शिखा श्रीवास्तव

Drama


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शिखा श्रीवास्तव

Drama


बंधन नेह का

बंधन नेह का

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"पार्थ, जरा इधर आना बेटे", शान्वी जी ने अपने बेटे को आवाज़ दी।

"क्या हुआ मम्मा ?" पार्थ ने स्टोर रूम में आते हुए पूछा।

"जरा ये सबसे ऊपर के खाने में रखा हुआ संदूक तो उतारो।" शान्वी जी ने कहा।

संदूक उतारते हुए पार्थ बोला "क्या रखा है इसमें मम्मा, जो ये इतना भारी है ?"

"इसमें मेरे-तुम्हारे हम सबके जीवन की मीठी-मीठी सी यादें है, पुराने अल्बम, तुम्हारे बचपन के खिलौने-कपड़े।" शान्वी जी मुस्कुराते हुए बोली।

पार्थ ने संदूक में रखे कुछ अल्बम्स निकालते हुए कहा "अरे वाह, मैं भी तो देखूँ।"

एक अल्बम के पन्ने पलटते हुए सहसा एक तस्वीर पर पार्थ की नज़र रुक गयी। उस तस्वीर में एक साल के पार्थ को तेरह-चौदह साल की एक लड़की राखी बांध रही थी। दोनों ही उस तस्वीर में बड़े प्यारे लग रहे थे।

"ये कौन है मम्मा ? मुझे कुछ याद नहीं आ रहा इनके बारे में।" तस्वीर दिखाते हुए पार्थ ने पूछा।

शान्वी ने कहा "अरे ये हमारी पुरानी कामवाली मुन्नी की बेटी 'काजल' है। ये फोटो तब की है जब तू एक साल का था। राखी का त्योहार था। काजल तुझे छोटे भाई जैसा ही स्नेह करती थी तो मैंने बोला कि वही बांध दे तुझे राखी क्योंकि और कोई बहन तो थी नहीं तेरी।

मुन्नी भी तुझे बहुत प्यार करती थी, तुझे लल्ला कहकर बुलाती थी दोनों माँ-बेटी। ये राखी भी काजल ने खुद बनाई थी।"

"अरे वाह, तस्वीर देखकर ही लग रहा है वो मुझे कितना स्नेह करती होंगी। अभी कहाँ रहती है काजल दीदी ?" पार्थ ने पूछा।

संदूक में रखी और चीजें देखते हुए शान्वी बोली "इन लोगों में तो कम उम्र में ही शादी हो जाती है तो अपने ससुराल में ही होगी। उस मोहल्ले को छोड़े पच्चीस बरस बीत गए। फिर मुलाकात भी नहीं हुई किसी से। अब तो बड़े-बड़े बच्चे होंगे इसके।"

अपनी माँ की बात सुनते हुए पार्थ ने कहा "देखो ना मम्मा, अगले ही महीने राखी है। कितने अच्छे वक्त पर ये तस्वीर मिली मुझे और पता चला कि मेरी भी कोई बहन है। इस बार मैं अपनी कलाई सूनी नहीं रहने दूंगा। अभी जाता हूँ काजल दीदी की माँ से उनके ससुराल का पता लेने।"

"तेरा इतना मन है तो जा पर खाने के वक्त तक आ जाना।" शान्वी ने कहा और वापस अपने काम में लग गयी।

उधर पार्थ कुछ ही देर में उस मोहल्ले में खड़ा था जहाँ वो कभी रहते थे। उनकी पुरानी कामवाली 'मुन्नी' जो काजल की माँ थी वो भी वहीं रहा करती थी।

लोगों से पूछते-पूछते आखिर पार्थ मुन्नी के घर पहुँच ही गया और दरवाजे पर दस्तक दी। आवाज़ सुनकर लगभग दस बरस की एक लड़की ने दरवाजा खोला।

"काजल दीदी की माँ यहीं रहती है ?" पार्थ ने पूछा।

"कौन है गुड़िया ?" उस लड़की को किनारे कर एक बूढ़ी सी महिला आकर दरवाजे पर खड़ी हो गयी और कौतूहल से पार्थ को देखने लगी।

इससे पहले की वो कुछ पूछती पार्थ ने कहा "आप ही मुन्नी मौसी है ?"

