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शिखा श्रीवास्तव

Drama


4  

शिखा श्रीवास्तव

Drama


खुशियों की शहनाई

खुशियों की शहनाई

19 mins 251 19 mins 251

शहनाई की मधुर धुन आज राधा जी के घर के साथ-साथ पूरे मोहल्ले में खुशियों की तरंगें बिखेर रही थी।

ऐसा लग रहा था मानो घर के सदस्यों के साथ-साथ घर का हर एक कोना भी खुशी से झूम रहा था।

आख़िरकार पूरे पाँच वर्ष के बाद इस घर ने ऐसी रौनक देखी थी, इसलिए सब लोग बहुत ज्यादा उत्साहित थे।

कोई गीत गुनगुनाते हुए राधा जी घर के मंदिर की तरफ जा रही थी कि तभी उनकी बेटी मिहिका ने आकर कहा "अरी ओ माँ, गीत बाद में गा लेना पहले जरा चलकर देख तो लो तुम्हारी लाडली के हाथ में मेहंदी ठीक से रची है या नहीं वरना बाद में मेरी शिकायत करती फ़िरोगी।"

"तूने लगाया है तो अच्छा ही लगाया होगा। फिर भी चल।" कहती हुई राधा जी मिहिका के पीछे चल पड़ी।

कमरे में बैठी थी सौम्या, जिसके विवाह की शहनाई घर में गूंज रही थी।

राधा जी ने मेहंदी रची हुई सौम्या की हथेली देखी तो तुरंत अपने पल्लू में बंधी चाभियों का गुच्छा मिहिका को देकर बोली "जा जरा रुपये तो निकालकर ले आ। अपनी बेटी की खुशियों की नज़र उतार दूँ।"

सौम्या को प्यार भरी नजरों से देखती हुई राधा जी ने सहसा देखा कि उसकी आँखों से आँसू बह रहे हैं।

उन आँसुओं को अपने आँचल की कोर से पोंछते हुए राधा जी बोली "अरे क्या बात हो गयी बिटिया? तुम्हारी आँखों में ये आँसू क्यों?"

"कुछ नहीं माँ बस आपका प्यार देखकर मन भर आया।" सौम्या ने आहिस्ते से कहा।

"पगली कहीं की। खबरदार जो अब इन सुंदर आँखों में आँसू लायी तो। अब इनमें सुंदर-सुंदर सपने सज़ा।" कहती हुई राधा जी ने सौम्या को हृदय से लगा लिया।

अब तक मिहिका भी आ चुकी थी।

उसने इस दृश्य को देखकर मजाकिया अंदाज में कहा "वाह माँ सारा दुलार सिर्फ बड़ी बिटिया को। छोटी को कुछ नहीं।"

"अरे तू भी आ जा। तुम दोनों तो मेरी जान हो, घर की शान हो।" राधा जी ने मिहिका को भी अपने अंक में समेटते हुए कहा।

अपनी बेटियों को दुलार करती हुई राधा जी की आँखों के आगे पाँच वर्ष पूर्व की घटनाएँ किसी चलचित्र की भाँति चलने लगी थी।

राधा जी और मनोहर जी के दो बच्चे थे, बड़ा बेटा कमल और उससे छोटी बेटी मिहिका।

दोनों ही बच्चों को उन्होंने पढ़ा-लिखाकर आत्मनिर्भर बना दिया था।

पेशे से बैंक पीओ मिहिका की शादी भी एक बैंक ऑफिसर राजीव से करके उसकी तरफ से वो निश्चिन्त हो चुके थे।

अब बारी थी कमल के विवाह की, जो बिजली विभाग में इंजीनियर था।

किसी रिश्तेदार के यहाँ एक आयोजन में राधा जी और मनोहर जी दोनों को ही सीधी-सादी प्यारी सी तेईस वर्षीय सौम्या भा गयी और कमल की सहमति से उन्होंने सौम्या के साथ उसका रिश्ता पक्का कर दिया।

सौम्या और उसका परिवार भी इस रिश्ते से बहुत खुश थे।

एक ही महीने बाद सौम्या बहू बनकर उनके घर आ गयी। सारा घर खुशियों से चहक उठा था।

लेकिन शायद किस्मत को ये खुशी ज्यादा दिन रास नहीं आयी।

विवाह के तीन ही महीने बाद दफ़्तर से लौटते हुए एक सड़क दुर्घटना में कमल की मृत्यु हो गयी।

