satish bhardwaj

Classics Tragedy


5.0  

satish bhardwaj

Classics Tragedy


घरु

घरु

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परितोष तेजवानी घर में आते ही सबसे पहले अपने पिता जगमोहन तेजवानी के पास आया। जगमोहन तेजवानी लगभग 83 वर्ष के विधुर वृद्ध थे, सरकारी नौकरी से सेवानिवृत्त। परितोष भी प्रोढ़ अवस्था में आ चुका था और एक नामचीन पत्रकार है। जगमोहन अपने कमरे में अपनी कुर्सी पर बैठे नित्य की भांति अपने ही विचारों में लीन है। धीमी आवाज़ में मल्लिका पुखराज के गाने चल रहे हैं।

परितोष ने अपने पिता के हाथों को अपने हाथों से नरमी के साथ पकड़ा और बोला “पापा जी”। जगमोहन का ध्यान भंग हुआ और पुत्र को देखकर एक हलकी सी मुस्कराहट अपने चहरे पर बिखेर दी। चेहरे की झुर्रियों में भी जगमोहन आँखें उनकी मुस्कान की गवाही दे रही थी।

परीतोश की आँखों में चमक थी उसने उत्साह से कहा “पापा तयारू कर लो, हम घरु जायेंगे” (पापा तैयारी कर लो हम घर जायेंगे)

जगमोहन एकदम से चंचल हो उठा और बोला “क्या जामपुर?”

परितोष ने जोर देकर कहा “हाँ, टहु दिहुं बाद” (हाँ तिन दिन बाद)

जगमोहन ने संक्षिप्त उत्तर दिया “ठिकू” (अच्छा है) और अपनी कुर्सी से सर टिका कर आँख बंद कर ली।

परितोष कुछ देर और अन्य प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा में बैठा रहा फिर उठकर बाहर चला गया।

जगमोहन पुरानी यादों में चला गया था शायद।

आज से कोई 70 साल पहले की बात होगी जब भारत की स्वतंत्रता के साथ ही विभाजन भी हो गया था। विभाजन रेखा के दोनों तरफ ही बड़ा कत्लेआम और विस्थापन हुआ था। लेकिन पाकिस्तान की तो बुनियाद में ही कट्टरवाद की इंटें जमा दी गयी थी। तो पाकिस्तान में हिन्दुओ के साथ वो क्रूरता हुई कि हिन्दुकुश की पहाड़ियाँ भी सहम गयीं थीं। जगमोहन तेजवानी का परिवार सिन्धी परिवार था। जगमोहन के पिता का पंजाब, के राजनपुर जिले के जामपुर क़स्बे में तम्बाकू का व्यापार था। “जामपुर” “सुलतान पहाड़ीयों” और “सिन्धु नदी” से बनी मनोरम वादियों में बसा पंजाब, पाकिस्तान की सीमा पर सिंध से सटा क़स्बा था। तीन भाई-बहनों में बहन सबसे बड़ी थी, एक और छोटा भाई था। माता पिता के साथ ही जगमोहन के दादा दादी भी रहते थे। दुकान के साथ ही घर था। कुछ ज़मीन जायदाद भी बना रखी थी। विभाजन के समय जब कत्लेआम शुरू हुआ तो जगमोहन का परिवार भी उस आग की चपेट में आ गया। अपने पूरे परिवार में से बस जगमोहन ही वापस आ पाया था भारत। भारत में जगमोहन को उसकी बुआ ने पाला था। जगमोहन के फूफा सरकारी नौकरी में थे। विभाजन के समय सरकारी नौकरी वालो की तो अदला बदली दोनों तरफ की सरकारों ने कर ली थीं लेकिन जो किसान या व्यापारी थे वो आग के दरियाओं को पार करके विस्थापित हुए थे। और उस आग के दरिया में बहुत से लोगो ने अपना सब कुछ खो दिया था।

