Laxmi N Jabadolia

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Laxmi N Jabadolia

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हवाई सफ़र-एक यादगार

हवाई सफ़र-एक यादगार

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हवाई जहाज जिसको बचपन मे हम चीलगाड़ी कहा करते थे, जैसे ही हमारे खेत के ऊपर से गुजरती थी, हम लोग अपनी फटी सी बनियान (चूँकि उस समय हमारे पास कमीज़ नही हुआ करती थी) को खोलकर लहराते हुए, हीरो की तरह हवाई जहाज के पीछे दौड़ते थे, मानो ऐसा लगता है कि फ़िल्म "रंग दे बसंती" का वो दृश्य हमारे बचपन की हरकतों से ही चुराया हो। चीलगाड़ी में बैठने की उस समय की वो ख़्वाहिश, आज पूरी हुई, आज मुझे दफ़्तर कार्य से कोच्चि (केरल)जाना था और इसके लिए मैं मेरी संस्थान का तहेदिल से कृतज्ञ हूँ। घण्टे भर की कड़ी सुरक्षा जाँच के बाद मैं हवाई जहाज के नज़दीक पहुंचा, हवाई जहाज इतनी बड़ी होती है, वो मैने आज देखा है। शायद रावण का उड़न खटोला (पुष्पक विमान) भी ऐसा ही होगा। इतनी ऊंची हवाई जहाज में चढ़ेंगे कैसे, मैं यही सोच रहा था कि झुँ झुँ की आवाज़ करते हुए एक समायोज्य उत्थापक (Adjustable lift) आयी और सीधा हवाई जहाज को हमारे वाले तल से संबंद्ध कर दिया। फिर जैसे ही उसमे से होकर हम लोग हवाई जहाज के मुख्य द्वार पर पहुंचे, एक मधुर सी आवाज़ मेरे कानों में आई, Welcome Sir, मैने सामने देखा तो एक सुंदर लड़की सामने स्वागत के लिए खड़ी थी, शायद ये हवाई सत्कारिणी (Air Hostess) थी, मैने भी मुस्कराते हुए "Thank you" कहा और अपनी सीट के लिए आगे बढ़ गया। क़िस्मत से मेरी सीट खिड़की के पास वाली थी ताकि मैं आसमान का पूरा नज़ारा अपनी आंखों से देख सकूँ। करीब दो सौ बैठक वाली आलीशान वातानुकूलित कुर्सियां देखकर मन प्रसन्न चित था। जैसे ही सब यात्रीगण अपनी अपनी कुर्सियों पर विराजमान हुए, उस सुंदर लड़की ने अपना नाम प्रतिभा बताते हुए चालक दल प्रबंधक (क्रू मैनेजर ) के रूप में परिचय दिया और अपने सभी क्रू सहकर्मियों व कैप्टन को भी परिचित करवाया, उसको देखकर मुझे नीरजा की याद आ गयी, जिसने अपना जीवन हवाई यात्रियों के लिए बलिदान कर दिया था और इसीलिए आज भी वो भारत व पाकिस्तान दोनों देशों के लिए यादगार बनी हुई है। जैसे ही हवाई जहाज उड़ने के लिए तैयार हुआ, सभी यात्रियों को सीट पेटी (belt) बांधने व प्राणवायु कम होने पर मुखावरण (mask) लगाने के लिए अनुदेश दिए गए। मैने फटाक से सीट पेटी लगा ली, पर देखा कि पड़ोस में बैठी एक मैडम अभी भी सीट पेटी बांधने का बार बार प्रयास कर रही थी। मैने मुस्कराते हुए उसकी सहायता की । उसने भी सहज लहजे में शुक्रिया अदा किया।