सारे परिवार पर दुख का पहाड़ टूट पड़ा। अपनी नई-नवेली बहू को श्रृंगार-विहीन देखकर राधा जी और मनोहर जी का हृदय मानों फट पड़ता था।

खैर दुनिया के रीति-रिवाज तो निभाने ही थे। जैसे-तैसे करके कमल की तेरहवीं संपन्न हुई।

सभी रिश्तेदार लगभग जा चुके थे। बस सौम्या के माता-पिता और भाई अभी वहीं थे।

जब उनके जाने का वक्त हुआ था तब सौम्या के भाई नीरज ने कहा "सौम्या भी तो अब हमारे साथ ही जायेगी।"

उसकी बात सुनकर राधा जी बोली "आपकी बेटी पर पहला हक आपका है। आप लोग चाहें तो उसे ले जा सकते हैं।"

उनकी बात सुनकर सौम्या की माँ इंदु जी बोली "देखिये बहन जी हम जानते हैं कि ये दुख बहुत बड़ा है और इसकी भरपाई नहीं की जा सकती। लेकिन अब जो ज़िंदा हैं उनके विषय में तो सोचना ही पड़ेगा।"

"जी आप बिल्कुल सही कह रही हैं। मैं सौम्या को बोलती हूँ अपना सामान पैक कर ले।" राधा जी ने मायूस आवाज़ में कहा।

राधा जी की बात सुनकर इंदु जी बोली "नहीं-नहीं बहन जी रुकिये। मेरी बात सुन लीजिये। मेरे कहने का मतलब था कि दामाद जी के साथ अब तो सौम्या की खुशियाँ भी मर गयी। लेकिन मेरी एक और बेटी, फिर बेटा ज़िंदा है।

सौम्या को साथ ले जाकर मैं इनकी खुशियाँ नहीं छीन सकती।

आखिर हमें भी इस समाज में रहना है। घर में विधवा बेटी देखकर ना दूसरी बेटी के लिए अच्छे रिश्ते आयेंगे और ना कोई बहू ही ज़िन्दगी भर साथ रहने वाली ननद को स्वीकारेगी।

इसलिए अगर आप उसे यहाँ रखना चाहती हैं तो रखिये वरना किसी विधवा-आश्रम भेज दीजिये।"

"क्या? विधवा-आश्रम? ये आप कैसी बात कर रही हैं बहन जी? आखिर वो आपकी बेटी है।

और भाईसाहब आप क्यों चुप हैं? आप तो कुछ कहिये।" राधा जी ने इंदु जी के साथ-साथ सौम्या के पिता चंदन जी को तरफ सवालिया निगाहों से देखते हुए कहा।

चंदन जी ने सीधे-सपाट शब्दों में जवाब दिया "मैं क्या बोलूँ बहन जी? इंदु ठीक ही कह रही है। सौम्या हमारी जिम्मेदारी तब तक थी जब तक हमने उसे विदा नहीं किया था। अब वो जाने और उसकी किस्मत।"

नीरज ने कुछ कहना चाहा लेकिन उसके माँ-पापा ने डपटकर उसे चुप करवा दिया।

सारी बातों को सुनने के बाद राधा जी बोली "ठीक है फिर। तो अब आप लोगों के यहाँ बैठने का क्या औचित्य है। और फिक्र मत कीजियेगा मेरे मन में पहले भी सौम्या को कहीं भेजने का ख्याल नहीं आया था और ना अब आयेगा।

वो तो नीरज की बात सुनकर लगा कि शायद आप लोग...।"

"आप खुद ही ये फैसला ले रही हैं बहन जी? एक बार भाईसाहब से तो पूछ लीजिये की वो विधवा बहू को घर में रखना चाहते हैं या नहीं।" इंदु जी ने कहा।

उनकी इस बात का जवाब देते हुए राधा जी बोली "मुझे किसी से कुछ पूछने की आवश्यकता नहीं है। अपने पति पर मेरा भरोसा कम हो सकता है लेकिन अपनी बेटियों के पिता पर नहीं।