जगमोहन के परिवार के साथ पाकिस्तान में क्या हुआ? ये कभी भी जगमोहन ने किसी से नहीं बताया। उस समय का जिक्र आते ही जगमोहन एक मौन धारण कर लेता था और उसकी आँखें पनीली हो जाती थीं। परितोष ने भी बाकी लोगो की तरह कई बार जानना चाहा था कि उस समय क्या हुआ था? लेकिन जगमोहन ने कभी कुछ नहीं बताया। आज भी जगमोहन को आबिदा परवीन के गीत बहुत सुहाते थे। हालाँकि वो विभाजन से बाद में पैदा हुई थीं।सिंध और पंजाब (पाकिस्तान) से सम्बद्ध समाचारों पर जगमोहन का ख़ास ध्यान रहता था। परितोष से कई बार कहता था “कडह घवञण छा?” (कभी घर जायेंगे क्या?)।

जगमोहन ने कभी भी इस विभाजन को स्वीकार ही नहीं किया था। जगमोहन उस विभीषिका से बचकर आ तो गया था लेकिन शायद अपना बचपन, यौवन, हास्य, विनोद, करुणा सब वहीं छोड़ आया था। एक भावना विहीन शरीर मात्र रह गया था जगमोहन। लेकिन सिन्धु के जल प्रवाह की वो मोनारम ध्वनि से उत्त्पन्न संगीत, सुलतान पहाड़ियों की हवाओं कि वो सुगंध आज भी उसके मन में बसी थी जो दिल्ली में भी भी उसको कभी जैसे सहला जाती थी। और यूँ ही मौन बैठे बैठे उसके चहरे पर एक मोहक मुस्कान आ जाती थी। वो मुसकान उसे एकदम एक बच्चे की तरह बना देती थी वो हँसने लगता था, ठेठ सिन्धी भाषा में या कभी पंजाबी में कुछ भी बोल उठता था, जैसे वो लड़ रहा हो, कभी अपने भाई बहनों से तो कभी अपने दोस्तों से। हालाँकि जगमोहन को अच्छी हिंदी आती थी। वो खो जाता था कंचो या गिल्ली डंडे के खेल में। फिर शांत हो जाता था। किसी राजनैतिक मजलिस या जुलुस में अगर जगमोहन “अल्लाह हु अकबर” का नारा सुनता था तो बेचैन हो उठता था। वो अपने दोनों कानों को अपने हाथों से कसकर भींच लेता था।

सबको लगता था की जगमोहन पागल है। परन्तु अपना कार्य जगमोहन अन्य लोगो से ज्यादा गंभीरता से और कुशलता से करता था। बस वो किसी के साथ ज्यादा घुलता मिलता नहीं था। जगमोहन एक अच्छा पिता और पति रहा लेकिन उसके आचरण में ये असामन्यता हमेशा बनी रही। जगमोहन की बुआ ने और बाद में बेटे परितोष ने उसका इलाज भी करवाया लेकिन कुछ नहीं हुआ था।

दोनों देशों की सरकारें पुन: सम्बन्ध सामान्य करने की प्रक्रिया के दौर में थे। भारत से एक सांस्कृतिक प्रतिनिधि मंडल पाकिस्तान जा रहा था। जिसमें परितोष भी था। परितोष ने भारतीय विदेश सचिव से अपने पिता के बारे में चर्चा की और उन्हें साथ ले जाने की बात रखी तो उसे अनुमति मिल गयी थी।भारत में पाकिस्तान के राजदूत ने खास व्यवस्था करवाई थी जगमोहन को जामपुर भेजने की।


