Vinita Shukla

Classics Inspirational

5.0  

Vinita Shukla

Classics Inspirational

एक थी तात्री

एक थी तात्री

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एक थी तात्री

             (केरल की ऐतिहासिक कथा)

                 तात्री बुत बनी बैठी थी. परिस्थितियों ने उसे पाषाण बना दिया. एक ना एक दिन चरित्र- पड़ताल की प्रक्रिया से उसे गुजरना ही था; इस जाल में तो वह, जानबूझकर फंसी थी. पतन के पंक में, वह स्वयं ही कूदी थी. जो सुनता, आश्चर्य से, दांतों तले उँगली दबा लेता; उससे ऐसी अपेक्षा, उसके परिचितों ने, नहीं की थी. तत्कालीन मलयाली समाज में, चाल- चलन की जांच- पड़ताल को ‘स्मार्तचरितं’ कहते थे. किसी स्त्री की पवित्रता पर, संदेह होने की स्थिति में, उसके विरुद्ध, ऐसी कार्यवाही की जाती थी.

           बिरादिरी के लिए वह इंसान ना होकर ‘साधनम’ हो गई. साधनम यानी वस्तु- एक ऐसी नारी, जिस पर अभियोग लगा हो. जिसकी पहचान, उसके नाम से न होकर, एक वस्तु की तरह, होने लगी. कैसी घिनौनी सोच! ‘स्मार्तचरितं’ का प्रथम चरण था- ‘दासी- विचारम’; जिसमें अभियुक्त महिला को लेकर, उसकी दासी से पूछताछ की जाती थी. वह कटुता से हंसी. ‘दासी- विचारम’ उस जैसी पतिता के लिए नहीं था. यह तो उन भद्र स्त्रियों के लिए था- सयानी होते ही, जिनके रूप- यौवन पर, पहरा बिठा दिया गया. यह बात और है कि कभी वह भी... उन्हीं स्त्रियों की श्रेणी में आती थी.

        वर्तमान में, उसके आचरण पर अंकुश रखने वाली, नौकरानी तो नहीं; एक वफादार महिला साथी अवश्य थी जो उसके देह- व्यापार के लिए, ग्राहक जुटाती थी. वह तोज़ी(सखी) तो स्वयं ही भ्रष्ट थी जबकि ‘दासी विचारम’ के संचालन हेतु, ऐसी सेविका चाहिए थी; जिसका नाम उसके कुल ने, पहचान- चिन्ह के तौर पर, उसके मस्तक पर अंकित किया हो; जो तथ्यों की चीरफाड़ करते हुए, उसके चरित्र को उघाड़ सके.  

अभियोग का पहला चरण, यूँ ही गुजर गया. तात्री को याद आईं- सभी नई- पुरानी दासियाँ; एक- एक कर, सुधियों के द्वार, खटखटातीं.

       वे परिचारिकाएँ- निम्न कुल में जन्मीं नारियां; क्रूर सामाजिक परिस्थितियों से दो चार होकर, स्त्री- सुलभ कोमलता, खोती जातीं . इन दासियों को, घर की महिलाओं संग, ‘नत्थी’ होते, कितनी ही बार देखा तात्री ने...मानों वे उनके अस्तित्व का अंग हों. सयानी होने के बाद, नम्बूदिरी औरत पर, ‘अंतर्जनम’ का ठप्पा लग जाता. अन्तर्जनम- अर्थात घर के अंदर रहने वाले प्राणी. यह ठप्पा लगते ही ,उसकी निगरानी का ‘ठेका’, किसी नायर स्त्री को मिल जाता.

कुलीन महिला के ,आचरण की गवाही देने वाली सेविका; स्वयं अपनी दैहिक-अस्मिता को, अक्षुण्ण नहीं रख पाती. नम्बूदिरी पुरुष, स्वेच्छा से उसका शोषण कर सकते थे; ऐसे थे समाज के दोगले मानदंड! वह सेविका जिसे आजन्म, आभिजात्य-वर्ग की, स्त्रियों की, सेवा करनी पड़ती ; उसी को यदा-कदा, स्वामिनी के विरुद्ध, चरित्र- हनन का अधिकार, मिल जाता...क्या यह बन्दर के हाथ, उस्तरा थमा देने जैसा नहीं था? क्या दबे- कुचले होने की कुंठा, तब, अपना प्रतिशोध, नहीं लेती होगी...और फिर...उत्कोच से तो बड़े- बड़ों को खरीदा जा सकता था; दासी की तो बात ही क्या!