आज तक हमारी एक बेटी थी, अब भगवान की कृपा से दो हैं।"

पर्दे के पीछे चुपचाप खड़ी सौम्या ने भी सारी बातें सुन ली थी।

अपनी माँ की कही हुई बातें सुनकर उसकी आँखों से आँसुओं की धार बहती ही जा रही थी।

तभी मनोहर जी, मिहिका और राजीव भी वहाँ आ पहुँचे।

मिहिका ने रोती हुई सौम्या को देखा तो उसके आँसू पोंछकर उसे दिलासा देने लगी।

तभी राधा जी की आवाज़ आयी "सौम्या बेटी यहाँ आओ।"

सौम्या के आने पर उन्होंने उससे कहा "मैं जानती हूँ तुम सारी बातें सुन चुकी हो। अब तुम्हारे माँ-पापा जा रहे हैं। इन्हें प्रणाम कर लो।"

उनकी बात पर सौम्या धीरे से बोली "क्यों माँ अब इसकी भी क्या जरूरत है? अब तो मैं उनकी बेटी ही नहीं हूँ।"

"अच्छा ठीक है मेहमान समझकर ही प्रणाम कर लो। बाकी बातें हम बाद में करेंगे।" राधा जी ने कहा।

उनकी बात का मान रखते हुए सौम्या ने प्रणाम की मुद्रा में अपने हाथ जोड़ लिए।

बिना कुछ कहे खामोशी से सौम्या के मायके वाले वहाँ से चले गए।

उनके जाने के बाद मिहिका ने राधा जी से पूछा "क्या बात हो गयी माँ? भाभी ऐसे क्यों कह रही थी अपने परिवार के विषय में?"

उसके सवाल का जवाब देती हुई राधा जी बोली "भाभी नहीं दीदी। आज से सौम्या तुम्हारी बड़ी बहन और इस घर की बड़ी बेटी है।"

इसी के साथ उन्होंने सौम्या के माता-पिता की कही हुई बातें और अपना फैसला सारे परिवार को बता दिया।

उनकी बात सुनकर मनोहर जी बोले "तुमने बिल्कुल ठीक जवाब दिया उन्हें। हमारे लिए हमारी बेटी बोझ नहीं है जो उसे यूँ उठाकर घर के बाहर फेंक दें।"

मिहिका ने भी राधा जी को गले लगाते हुए कहा "मेरी प्यारी माँ मुझे गर्व है तुम पर।"

"और मुझे भी सासु माँ। आपके इस नेक फैसले ने मुझे भी एक साली दे दी बड़ी ही सही।" राजीव ने माहौल हल्का करने के उद्देश्य से कहा।

उसकी बात सुनकर सभी घरवालों के साथ सौम्या के चेहरे पर भी मुस्कान की क्षीण रेखा आ गयी।

राधा जी ने सौम्या को अपने पास बैठाते हुए कहा "सुनो बेटी, यूँ तो बच्चों को देना माता-पिता का ही फ़र्ज़ होता है, लेकिन आज मुझे अपनी बड़ी बेटी से कुछ चाहिए।"

"मैं भला आपको क्या दे सकती हूँ माँ? दिया तो आपने है अपना प्यार, ये परिवार और सम्मान के साथ सर पर छत।" सौम्या बोली।

राधा जी ने प्यार से उसके सर पर हाथ रखते हुए कहा "दे सकती हो एक वादा की आज के बाद ना तुम दुखी होकर आँसू बहाओगी और ना ही ऐसे श्रीहीन रहोगी।

जैसे एक बेटी रहती है बिल्कुल उसी तरह रहोगी।

जो होना था हो गया उस पर किसका जोर है, लेकिन हमें तो जीना ही है जब तक साँस है।"

मनोहर जी भी उनकी बात से सहमत होकर बोले "बिल्कुल ठीक कह रही है तुम्हारी माँ। अब इस घर को तुम्हें ही सजाना-संवारना है और ये तभी होगा जब तुम सामान्य रहोगी।"

मिहिका ने भी सौम्या को गले लगाकर कहा "हाँ प्यारी दीदी हम सब तुम्हें खुश देखकर ही खुश रह पायेंगे।"

सारे परिवार का प्यार देखकर सौम्या का मन भर आया और उसने मन ही मन अपने ईश्वर को धन्यवाद दिया कि उन्होंने उसे इतना प्यारा परिवार दिया।

