satish bhardwaj

Tragedy Others


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satish bhardwaj

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हाय

हाय

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एक बूढ़ा आदमी तेज कदमों से चलकर आया और खंडहर बन चुके मकान के आगे आकर खड़ा हो गया। ये एक छोटा सा कमरा था जिसकी कड़ियाँ टूट कर नीचे गिर गयी थीं और सामने एक छोटे से आँगन में अब कूड़ा कचरा बिखरा पड़ा था और ऊँची ऊँची झाड़ियाँ उगी हुई थीं। काफी समय से ये खंडहर यूँ ही पड़ा था।

बूढ़ा सामने खड़ा हो गया उसकी आँखें सजल थी। फिर उसने एक ऊँची लेकिन करुण पुकार लगायी "ऐ शरबतिया, ऐ माफ़ी दे दे....री क्यूँ इतना जहर घोल री तू। माफ़ कर दे शरबतिया...मुझसै बड़ा पाप हो गिया था। मेरी मति मलीन होगी थी री।"

फिर वो बूढ़ा वहीँ धरती पर बैठ गया और जोर जोर से रोने लगा। इतने में ही दो तीन लोग वहाँ आये और उनमें से ही एक युवक ने इस बूढ़े को कन्धा पकड़ कर उठाया "पिताजी घर चलिए, नहीं तो फिर तबियत बिगड़ जाएगी"

बूढ़े ने उसका हाथ झटकते हुए अपनी ही धुन फिर गिड़गिड़ाना शुरू कर दिया "री तू तो चाच्ची लगै इन बालकों की। ये भी तो तेरे ई बालक हैं। क्यूँ इनका जनम ख़राब कररी तू.....री शरबतिया, दिके अपने नाम कि लाज रखले ...बकस दे हम सब कु"

वहाँ और भी लोग इकट्ठा हो गए थे "वो युवक प्यार से समझाते हुए हुए उस बूढ़े को वापस ले गया। तभी वहाँ खड़े एक आदमी ने कहा "भाई भोत बुरी पड़ी शरबतिया की हाय तो लम्बरदार पै"

"लम्बरदार चतर सिंह" ये ही नाम था इस बूढ़े का। देवला गाँव का सबसे धनवान और सबसे बड़ा किसान।

आज से 5 वर्ष पहले की एक घटना, जिसके बाद आज लम्बरदार इस हालत में था। 


पाँच वर्ष पहले ...

शरबतिया, एक विधवा थी, और जैसा कि सामाजिक चलन है कि विधवा है तो एक बदरंग जीवन जीना है| उसका जीवन भी एकदम बदरंग था, उसके चेहेरे पर एक मुस्कान रंग बिखेर देती थी जब वो अपने बेटे सुनील को देखती थी। लेकिन सुनील के लिए तो कोई भी शोक ऐब ही था क्योंकि शोक करने लायक गुंजाइश ही नहीं थी। बेटे के साथ रहती थी। इसके और इसके बेटे सुनील के अलावा और कोई नहीं था इनके परिवार में। पति बहुत पहले इही लोक चले गये थे। रोजी रोटी के लिए दूसरों के घरों में या दूसरों के खेतो पर मजदूरी कर लेती थी। अपने बेटे सुनील को इसने किसी तरह की कोई कमी नहीं होने दी थी। इसके लाड़-प्यार का असर ये हुआ कि इसके बेटे ने कभी अपनी जिम्मेदारी को समझा ही नहीं। कस्बे में पढ़ने जाता था तो वहाँ कुछ आवारा लड़कों से दोस्ती हो गयी। लेकिन वो आवारा लड़के तो अमीर परिवार से थे तो उनकी आवारगी तो उनका शोक थी| लेकिन वो ही शोक सुनील के लिए आवारगी| सुनील अपने दोस्तों के साथ उनकी मोटरसाइकिलों और उनकी कारों में घूमता था। कभी कभी गाँव में भी उनकी कार को लेकर आ जाता था। गाँव वालो को तो इस बात से ही बहुत चिढ़ थी कि सुनील कभी उनके खेतों पर मजदूरी करने नहीं आया। फिर उसका प्राइवेट स्कूलों में पढ़ना और यूँ गाड़ियों में घूमने से तो बहुत सो की छातियों पर साँप लोटते थे।

एक दिन सुनील अपने किसी दोस्त की कार लेकर आ रहा था कि उसके दुर्भाग्य से चतर सिंह के बुजुर्ग पिता को उस कार से टक्कर लग गयी। एक्सीडेंट के नाम से ही कोई भी घबरा जाये, ये तो फिर चतर सिंह के पिता थे। सुनील घबराहट में गाड़ी को लेकर भाग गया।

