Laxmi N Jabadolia

Drama


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Laxmi N Jabadolia

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कोरोना वायरस: एक सामाजिक चुनौत

कोरोना वायरस: एक सामाजिक चुनौत

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मनुष्य प्रकृति का सबसे सुंदर व बुद्धिमान प्राणी है बसर्ते वो अपनी बुद्धि व ज्ञान का उपयोग सही तरीके से करे। दुनिया में ऐसा कोई भी संकट या प्राकृतिक आपदा नहीं है जिससे मनुष्य जीत नहीं सकता चाहे वो किसी तरह की महामारी हो जैसे फ्लू, COVID-19 या अन्य विनाशकारी प्राकृतिक घटनाये । विज्ञान को कमजोर मत आंकिये , विज्ञान ने वो चीजे दी है जिसका उपयोग मानव कल्याण के उपयोगी सिद्ध हुआ है। मेरा विश्वास है कि आने वाले समय में विज्ञान की बदौलत मृत्यु भी ऐच्छिक होगी। 

किसी आपदा में विज्ञान का उपयोग के साथ साथ लोगों का सामाजिक योगदान काफी महत्वपूर्ण होता है । अभी सारा विश्व कोरोना वायरस महामारी से झूज रहा है हर एक राष्ट्र अपने स्तर पर सर्वोत्तम कर रहा है । अध्धयन से पता चला है कि कोरोना वायरस सामान्यतया किसी सतह पर कुछ घंटों लेकर से 9 दिनों तक जीवित रह सकता है, वायरस एक (परजीवी ) पैरासाइट होते है वो अपने आप में ग्रोथ नहीं करेगा जब तक कोई माध्यम उसको नहीं मिल जाये जैसी हवा कण , जल कण, कोई सतह या मानव शरीर आदि। लोग नमी हवा के माध्यम से और दूषित वस्तुओं को छूने के बाद कोरोनावायरस से संक्रमित हो सकते हैं। यह वायरस अपेक्षाकृत आकस्मिक संपर्क के माध्यम से काफी संक्रामक है। यदि आप उन वस्तुओं को छू रहे हैं जिन्हे किसी और ने हाल ही में संपर्क किया या छुआ है, तो ध्यान रखें कि वे दूषित हो सकते हैं और आपके हाथ दूषित हो सकते हैं। ये भी बताया है कि COVID-19 के लिए यात्रियों की थर्मल स्क्रीनिंग बहुत प्रभावी नहीं है। वायरस से संक्रमित लोग - जिन्हें आधिकारिक तौर पर SARS-CoV-2 नाम दिया गया है - वे यह जाने बिना या लक्षणों के प्रकट होने से पहले वायरस को फैला सकते हैं। इसकी ग्रोथ तापमान व आर्द्रता (रिलेटिव Humidity ) पर भी निर्भर करती है।

वायरस की ग्रोथ एक्सपोनेंशियल (घातीय ) होती है , वो मेज़बान (होस्ट) के डीएनए को खुद के डीएनए / RNA में बदल देता है। अभी तक देखा गया है कि कोरोना वायरस की संक्रामकता ज्यादा है लेकिन घातकता SARS व MERS की घातकता से कम है अतः यदि सावधानी बरती जाये तो इससे निपटा जा सकता है। और इसी के बचाव के लिए WHO और सरकार ने समय समय पर कुछ गाइडलाइन्स भी पब्लिक में जारी किया है जिनकी हुम्हे पालना करनी चाहिए जैसी , सोसिअल गेदरिंग से बचना, हाइजीन व सैनिटेशन, जो लोग बीमार हैं उनसे निकट संपर्क से बचें, अपनी आंखों, नाक और मुंह को छूने से बचें, बीमार होने पर घर पर रहें, खांसते या छींकते समय मास्क / कपडे का उपयोग आदि आदि । इसीलिए सरकार ने तारिख 22.03.20 को जनता कर्फ्यू की अपील की थी ताकि सोसिअल गाथेरिंग से बच सके और साथ ही ये भी अनुरोध किया किया है कि तारिख 22.03.20 को सांय 5.00 बजे ताली , थाली या घंटी बजाकर , जो लोग महामारी निपटने के लिए दिन रात देश सेवा में लगे हुए है , उनका प्रोत्साहन बड़ा सके। समय समय पर लॉक डाउन भी लगाया गया है । लेकिन चूँकि विज्ञान का उपयोग भी मनुष्य पर निर्भर है।