अगले दिन मिहिका और राजीव अपने घर चले गए। अब बस सौम्या, राधा जी और मनोहर जी ही घर में थे।

सौम्या को दुख से बाहर लाने के लिए उन दोनों ने अपने आँसुओं को पी लिया था।

जब भी उन्हें कमल की याद आती तब अकेले में आँसू बहाते और सौम्या के सामने मुस्कुराते रहते।

लगभग एक महीना बीत चुका था। एक दिन राधा जी ने मनोहर जी से कहा "सुनिये हमें सौम्या के भविष्य के विषय में सोचना चाहिए। आखिर हम दोनों कब तक उसके साथ रहेंगे।"

"मैं भी यही सोच रहा था कि हमें उसकी दूसरी शादी कर देनी चाहिए। आखिर पूरी उम्र पड़ी है बच्ची के आगे।" मनोहर जी बोले।

राधा जी ने कहा "नहीं शादी अभी नहीं। पहले हमें उसे अपने पैरों पर खड़ा करना होगा, आत्मनिर्भर बनाना होगा ताकि भविष्य में किसी भी प्रकार की तकलीफ से वो खुद लड़ सके।

उसके बाद हम उसकी शादी करेंगे।"

मनोहर जी उनकी बात से सहमत होते हुए बोले "बिल्कुल ठीक कह रही हो तुम।

जरा तुम ही सौम्या के मन को टटोलो की उसे क्या पसंद है, वो क्या करना चाहती है?

फिर उसी हिसाब से आगे सोचेंगे।"

राधा जी ने हाँ में सर हिला दिया।

मनोहर जी के दफ्तर जाने के बाद राधा जी ने सौम्या से पूछा "बेटी एक बात बताओ, तुमने भी तो कभी सोचा होगा कि जीवन में कुछ बनना है, कुछ करना है।

बताओ तुम क्या करना चाहती हो क्योंकि तुम्हारी इस माँ की इच्छा है कि वो अपनी बेटी को अपने पैरों पर खड़ा देखे।"

उनकी बात सुनकर सौम्या बोली "माँ मेरी हमेशा से इच्छा थी कि मैं एक शिक्षिका बनूँ क्योंकि देश और समाज का भविष्य सँवारने में माता-पिता के बाद जिसका सबसे अहम योगदान होता है वो है एक योग्य शिक्षक।"

सौम्या की इच्छा जानकर राधा जी ने कहा "ठीक है तो स्नातक तुम कर ही चुकी हो। मैं तुम्हारे पापा से कहती हूँ बी.एड के विषय में पता करें।

अब बस तुम्हें अपना भविष्य संवारना है मेरी बच्ची।"

सौम्या ने हाँ में सर हिला दिया।

राधा जी ने बिना समय गँवाये मनोहर जी को फोन करके इस विषय में बता दिया।

शाम में जब मनोहर जी लौटे तब उनके हाथ में बी.एड प्रवेश-परीक्षा का फॉर्म और परीक्षा की तैयारी के लिए सभी जरूरी किताबें थी।

उन्होंने सौम्या को सब सौंपते हुए कहा "देखो बेटी कितना अच्छा संयोग था कि अभी बी.एड प्रवेश-परीक्षा का फॉर्म भी आया हुआ है। कल सुबह तक फॉर्म भरकर दे देना, मैं दफ़्तर जाते हुए जमा कर दूंगा।

और किताबें भी देख लो, अगर दिक्कत हो तो कोई कोचिंग ज्वाइन कर लेना। अभी परीक्षा में चार महीने का वक्त है।"

मनोहर जी और राधा जी की तत्परता और सहयोग देखकर सौम्या एक बार फिर भावुक हो गयी थी।

वो चाय बनाने रसोई की तरफ जा ही रही थी कि राधा जी बोली "कहाँ चली तुम। आज से रसोई से तुम्हारी छुट्टी। तुम जाओ और पढ़ाई करो। जब ब्रेक लेने का मन हो तब भी रसोई में मत झाँकना की थक जाओ।

टीवी देखना, गाने सुनना या तुम्हारी छोटी बहन है ही अपनी बातों से तुम्हारा सर खाने के लिए।"