लाहौर में कुछ औपचारिक मित्रवत और सांस्कृतिक कार्यक्रमों के बाद आज जगमोहन जामपुर जा रहा था। भारत की मीडिया पाकिस्तान की दरियादिली की चर्चाओं में तल्लीन थीं कि कैसे एक बिछड़े को उसकी जड़ों से मिलवाने को पाकिस्तान सरकार ने मानवता का परिचय दिया है। पाकिस्तानी जनता के जगमोहन के लिए बेहद मार्मिक और अपनत्व भरे सन्देश प्रचारित किये जा रहे थे। सत्यता का तो पता नहीं लेकिन भारतीय मिडिया चैनलों ने दोनों देशों के रिश्तों की बर्फ को पूरी तरह पि दिया था। जगमोहन की हालत को देखते हुए उसे मिडिया से बहुत दूर रखा जा रहा था।

सरकारी गाड़ी से सेना के चार जवान, एक पाकिस्तानी पत्रकार, दो पाकिस्तानी सरकारी अधिकारी, जगमोहन और परितोष को जामपुर ले जा रहे थे।परितोष यहाँ के दृश्य को देखकर मुग्ध था। “हिन्दुकुश" पर्वतमाला का ही हिस्सा सुलतान पहाड़ी दिख रहीं थी। सिन्धु नदी ने यहाँ की धरती को उपजाऊ बना रखा था।जिससे यहाँ की हरयाली ने यहाँ की खूबसूरती को और बढ़ा दिया था।जगमोहन अपने में ही मगन था।

जामपुर क़स्बा शुरू भी नहीं हुआ था की जगमोहन ने एकदम से गाड़ी रुकवा दी। जगमोहन गाड़ी से बाहर आकर चारों तरफ देखने लगा। जगमोहन की दृष्टी कुछ तलाश रही थी। तभी साथ आये पाकिस्तानी पत्रकार जिसे हिंदी अच्छी आती थी उसने कहा “यहाँ कभी एक पुराना मंदिर हुआ करता था। नयी सड़क बनाने के लिए उसे यहाँ से शिफ्ट कर दिया गया।”

परितोष ने उसकी बात सुनकर कहा “लगभग सभी मंदिर रास्तों में आ रहे थे इसलिए पाकिस्तान सरकारों ने शिफ्ट कर दिए” ये शिफ्ट शब्द कुछ ज्यादा ही जोर डालकर बोला था परितोष ने। परितोष के इस कटाक्ष पर पाकिस्तानी पत्रकार ने दृष्टी चुराने का असफल प्रयास किया।

जगमोहन को उनके इस वार्तालाप से कोई मतलब नहीं था। वो अपनी ही धुन में कस्बे की तरफ चल दिया।

पाकिस्तानी पत्रकार ने कहा “सर कार से ही चलिए, अभी एक किलोमीटर चलना पड़ेगा, बीच शहर में कहीं होगा आपका ठिकाना”

जगमोहन ने उसकी बात पर ध्यान नहीं दिया और पैदल ही चलता रहा। जगमोहन के बूढ़े शरीर में उर्जा का स्तर एकदम से बढ़ गया था। अब उसके कदम भी नहीं बहक रहे थे। जगमोहन कसबे के भीतर आ गया था। बहुत ज्यादा बदल चुका था ये क़स्बा, पहले से बड़ा भी हो गया था। लेकिन शायद यहाँ की ज़मीन का हर टुकड़ा पहचानता था जगमोहन को। वो कभी किसी गली में चला जाता। कुछ देर देखता रहता, साथ आया पाकिस्तानी बताता कि यहाँ कभी कोई पुरानी इमारत हुआ करती थी। कभी जगमोहन किसी पुरानी इमारत के सामने रुक कर खड़ा हो जाता। उस इमारत के भीतर जाता और घूम कर बाहर आ जाता। वो चले जा रहा था अपनी पुरानी यादों में खोया। ना जगमोहन किसी से कुछ पूछ रहा था ना ही किसी को कुछ बता रहा था। वो चल रहा था जैसे कहाँ कहाँ जाना है ये उसने पहले से ही निश्चित किया हुआ है।

