Laxmi N Jabadolia

Abstract


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Laxmi N Jabadolia

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शिक्षक दिवस : शिक्षा के बदलते मायने

शिक्षक दिवस : शिक्षा के बदलते मायने

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शिक्षक अपने आप में एक कठिन मगर सम्पूर्ण शब्द है जिसको किसी एक रूप से परिभाषित नहीं किया जा सकता है। शिक्षक शब्द सुनते ही सम्मान की हलचल सी महसूस होती है। देखा जाये तो एक माँ अपने कलेजे के टुकड़े को छोटी सी उम्र में सबसे ज्यादा विश्वास कर किसी के पास छोड़ती है तो वो शिक्षक होता है । आज शिक्षक दिवस को कोई स्कूल शिक्षा के अध्यापक, तो कोई कॉलेज या कोई प्रोफेशनल शिक्षा के आचार्य या कोई माता पिता की फोटो लगा के सम्मानित कर, या डॉ. राधा कृषणन के जन्मदिन के रूप में मानते है। वैसे तो मेरे जीवन में सभी शिक्षकों का बड़ा महत्त्व रहा है फिर भी मेरे स्कूल शिक्षा के अध्यापक श्री D.R . शर्मा जी का बड़ा महत्त्व है आज भी यदि वो मिले तो मैं नतमष्तक होकर शीश नवाऊ । जिंदगी एक सागर है जिसमे न जाने कितने पड़ाव आते है और उसमे हम्हे कब कौन शिक्षा दे के चला जाता है हुम्हे पता ही नहीं चलता ?, द्रोणाचर्य भले ही अर्जुन के शिक्षक (गुरु) रहे हो लेकिन श्री कृष्ण का महत्व भी कम नहीं और उन्ही के कहने पर अर्जुन ने गुरु पर भी बाण चलाये थे । यदि मैं पूजनीय ज्योतिबा फुले व् सावित्री बाई फुले , जिन्होंने मनुवादी सभ्यता से ऊपर उठकर सदियों से हाशिये पर रखी गई शोषित समाज व महिला शिक्षा की ज्योति जलाई, को भी शिक्षक कहु तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। शिक्षक केवल एक व्यक्ति विशेष तक ही सीमित नहीं है , समय भी शिक्षक है , सफलता व् विफलता भी शिक्षक हो सकती है, और आज कल तो टेलीविज़न , मीडिया , गूगल बाबा ये भी शिक्षक की भूमिका निभा रहे है । लेकिन किताबी ज्ञान को ही शिक्षा नहीं कह सकते बल्कि शिक्षा का एक चक्र (साइकिल) है, जिसके पहले छात्र पढ़ता है , सीखता है और फिर ज्ञान को अर्जित कर अपने जीवन में उतरता है, फिर अपना मुकाम पता है और फिर अपने ज्ञान को समाजोपयोगी कार्य में लगता है । इसीलिए तो कहा गया है कि "विद्या दधाति विनयं ", और कबीर जी ने भी कहा है कि " पोथी पढ़ी पढ़ी जग मुआ , पंडित भयो न कोई...।

लेकिन आज जैसे जैसे शिक्षा का स्वरूप बदल रहा है वैसे वैसे शिक्षक की भूमिका भी बदल रही रही है । पहले वो गुरु था अब उसको नौकर तक सिमित कर दिया है, आज देखा जाये तो खासकर सरकारी स्कूल में तो शिक्षक को , शिक्षण के साथ साथ अन्य सारे काम जैसे जन गणना, पशु गणना , मतदान कार्य , मिड दे मील आदि बहुत सारे काम देकर उसकी हालत पतली कर दी है। योग्य शिक्षिक होने बावजूद, सरकारी स्कूलों की शिक्षा केवल गरीब वर्ग तक ही सीमित हो गयी है । किसी महान दार्शनिक ने कहा था कि परिवर्तन को छोड़कर बाकि सब परिवर्तनशील है । वैसे ही शिक्षा , शिक्षा स्थल , शिक्षक , शिक्षा मूल्यांकन , शिक्षा पद्धति सब बदल रहे है । शिक्षा पहले शिक्षण (Teaching) , फिर अधिगम (Learning) और अब चिंतन (Thinking) पद्धति पर चल रही है इसी के अनुसार शिक्षक भी अपने आप को तैयार कर रहे है। लेकिन जैसे ही शिक्षा का निजीकरण शुरू हुआ वैसे ही शिक्षक ट्यूटर बनना शुरू हो गया, भौतिकवाद उन्हें भी जकड लिया और शिक्षा का सवरूप ही बदल गया । सावित्री बाई जैसे शिक्षक आज बिरले ही मिलते है, जिसने न जाने कितनी यातनाये झेलते हुए अपना जीवन हाशिये से बाहर रखी नारी जाति व् समाज सेवा के लिए बलिदान कर दिया था । मुझे ऐसा लगता है कि आज कि शिक्षा कहीं न कहीं , नैतिक शिक्षा की कमी से झूज रही है । गुरुकुल शिक्षा पद्धति में गुरु व् शिष्य एक साथ आश्रम में रहते थे । वहां छात्रों को नैतिक , व्यावहारिक शिक्षा दी जाती थी , गुरु और शिष्य के बीच एक अलग ही भक्तिमय सम्बन्ध होता था लेकिन आज वो कमी देखने को मिल जाती है। ये कहना उचित ही होगा कि हम भारतीय लोग अब चरित्र से चित्र तक सीमित हो गए। किसी महापुरुष कि विचारधारा को मारना हो तो उसको पूजना शुरू कर दो, उसके चित्र में डूब जाओ, विचारधारा से स्वतः सरासर दूर चले जाओगे । आज भले ही हम कितने ही गुरु ब्रह्मा , गुरु पूर्णिमा या शिक्षक दिवस मना ले, लेकिन आज की शिक्षा में नैतिक शिक्षा की कहीं न कहीं कमी जरूर नज़र आती है। आज जो हम समाज देख रहे है क्या उसमे नैतिक शिक्षा की कमी नज़र नहीं आती है?, मेरा कहने का मतलब ये भी नहीं की गुरु को देखते ही सपाट लेट जाओ लेकिन जिन मानवीय मूल्यों (जैसे ईमानदारी, अहिंसा प्यार, त्याग , सहयोग, समाजसेवा आदि) की कमी समाज में खल रही है शायद अब हुम्हे वापिस उस नैतिक शिक्षा पर जोर देना होगा तब ही एक स्वस्थ , समृद्ध , खुशहाल समाज का निर्माण हो सकता है। शिक्षक दिवस पर मैं सभी गुरुजनगणों का आभार व्यक्त करना चाहूंगा जिनके आशीर्वाद से आज मैं ऐसे मुकाम तक पहुँच पाया हूँ, अंत में यही कहकर मैं मेरी लेखनी को विराम देना चाहूंगा।


मेरे जीवन की लेखनी का वज़ूद आप से है,

मेरे सरल जीवन में गुरु आप कहीं खाश हो।

काजग, न कलम समर्थ है गुरु वर्णन में,

लेखन के हर शब्द में आपका आशीर्वाद हो॥



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