लोगो ने देख लिया था कि टक्कर मारने वाला सुनील है, शरबतिया का बेटा। चतर सिंह के पिता को अस्पताल में भर्ती करवा दिया गया था। जान को खतरा तो नहीं था लेकिन चोटें गंभीर थी फिर आयु भी बहुत हो चली थी, 80 के करीब जा रहे थे।

चतर सिंह या किसी के भी लिए सुनील का यूँ गाड़ियों और मोटरसाइकिल पर घूमना वैसे भी नागवार ही था। लेकिन आज तो सुनील से बड़ी ग़लती हो गयी थी।

चतर सिंह के घर में ही गाँव के लगभग सभी सम्मानित लोग बैठे थे। शरबतिया भी बेचारी अपने बेटे सुनील के साथ अपराधीन सी खड़ी थी ।

चतर सिंह ने एक तंज कसते हुए कहा "सो बिगा सै बी जादा ई धरती बोरा भाई मैं, अर होर भी काम धंदे... पर रोज नवी नवी गाड़ियों में घूमना तो म्हारे बी बसकी ना"

फिर चतर सिंह ने शरबतिया की तरफ देखते हुए कहा "शरबतिया, कोई नौकरी तो तेरा लौंडा कर ना रा...अर तू बी तुझ-मुझ के खेत मै ई मजदूरी करै, कोई केस्सर तो बो ना रखी। फेर रोज नवी नवी गाड़ी अर ये अजब गजब ढाल की मोटरसाइकिल कहाँ सै आ जा तेरे लोंडे पै"

तभी वहाँ बैठे लोगो में से एक बोला "अजी पढ़न के ना पै पता नी क्या गुल खिलारा यो लोंडा, मुझै तो लगै ये सब गाड़ी चोरी चकारी की ई चलारा दिक्खै"

शरबतिया जो पहले ही अपराध बोध से दबी पड़ी थी, ये हमला तो उसपर बहुत भारी पड़ गया। वो ज़मीन पर झुकते हुए बोली "चोरी वोरी ना जी, वो तो उसके दोस्तों की हैं जी। बस शोक मैं ले आया जी, मैं तो ना करूँ ही जी। पर बस आप तो जानो ई हो आजकल के बालकों का मन"

चतर सिंह ने व्यंग्यात्मक लहजे में कहा "हाँ गाम मै बिरसे बि भोत पड़े उसके खात्तर, फेर गाड़ियों मै वो नी तो क्या हम फिरेंगे"

शरबतिया ने रोते हुए चतर सिंह के पैरो को पकड़ते हुए कहा "लम्बरदार जी गलती होगी, वो बि थारा ई बालक है.. माफ़ करदो जी। आज के बाद गाम मै बि ना दिखै"

चतर सिंह को जैसे एकदम ताव आ गया "मेरे बुड्ढे बाप कु मरता छोड़ कै भाग गिया, अर तू बोलरी माफ़ कर दूँ। इस लोफर कु माफ़ कर दूँ"

तभी चतर सिंह का ही ख़ास बोल पड़ा "तेरे लोंडे का तो शोक हो गिया, अर म्हारा क्या हाल बन गिया? पता डाक्टर नै अपरेसन बोल दिया हड्डी का। पचास्सो हज़ार का खर्चा आ जागा"

शरबतिया गिड़गिड़ा कर रो रही थी, उस आदमी के भी पैरो में गिर गयी।

तभी वहाँ बैठा एक आदमी बोल पड़ा "सुण री सारा खर्चा तू ई देगी इलाज का"

शरबतिया इस बात पर घबरा गयी। जो मजदूरी में कमाती थी उसमें से सभी कुछ तो खर्च हो जाता था। अपने बेटे सुनील को भी अच्छे स्कुल में पढ़ा रही थी। जो थोड़े बहुत जेवर थे वो भी बेच ही चुकी थी। घबराते हुए बोली "खर्चा? अभी तो कुछ ना मेरे पास, पर सुनील का टेस्ट पास हो गिया जी सरकारी नौकरी का...एक एक पाई चूका दूंगी खर्चे की"

तभी एक और व्यक्ति बोल पड़ा "अच्छा तेरा लोंडा तो जागा नौकरी पै अर हम यहाँ डोब भरैन्गे, देख पुलस मै रपट कर दी। या तो सारा खर्चा अर दंड अभी के अभी दे ना तो सांज तक दरोगा जी अपने आप सलट लेंगे"

शरबतिया एकदम से घबरा गयी और चतर सिंह के पैर पकड़ लिए और रोती हुई बोली "माफ़ कर दो लम्बरदार...जिन्नगी बर्बाद मत करो मेरे बेट्टे की। यो थारे सामने खड़ा.... जो सजा देनी दे लो पर मुझ विधवा का सहारा ना छिन्नो"

चतर सिंह बोल पड़े "गरीब ....तू कहाँ की गरीब? लोंडा तेरा गाड़ियों मै घूमरा"