चलते हुए जगमोहन एक खंडहर के सामने जाकर रुक गया। अब तक कुछ स्थानीय लोग भी कौतुहलवश साथ हो लिए थे। जो स्थानीय लोग अभी तक इस तमाशे को आनंद से देख रहे थे, उस खंडहर को देखते ही अब उनके सुर्ख़ चेहरे सफ़ेद हो गए । एक स्थानीय के मुँह से निकला “शैतानी रूहों का डेरा”

परितोष ने उन बातों पर ध्यान नहीं दिया। वो जगमोहन के पास आकर खड़ा हो गया। जगमोहन की आँखों में पूरा शहर घूमते समय एक बालसुलभ चमक थी लेकिन इस खंडहर के सामने आते ही उसकी आँखें झर झर बह चली थीं।

खंडहर कभी घर ही था। बाहर एक किनारे पर बड़ा सा कमरा और बरामदा था आगे फिर बड़ा सा आंगन था। उस आंगन में एक लोहे का खंम्बा था जिस पर लटका जीर्ण शीर्ण जंग खाया तराजू आज भी दिख रहा था। कभी मुख्य दरवाज़े पर लकड़ी का दरवाज़ा रहा होगा क्योंकि जली हुई लकड़ी की देहल आज भी दिख रही थी। पूरे आंगन में इंटें बिछी थीं, लेकिन फिर भी काफी ऊँची झाड़ियाँ हो गयी थीं। आंगन में ही दो बड़े पेड़ थे जिन पर जंगली बेल चढ़ गयीं थी। स्थानीय लोग इस खंडहर के पास भी नहीं आते थे। देखने में भी ये जगह बहुत डरावनी थी।  

जगमोहन उस खंडहर के भीतर दाखिल होने लगा। तभी एक स्थानीय ने घबराते हुए कहा "साहब इस जर्रे में तो आदमजात तो आदम जात कोई परिंदा भी कभी बैठे नहीं देखा। भयानक रूहें घूमती हैं यहाँ। रोकिये उन्हें भीतर जाने से।"

परितोष ने उस आदमी की बातों पर ध्यान नहीं दिया और जगमोहन के साथ खंडहर में भीतर दाखिल हो गया। लेकिन बाहर खड़े स्थानीय लोगो के चेहरे अब भय से पीले जर्द हो गए थे। जो स्थानीय लोग एक भीड़ के रूप में इनके साथ चल रहे थे अब वो सब वहाँ से दूर हटकर खड़े हो गए। बस उनके साथ आये लोग और एक दो स्थानीय ही वहाँ खड़े रह गए थे।


जगमोहन ने बाहर के उस कमरे में प्रवेश किया। कभी इसे जलाया गया था इसका अनुमान कमरे को देखकर हो रहा था। ये इस घर में आत्माओं के होने की जो बात लोगो के दिलों में बैठ गयी थी उसकी वजह से ये आज 70 साल बाद भी ज्यों का त्यों ही था, जैसा कभी दंगाइयों ने इसे कर दिया था और जगमोहन छोड़कर गया था।

जगमोहन ने बराबर में खड़े परितोष के हाथ को अपनी हथेली से दबाया और बोला “ये हमारी तम्बाकू की दुकान थी। पीले रंग की पुताई थी पूरे मकान पर”

फिर जगमोहन उस कमरे से बाहर आकर आंगन में आया और बताने लगा “यहाँ बहुत भीड़ रहती थी पूरे दिन, तम्बाकू और पैसों का लेनदेन होता था।” 

परीतोष को अजीब लग रहा था। आज पहली बार जगमोहन बोल रहा था उस समय के बारे में।

फिर जगमोहन बाहरी आंगन से मकान के भीतरी हिस्से में प्रविष्ट हो गया। एक बड़ा बरामदा फिर एक अपेक्षाकृत छोटा आंगन और उसके बाद फिर तीनों तरफ एक कमरों की पंक्ति। बरामदे में ही ऊपर जाने को जीना था। प्रथम दृष्टी में ही परितोष को इतना दिख गया था।