"पर माँ आप अकेले कैसे...।" सौम्या ने कहना चाहा तो राधा जी हँसते हुए बोली "अभी बूढ़ी नहीं हुई है तुम्हारी माँ।"

मनोहर जी भी उनकी बात पर सहमति जताते हुए बोले "और तुम्हारे पापा भी तो हैं माँ का साथ देने के लिए। तुम निश्चिन्त रहो।"

आखिर सौम्या को हार मानकर अपने कमरे में जाना ही पड़ा।

उसने ठान लिया था कि अपने माँ-पापा को निराश नहीं करना है, इसलिए परीक्षा की तैयारी में दिन-रात एक कर दिया।

जब परीक्षा का परिणाम आया तब सौम्या का चयन सबसे अच्छे कॉलेज के लिए हो चुका था।

इस अवसर पर राधा जी और मनोहर जी ने मिहिका और राजीव के साथ मिलकर सौम्या के लिए छोटी सी पार्टी रखी।

सब उसके लिए बहुत खुश थे।

वक्त पंख लगाकर उड़ता चला गया।

दो वर्ष में सौम्या का बी.एड पूरा हो चुका था और अब एक प्रतिष्ठित विद्यालय में शिक्षिका के तौर पर कार्य करते हुए वो एम.एड भी कर रही थी।

अब जब उसका एम.एड भी पूरा होने वाला था तब राधा जी ने मनोहर जी से कहा "अब हमें सौम्या के विवाह के विषय में सोचना चाहिए।"

सौम्या के कानों में ये बात पड़ गयी और पहले तो उसने विवाह से इनकार कर दिया लेकिन राधा जी के बहुत समझाने पर मान गई।

उसके विवाह के विषय में सोचते हुए मनोहर जी राधा जी से बोले "मेरी नज़र में एक लड़का है, करण नाम है उसका। पिछले दो वर्ष से बतौर सहायक मैनेज़र मेरे दफ़्तर में काम करता है। बहुत ही नेकदिल है। लेकिन वो अनाथ है।"

उनकी बात सुनकर राधा जी बोली "अनाथ है तो क्या हुआ जी। हमें लड़के के चरित्र से मतलब है। हाँ लेकिन फिर भी अब जरा निजी तौर पर उसकी छानबीन कर लीजिये। फिर अगर वो सौम्या से विवाह के लिए राजी हो तब सौम्या को उससे मिलवाकर उसकी भी मर्ज़ी पूछ लेंगे।"

मनोहर जी ने हामी भर दी।

जितने भी लोगों से उन्होंने करण के विषय में पता किया उसके आस-पड़ोस, संगी-साथी सबने करण की तारीफ की।

फिर मनोहर जी भी तो उसे दो वर्ष से जान ही रहे थे।

अब उन्होंने एक दिन बातों-बातों में करण से उसकी शादी की इच्छा के विषय में पूछा और साथ ही ये जानने की भी कोशिश की कि उसे कोई लड़की पसंद तो नहीं है।

जब करण ने कहा कि उसके जीवन में कोई लड़की नहीं है तब उन्होंने सौम्या के विषय में उसे बताते हुए कहा "बेटे तुम ये मत सोचना की तुम्हें अकेला देखकर मैं एक विधवा लड़की तुम्हारे पल्ले बाँधना चाहता हूँ।

तुम जब से इस दफ़्तर में आये तुमसे एक अलग ही लगाव रहा है मुझे।

सौम्या कभी मेरी बहू थी लेकिन अब बेटी है। कोई भी बाप अपनी बेटी के लिए तुम जैसा जीवनसाथी पाकर धन्य महसूस करेगा।

अगर तुम चाहो तो एक बार सौम्या से मिल लो पर अगर तुम्हारी ना है तब भी कोई दिक्कत नहीं।

संकोच मत करना कि मैं तुम्हारा बॉस हूँ तो तुम्हें मेरी बात माननी ही होगी।"

उनकी बात सुनकर करण बोला "नहीं-नहीं सर मैं कुछ भी गलत नहीं सोच रहा। और फिर जब पत्नी के मरते ही पुरूष दूसरी शादी कर सकता है तो एक स्त्री को सारी जिंदगी अकेले रहने के लिए बाध्य करने वाली प्रथा के मैं खुद भी खिलाफ हूँ।