 तात्री को रिश्ते की वे सभी बहनें याद आईं जो उससे पहले, सयानी हो गई थीं. उसके साथ वाटिका में फूल चुनते चुनते...तालाब में अठखेलियाँ करते करते... वे चेचियाँ उर्फ़ दीदियाँ, न जाने कब और कैसे... घर की चारदीवारी में, नजरबंद हो गईं. पिता के स्नेहिल स्पर्श से वंचित...भाइयों के पावन नेह से परे- एक अँधेरे संसार की कैदी.

 कभीकभार मन्दिर या किसी सम्बन्धी के यहाँ जाने पर ही; बाहरी संसार से, उनका सामना होता. अपने पति या दासी की देखरेख में ही, वह बाहर निकल सकती थीं. ताड़पत्र की छतरी से, मुँह छिपाते हुए, चलना होता ताकि परपुरषों की कुदृष्टि, न पड़े. चाल- चलन का आंकलन करने वाली दासी, अपनी ‘काकदृष्टि’ उन पर जमाए रखती! संसार के समस्त पुरुष, उन चेचियों( दीदियों) के लिए, परपुरुष ठहरे - उनका भावी पति या पति ही उन्हें देख सकता था. वयःसंधि के द्वार पर खड़ी तात्री, आतंकित होकर सोचती कि क्या ऋतुधर्म होने से, चारित्रिक दोष, स्वतः ही उत्पन्न हो जाता है?

    बिरादिरी का सत्य, कितना सतही था...और कितना खोखला!

 वह स्त्री- जिसके शील और चाल- चलन का, बड़ी- बूढ़ियाँ उदाहरण देती थीं; आज अपनी छवि को, मलिन होने से, रोक नहीं पा रही थी. वह जो- नियम- कायदों को, सहज रूप में, स्वीकारती रही थी ,युगों युगों की नींद से, जाग चुकी थी. पितृसत्ता के सारे पैंतरे, उसे समझ आने लगे थे. नम्बूदिरी पुरुष, अपने दोनों हाथों में लड्डू रखना चाहते थे...और स्त्री! उसे तो बहुमूल्य आभूषण, पहनने का, अधिकार तक न था. सर्वाधिक सम्पन्न, नम्बूदिरी परिवार की सदस्य होने के बावजूद, वह मात्र ताम्र- आभूषण, धारण कर सकती थी. उसका अधिकार क्षेत्र, घरेलू कार्यों तक ही सीमित और देवालय को सजाना, देव- प्रतिमाओं के लिए माला गूंथना- उसकी अभिवृत्ति.

        औपचारिक शिक्षा से वंचित, तात्री का रुझान; साहित्य, कला और कथकली नृत्य की तरफ रहा. वह बुद्धिमान थी. वर्जनाओं ने उसे, विद्यालय नहीं जाने दिया. फिर भी, पिता और भाइयों से, उसने पढ़ना- लिखना सीखा और ललित कलाओं में, निपुणता हासिल की. उस जैसी योग्य कन्या का, विद्रोहिणी होना स्वाभाविक था. जैसे जैसे वह बड़ी हुई; निर्मम समय की भयंकरता और भविष्य की अनिश्चितता, उसे डराने लगी. रोगी, भोगी, वृद्ध, कुरूप - जैसा भी वर, भाग्य उसकी झोली में डालता, उसे स्वीकारना पड़ता. उस काल में नारी की, इच्छा- अनिच्छा का तो प्रश्न ही नहीं था - फिर चाहे वह उच्च कुल की हो या निम्न कुल की. उच्च कुल की नारी को तो, जीवन भर एक ही पुरुष, के प्रति समर्पित रहना पड़ता था. उस युग में, विवाह के लिए, पुरुष उपलब्ध ही कहाँ होते थे... नम्बूदिरी परिवार के बड़े पुत्र को ही ‘वेली’(विवाह) की अनुमति थी; परिवारिक संपत्ति को बंटवारे से, बचाने के लिए!