"मुन्नी तो मैं ही हूँ पर आप कौन है ?" मुन्नी ने हैरत से पूछा।

मुन्नी के पैर छूते हुए पार्थ ने कहा "मैं पार्थ, मेरा मतलब आपका 'लल्ला'। कुछ याद आया ?"

दिमाग पर जोर डालते हुए सहसा मुन्नी को पार्थ और उसका परिवार याद आ गया। पार्थ के सर पर हाथ रखते हुए वो रो पड़ी।

मुन्नी के आँसू पोंछते हुए पार्थ ने कहा "इतने बरस बाद आपका लल्ला आपसे मिलने आया है और आप रो रही है। चलिए मुस्कुराइए और मुझे घर में तो आने दीजिये। सारी बातें क्या दरवाजे पर ही कर लेंगी ?"

"अरे हाँ-हाँ लल्ला आओ ना, लेकिन ये घर तुम्हारे बैठने लायक नहीं बेटा।" मुन्नी हिचकते हुए बोली।

"ऐसा कुछ भी नहीं है मौसी", कहते हुए पार्थ घर के अंदर चला गया।

वो लड़की 'गुड़िया' जिसने दरवाजा खोला था हैरान सी इन दोनों की बातें सुन रही थी।

जब मुन्नी ने उससे कहा "जा, मामा जी के लिए कुर्सी तो ला तब पार्थ का ध्यान गुड़िया की तरफ गया।

'मामा जी' शब्द सुनते ही पार्थ ने पूछा "अरे क्या ये काजल दीदी की बेटी है ? मतलब दीदी ससुराल से आयी हुई है ?"

"वो अभागी क्या आएगी ससुराल से लल्ला, यहीं रहती है अपनी बेटी के साथ।" कहते हुए मुन्नी की आवाज़ भर्रा गयी।

"आप ऐसा क्यों कह रही है मौसी ?" पार्थ ने हैरानी से पूछा।

तब मुन्नी ने किसी तरह खुद को संयत करते हुए बताया "हमारे यहां सोलह बरस की होते-होते लड़कियों की शादी कर देना अच्छा मानते है, लेकिन काजल के गहरे रंग के कारण कोई लड़का इसे पसंद ही नहीं करता था। जब ये बीस पार कर गयी तब आखिरकार हारकर हमने एक बड़े उम्र के लड़के से इसकी शादी कर दी ताकि समाज में ताने ना मिले। लेकिन वही हमारी सबसे बड़ी गलती बन गयी। वो आदमी नशे की लत का शिकार था और नशे में रोज रात इसके साथ मारपीट करता था। कई-कई दिन इसे भूखा छोड़ देता था। फिर भी इसने हमें कुछ नहीं बताया और चुपचाप सहती रही। किसी तरह दिन कट रहे थे। अक्सर कई-कई दिनों के लिए घर से भाग जाता।पूरे दस बरस बाद गुड़िया का जन्म हुआ तब लगा कि शायद सब ठीक हो जाएगा लेकिन एक तो इतने सालों के बाद संतान का जन्म और वो भी बेटी, ये खबर सुनते ही ना जाने उस आदमी पर कैसा खून सवार हो गया कि उसने मेरी फूल सी बच्ची का सर दीवार से भिड़ा दिया। दिमाग पर चोट लगने के असर से मेरी कजली पागल हो गयी। तब यहां सबसे झगड़ा करके मैं उसे और उसकी बेटी को लेकर आ गयी। कैसे मरने के लिए छोड़ देती लल्ला, है तो मेरा ही खून।"

मुन्नी की बातें सुनकर पार्थ रो पड़ा। कुछ वक्त के लिए उसे समझ ही नहीं आया कि क्या कहे।

फिर किसी तरह खुद को संयत करते हुए पूछा "सबसे लड़कर क्यों लाना पड़ा आपको दीदी को यहां ? यहां तो सब उनके अपने ही है ना।"

"क्या 'अपने' लल्ला, इस समाज का तो तय नियम है कि लड़की की डोली मायके से और अर्थी ससुराल से ही निकलनी चाहिए, और अगर ऐसा ना हो तो समाज स्त्रियों पर ही तोहमत लगा देता है। कजली के दोनों भाई और पिता शादी के बाद इसका बोझ नहीं उठाना चाहते थे। जब मैं इसे यहां लेकर आयी तो सबने कहा कि इसे और इसकी बेटी को वहीं छोड़ आऊं, इसे अच्छा घर-वर नहीं मिला ये इसका भाग्य था। वो तो ये घर मैंने किसी तरह जोड़-तोड़ करके बनवाया था इसलिए मैं भी अड़ गयी। तब मेरे दोनों बेटे और पति घर छोड़कर चले गए।" बड़ी मुश्किल से जब्त किए हुए मुन्नी के आँसू इस बार छलक उठे।