मैं जरूर सौम्या जी से मिलना चाहूँगा।"

इतवार के रोज करण को घर आने के लिए कहकर मनोहर जी ने राधा जी को ये खुशखबरी सुना दी।

राधा जी ने सौम्या को करण के विषय में बताते हुए कहा "बेटी वैसे तो करण अच्छा लड़का है लेकिन फिर भी कोई जबर्दस्ती नहीं है कि तुम इस रिश्ते के लिए हाँ ही कहो। अगर वो तुम्हें पसंद ना आये तो बिना किसी हिचक के कह देना।"

सौम्या ने करण से मिलने के लिए हाँ तो कह दिया लेकिन उसके मन में किसी तरह की कोई उमंग नहीं थी।

सब कुछ किस्मत पर छोड़कर उसने स्वयं को तटस्थ कर लिया।

करण जब घर आया तब उसकी बातों से, व्यवहार से राधा जी को भी वो अजनबी नहीं लगा।

करण और सौम्या को बातें करने के लिए छोड़कर मनोहर जी और राधा जी वहाँ से चले गये।

आख़िरकार दो परिपक्व लोगों की परिपक्व सोच ने इस रिश्ते पर सहमति की मोहर लगा दी।

मनोहर जी और राधा जी की प्रसन्नता का ठिकाना नहीं था।

उन्होंने तुरंत मिहिका और राजीव को ये खबर दी जो यहाँ आने के लिए निकल चुके थे।

फिर उन्होंने करण से कहा "बेटे हम तो चाहते हैं जल्द से जल्द ये विवाह हो जाये।

तुम्हारी क्या इच्छा है?"

करण ने कहा "मेरी भी यही इच्छा है पर अब जब मैं अकेला हूँ तो आगे की सारी बात भी मुझे ही करनी है, लेन-देन की बात।"

उसकी बात सुनकर मनोहर जी बोले "हाँ-हाँ बिना किसी संकोच के कहो बेटा। हम हरसंभव तुम्हारी हर माँग पूरी करेंगे।"

उधर सौम्या करण की बात सुनकर चौंक गयी और कुछ कहना चाहा कि उसे रोकते हुए राधा जी बोली "पहले करण को अपनी बात पूरी करने दो।"

करण ने आगे कहा "आप तो जानते हैं मैं अनाथ हूँ औऱ सौम्या की विदाई के बाद आप भी यहाँ अकेले हो जायेंगे।

तो बस मुझे शादी के उपहार में मेरे माँ-पापा दे दीजिये।

मैं चाहता हूँ हम एक परिवार बनकर साथ रहें क्योंकि सिर्फ माता-पिता को ही नहीं बच्चों को भी कदम-कदम पर माता-पिता की जरूरत होती है।"

उसकी बात सुनकर सौम्या के साथ-साथ मनोहर जी और राधा जी भी भावुक हो गए।

मनोहर जी ने खुशी से भर आयी अपनी आँखों को पोंछा और बोले "बेटे अगर तुम्हें ऐतराज ना हो तो कम्पनी का दिया घर छोड़कर अपने इस घर में आ जाओ। इस घर को उसका बेटा लौटा दो।"

राधा जी ने भी इस बात में अपनी सहमति जतायी और फिर बोली "लेकिन तुम देख लो कोई जबर्दस्ती नहीं है। हमें अपने बच्चों की खुशी चाहिए।

तुम कहोगे तो हम भी तुम्हारे साथ चल चलेंगे।"

सबकी बात सुनकर सौम्या बोली "लेकिन माँ पहले मिहिका से तो बात कर लीजिये। इस घर पर उसका भी हक़ है।"

अब तक मिहिका और राजीव भी आ चुके थे।

सारी बात सुनकर मिहिका बोली "मुझे मेरा भाई मिल गया और क्या चाहिए मुझे।"

"बिल्कुल अब आप करण जी से तो पूछिये उनकी इच्छा क्या है?" राजीव ने कहा।

करण समझता था कि इस उम्र में मनोहर जी और राधा जी के लिए नई जगह में एडजस्ट करना मुश्किल होगा इसलिए उनकी बात का मान रखते हुए उसने इस घर में आना स्वीकार कर लिया।