उसके पति तो कदाचित, अब तक कई विवाह कर चुके होंगे. एक वह है, जो समाज के बनाये कटघरे में खड़ी, मानों किसी प्रलय की प्रतीक्षा, कर रही थी. सारे नियम कायदे तो नारी के लिए ही थे- पुरुषवादी सत्ता का, सुनियोजित षड्यंत्र. एक ही पुरुष, दसियों बार, दूल्हा बनता. यहाँ तक कि पत्नी के तौर पर, पोती की आयु की किशोरी, उसकी भोग्या होती. तात्री भी तो उसी व्यवस्था की अंग थी जहाँ बूढ़े पति के मरने पर, उनकी युवा विधवाएं, दयनीय और उपेक्षित हो जाती थीं. यहाँ तक कि उनके हंसने पर भी रोक लग जाती.

       अतीत की गांठ फिर कसकने लगी थी. पति द्वारा त्यागे जाने पर; उपेक्षा और तिरस्कार, सहते हुए, दिन बीत रहे थे. वह समझ नहीं पा रही थी कि इस विकट स्थिति से, कैसे निपटे. “तू मर क्यों नहीं जाती?!” उसके अपने ही कुटुम्बियों ने; घृणा से थू थू करते हुए कहा था. उसकी माँ और भाभियों ने, उसके रसोईं में बैठकर, खाने पर रोक लगा दी थी. वह जान गई कि उसके खिलाफ ,साक्ष्य जुटाए जा चुके थे. अनेक राहगीरों व अड़ोसियों पड़ोसियों ने उसको, साज- श्रृंगार से युक्त होकर, झरोखे से ताकते, पाया था... उससे ‘आँख लड़ाने वाले’ रसिकजनों के, ‘अभद्र संकेतों’ और बदले में, उसकी ‘निर्लज्ज चेष्ठाओं’ को भी देखा गया. तात्री चीखकर कहना चाहती थी, ‘क्या सजना- संवरना पाप है? क्या गवाक्ष से, बाहर देखना अपराध है...शालीन स्मित का प्रत्युत्तर, मुस्कराकर देना, अनुचित है??

         किन्तु कोई लाभ न था. उसके अपने ही पराये हो चले. उसकी सहायता करना तो दूर, उसे बेघर करने पर तुले थे. उन आत्मघाती क्षणों में उसने जो निर्णय लिया, उसकी कोई कल्पना भी नहीं कर सकता था!

स्मार्तचरितं का दूसरा चरण, आरम्भ हो गया. तात्री को एक निर्जन स्थल पर, ‘अचमपुरा’ नामक विशिष्ट कोठरी में, रखा जाना था. राजा के पास, यह सूचना पहुंची. आगे की प्रक्रिया हेतु, एक न्यायिक अधिकारी और तीन विद्वानों की नियुक्ति हुई. तात्री जान गई कि उसके बचने की प्रत्याशा, बहुत कम थी. सुनियोजित षड्यंत्र द्वारा, निर्दोष अंतर्जनम पर; मिथ्याभियोग सिद्ध करना, आम होता जा रहा था...और फिर वह तो निर्दोष थी भी नहीं, एक कलंकिनी थी.

            इस क्रम में, सच उगलवाने के लिए; साधनम पर, कई अत्याचार, किये जा सकते थे. उसकी कोठरी में, सर्प एवं मूषक जैसे, विषैले जन्तुओं को, छोड़ा जा सकता था... उसे दरी में लपेट कर, भवन की छत पर से, एक शव की भाँति, लुढ़काया जा सकता था. उसने सोच लिया था कि वह ऐसी यन्त्रणाओं से बचने के लिए, अपना दोष, सहज ही मान लेगी. प्रताड़ना की इस यात्रा के समानांतर, अतीत की यात्रा भी जारी थी . उसका कम उम्र में ही बेमेल विवाह, कर दिया गया था. इस वास्तविकता को भी उसने, सर झुकाकर स्वीकार किया; क्योंकि यही उसके समाज का सच था. उसके अंतस में विद्रोह की ज्वाला कब जगी- वह खुद नहीं जानती... आयु से कहीं बड़े पति ने, उसका शोषण किया. उनके रसिक स्वभाव से त्रस्त होकर, द्रोह का अंकुर, उसके मन में फूट पड़ा था. समवयस्क और समर्पित सहचर पाने का, उसका स्वप्न चूर- चूर हो गया.

