल लगाती थी। पायल वापस फिर ससुराल पहुँच गई अब और व्यस्त रहने लगी दादी सास की दवाई से लेकर घर का सारा काम करना साँस लेने की फुरसत नहीं रहती अब मायके जाना और

भी कम एक तरह कलह भी हो जाता था जब जाने की बात आती तो फिर समय बीतता गया तब फोन का जमाना भी नही की एक बार आवाज सुन लूँ तभी याद आया माँ एक भजन गाती थी कितनी मधुर आवाज भैयाजी ने रिकॉर्ड कर लिया और ले छुटकी कर के मुझे दिया कुछ देर सुनी अच्छा लगा कितनी मीठी आवाज सुनते सुनते झपकी लग गई तभी अम्मा का चेहरा सामने आ गया अम्मा कितनी सुंदर लग रही थी बढ़ी सी बिंदी माथे पे मांग में बंदन लगाई पर इस सुंदरता के बीच अम्मा उदास लग रही थी तभी अम्मा के सामने एक दिव्य प्रकाश प्रकट हुआ अम्मा मेरी सर पे हाथ रखने वाली थी की धीरे धीरे वो प्रकाश में समाहित हो गई बस उनका हाथ दिख रहा था और फिर वो ओझल ही गई तभी अम्मा बोल झटके से मेरी नींद खुल गई। सामने देखी तो ये खढे थे क्या हुआ पायल बोल

सर में हाथ रखे मेरी आँखों से आँशु बह निकले बस एक बुरा सपना था बोल मैं चाय बनाने चली गई। वैसे तो ये बहुत अच्छे थे समझते थे पर उनकी भी मजबूरी थी जिम्मेदारियां थी फिर 50 km की दुरी में रहना रविवार को ही घर आ पाते थे छोटे भाई भी साथ में रह के पढ़ते थे अब इस एक दिन में उन्हें घर का हिसाब किताब देखना बाबूजी को समय देना और फिर खेती किसानी की बातें जो मेरे समझ से परे थी। हाँ पर ये जरूर था इनके आने से मेरी सास बुआ सास सब अच्छा व्यवहार करते कोई महरियां लोगो से मेरा मजाक ना करते साथ ही विवाह योग्य नन्द थी जो रसोई में मदद भी कर देती थी और इस रविवार के दिन मुझे दोपहर में भी कोई काम न करना पढता खैर ससुराल तो ससुराल ही होता है हर रविवार में भी सब भूल जाती हाँ पर इन सबमें अम्मा से दूरियां अब और बढ़ गई पर मिलो की ....

हर बात में अम्मा और याद आती जब से उन्हें अस्वस्थ देखि पर यंहा किस्से कहे किसका खून का रिश्ता जो उबाल मारे ये अलग बात थी की यंहा किसी को भी तकलीफ होती तो मैं उतना ही परेसान हो जाती जितना अपने अम्मा बाबूजी के लिए पर फिर भी। दिन बीतते गए अब यही कोशिश रहती की तीज या भाईदूज में जाने को मिल ही जाये रक्षाबंधन में भाई आता और शाम को चले जाते तब घर में इतनी भीड़ रहती की शोर में हम भाई बहनो के बीच के संवाद ही मौन हो जाते।

ना इतना समय दे पाती भाई को। दिन बीतने लगे इस बार मन बढ़ा व्याकुल था बहुत ज़िद कर भाईदूज में पहुंची गांव पर पहुचते ही अचानक हमे वापस आना पढ़ गया रुकने की बहुत इच्छा थी। पर जिद करना व्यर्थ लगा आने के समय मन बहुत खराब लग रहा था इस बार आते वक्त पीछे मुड़के देखने की हिम्मत भी ना हुई पर मुड़ी तो अम्मा वंही चौखट की देहरी में खड़ी हाथ हिलाते हुए जल्दी आने को कहना आज तक उनकी छवि भूल ना पायी कभी सोची ना थी की अम्मा से अगली मुलाकात जल्द ही होने वाली है वो भी हॉस्पिटल के बेड पर आज भी लगता है की काश ! जी भरके बात कर पाती तुमसे अम्मा।


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