जगमोहन ने अन्दर के बरामदे की तरफ इशारा करके कहा “यहाँ मेरी दादी बैठी रहती थी और तेरी बुआ और तेरी दादी भी उनके साथ यहीं बैठती थी। मैं और तेरा चाचा जब पाठशाला से आ जाते थे तो हम कभी यहाँ बैठ जाते थे। जब माँ घुड़क देती थी तो बाहर चले जाते थे। बाहर से भी पिताजी धमका कर भगा देते थे, तो फिर हम दादा जी के पास चले जाते थे” जगमोहन ने एक भीतरी कक्ष की तरफ इशारा करके कहा।

बड़ी बड़ी झाड़ियों में जगमोहन यूँ ही सरलता से घुसा चला जा रहा था।

परितोष भी जैसे उस समय में ही पहुँच गया था। उसे भी इस बात का अनुमान ही नहीं था की यहाँ कितनी बड़ी झाड़ियाँ हैं। वो अपने और जगमोहन के लिए झाड़ियाँ में से रास्ता बनाने का प्रयास ज़रुर कर रहा था।

फिर जगमोहन भीतर आंगन में आ गया। उसके बाद वो एक कमरे में गया। उस कमरे में एक लकड़ी का तख़्त पड़ा हुआ था, जो आज भी यूँ ही था। अन्दर पक्का निर्माण होने के कारण झाडियाँ तो नहीं उगी थीं लेकिन मकड़ी के जालों से और धूल और कुछ जंगली बेलों से वो कमरा भरा हुआ था। उस घर में कदम रखने से भी सब डरते थे इसलिए उस घर का सामान भी किसी ने नहीं छेड़ा था। वहाँ बस प्रकृति का वास था पूरी तरह से।

उस कमरे के भीतर एक और कमरा था। जगमोहन ने उस कमरे में प्रवेश किया। परितोष ने देखा कि दो सेना के जवान डरते डरते भीतरी आंगन में आकर खड़े हो गए थे।

इस भीतरी कक्ष में अंधेरा था इसलिए परितोष ने मोबाइल टॉर्च जला ली थी, रौशनी के लिए। कमरे के बिलकुल मध्य में एक पक्का ऊँचा आधार बना कर एक भण्डारण कक्ष बनाया हुआ था। पुराने मकानों में इसे बनाया जाता था जो कच्चा मिट्टी का भी होता था, जिसे सामान्य रूप से अनाज भण्डारण के हेतु उपयोग करते थे। जगमोहन उसके आधार के पीछे की तरफ गया और आधार में ही बनी एक खोह को देखने लगा। अंधेरा था तो परितोष ने मोबाइल से टौर्च जला ली थी। जगमोहन ने उस खोह में घुसने का प्रयास किया लेकिन घुस नहीं पाया, खोह छोटी थी। जगमोहन बाहरी कक्ष में आ गया। शायद वो अब थक गया था इसलिए गर्द और मकड़ी के जालों से भरी दीवार से ही टेक लगाकर खड़ा हो गया। परितोष ने उसके आसपास से जाले हटा दिए।

जगमोहन कुछ देर अपने में ही गुम रहा और फिर बोलना शुरू किया। “बहुत खुश थे हम यहाँ पर, अच्छा व्यवसाय था तेरे दादा का। लोगो में रसूख भी अच्छा था। यहाँ के मदरसों और मस्जिदों में सबसे ज्यादा दान तेरे दादा ही करते थे। मैं पूरे दिन मोनिस और अल्लामा के साथ खेलता था। मोनिस का बाप असलाम और अल्लामा का बड़ा भाई मुश्ताक तेरे दादा के यहाँ ही नौकरी करते थे। असलाम को हम भाई बहन ताया बुलाते थे। जब विभाजन के बाद दंगे शुरू हुए तो तेरे दादा ने यहाँ से जाने का निर्णय कर लिया था। बुआ से भी बात हो गयी थी। लेकिन शायद देर कर दी थी पिताजी ने। हमें पाठशाला भेजना बंद कर दिया था। माहौल बदल चुका था एकदम से। उस दोपहर के समय ही पिताजी भी खाना खाकर भीतर ही आराम करने आ गए थे।”

जगमोहन को एक सिहरन सी महसूस हुई और उसका बदन हल्का सा कंप-कंपा गया। जगमोहन के शरीर की इस हलचल को परितोष ने भी अनुभव किया। वो जगमोहन से बोला “पापा आप ठीक तो हो ना, चले क्या?”