             वह जान गई थी कि उसका स्वामी, मद्यप और वेश्यागामी था. तात्री एक अंतर्जनम थी- शैशव से ही पुष्पसज्जा में निपुण; पर एक दिन, उसके पति ने; उसे एक गणिका की, सेज सजाने पर, विवश कर दिया. वह उस वेश्या को, राह से उठाकर, घर ले आया था. यहाँ पर उसकी सहनशक्ति जवाब दे गयी और उसने पति को, सदा के लिए, छोड़ दिया. अब तो उसका मायका भी छूट चुका. स्मृतियों ने कुरेदा तो विगत की परतें, खुलती चली गईं. पति की अवमानना से, उसका मानसिक संतुलन, बिगड़ सा गया था. वह नित्य सज- संवरकर, निरुद्देश्य, खिड़की से, बाहर दृष्टिपात करती. गणमान्य पुरुष , उस राह से गुजरते रहते और जब तब, उसको देखकर, मुस्करा देते.

 अभिवादन के तौर पर, वह भी मुस्करा दिया करती. इसके पीछे सुंदर दिखने की चाह थी. उन कुलीनजनों की मुग्ध दृष्टि, उसके आहत अहम को सहलाती और उसकी पीड़ा, यह सोचकर मंद पड़ जाती कि अपने स्वामी के साथ, शयन करने वाली स्त्रियों से, वह कहीं अधिक मोहक है. मन में हठात ही उठने वाला विकार, प्रौढ़ पति की तुलना, उसके युवा प्रशंसकों से कर देता. यद्यपि उसकी देह ने, मर्यादा की सीमा- रेखा नहीं लांघी तथापि उसे, यह भान भी न हुआ कि उसके हाव- भाव, किस कुचक्र में, फंसाने वाले थे!

 स्मार्तचरितं का तीसरा चरण, क्रियान्वित होने को था. राजा द्वारा नियोजित, न्यायिक समिति, उससे प्रश्न पूछने वाली थी. अन्न का एक कण भी, उसके गले से नहीं उतरा था जबकि कोठरी के बाहर जुटी, खा- पीकर अघाई हुई, मक्कारजनों की टोली; इस प्रकरण को, एक उत्सव की तरह, मना रही थी. साधनम के विषय में, अनर्गल और अश्लील टिप्पणियाँ करते हुए ‘सत्पुरुष’, कामना कर रहे थे कि तात्री जैसी सुन्दरी, समाज से बहिष्कृत हो और वे उसे, अपनी रखैल बना लें. यहाँ तक कि निम्नकुल के भी कुछ लोग, उसे अपनाने की, आस लगाये बैठे थे. पहले तो वे, उसकी छाया को छूने तक की, कल्पना नहीं कर सकते थे!

नम्बूदिरी भद्रजनों ने, अपने स्वार्थ के लिए, स्त्री- शोषण और दमन की, कैसी- कैसी कूट- योजनायें, बनाई थीं और उनके विद्रोह को रोकने के लिए, कठोर नियम. कुलीन परिवार का ज्येष्ठ पुत्र, बहुविवाह के चलते, विलासिता का जीवन बिताता और अनुज, निम्नकुल की स्त्रियों से, स्वेच्छापूर्वक दैहिक- सम्बन्ध बनाते. ‘सम्बन्धम’ नामक इस रीति का विरोध करने के बजाय, शोषित कन्या के अभिभावक; प्रसन्न होते कि इस प्रकार, उनकी बेटी को, एक तेजस्वी और बुद्धिमान सन्तान मिलेगी. छद्ममातृसत्ता - जिसमें शारीरिक- उत्पीड़न के उपरान्त, उत्पन्न संतति का दायित्व, मातृकुल का रहता; पुरुष का उससे, कोई लेना- देना नहीं होता.