शरबतिया ने उठकर सुनील के चांटे मारते हुए कहा "लम्बरदार सही कहरे तम, खूब समझाऊ ही, कि चद्दर सै बाहर पैर ना काढ़, हम मज़दूर गरीब हैं"

इतने में ही चतर सिंह के युवा बेटे ने उठकर सुनील में कई चांटे जड़ दिए। और लोगो ने भी सुनील की पिटाई शुरू कर दी।

सुनील के ऊपर पड़ने वाला हर प्रहार शरबतिया को चोट पहुंचा रहा था। लेकिन वो रोते हुए बस ये कहा रही थी "इसे सजा दे लो जी जो देनी है। थारा ही बालक है जी, थारे भरोसे ई इस गाम मै पड़ी ही आज तक। ना तो मुझ विधवा का क्या सहारा?"

तभी पुलिस आ गयी "पुलिस को देखकर शरबतिया घबरा गयी। सुनील के चेहेरे पर खून नीकल रहा था, लेकिन उसकी घबराहट भी साफ़ दीख रही थी।

पुलिस सुनील को पकड़ कर ले जाने लगी "शरबतिया ने दरोगा के पैर पकड़ लिए, पंचायत में बैठे हर आदमी के पैरो में गिरकर वो गिड़गिड़ायी लेकिन किसी ने नहीं सुनी और पुलिस सुनील को ले गयी।

शरबतिया ने चतर सिंह से कहा "लम्बरदार मुझ गरीब की हाय मत ले, बकस दे हमें। दोबारा मै या मेरा लोंडा तुझै दिखै बी ना गाम मै, लम्बरदार रहम कर मुझ विधवा पर"

लम्बरदार ने ताव में आते हुए कहा "री वो आवारा है जहाँ जागा वहाँ लोफर पना ई करैगा"

शरबतिया ने याचना करते हुए कहा "ना लम्बरदार सुधर जागा। नौकरी लगन वाली उसकी, उसकी जिन्दगी ख़राब ना करो"

चतर सिंह ने कहा "शरबतिया मेरा लोंडा ऐसा आवारा होत्ता या ऐसा काण्ड करता तो घर मै बी ना बड़ण देत्ता। खुद पुलिस कु सौंप देत्ता"

अब शरबतिया का सब्र का बाँध टूट गया था। उसने अपनी बिखरी आवाज़ में कहा "लम्बरदार बड़े बोल ना बोल, सबके सामनै आं उसके बोल्ले बोल। मेरे सुनील सै गलती हुई पर इतनी बी बड़ी ना हुई के उसकी जिन्दगी बर्बाद कर दो तुम गाम वाले"

लेकिन वहाँ किसी पर शरबतिया की वेदना और पीड़ा का कोई प्रभाव नहीं पड़ रहा था।

शरबतिया उठकर चल दी और चलते चलते कहा "लम्बरदार याद रखिये अपने बड़े बोल बी अर इस विधवा कु बी.....एक दिन तू खुद कहगा कि तुन्नै सही ना करा हा, जब तेरे बोल तेरे सामने आकर खड़े हो जावेंगे। तब तुझे पता चलेगा कि एक गरीब की हाय क्या कर सकती है? "


शरबतिया उठकर चली गयी वहाँ से। लेकिन शायद ये उस घटना का असर था या कोई दुर्योग कि शरबतिया की दो दिन बाद ही मौत हो गयी। दुर्घटना का मुकदमा था तो सुनील कुछ दिन बाद ही छूट गया और गाँव छोड़कर चला गया। फिर कभी सुनील गाँव में नहीं आया। सब कुछ सामान्य चल रहा था। चतर सिंह बहुत ही खुश था अपनी जीत पर, लोगो को शान से अपनी पितृभक्ति के बारे में बताता था कि कैसे उसके पिता को चोट देने वाले को उसने गाँव बदर कर दिया।

किसी को एहसास नहीं था उस दुःख और पीड़ा का जो शरबतिया ने सही थी।

शरबतिया का मकान भी जैसे उस दुःख को नहीं सह पाया और टूट कर बिखरने लगा था।


उस घटना से एक वर्ष बाद एक दिन जब चतरसिंह अपनी बैठक में बैठा था तभी गाँव का एक आदमी आया, वो घबराया हुआ था। अपनी फूली हुई सांस को सँभालते हुए उसने चतर सिंह से कहा "लम्बरदार जी रोहित ने गाड़ी सै टक्कर मार दी जी।" रोहित चतर सिंह का इकलोता पुत्र है।

चतर सिंह एक दम से खड़ा हो गया और बस इतना ही कह पाया "कहाँ? कैसा है रोहित?"