जगमोहन ने ध्यान नहीं दिया और फिर बोलना शुरू किया “मैं दादा जी के साथ इस कमरे में था। तभी शोर शराबा हुआ, कुछ जाने पहचाने नारे भी लग रहे थे “अल्लहा हु अकबर” के। मुझे इन नारों से डर नहीं लगता था। जामपुर और आसपास के कई गाँव और कस्बों की मस्जिदें तेरे दादा और परदादा के पैसों से ही बनी थीं। मौलवी कहा करते थे “आस पास जहाँ भी रोज़ मुक़द्दस अजान होती है या बच्चे तालीम लेते हैं तो आपको ज़रुर दुआ देते हैं। आपको ख़ुदा यूँ ही सलामत रखे। आप नजीर हो इंसानियत की शाह जी।”

जगमोहन फिर मौन में खो गया। अब तक वो दोनों सिपाही भी पास आ गए थे और बाहर खड़े बाकी दोनों सिपाही और कर्मचारी भी भीतर आ गए थे। वो सब भी अत्यंत उत्सुकता से जगमोहन को सुन रहे थे। जगमोहन परितोष से हिंदी में ही बात किया करता था।

जगमोहन ने मौन को तोड़ते हुए बोलना शुरू किया “शाह जी ही कहते थे तेरे दादा को यहाँ लोग। बाहर जोर-जोर से नारों की आवाज़ सुनकर बाकी सब घरवाले कुछ परेशान हो गए थे। पिताजी कमरे से निकले और बहार आंगन में जाने को ही थे कि तुरंत तेज़ धमाका हुआ। किसी ने पिताजी को गोली मार दी। घर में चीख पुकार मच गयी थी। मेरे दादा जी बाहर की तरफ भागे। वो भीड़ “अल्लाह हु अकबर” के नारे लगाते हुए तुरंत अन्दर घुस गयी थी। मैंने अपनी आँखों से देखा कि उस भीड़ में सबसे आगे असलाम और मुश्ताक थे। जिन्हें मेरे दादा-दादी इदी दिया करते थे, चेटीचंड का हलवा खिलाया करते थे।मुश्ताक ने तलवार से मेरे दादा की गर्दन काट डाली, भीड़ ने दादी को भी मार दिया। तेरा चाचा जो आठ बरस का ही था, उसके नाज़ुक से शरीर को तलवार बल्लमों से चिर कर उसके ऊपर को ही भीड़ गुजर गयी। मुश्ताक ने तेरी बुआ जो 14 वर्ष की भी नही हुई थी, उसे यहीं आंगन में पकड़ कर भीड़ से कहा "ये है हमारा इनाम इन काफिरों की औरतें। इन्हें नहीं मारेंगे।" भीड़ में से ही एक ने मेरी माँ को पकड़ रखा था। ये वो था जिसे कुछ दिन पहले पिताजी ने उसके बेटे के इलाज के लिए पैसे दिए थे। मैं कमरे में छुपा सब देख रहा था।”

जगमोहन को एक हिचकी आई। परितोष जिसकी आँखों से अब आँसू बिना रुके बह रहे थे उसने कहा “चलो चलते हैं पापा”

जगमोहन ने हाथ के इशारे से मना किया और फिर बोलना शुरू किया “मेरी आँखों के सामने उस भीड़ ने इस आंगन में मेरी बहन और मेरी माँ का...”