हवाई जहाज हवाई पट्टी पर खरगोश की तरह सरपट दौड़ती हुई आसमां में चिड़िया की तरह फ़ुर्र से उड़ गई। करीब 35000 वर्ग फीट की ऊँचाई पर चीलगाड़ी आसमान में बादलों को चीरते हुए आगे बढ़ रही थी, कभी धूप तो कभी बादलों की हल्की छांव। मैने खिड़की से धरती का नज़ारा देखा, स्वर्ग जैसा नज़ारा अति रमणीय था। नदी नाले लग रहे थे, झील तालाब, पहाड़ टीले और ऊँचे भवन एक कमरे जैसे लग रहे थे। हरे भरे खेत खलिहान और रूई के फ़ोहे जैसे तैरते हुए बादलों को देखकर, मेरा मन मोहित हो रहा था। शायद ऐसे ही सुन्दर नज़ारे को देखकर, भारत के प्रथम चंद्रयात्री राकेश शर्मा ने कहा था "सारे जहां से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा...।" एक डेढ़ घंटे तक नभगामी नज़ारा देखने के बाद, जब मैं हवाई जहाज़ के अंदर का दृश्य देखा, सभी यात्री अपने अपने पांच इंचीय चल दूरभाष में मस्त हो रखे थे। उन्हें देखकर ऐसा लगा कि आजकल ये व्हाट्सएप व फ़ेसबुकिया दुनिया तक ही संसार सीमित है वरना वो बसों का सफर भी मुझे याद है, जिसमे अनजान व्यक्ति भी हाथ पकड़कर भीड़ भरी मोटरगाड़ी में भाई आ जाओ कहकर चढ़ाया करते थे फिर पूरे रास्ते गपसप किया करते थे। धीरे धीरे मुझे भी सुस्ती आने लगी, सोचा चाय की चुस्की लिया जाए। मेने सोचा होगी 25-30 रुपये की, जल्दी से एक चाय ऑर्डर कर दिया, लेकिन जैसे ही 100 रुपये दाम सुना, मेरी तो सुस्ती बिना चाय पिये ही भाग गयी। आदमी शर्म से मर जाता है, मन मारके 100 रुपये दे दिए। चाय पीने के बाद भी, दो सौ सीटों वाले हवाई जहाज में मैं अकेला महसूस कर रहा था। अचानक धीरे से लेखनी ने मुझे पुकारा, लेखनी मेरी सबसे अच्छी मित्र है, जैसे ही मुझे अकेले पाई और झट से मेरे पास आ जाती है, वो मुझे कभी भी ऊबने(Bore) नही होने देती है, दोस्त होने भी ऐसे ही चाहिए। कभी तो लेखनी पूरी रात भर मेरे साथ रहती है। ऐसा देखकर, कभी कभार तो मेरी गृहणी को शक होता है कि कहीं ये लेखनी उसकी सौतन न बन जाए। लेकिन मैं लेखनी का दुःख समझ सकता हूं। पहले कलम मित्र(Pen Friend) हुआ करते थे जिससे लेखनी का मन बहल जाया करता था। आजकल की भागदौड़ भरी जिंदगी में लेखनी को सबने दूर कर दिया। शायद इसी वजह से ही लेखनी अब कुछ लोगों से ही प्यार करती है। मैने लेखनी से प्यार से हाथ मिलाया और उस खूबसूरत नज़ारे को अपनी यादगारस्वरूप कागज़ पर उतारने लग गया, मानो कोरा कागज भी इसी इंतज़ार में था, उसी समय मैने कागज कलम की दोस्ती को महसूस किया, वास्तव में दोनों एक दूजे के लिये ही बने हैं। उसी समय अचानक फिर सीट पेटी बांधने का अनुदेश हुआ, एक बार तो लेखनी को ऐसा ख़लल पा कर गुस्सा आया लेकिन वो कोचि हवाई अड्डे के खूबसूरत दृश्य को देखने के लिए, चुपचाप वापस जाके बैठ गई। कुछ ही देर में हवाई जहाज का अवतरण (Landing) हुआ और जब खिड़की से बाहर देखा तो सामने लिखा था- "विश्व के सर्व प्रथम, सौर प्रणाली स्वचालित कोच्चि हवाई अड्डे (World First Solar Powered Automated Kochchi Air Port Welcome You) पर आपका स्वागत है"। चूँकि कार्य ही पूजा है, मैं और मेरी लेखनी मुस्कराते हुए अपने कार्यालय के लिए चले गए।



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