पार्थ ने खामोशी से अपना हाथ मुन्नी के हाथ पर रख दिया मानों कहना चाह रहा हो "मैं समझता हूँ आपका दुख।"

इनकी बातें चल ही रही थी कि अचानक बर्तन गिरने की आवाज़ आयी। गुड़िया आवाज़ की दिशा में भागी।

"उफ्फ, लगता है कजली फिर उठकर रसोई में पहुँच गयी", कहती हुई मुन्नी भी उधर जाने के लिए उठी।

पार्थ भी पीछे-पीछे पहुँचा तो देखा फटेहाल स्थिति में काजल एक थाली हाथ में लिए उसे चाट रही थी। ये देखकर उसका मन पीड़ा से भर उठा।

"देख ना लल्ला, रोज तरह-तरह के पकवानों की ज़िद करती रहती है, मैं झूठ ही कह देती हूँ कि रखा है थाली में तो इसी तरह थाली उठाकर चाटती है। इस उम्र में अब ज्यादा काम भी तो नहीं होता मुझसे की ज्यादा पैसे कमा पाऊँ। कहाँ से लाऊँ मैं पकवान ? इसकी दवा के लिए ही पैसे अक्सर कम पड़ जाते है।" पीड़ा भरी नजरों से काजल को देखते हुए मुन्नी बोली।

सहसा पार्थ काजल के पास जाकर खड़ा हो गया और उसके हाथ से थाली लेकर बोला "क्या-क्या खाएगी मेरी दीदी, मुझे बताएगी क्या ?"

"तुम लाकर दोगे ? तुम खिलाओगे मुझे अच्छी-अच्छी चीजें ?" काजल ने मासूमियत से पूछा।

पार्थ ने उसके बालों को सहलाते हुए कहा "हाँ-हाँ, मैं आपको सब खिलाऊंगा, आखिर आप मेरी दीदी जो है।"

"दीदी ? मैं दीदी हूँ तुम्हारी ? तुम राजू-पप्पू हो क्या ?" काजल ने अपने दोनों भाइयों का नाम लेते हुए पूछा।

"नहीं दीदी मैं आपका 'लल्ला' हूँ।" पार्थ के ये कहते ही काजल तालियां बजा-बजाकर हँसते हुए कहने लगी "देखो-देखो इतना लंबा लल्ला।"

उसे यूँ हँसता देखकर पार्थ को बहुत अच्छा लग रहा था। मुन्नी और गुड़िया भी हैरान थी कि पहली बार काजल ने किसी अजनबी, खासकर पुरुष को देखकर हिंसक व्यवहार नहीं किया था वो भी तब जब पार्थ ने उससे उसकी थाली भी ले ली थी। शायद नेह के बंधन का अहसास उन्हें एक-दूसरे से जोड़ रहा था।

काजल अब एक-एक करके पकवानों के नाम पार्थ को गिना रही थी।

जब उसकी बात खत्म हो गयी तब पार्थ ने कहा "दीदी आप बस थोड़ा वक्त दीजिये, आपका भाई यूँ गया और यूँ आया।"

मुन्नी पार्थ को रोकती रह गयी लेकिन वो निकल गया। अपने घर पर फोन करके उसने कह दिया कि उसे आने में शाम हो जाएगी।

शान्वी जी ने कारण पूछा तो पार्थ ने कहा "फोन पर नहीं बता पाऊंगा मम्मा। आकर बताता हूँ सब।"

एक घण्टे बाद शहर के सबसे अच्छे रेस्टोरेंट से वो काजल की बतायी हुई सारी चीजें और सबके लिए नये लेकर हाज़िर था।

लेकिन तब तक काजल दवा के असर से सो चुकी थी।

उसके जागने का इंतज़ार करते हुए पार्थ वहीं रुका हुआ था।

हिम्मत करके उसने मुन्नी से पूछा "मौसी, दीदी इस तरह फटे-पुराने कपड़ो में, बिखरे बालों में क्यों रहती है ?"