इतना कहकर ही जगमोहन ने लम्बी सांस ली और फिर बोला “जो मेरी माँ को काकी ताई बुलाते थे आज वो वहशियों की तरह उसे नोच रहें थे। मेरी छोटी सी मासूम बहन जिनको चाचा ताऊ कहती थी वो उसे नोच रहे थे। मुश्ताक ने कहा कि इसे मैंने ही अपनी गोद में जवान किया है तो सबसे पहला हक मेरा।मेरी बहन और माँ उस भीड़ के लिए इनाम थी अल्लाह का और हम सजा भुगत रहे थे हिन्दू होने की। तेरी दादी और बुआ को तलवार या बन्दुक से क़त्ल नहीं किया गया था बल्कि उन्हें तो इतनी भीड़ ने नोचा के वो मर गयी। तेरी 13 साल की बुआ और दादी में हिस्सा बांटने को पूरा क़स्बा खड़ा था। भीड़ उन दोनों के मर जाने के बाद भी उनकी लाशों को नोचती रही। मेरी बहन चीख रही थी। सबसे उसका कोई न कोई रिश्ता था, कभी कहती भाई छोड़ो कभी कहती ताया जी दर्द हो रहा है। उस बेचारी को तो बस दर्द का ही एहसास हो रहा था। उसे क्या पता था कि उसके साथ ये सब अल्लाह की हुक़ूमत कायम करने को किया जा रहा है। फिर उसकी चीखे बंद हो गयीं थी। मेरी माँ गिड़गिड़ा रही थी भीड़ के सामने “वो बोल रही थी कि जो करना है मेरे साथ कर लो, ये बच्ची है इसे छोड़ दो। वो सबको पुराने रिश्ते याद दिला रही थी। लेकिन उस भीड़ पर तो एक मज़हबी जुनून सवार था। ये सब हो रहा था और भीड़ “अल्लाह हु अकबर” के नारे लगा रही थी। मैं ये देखकर पत्थर हो गया था।"

एक बार फिर जगमोहन ने एक संक्षिप्त मौन धारण कर लिया।

जगमोहन ने फिर बोलना शुरू किया "शैतानों और भूतों की कहानियाँ कभी कभी दादा जी सुनाया करते थे। लेकिन उन किस्सों के शैतान भी इतने डरवाने नहीं थे जितनी डरावनीवो भीड़ थी....वो इंसानों की भीड़। मुझसे जब नहीं देखा गया तो मैं अन्दर जाकर कोठी के नीचे उस खोह छुप गया। भीड़ को उनका इनाम मिल गया था। किसी का ध्यान ही नहीं गया मेरी तरफ। वो जितना लूट सकते थे लूटा और फिर बाहर आग लगा दी थी। मुझे नहीं पता मैं कितने दिन अन्दर छुपा रहा, मुझे रौशनी और आदमजात से भी से डर लगने लगा था। अंधेरे में बाहर आता और फिर छुप जाता। जो खाने पीने को मिलता घर में, खा लेता। उस दिन के बाद मैंने मेरे परिवार के मुर्दों को भी नहीं देखा। क्योंकि मैं रौशनी में बाहर निकलता ही नहीं था। बस एक तीखी बदबू मुर्दा शरीर की नाक में घुस जाती थी।”

फिर कुछ देर चुप रहने के बाद जगमोहन ने फिर बोलना शुरू किया “एक रात मैं यहाँ से बाहर निकला और चलता चला गया। दिन में छुप जाता रात में चल पड़ता। फिर मुझे एक जगह भीड़ दिखाई दी, वो शरणार्थियों का शिविर था। वहाँ से मुझे भारत भेज दिया। मुझे फूफा बुआ का पता मालूम था तो उनके पास पहुँचा दिया गया।”

फिर जगमोहन बाहर आंगन की तरफ चल दिया। अब परितोष ही नहीं उन पाकिस्तानियों की आँख से पानी बह रहा था। जगमोहन ने एक कोने की तरफ ऊँगली करके कहा “देख यहाँ चूल्हा था हमारा, हम भाई बहन यहीं पास बैठकर गर्म गर्म खाते थे।”

