Laxmi N Jabadolia

Abstract


4.7  

Laxmi N Jabadolia

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टुकड़ा ज़मीन का

टुकड़ा ज़मीन का

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चरमर करती खटिया पर बाहर बैठा बीमार पन्ना लाल ने आवाज लगाई:- श्यामू, ओ! श्यामू , शायद उसको कुछ जरुरत थी, लेकिन श्यामू की पत्नी रूड़ी ने एक दो बार नज़र अंदाज़ कर फिर बोला " क्यों हमारा सिर खा रहा हैI जा ! अपने छोटे बेटे रामू के पास जा, क्या हमने तुम्हारे को पालने का ठेका ले रखा है, सुबह ही रोटी खिलाई थी और अब भूख भी लग गई। हमको दिया ही क्या है, जो हम तुम्हारे को रोटी खिलाये , सारा धन तो उसको दे दिया।"


छोटे बेटे का नाम रामु था । असल में उनका नाम रामलाल व श्यामलाल था लेकिन गांवों में नाम बिगाड़कर, छोटाकर बोलने की प्रथा है अतः सब उनको रामू व श्यामू या बड़े बूढ़े रामुडया , श्यामूडया कहकर पुकारते थे। दरअसल श्यामू बहुत दिनों से अलग रह रहा था ,और पन्ना लाल, पत्नी सहित अपने छोटे बेटे रामु के साथ रहता था, लेकिन एक ही मकान जो की पन्ना लाल का था , में अलग अलग कमरों में रहते थे अतः कभी कभार जब रामू घर से जल्दी खेत पर चला जाता तो सिकुड़ती हाड़मांस का पुतला पन्ना लाल श्यामू के पास गर्म रोटी सब्जी मांग लिया करता था लेकिन आज फिर हर बार की तरह उसकी आत्मा सूख कर रह गयी जब श्यामू की पत्नी रूड़ी ने रोटी के बजाय दुत्कार दिया। माता पिता अपनी औलादों को अपना पेट काटकर लालण पोषण करे , लेकिन उन्ही बेटों के पास उनके माता पिता के लिए रोटियां कम पड़ जाती है। आजकल यही विधि का विधान होता चला जा रहा है ।

जवानी में पन्ना ने खूब मेहनत मज़दूरी कर के अपने पास कुछ जमीन जायजाद जोड़ी थी । कुछेक भाग करीब एक साथ व कुछेक अगल अलग जगहों पर । आज रामू व श्यामू के पास जो भी है उसी की जमीन जायजाद है । श्यामू शादी होते ही अलग हो गया था और मज़दूरी कर के अपना गुजरा चलाया करता था। रामु श्यामू से बहुत छोटा था और देखा जा सकता है कि माता पिता अक्सर छोटे पुत्र के पास ही रहते है। पहले जमीन ऐसे ही शाब्दिक तौर पर ही बाँट लिया करते थे, रजिस्ट्री वैगराह बाद में होती रहती थी। सहकारी खेती के बारे आपने सुना होगा, आज भी लोगों की जमीन इदर उदर फसीं रहती है। रामू श्यामू ने भी कुछ ऐसे ही जमीन बाँट ली थी, रामू अपने पिताजी पन्ना के साथ बचपन से ही मज़दूरी या खेती के काम में ही लगा रहता था। करीब सत्तर अस्सी के दसक में सरकार द्वारा गरीब किसानो को , साहूकारी प्रथा से निवारण के लिए, कुछ जमीन के टुकड़े उनके नाम (अलॉटमेंट) किये थे ताकि उनका गुजारा चल सके। श्यामू अलग रहने लग गया था अतः उसके अलग जमीन अलॉटमेंट हुई हालांकि श्यामू ने उस जमीन को भूंगड़ो के भाव मे ही बेच कर खा पी ली थी। दूसरी तरफ रामु के न होकर उसके पिताजी पन्ना लाल के नाम अलग से जमीन अलॉटमेंट हुई। जमीन क्या थी , बल्कि एक अंजड़ टुकड़ा था । वो लम्बे लम्बे कूंचे, कंटीली झाड़ियां, रेत के ऊँचे ऊँचे धोरे, जिनको देखकर खेती तो दूर, जंगली जानवर , भूत प्रेत आदि से डर के मारे रूह कांपती थी । इसलिए पहले लोग खेती करना कम ही पसंद थे, मज़दूरी ज्यादा अच्छी थी लेकिन रामु ने खेती करना चाहा । न कुआं , न बावड़ी , न पानी का अन्य स्रोत, ऐसे में केवल मौसमी खेती ही कर सकते थे लेकिन उसके पहले जमीन को समतल बनाने के लिए अपना सब कुछ दाव पर लगाना पड़ सकता था। रामु ने भी साहूकार से ब्याजपर पैसे लेकर जमीन को समतल बनाकर कुछ भाग पर कैसे तैसे खेती शुरू की और धीरे धीरे अपना पेट पालने लगा । साहूकार के ब्याज का नाम सुनकर ही आत्मा सिहर उठती है , क़र्ज़ चुकाने में पीढ़ियां लग जाती है , और शायद छोटे किसानों की आजतक भी हालात इसी वजह से खराब है । रामू ने कैसे-तैसे जमीन को समतल करके मौसमी खेती करना शुरू किया, उसके पिताजी भी काम में हाथ बटाया करते थे । मौसमी खेती से पार नहीं पड़ती देखकर रामू ने खुद के नाम की जमीन के टुकड़े, जो की पन्ना लाल की जमीन सर सत्कार ही थी, में कुआं बनाया। छोटा-मोटा मेहनत मजदूरी भी कर लिया करता था जिसके भी घर का खर्च चल सके।


