शिखा श्रीवास्तव

Abstract


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शिखा श्रीवास्तव

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सबक बचपन का

सबक बचपन का

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'खुशी' और 'रोहन' एक-दूसरे के पक्के दोस्त थे। कक्षा से लेकर खेल के मैदान तक दोनों हर जगह साथ रहते थे।

उनकी शरारतों से घरवालों के साथ-साथ विद्यालय में भी सभी परेशान थे।

शिक्षक अक्सर ही दोनों को सज़ा देते फिर भी उन पर असर नहीं होता था।

पढ़ाई में ध्यान कम ही रहता था उनका। बस किसी तरह उत्तीर्ण हो जाते थे।

अब वो दोनों कक्षा 'एक' में आ चुके थे। लेकिन फिर भी वो ठीक से लिखना नहीं सीख पाए थे।

'विनोद सर' उन्हीं दिनों विद्यालय के नए निर्देशक बनकर आये थे।

उन्होंने जब रोहन और खुशी की जोड़ी को देखा तो उन्हें सुधारने की ठान ली।

विनोद सर ने बारी-बारी से दोनों को प्राध्यापक कक्ष में बुलाया और कुछ सवाल किए।

उन सवालों के जवाब से विनोद सर समझ गए कि दोनों अच्छे विद्यार्थी है बस थोड़ा ध्यान देने की जरूरत है।

बहुत सोच-विचार के बाद उन्होंने एक तरकीब निकाली।

अगले दिन जब फिर रोहन औऱ खुशी कक्षा में शरारत कर रहे थे, विनोद सर ने उन्हें देख लिया और कहा "आज से तुम दोनों की यही सज़ा है कि सारी कक्षाओं के दौरान तुम दोनों अलग-अलग बैठोगे। साथ बैठने की इजाजत उसी दिन मिलेगी जब परीक्षा में तुम्हारे अच्छे परिणाम आएंगे।"

विनोद सर से सभी बच्चे डरते थे।

मजबूरी में रोहन और खुशी को अलग होना पड़ा।

उन दोनों के लिए एक-दूसरे से बात किये बिना रहना असंभव था। दोनों का मन कक्षा में नहीं लग रहा था।

बहुत सोचने के बाद दोनों के नटखट पर तेज दिमाग ने एक तरकीब निकाली।

अब कक्षा में शिक्षक के आने से पहले और जाने के बाद दोनों पर्चियों पर अपनी बात लिखकर एक-दूसरे तक पहुँचाने लगे।

इसी तरह बातों-बातों में उनकी लिखावट भी सुधरने लगी।

साथ ही एक-दूसरे के साथ फिर से बैठने की उम्मीद में उन्होंने अपनी पढ़ाई पर भी ध्यान देना शुरू कर दिया।

तीन महीने के बाद विद्यालय में अर्धवार्षिक परीक्षा हुई।

विनोद सर ने कक्षा में परिणाम घोषित किये।

रोहन और खुशी सबसे ज्यादा नम्बरों से उत्तीर्ण हुए थे।

सारी कक्षा उनके लिए तालियां बजा रही थी।

विनोद सर ने उन दोनों से कहा "आज तुम दोनों के हौसले की जीत हुई है। इसलिए मैं तुम्हारी सज़ा खत्म कर रहा हूँ। लेकिन ध्यान रखना आगे अगर फिर कोई शिकायत मिली तो फिर से यही सज़ा मिलेगी।"

रोहन और खुशी ने कहा "सर, हम वादा करते है अब कभी शिकायत का मौका नहीं देंगे।"

उन दोनों के चेहरे पर आत्मविश्वास की चमक थी और विनोद सर प्रसन्न थे कि उनकी तरकीब से दो बच्चों का जीवन संवरने की दिशा में अग्रसर हो गया था।


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