"बेटा, हमने बहुत कोशिश की इसे ढंग से रखने की लेकिन अच्छे कपड़े देखते ही ये मार-पीट करने लगती है, एक रात नींद में ही किसी तरह इसकी चोटी कर दी तो जागने पर इसने रोते हुए अपने बाल ही जला दिए। इसलिए अब हमने ज़िद करना ही छोड़ दिया है।" मुन्नी ने बेबसी से कहा।

एक पैकेट मुन्नी के हाथ में रखते हुए पार्थ बोला "आप कहें तो मैं एक बार कोशिश करूँ ?"

मुन्नी ने देखा उस पैकेट में काजल के साथ-साथ गुड़िया और उसके लिए नए कपड़े थे।

"नहीं लल्ला, मैं तुझ से ये सब नहीं ले सकती। तू कोशिश कर लेकिन मैं उसके लिए इसके पुराने सही-सलामत कपड़े निकाल देती हूँ।" मुन्नी ने कहा।

पार्थ पैकेट वापस लेने से मना करते हुए बोला "अच्छा क्यों नहीं ले सकती आप मुझसे ? लल्ला भी कहती है और औपचारिकता भी निभाती है। वैसे भी आज पहली बार मैंने अपनी भांजी को देखा है तो खाली हाथ अच्छा लगता है क्या ? फिर दीदी ने मुझे जो राखी बांधी थी उसका तोहफा भी तो देना बनता है। ये मेरा हक है।"

"तू तो जन्मजात ज़िद्दी है बिल्कुल अपनी माँ की तरह। जा ठीक है मैं हारी तू जीता।" मुन्नी बोली।

तभी काजल की आवाज़ आयी "अरे लल्ला भैया, तुम आ गए ? कहाँ है पकवान ? दो ना।"

पार्थ ने खाने के डिब्बे दिखाते हुए कहा "हाँ दीदी सब ले आया हूँ, लेकिन खाने से पहले आपको मेरी एक बात माननी होगी।"

"मैं सब मानूँगी, जल्दी बोलो," काजल ने डिब्बों की तरफ देखते हुए बाल-सुलभ भोलेपन से कहा।

तब पार्थ ने उसके हाथ में नए कपड़े और कंघी रखते हुए कहा "आपको ये कपड़े पहनने होंगे और बाल भी बनाने होंगे मेरी अच्छी दीदी की तरह।"

कपड़ों और कंघी को देखते ही सहसा काजल जोरों से रो पड़ी और रोते-रोते बोली "नहीं पहनने मुझे अच्छे कपड़े, नहीं बनाने बाल, फिर सब मुझे पकड़ कर वहीं छोड़ आएंगे। वो बहुत मारेगा मुझे। नहीं जाऊंगी मैं।"

पार्थ ने काजल को संभाला और उसके आँसू पोंछते हुए कहा "अपने भाई पर भरोसा रखिये दीदी। कोई आपको कहीं नहीं भेजेगा। आप अब अपने भाई के पास रहेंगी हमेशा। आपका ये भाई किसी को भी आपके पास नहीं आने देगा।"

"हाँ सच्ची ? मैं नए कपड़े पहनूँगी तब भी मुझे कहीं नहीं जाना होगा ? तुम मेरे पास रहोगे लल्ला भैया ? और अच्छा-अच्छा खाना भी दोगे ? झूठ तो नहीं बोल रहे ?" पार्थ की तरफ देखते हुए काजल बोली।

"नहीं दीदी, मैं बिल्कुल झूठ नहीं बोल रहा। आपको कहीं दूर नहीं जाना होगा बस अपने इस भाई के घर तक चलना होगा जो अब आपका भी घर है। मैं, आप, गुड़िया, मौसी हम सब चलेंगे। और कोई नहीं आएगा वहां।" काजल को आश्वस्त करते हुए पार्थ बोला।

उसकी बात सुनकर काजल को तसल्ली हुई और वो तुरंत ही नए कपड़े पहनकर आ गयी और खुद कंघी देकर अपनी माँ से बाल बनवाये।

बरसों बाद आज काजल के चेहरे पर रौनक आयी थी और उसे यूँ देखकर मुन्नी और गुड़िया की खुशी छुपाए नहीं छुप रही थी।

पार्थ ने खुद अपने हाथों से काजल को खाना खिलाया। पेट भर खाने के बाद काजल वहीं एक कोने में सो गयी। आज पहली बार उसे सोने के लिए दवा की जरूरत नहीं पड़ी थी।