धीरे-धीरे वक्त गुजरता गया खेत में खड़ी फसलों को देख कर के श्यामू के मन में काला कपट पैदा हो गया वह सोचने लगा कि यह खेत तो आधे मेरे हैं। इस कुए में भी मेरा हिस्सा है, अब रोज का झगड़ा शुरू हो गया , आये दिन श्यामू दारू पीकर , रामू के खेत पर आकर कभी जमीन मांगता , कभी कुआं। श्यामू के मुँह से हमेशा यही कहते सुना जा सकता था , " रामूडया तेरे को बर्बाद करके छोडूंगा, तेरी आने वाली पीढ़ी को बर्बाद कर दूंगा ।" रोज-रोज के झगड़े से परेशान होकर रामू ने अपनी छोटी सी कुटिया एक खेत में ही बना दी थी ताकि अधिकतर समय खेत में ही गुजर सके। श्यामू फिर भी उसका पीछा नहीं छोड़ता था लड़ाई के लिए खेत में ही आ धमकता था कभी कभार तो खून खराबा भी हो जाता था चूँकि रामू तो छोटा भाई था, बड़ा भाई पिता समान होता है , श्यामू पर हाथ नहीं उठा सकता था , इसी का फायदा श्यामू उठा लेता था , और बिच बचाव में अगर उनके पिताजी आते तो , श्यामू पिताजी को भी पीटने से नहीं चूकता था ।

