Husan Ara

Classics


5.0  

Husan Ara

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पश्चाताप

पश्चाताप

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दिशा ने नए घर में कदम रखते ही ,पहले दिन से जितना उससे बन पड़ा ,किया। वह राजेश की न सिर्फ पत्नी बनकर इस घर मे आई थी, बल्कि बाकी रिश्तों को भी सहेजने में भी जी जान से लगी हुई थी।


वह अपनी भाभी से भी तो शर्त लगाकर आई थी कि वह दिखाएगी कि बहु के दायित्व कैसे निभाए जाते हैं। इसके जवाब में भाभी ने बस सदा खुश रहने का आशीर्वाद दिया था।


दिशा के ससुराल के सभी लोग सभ्य और संस्कारी थे। उन्होंने भी दिशा को दिल से अपनाया था। मगर धीरे धीरे सबका टोका टाकी करना दिशा को थोड़ा अखरने लगा था।

उसके पूरा दिन काम करने तथा सबको खुश करने की कोशिशों के बावजूद भी सराहना कम तथा सीख ज़्यादा मिलती।

नए नए जोश में कुछ दिन तो वह सब करती रही, मगर अब वह थकने लगी थी।

कभी सास की मीठी झिड़की ,तो कभी ननद की जाने अनजाने की गई मज़ाकिया या तन्ज़िया बातें। देवरो की नई नई फरमाइश, तो ससुर जी की बड़ो के सामने पल्लू रखने, ना बोलने जैसी बातें। अब ये सब उसका दिल दुखाने लगा था।


अपने लिए तो समय ही नही था उसके पास ।उसे लगने लगा था क्या मेरा जन्म बस इसीलिए हुआ है, काम करने और बाते सुनने के लिए।


एकाएक उसके मस्तिष्क में भाभी की तस्वीर उभर आई थी। मैं भी तो उनको जो मन मे आया बोल दिया करती थी। उनकी छोटी बड़ी गलतियों को पकड़ उन्हें सुनाती तो कभी माँ के पास जाकर शिकायत लगाती।



एक बार भाभी ने समझाया भी था कि "देखो धीरे धीरे सब सीख जाऊँगी। इतनी जल्दबाजी मत करो। पहले मैं सिर्फ रश्मि थी, अपने माता पिता की छोटी सी रश्मि, भाई बहनों की प्यारी, स्कूल पढ़ने वाली। अब अचानक से मैं तुम्हारे भाई के लिए पत्नी,सास के लिए बहू, ससुर जी की आज्ञाकारी बेटी ,देवरों की दोस्त, जेठ की छोटी बहन और तुम्हारी भाभी बन गई हूं। मैं अपने को इस सब मे ढाल लूंगी। मगर कुछ समय तो लगेगा ना।"

तब दिशा ने ही घमंड के साथ उनसे शर्त लगाई थी कि देखना जब मैं बहू बनूँगी ,तो कैसे सबका दिल जीत लूंगी।


मगर ये बाते कहने और सोचने में जितनी आसान थी, जब दिशा पर आकर पड़ी, तब इनका दर्द महसूस किया। अपना सबकुछ कुर्बान करने के बाद भी वह सबकी अपेक्षाओं पर खरी नहीं उतर पा रही थी।


आज भी अपने घर जाते समय जब उसकी ननद यह कहकर गई कि "दिशा भाभी ,चलिए हमारा तो कुछ नहीं, प्लीज मम्मी को अब इतना काम मत करने दिया कीजिये...

ये शब्द जाकर उसके सीने पर चुभ रहे थे।क्या इन्होंने देखा नहीं कि पूरा दिन मैं भी तो काम ही में लगी रहती हूं।क्या इन्होंने ये नही देखा सबके खाने , चाय ,दवा आदि का समय ध्यान रखने में मेरी अपनी कोई आशा नहीं बची। अब तो उसे तैयार होना भी अच्छा नहीं लगता था।


परन्तु दिशा भी तो एक बार भाभी के पुराने कपड़ों में काम करने पर कितना चिल्लाईं थी, "आप क्या दुनिया को ये दिखाना चाहती हैं कि हम आपको नए कपड़े सिलवाकर नहीं देते.. ...सुबह सुबह तैयार हुआ कीजिये भाभी"।

मगर आज उसे खुद को रोज़ भारी भारी कपड़ों में रहना पड़ता, चूड़ियों से भरे हाथों से दिन भर काम करके कलाइयां दुख जाती। रोज़ मेकअप लगाने से चेहरे पर एलर्जी भी हो गई थी।


इस बार जब वह घर पहुंची, तो रश्मि के पैरों में गिरकर फूट फूटकर रोईं। भाभी आप मुझे माफ़ करेंगी ना। उन शब्दों के बाणों के लिए जिनसे मैं जाने अनजाने आप पर वार करती। उन सीखों के लिए जो स्वयं अनजान होते हुए भी आप पर थोपना चाहती थी। सब आंसुओ के लिए जो मेरी वजह से आपकी आंखों में आए, आप मुझे माफ़ करेंगी ना।



रश्मि ने दिशा को गले से लगा लिया , और बस इतना कहा कि "तुम्हे पश्चाताप है बहुत बड़ी बात है, अब मुझे तुमसे कोई गिला नहीं क्योंकि सुबह का भूला अगर शाम को घर आ जाए तो उसे भूला नहीं कहते।"


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