करण और सौम्या दोनों की ही इच्छा थी कि विवाह सादगी से हो।

लेकिन राधा जी ने कहा "हल्दी-मेहंदी वगैरह की रस्में तो होंगी ही।"

तय हुआ कि विवाह के एक दिन पहले करण यहाँ चला आये ताकि उसकी तरफ की भी सारी रस्में ही सकें।

राजीव ने जब बताया कि उसके माता-पिता भी इस समाचार से बहुत प्रसन्न हैं और इस शुभ कार्य का हिस्सा बनना चाहते हैं, तब सबकी खुशी और बढ़ गयी।

सब इस बात पर राजी हो गए कि करण की तरफ से मिहिका, राजीव और राजीव के माँ-पापा सब कार्यभार देखेंगे।

पंडित जी ने विवाह के लिए दो महीने बाद का मुहूर्त बताया था।

उस हिसाब से सब लोग तैयारियों में जुट गए।

मनोहर जी के दफ्तर में जब सबको ये खबर मिली तब सबने मनोहर जी और करण की बहुत तारीफ़ की, साथ ही अपनी तरफ से हर मदद का आश्वासन दिया।

मिहिका, राजीव और उसके माँ-पापा के साथ-साथ बारात में रौनक लगाने के लिए करण की तरफ से अब सारे दफ़्तर वाले भी शामिल हो गए थे।

सौम्या के मना करने के बावजूद मनोहर जी उसके मायके वालों को भी विवाह का निमंत्रण पत्र दे आये थे।

इस निमंत्रण पत्र को देखकर इंदु जी और पूरे परिवार को यकीन ही नहीं हो रहा था कि ये सच है।

सौम्या की नौकरी के साथ-साथ करण के ओहदे के विषय में जानकर भी उन्हें झटका सा लगा।

उन्होंने तो इतने वर्षों में कभी सौम्या या उस परिवार की खबर ली नहीं थी और ना अपने यहाँ हुए आयोजनों में ही उन्हें बुलाया था।

लेकिन इस निमंत्रण पत्र को देखकर अब वो वहाँ जाने के लिए तैयार थे।

आख़िरकार वो शुभ दिन आ ही गया जब एक बार फिर मेहंदी के खूबसूरत बूटों से सौम्या की हथेली सज उठी।

"अरे कहाँ चले गए सब लोग?" मनोहर जी सबको आवाज़ देते हुए वहाँ आये तब राधा जी अतीत के पन्नों से बाहर निकली।

उनकी भी आँखों में आँसू छलक आये थे।

उन्हें पोंछते हुए वो बोली "क्या हुआ क्यों ढूंढ रहे थे हमें।"

"अरे करण बस आने वाला है उसका स्वागत करना है की नहीं।

चलो उठो करण की बहन जी।" मनोहर जी मिहिका को लाड़ से बोले।

करण के साथ दफ़्तर के उसके कुछ साथी भी थे। सबका स्वागत करके मिहिका ने उन्हें उनका कमरा दिखाया और फिर एक-एक करके रस्में शुरू हो गयी।

विवाह का मुहूर्त अगले दिन का था।

तय हुआ कि बारात सजकर पास के मंदिर चलेगी और फिर वहीं से सब लोग नाचते-गाते घर तक आयेंगे क्योंकि राधा जी की इच्छानुसार विवाह का मंडप इसी घर में लगा था।

विवाह के दिन सौम्या के माता-पिता, भाई-भाभी भी उपस्थित थे।

यहाँ की सजावट, तैयारियाँ और रौनक देखकर आज उन्हें अपनी सोच पर शर्मिंदगी हो रही थी।

उन्होंने सौम्या से बात करना चाहा, उसके पास बैठना चाहा तो सौम्या ने बस औपचारिकतावश उनके पैर छुए और उठकर दूसरे कमरे में चली गयी।

बारात भी अब द्वार पर आ चुकी थी।

द्वारपूजा, जयमाला की रस्मों के बाद अब दूल्हा-दुल्हन मंडप में आ चुके थे।

कुछ रस्मों के बाद पंडित जी ने कहा "कन्यादान के लिए लड़की के माता-पिता आगे आये।"