एक दिन हार के वो दिन आ ही गया, उस दिन बंटवारे का दिन था, सुबह सवेरे तड़के ही रामू ने पिता जी पन्नालाल को नहला धुला कर टूटी सी खटिया पर बैठा दिया। पंच पटेल आने वाले ही थे आजकल के पंच कैसे होते हैं वह बताने की जरूरत नही है, कहने को तो पंच परमेश्वर होते हैं लेकिन वास्तविकता कुछ और ही होती हैं, सही को सही और गलत को गलत ठहरने वाले बिरले ही मिलते है । आस-पड़ोस रिश्तेदारों में कई पंच पटेल आए। जैसा कि कोई भी प्रोग्राम हो, रामू के खेत में ही हुआ करता था, इससे श्यामू को फायदा ये होता था कि उसके घर का रोटी पानी का खर्चा बच जाया करता था, दूसरी तरफ खेत में खुली जगह मिल जाती थी , लेकिन रामू को इससे कोई ग्लानि नहीं होती थी, अतः इस बार भी पंच पटेल खेत में ही जमा हुए हैं, बड़ी बड़ी मूंछे व सफ़ेद धोती कुर्ता पहने मानो बगुले लग रहे थे। जाजम बिछाई गई। भैंस के दूध की मलाई मार के उबलती हुई चाय, पानी , गरमा गरम रोटियां सब्ज़ी व अन्य खाना पीना सब रामु के घर से ही आ रहा था। बेचारा पन्नालाल खटिया पर बैठा बैठा सब देख रहा था वह एक फटी सी बंडी (जेब वाली बनियान) पहना हुआ था । पन्नालाल को ऐसा लग रहा था कि बटवारा जमीन का नहीं उसके शरीर का होने वाला है आजकल के पटेल होते ही ऐसे हैं, वह केवल दोनों पक्षों को कैसे-तैसे करके निपटारा करवाना चाहते हैं, सही क्या है गलत क्या है वह मायने नहीं रखता है। कमजोर व गरीब पक्ष को ही हमेशा दबाया जाता है। कभी रामू को पूछे, तो कभी श्यामू को पूछे, लेकिन जिसकी जमीन है उसको कोई पूछ ही नही रहा था। न्याय का सिद्धांत तो ये कहता है कि जिसकी जमीन है उसकी सहमति अति आवश्यक है लेकिन पंच पटेल तो परमेश्वर ठहरे। जमीन का आपस में बंटवारा हुआ एकजाई जमीन थी वह रामू को दे दी गई क्योंकि रामू ने उसी जमीन के पास अपनी जमीन में कुआं बना लिया था और खेती करना शुरू कर दिया था और जो अन्य टुकड़े थे जो कि मुख्य सड़क पर स्थित थे व कीमती भी थे, वह श्यामू को दे दी गई । बूढ़े माता पिता को तो बेशक रामू के पास ही रखना था । अब रहा पुश्तैनी मकान जिसमे पन्नालाल रामू के साथ व श्यामू भी अलग अलग कमरों में रहा करते थे, वह श्यामू के हिस्से में दे दिया गया। जैसे ही मकान का बंटवारा हुआ पन्नालाल पंचों के पास छाती फाड़कर रोने लगा जैसे कि उसके खुद के टुकड़े हो गए हो आज पन्नालाल आँसू भरी आंखों से देख रहा था कि जिस मकान में उसने भाग भाग कर के पत्थर लगाए थे , जिस मकान को उसने अपनी मेहनत के खून से सींचा हो, जिस मकान की हर ईंट में उसकी आत्मा बसती हो, उसी मकान में उसे रहने के लिए एक कमरा भी नहीं दिया गया है। वो पंच पटेलों के फ़ैसलों से कतई सहमत नही था। वैसे तो सहमत श्यामू भी नही था , पूरा पुश्तेनी मकान मिलने के बाद भी उसको तो कुँए वाली आधी जमीन चाहिए ताकि कुआं में भी हिस्से की मांग पूरी हो जाये जबकि कुआं तो रामु ने बनवाया था। रामु भी खुश नहीं था क्यों कि कीमती जमीन व मकान तो श्यामू को दे दिया जा रहा था । कैसा फैसला था कोई खुश नहीं था , लेकिन पंच पटेल अपने मूंछों पर ताव दे रहे थे मानो उनकी जीत हुई हो । दोनों भाइयों में झगड़ा नही हो अतः चुपचाप इस दर्द को पन्नालाल ने अपने सीने में दबाये रखा और कुछ वर्ष बाद ही चल बसा। पटेलों के समझाने पर रामू ने तो जो भी फैसला सुनाया गया , उसको अपनी किस्मत समझकर स्वीकार कर लिया था । लेकिन श्यामू करीब 15-16 साल तक रामू से यही कहता रहता था कि उसको कुछ नहीं दिया । उसका मन कुए वाली जमीन में अटका हुआ था जो कि रामु की खुद की थी ।