एक कमरे की तरफ ऊँगली करके जगमोहन बोला “यहाँ हमारी चक्की थी जिसे माँ या दादी चलाती थी”

जगमोहन पूरे आंगन में घूम रहा था और अब अपनी ही धुन में बोल रहा था “ माँ सुम्मो बहन डूबीरो जाई, इनानु हलवा खुवा?” (माँ सुम्मो बहन दुबली हो रही है इसे हलवा खिला) फिर जगमोहन ठेठ सिन्धी में कुछ बोलने लगा जो परितोष के भी समझ नहीं आया। जगमोहन की शारीरिक भावभंगिमा एकदम से एक 13 वर्ष के बच्चे जैसी हो गयी थी। जगमोहन 70 साल पुराने समय में पहुँच गया था अपने परिवार के बीच। वो आंगन में चहल कदमी कर रहा था। कभी वो अपनी दादी से बात करने लगता था तो कभी अपने भाई बहनों से लड़ने लगता था। कभी वो माँ से कुछ खाने को मांगने लगता।

फिर जगमोहन उस भीतरी कमरे में चला गया, परितोष उसके पीछे चल रहा था। जगमोहन का पैर किसी चीज़ से टकराया उसने उसे उठाया तो वो टूटा हुआ हुक्का था। जगमोहन ने उसे अपनी छाती से यूँ लगा लिया जैसे कोई माँ अपने नवजात बच्चे को बाहों में भर लेती है। जगमोहन उस लकड़ी के तख़्त के पास पहुंचा और एक छोटे बच्चे की तरह बोला “दादा नींड आइ, तमारी गोदी मा आवी जाऊं”(दादा नींद आ रही है, तुम्हारी गोद में आ जाऊँ)

इतना कहने के बाद जगमोहन एक बच्चे की तरह उस वर्षो की गर्द और गंदगी जमे तख़्त पर लेट गया। वो कुछ ऐसे लेटा था जैसे कोई छोटा बच्चा अपने दादा की गोद में खेलने के बाद थक कर करके लेट जाता है।

परितोष रोकना तो चाहता था अपने पिता जगमोहन को उस धूल और गंदगी भरे तख़्त पर लेटने से लेकिन रोक नहीं पाया। वो देख रहा था आज अपने पिता के रूप में उस बारह तेरह साल साल के जगमोहन को खेलते हुए। जगमोहन तख़्त पर लेट कर एकदम शांत हो गया था। परितोष ने कुछ देर तक चुप खड़ा रहा फिर उसने जगमोहन को आवाज़ दी “पप्पा .... पप्पा”

जगमोहन ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। परितोष ने जगमोहन का कन्धा पकड़ कर उसे हिलाया तो वो एक तरफ को निढाल होकर लेट गया और उसका हाथ तख़्त से नीचे लटक गया। परितोष घबरा गया और जोर से जगमोहन को हिलाकर बोला “पप्पा पप्पा”

एक पाकिस्तानी फ़ौजी ने पास आकर जगमोहन को देखा और परितोष से बोला “सर अब ये नहीं उठेंगे, ये अब अपने परिवार के साथ हैं, पाक परवर दिगार की उस दुनिया में जहाँ कोई भी मज़हबी शैतान इनकी ख़ुशियों को आग नहीं लगा पायेगा। वो लोग कहते हैं कि वो इस दुनिया में अल्लाह का ईमान ला रहें हैं, ये दुनिया बनायी है उन्होंने, जहाँ अल्लाह हु अकबर सुनते ही लोग खौफ़ ज़दा हो जातें हैं।"

परितोष ने टॉर्च की रौशनी जगमोहन के चेहरे पर डाली तो उस बूढ़े जगमोहन के झुर्रियों से भरे चेहरे में जामनगर के उस बच्चे जगमोहन की झलक दिख रही थी।


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