यदि मानव अपनी बुद्धि का सही उपयोग नहीं करता है तो संसार का सबसे मुर्ख प्राणी भी कहा जा है। आजकल सोसिअल मीडिया पर भिन्न भिन्न प्रकार के वैज्ञानिक पनप रहे है इससे अपने समाज के बौद्धिक स्तर का पता चलता है , भले ही विज्ञान या तकनीति अपने पास है लेकिन यदि उसका उपयोग सही काम के लिए न करके , गलत काम के लिए किया जाता है तो , न होने से ज्यादा घातक है । भारत में कुछ आदमी अपने स्वतन्त्र सोच का परिचय पाखंड , अन्धविश्वाश, मन गडित कहानियां / पद्दतियाँ या फिर धार्मिक प्रगाढ़ता और आजकल किसी भी issue को पॉलिटिकल दृष्टि से ही देखने में देता है, भले ही मुद्दा सम्पूर्ण देश / मानव जाति के कल्याण का ही क्यों न हो।

और ये ही नहीं , वाहट्सएप्प , फेसबुक यूनिवर्सिटी पर तो आजकल किसी भी डरावने वीडियो को एडिट कर , कोरोना के संक्रमण का नाम दिया जा सकता है जिससे आम लोगों में न चाहते हुए भी भय का माहौल पैदा हो रहा है ।अपने यहाँ जैसे ही माननीय प्रधानमंत्री जी ने जनता कर्फ्यू कीअपील की , रोज मर्रा के सामान , सब्जियों के दाम दो से तीन गुना हो गए, जमा खोरी शुरू हो गयी। इस महामारी में जहाँ अन्य देश में लोग, अपना निजी सामान भी मानव सेवा में लगा रहे है , अपने यहाँ पर मास्क की कीमत 5 गुना तक हो गयी , एक खबर के मुताबिक तो कुछ लोग उपयोग किये हुए मास्क को दुबारा भी बेचने में लगे हुए हुए है , सेनिटाइजर भी नकली बना बैठे । कोई कोरोना का ताबीज बेच रहा है , कोई कोरोना का झाड़ा लगा के पैसे कमाने में लगा है। कुछ खबर ऐसी भी देखी गयी है कि कोरोना योद्धाओं के साथ अमानवीय घटनाएं भी हो रही है जैसे मेडिकल टीम पर पथराव, मकान किराये नहीं देना आदि । बाद में सरकार की शक्ति के कारण इन लोगों पर सिकंजा कसा गया । 

मेरा मानना है कि माहमारी में सरकार से ज्यादा , लोगों की ज्यादा जिम्मेदारियां बनती है , जो विकसित देश है उनके लोग विकसित है, उनकी सोच विकसित है , इसीलिए किसी भी आपदा का डटकर मुकाबला करते है और फतह पा लेते है । कोरोना महामारी एक वैश्विक आपदा के साथ साथ एक सामाजिक चुनौती भी है और इस चुनौती में हम लोग अपनी जिम्मेदारी कैसे निभाते , ये अपने पर निर्भर करता है । हम्हे कोरोना वारियर्स / अति आवश्यक सेवाओं के कर्मचारियों का मनोबल बढ़ाना चाहिए जो अपनी जान जोखिम में डाल कर देश सेवा कर रहे है।

तथागत बुद्ध कहते है कि यदि हम किसी भी अनजान, निर्जन दुख या रोग की विपदा के सूखे रेगिस्तान मे फंस जाएं तो उससे निकलने का एक ही उपाय है, बस हम चलते रहें,चलते रहे, यदि हम नदी के बीच जाकर अपने हाथ पैर नहीं चलाएंगे तो निश्चित ही डूब जाएंगे। इसलिए जीवन मे ऐसे क्षण भी आते है जब लगता है कि बस..अब तो चारों ओर अंधेरा है,अब कुछ भी उम्मीद नहीं है, ऐसी परिस्थिति में अपने आत्मविश्वास और साहस के साथ डटे रह कर मुकाबला करना चाहिए क्योंकि हर समस्या या परिस्थिति का हल होता हैं, आज नहीं तो कल होता हैं. हर दशा बदलती है, प्रयास जारी रखो, चलते रहो लेकिन सही दिशा में चलो, चलने की गति की बजाय दिशा महत्वपूर्ण है। 

अतः वैज्ञानिक सोच रखते हुए सरकार के गाइडलाइन्स को अमल करते हुए, अपनी सामाजिक जिम्मेदारियों का परिचय देते हुए, इस वैश्विक आपदा को निपटने में सहयोग करे।

सबका मंगल हो........सभी निरोगी हो।


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