अब मुन्नी ने पार्थ से कहा "लल्ला, अब तू जा। बहुत देर हो गयी है।"

"ऐसे कैसे चला जाऊँ मौसी, मैंने दीदी से कहा है उन्हें साथ लेकर जाऊंगा, अपने पास रखूंगा।" पार्थ बोला।

मुन्नी ने समझाते हुए कहा "नहीं-नहीं लल्ला, तू भावुकता में ऐसा कोई फैसला ना ले जो गलत हो। इसकी जगह यहीं है। तू अब जा। कभी-कभी आ जाना मिलने। मैं समझा दूंगी इसे किसी तरह।"

"बिल्कुल नहीं मौसी, ये भावुकता में लिया गया फैसला नहीं है, अब तो ये भाई अपनी बहन और भांजी को लेकर ही जायेगा।

मामा में 'दो माँ' छुपे है, तो गुड़िया के प्रति मेरी जिम्मेदारी दोहरी हुई ना। इसे तो निभाना ही है। इतनी प्यारी सी भांजी को पढ़ा-लिखाकर इसका भविष्य संवारना है। और आप भी चल रही है मेरे साथ।" पार्थ ने पूरे आत्मविश्वास से कहा।

"हाँ मामाजी, हमें ले चलो, मुझे बहुत पढ़ना है, बहुत बड़ा बनना है आपकी तरह। यहां गली के विद्यालय में कुछ नहीं पढ़ाते।" गुड़िया पार्थ के पैरों पर झुकते हुए बोली।

उसे रोकते हुए पार्थ ने कहा "पगली, तुझे किसी ने बताया नहीं मामा के पांव नहीं छूते।"

पार्थ का ये सरल-सहज व्यवहार देखकर मुन्नी का मन भर आया।

उसने कहा "ठीक है बेटा, तू अपनी बहन और भांजी को ले जा। हक है तेरा मैं नहीं रोकूंगी। लेकिन मैं नहीं आ सकूंगी। अंतिम सांस इसी घर में लेने की इच्छा है जहां कभी दुल्हन बनकर आयी थी। मेरी चिंता मत करना। मैं खुद आकर तुम सबसे मिलती रहा करूँगी।"

पार्थ ने इस वक्त और ज़िद करना ठीक नहीं समझा। उसने कहा "लेकिन वादा कीजिये मौसी किसी भी तरह की दिक्कत होने पर कोई परेशानी होने पर आप तुरंत मुझे बताएंगी। अब आप अकेली नहीं है ये मत भूलिएगा।"

"नहीं रे पगले, जिस दिन शरीर थक जाएगा तुझे बुला लूंगी पूरे हक से अपनी सेवा के लिए।" मुन्नी ने पार्थ के सर पर हाथ रखते हुए कहा।

कुछ देर के बाद जब काजल जगी तो पार्थ ने उससे पूछा "दीदी, अपने भाई के घर चलोगी ?"

काजल ने तुरंत मुस्कुराते हुए 'हाँ' में सर हिला दिया।

काजल और गुड़िया को लेकर जाते हुए पार्थ को मुन्नी नम आँखों से देख रही थी, साथ ही मन ही मन अपने लल्ला को ढ़ेरों आशीष भी दे रही थी।

उन्हें साथ लेकर जब पार्थ अपने घर पहुँचा तो शान्वी जी और उनके पति नीरज जी को देखकर काजल डरकर पार्थ के पीछे छुप गयी।

काजल का हाथ पकड़ते हुए पार्थ बोला "डरो नहीं दीदी, ये तो तुम्हारे मौसी-मौसा जी है।"

फिर पार्थ ने अपने माँ-पापा को सारी बातें बताई। काजल और गुड़िया के सर पर हाथ रखते हुए शान्वी जी बोली "आज से ये तुम्हारा घर है। कोई जरूरत हो तो बेहिचक बोलना।"

उन दोनों ने चुपचाप 'हाँ' में सर हिला दिया और पार्थ के साथ अपने कमरे में चली गयी।

नीरज जी शान्वी से बोले "जिसे तुम हमेशा छुटकू-छुटकू बुलाती रहती हो, देखो आज वो कितना बड़ा हो गया है कि अपनी जिम्मेदारियां समझने लगा है।"