रामू भी हमेशा यही कहता रहता था कि, कभी भी दुबारा जैसा वो चाहे वैसा फैसला कर ले लेकिन लड़ाई झगडे को ख़त्म कर दे। समय बीतता गया रामू ने फिर साहूकार से कर्ज लेकर खुद की जमीन गिरवी रखकर पक्का 1-2 कमरे खेत मे ही बना लिया। हालांकि पक्के कमरों की हैसियत नही थी लेकिन वो कुदरत व भगवान की परीक्षाओं से मजबूर था जो कि उसने पिछले कुछ सालों में कच्चे झोपड़ी में झेली थी। एक बार तो सब कुछ आग में स्वाहा हो गया था। दुबारा ऐसी ही कच्ची झोपड़ी में अपने दूध पीते बच्चों को लेकर रहने की उसकी हिम्मत नही बन पा रही थी। धीरे- धीरे मेहनत के खेत खलियान देख कर के रामू कभी कभार खुश हो लिया करता था कि अब जीवन मे शांति मिल जाएगी लेकिन उसकी खुशी हमेशा कुछ ही पल की रहती, फसल काटने के तुरंत बाद ही साहूकार का मोटा तगड़ा आदमी आकर रास (अनाज का ढेर) पर ही कम दामों में पूरी फसल का मोलतोल कर लेता। बेचारा रामु को खाने का अनाज भी कभी कभार तो साहूकार से वापिस अपने ही गेंहू ऊंचे दामों में खरीदना पड़ता। लेकिन हरे खेत देखकर श्यामू के मन में अभी भी लालच की ज्वाला उठ रहा थी यह वैसे ही थी जैसा कि महाभारत में पांडवों को इंद्रप्रस्थ देने व इन्द्रप्रस्थ को हरा भरा बनाने के बाद, दुर्योधन के मन में लालच का गुब्बार उठ रहा था। जैसे दुर्योधन पांडवों को पांच गांव भी देने को तैयार नही था वैसे ही श्यामू को भी रामू की खुशहाली फूटी कोडी भी नहीं सुहाती थी । दोनों भाइयों में लड़ाई अभी भी जारी थी शायद जमीन की नहीं , मन के लालच की थी। जैसे-जैसे जमीनों के भाव बढ़े, ग्रामीण क्षेत्र का शहरीकरण हुआ वैसे वैसे श्यामू ने अपनी जमीन बेचनी चाही, अब श्यामू का मन पंच पटेलों के 20 वर्ष पहले वाले फैसले को बदलना नहीं चाह रहा था लेकिन फिर भी उसका मन उस कुएं वाली जमीन में अटका हुआ था। बिना नामांतरण खोले बिकती नही। लड़ाई झगडे वापस शुरू, आए दिन सुबह शाम श्यामू , अपने बेटों के साथ साथ , छोटे भाई रामू के खेत में आकर रोज मारपीट करता और कभी जमीन मांगता तो कभी कुआं। एक दिन हार थक कर दोनों भाईयों में जमीनें का बंटवारा कानूनी तौर पर भी हो ही गया। दोनों भाइयों का मनमुटाव देख कर के रामू के पड़ोसियों के भी सिंह हो गए , चारों तरफ से आस-पड़ोस रोज 1 -1 हलाई कम करके रामू की जमीन पर अतिक्रमण करना शुरू कर दिया । हर पडोसी से थाना फौजदारी होती रही लेकिन थाने फौज़दारी का हाल तो पंच पटेलों से भी बदतर है। कई पुलिस वालों को अपराधियों के साथ गले मिलते देखा जा सकता है , बाहों में हाथ डाल के चलते फिरते देखा जा सकता है, मामले चलते रहे और रामू कमजोर होता गया। श्यामू को बड़ा मजा आता था छोटे भाई को दुखी देखकर। घर का भेदी लंका ढाये, आस पड़ोसियों को घर से ही रामू की कमजोरियों का पता चल कर वो मज़बूत होते गए। कहा जाता है कि आदमी संसार ले लड़ सकता है लेकिन घर वालों से हार जाता है , रामू का भी यही हाल हो रहा था । रामू की आधी से ज्यादा जमीन अब बंजर होने लग गयी थी, कुछ पानी के अभाव में और कुछ आस पड़ोसी, श्यामू भाई से लड़ाई व थाना फौजदारी से। मज़े केवल साहूकार के थे जिसके पास या तो गरीबों की जमीन गिरवी रखी थी या फिर कम दाम में खरीद ली गयी थी। रामू व श्यामू और आसपडोसी की लड़ाई का साहूकार ने जमकर फायदा उठाया था। अब श्यामू वृद्ध अवस्था मे पहुंच चुका है, चलने में सहारे की जरुरत पड़ने लग गयी है और रामू भी उसी अवस्था में पहुंचने की कगार पर है। आज रामू उसी टूटी हुई चारपाई पर लेटकर यही सोच रहा है कि काश ! ये टुकड़ा जमीन का होता ही नहीं। जितनी कीमत उस जमीन के टुकड़े की है, उससे ज्यादा तो नुकसान हो गया। थाना फौजदारी में ही खर्च हो गया। जो दोनों भाई आपस में मां की गोद में बैठने को भाग कर जाया करते थे, एक ही थाली में खाना खाया करते थे , आज उनके रास्ते ही अलग है । आज करीब करीब हर घर में रामू श्यामू जैसी कहानियां मिल जाएगी । रामू व श्यामू दोनों के घर में सब कुछ खुशहाल है दोनों परिवार अपना अपना गुजरा कर रहे है , लेकिन नही है तो बस केवल भाइयों का प्यार। आजकल जमीन के टुकड़े के लिए भाई भाई लड़ रहे है, आस पडोसी लड़ रहे है , सत्ताएं भी लड़ रही है , देश विदेश भी जमीन के टुकड़े के लिए ही लड़ रहे है । क्या जमीन का टुकड़ा इतना कीमती है , क्या इसके बिना भूखे मर जायेंगे , शायद नहीं! तो फिर क्यों लड़ रहे है, क्यों लूट रहे है, क्यों परिवार बिखर रहे है। शायद इन्ही सवालों का जवाब आज रामू खोज रहा है। 



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