इंदु जी और चंदन जी जैसे ही उठकर आने लगे सौम्या ने उन्हें रुकने का इशारा करते हुए मनोहर जी और राधा जी से कहा "माँ-पापा कोई माने ना माने मैं मानती हूँ की ये मेरा नया जन्म है और इस नए जन्म के जनक आप दोनों हैं, इसलिए इस बेटी का कन्यादान करने का अधिकार बस आपका है।"

राधा जी ने कुछ कहना चाहा तो सौम्या ने अपने हाथ जोड़ लिए।

इंदु जी और चंदन जी चुपचाप अपनी जगह पर जाकर बैठ गए।

अपनी बड़ी बेटी का हाथ दामाद के हाथ में सौंपते हुए मनोहर जी और राधा जी दोनों की आँखों से आँसू बरसकर उनकी हथेलियों पर जा गिरे।

पंडित जी ने इस दृश्य को देखकर सौम्या से कहा "बेटी तुम बहुत सौभाग्यशाली हो। इन आँसुओं से पवित्र तो गंगाजल भी नहीं।"

विवाह संपन्न होने के बाद मनोहर जी ने राधा जी से कहा "आज सिर्फ तुम्हारी वजह से मेरे जीवन में इतना सुंदर दिन आया है।"

इंदु जी ने भी हाथ जोड़ते हुए कहा "सच बहन जी माँ की परिभाषा क्या होती है ये आपने बता दी।

मैंने तो सिर्फ सौम्या को जन्म दिया लेकिन आपने अपने प्यार से उसका जीवन संवार दिया।"

सौम्या भी राधा जी के पैर छूते हुए बोली "सच जिस बेटी के जीवन में आप जैसी माँ हो जो हर तूफान में उसके साथ मजबूती से खड़ी रही उसे और क्या चाहिए।"

"अच्छा-अच्छा अब बस करो तुम लोग।" राधा जी ने कहा।

मनोहर जी बोले "नहीं राधा, अगर तुमने उस दिन माँ बनकर सौम्या को बेटी के रूप में अपनाया नहीं होता तो मैं भी कुछ नहीं कर पाता।

हम सबकी इन खुशियों की वजह तुम्हारी निःस्वार्थ ममता है।"

इस भावुक माहौल को हल्का करते हुए मिहिका बोली "अच्छा अब आप लोग ये सब बातें बाद में बैठकर कीजियेगा। पहले मुझे साली के रूप में अपना नेग लेने दीजिये और फिर थोड़ी देर में बहन के रुप में।"

उसकी बात सुनकर राजीव बोला "सही है, सबसे ज्यादा फायदा इसी का हुआ है, इधर से भी और उधर से भी।"

करण ने एक बैग राजीव को देते हुए कहा "भाईसाहब मेरी बहन से जलिये मत। मैं आपको नहीं भूला हूँ।"

राजीव ने पैकेट लेने से मना करते हुए कहा "अरे भैया मैं बस मज़ाक कर रहा था।"

"ठीक है वो आपका हक है जब चाहे मज़ाक कर सकते हैं पर मेरे भी तो कुछ अरमान हैं अपने परिवार के लिए। इसलिए इस उपहार को तो आपको स्वीकार करना ही होगा।" करण ने अपनेपन से कहा तो राजीव इंकार नहीं कर सका।

राजीव के बाद करण ने दो उपहार मिहिका की तरफ बढ़ाये।

उन्हें एक तरफ रखकर मिहिका भीगी आवाज़ में बोली "बस भैया तुम आ गए और कुछ नहीं चाहिए।"

"पगली सबको हँसाती है और खुद रोती है।" कहते हुए करण ने अपना स्नेह भरा हाथ मिहिका के सर पर रख दिया।

"अच्छा चलो अब सब लोग फैमिली फ़ोटो तो खिंचवा लो वरना दुल्हन का मेकअप ना उतर जाये।" राजीव ने हँसते हुए सौम्या की तरफ देखकर कहा।

सौम्या भी हँसकर बोली "फिक्र मत कीजिये वाटरप्रूफ मेकअप है।"

फैमिली फोटो खिंचवाते हुए करण और सौम्या के साथ-साथ सबके चेहरे खुशी से यूँ दमक रहे थे की कैमरे की फ्लैशलाइट भी उसके आगे फीकी पड़ चुकी थी।


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