"हाँ, इसलिए आज से इसका नाम ' बड़कू" बोलते हुए शान्वी जी हँस पड़ी।

थोड़ी देर में पार्थ वापस उनके पास आया और बोला "माँ-पापा मैं दीदी की मानसिक हालत की वजह लगभग समझ गया हूँ। इसलिए सोच रहा था क्यों ना कल दफ्तर से छुट्टी लेकर उन्हें कल ही डॉक्टर खुराना के यहाँ ले जाऊँ। आखिर वो हमारे शहर के सबसे अच्छे मनोचिकित्सक है। और गुड़िया के लिए सोच रहा था कि विद्यालय का अगला सत्र तो अब अगले साल से ही शुरू होगा। तब तक क्यों ना घर पर ही ट्यूटर रखकर उसे पढ़ाये और दाखिले के लिए तैयार करें।"

"तुमने बिल्कुल ठीक सोचा है बेटे। हम भी हरसंभव तुम्हें सहयोग देंगे।" शान्वी और नीरज बोले।

अगले ही दिन से पार्थ ने काजल की चिकित्सा और गुड़िया की पढ़ाई शुरू करवा दी।

जब भी वक्त मिलता वो खुद भी गुड़िया को पढ़ाता, उसके और काजल के साथ खेलता।

उन्हें खुश देखकर वो बहुत खुश होता।

अगले दिन राखी का त्योहार था। पार्थ ने काजल से कहा "बाज़ार चलो दीदी, राखी नहीं खरीदोगी ?"

कुछ याद करते हुए काजल बोली "मैं क्यों खरीदूं, मुझे तो राखी बनानी आती है।"

"अरे वाह फिर तो बहुत मज़ा आएगा।" पार्थ और गुड़िया उत्साह से बोले।

काजल के बताए अनुसार राखी बनाने का सारा सामान पार्थ लेकर आ गया।

काजल ने बड़ी ही सुंदर सी राखी बनाई जैसी कभी एक साल के पार्थ को बांधी थी।

राखी की सुबह मुन्नी भी आई हुई थी। काजल में आये हुए बदलावों को देखकर और गुड़िया की किताबें देखकर अब उसे बहुत तसल्ली थी। उसने पार्थ के सर पर हाथ रखते हुए कहा "लल्ला, तू किस पुण्य के फल से मुझे मिला रे की इस अभागी मौसी की खाली झोली को इतनी खुशियों से भर दिया जो हमने कभी सपने में भी नहीं सोचा था।"

"कुछ मत कहो मौसी, बस आशीर्वाद दो की तुम्हारा लल्ला अपनी जिम्मेदारी अच्छी तरह से निभा सके।" पार्थ बोला।

"अब बातें बंद, राखी का मुहूर्त आ गया। जल्दी-जल्दी आइए सब लोग।" राखी की थाली लेकर आती हुई गुड़िया ने कहा।

आज एक बार फिर पार्थ की कलाई काजल की बांधी हुई राखी से सज गयी थी।

दोनों भाई-बहन इस क्षण में भावुक और खामोश हो गए थे।

तभी खामोशी तोड़ते हुए गुड़िया बोली "जल्दी-जल्दी मामा जी को मिठाई खिलाओ ना, मुझे भी तो खानी है।"

उसकी बात सुनकर सभी हँस पड़े। बर्फी का टुकड़ा गुड़िया के मुँह में रखते हुए पार्थ बोला "पहले मामा खाये या भांजी, बात तो एक ही है।"

शान्वी जी ने पार्थ और काजल के सर पर हाथ रखते हुए कहा "कितने गजब के है हम भारतीयों के रीति-रिवाज, हमारी परंपराएं और मान्यताएं। राखी का एक धागा आपको किसी के साथ ऐसे बंधन में बांध देता है की पुरुष-स्त्री, अपना-पराया, सगा-सौतेला ये सभी शब्द अपना अस्तित्व खो देते है, कुछ रह जाता है तो बस नेह का बंधन, उससे जुड़ी प्यारी सी जिम्मेदारी।"

सबके मुस्कुराते हुए चेहरों को कैमरे में कैद करते हुए नीरज जी का चेहरा भी गर्व से चमक रहा था कि उनका बेटा इतनी अच्छी और ऊंची सोच रखता है।

मात्र एक धागे ने आज सबके जीवन में कभी ना मिटने वाली खुशियां भर दी थी।


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