उस आदमी ने कहा " वो जी कस्बे के जटिया मोहल्ले में, एक बुढ़िया थी, टक्कर लगते ई मरगी जी" फिर थोड़ा रुकते हुए बोला "वो जी दरोगा जी का फोन आया हा, बतारे हे कि रोहित दारु के नशे मै धुत्त था जी, मोहल्ले वालो ने गाड़ी बी तोड़ दी जी अर रोहित कु बी मार लगाई"

चतर सिंह के चेहरे पर अब घबराहट छा गयी। वो उठकर अन्दर गया और फोन पर दरोगा से बात की फिर निराश होकर बहर आ गया।

उस आदमी ने पूछा "क्या कहरे दरोगा जी?"

चतर सिंह ने दुखी मन से कहा "चिक काटनी पड़ी दरोगा जी कु, भीड़ लगा दी ही उन्होंने थाणे में। मेडिकल हो रा अब"

उस आदमी ने घबराते हुए कहा "मेडिकल मै तो दारु बी आ जागी जी"

फिर चतर सिंह अन्दर जाकर कुछ देर बाद बहर आया और कस्बे की तरफ अपने कुछ शुभचिंतकों को लेकर चल दिया। देर रात चतर सिंह वापस आया। कोई भी समझौते को तैयार नहीं हुआ था। रोहित को पुलिस हिरासत में ही रहना पड़ा।

लेकिन चतर सिंह का दुर्भाग्य बस यहीं नही रुका। अगले दिन प्रात: चतर सिंह वापस कस्बे में जाने की तैयारी रहा था, उसके कुछ ख़ास शुभचिंतक भी आ गए थे।

चतर सिंह के मोबाइल की घंटी बजी, उसके दामाद का फोन आया था। वो बहुत ही परेशान था, चतर सिंह की बेटी का विवाह दो वर्ष पहले हुआ था और वो विवाह के बाद पहली बार गर्भवती थी। चतर सिंह के दामाद ने बाताया "पिताजी रात जैसे ही रोहित के एक्सीडेंट की खबर सुनी तो घबरा गयी। बस क्या कहूँ जी तबियत ख़राब होती चली गयी। डॉक्टर के पास भी ले गये लेकिन जी बच्चा मिस्करेज हो गया। इसकी तो हालत अब ठीक है पर मेरे घर में ख़ुशी आने से पहले ही ..."इतना कहते ही वो रोने लगा।

चतर सिंह के हाथ से मोबाइल छूट कर ज़मीन पर गिर गया। वो खुद भी धम्म से ज़मीन पर पसर गया। वहाँ खड़े लोग परेशान हो गए और फोन को उठाकर दामाद से बात करने लगे।


चतर सिंह को दरवाज़े पर शरबती खड़ी दिखाई दी। वो वितृष्णा भरी दृष्टि से देख रही थी। लेकिन उसके चेहरे पर एक मुक्तिभाव प्रदर्शित करती मुस्कान दिखाई दे रही थी।

चतर सिंह उठकर अपने उस दिवास्वप्न के पीछे भाग लिया और भागते भागते शरबती के खंडहर बन चुके मकान के बाहर आकर ज़मीन पर बैठ गया और चिल्लाने और रोने लगा "शरबती मुझे माफ़ कर दे, मेरे जीवन में जहर मत घोल, री अपने नाम की लिहाज कर। शरबती है तेरा नाम, मिठास बाँट जहर मत घोल"

चतर सिंह के कानों में शरबती के वो बोल गूंज रहे थे "लम्बरदार याद रखिये अपने बड़े बोल बी अर इस विधवा कु बी.....एक दिन तू खुद कहगा कि तुन्नै सही ना करा हा, जब तेरे बोल तेरे सामने आकर खड़े हो जायेंगे। तब तुझे पता चलेगा कि एक गरीब की हाय क्या कर सकती है?"

समय अपनी गति से गतिमान रहा सब कुछ बदल गया था। सुनील कभी गाँव में वापस नहीं आया उसकी सरकारी नौकरी लग गयी थी और विवाह भी हो गया था। रोहित के मामले में भी समझौता हो गया था उसका भी विवाह हो गया था। चतर सिंह की बेटी के घर में भी एक सुंदर पुत्री ने जन्म ले लिया था। सबका जीवन खुशहाल हो गया था। किसी को याद भी नहीं आती थी वो घटनाएँ लेकिन चतर सिंह का जीवन जैसे बस उस दिन पर आकर ठहर गया था। वो पागल हो चुका था, उसे घर से बाहर नहीं निकलने दिया जाता था लेकिन यदि वो कभी घर से बाहर निकलता भी था तो सीधा शरबती के खंडहर बन चुके मकान पर आकर ही ठहरता था और शरबती से माफ़ी मांगने लगता था। उसे आज भी शरबती दिखाई देती थी। 



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