 ‘वेली’ और ‘सम्बन्धम’ नाम की रीतियों ने, नम्बूदिरी ’महानुभावों’ को, उच्छृंखल बना दिया था और ‘आखेटक’ भी. उनका ‘ आखेट’ बनतीं थीं- तात्री जैसी महिलायें. सवाल- जवाब के दौरान, तात्री ने सारे अभियोग स्वीकार किये किन्तु उसने यह भी कहा कि उसके संग, दैहिक संसर्ग करने वाले भी उतने ही दोषी हैं, उन्हें भी दंडित किया जाना चाहिए. उन सबने, नम्बूदिरी कुल की मर्यादा को, ठेस जो पहुंचाई थी.

चौथे चरण में साधनम और उसके साथ, पाप में भागी; पुरुषों के विरुद्ध, सुचिन्द्रन मंदिर में, अभियोग सिद्ध किया जाना था. उन भद्रजनों में से, किसी ने तात्री को अपनी बहन तो किसी ने पत्नी बताकर, अभियोग से बचना चाहा. कुछ दूसरे भी बहाने बनाये गये...किन्तु सब व्यर्थ! तात्री के पास, उनके खिलाफ, पुख्ता सबूत थे. उनके द्वारा दिए उपहारों से लेकर, उनके साथ बिताए, समय का लेखा- जोखा, उसके पास था. यहाँ तक कि उनके शरीर पर, ऐसे कुछ निशानों के बारे में, तात्री जानती थी- जिनका औरों को ज्ञान न था. दोषियों को सजा दिलाना उसका लक्ष्य था; जिसमें वह सफल हुई.

 पांचवें चरण में, उसे समाज च्युत किया जाना था. उसके घरवालों ने, जीतेजी, उसका अंतिम- संस्कार कर दिया. उसके पिता के अनुसार, तात्री के जन्म के समय, ग्रह- नक्षत्र, अशुभ थे. इसी से उन्हें, यह दिन देखना पड़ा. पति के शब्द, उसके भीतर उबाल मार रहे थे, “हाँ मुझे वेश्याओं से प्यार है. तुम भी वेश्या बन जाओ तो तुम्हें भी प्यार करूंगा.” उस काल में, स्त्री और पुरुष की हैसियत, एक ही तराजू में तौलने का, इससे बेहतर उदाहरण, क्या हो सकता था?!

  स्मार्तचरितं का छठा और अंतिम चरण था. कुलटा को दंड देकर, बिरादरी को पावन करने की ख़ुशी में, न्यायिक समिति की तरफ से, भोज का आयोजन हुआ. साधनम को, दोषी ठहराए जाने के बाद, भेड़ की खाल में कई भेड़िये, उसका आखेट करने को तत्पर थे; किंतु वह किसी के हाथ न आई. जाने कहाँ, गायब हो गई थी तात्री. उसे अपना बनाने का, सपना देखने वाले, हाथ मलकर रह गये.

तात्री की कहानी, मात्र स्मार्तविचारम के, छह चरणों की कहानी नहीं है. असली कहानी तो तब शुरू हुई थी जब वह परित्यक्ता बनकर, मायके आयी. तब उसके पति का अवगुण, किसी को दिखाई न दिया. सबने उसे ही बुरा माना. अपने स्वामी और नैहरवालों के दुर्व्यवहार से त्रस्त होकर, वह कहीं चली गई थी. लोगों ने समझा- मर, खप गई होगी. दिन बीतते रहे. इस बीच, उत्सव- क्षेत्रों में; कोई नई स्त्री, दिखाई पड़ने लगी. उसका अद्भुत सौन्दर्य, उच्च वर्ग के पुरुषों को, खींचता था. धीरे धीरे कई गणमान्य, उसके पाश में जकड़ते चले गये. यदि उन कुलीनजनों को, स्वप्न में भी, यह आभास होता कि वह एक नम्बूदिरी महिला थी तो उसके पास फटकने का, साहस नहीं करते. उस कालखंड में, निम्नवर्ग की नारी को भोगना जितना सहज था, उच्च कुल की स्त्री से सम्बन्ध बनाना- उतना ही बड़ा अपराध! आश्चर्य यह था कि वह सुन्दरी मात्र, अभिजात्य वर्ग के पुरुषों हेतु, उपलब्ध थी.

 फिर वह अवसर आया, जिसकी उसको बरसों से प्रतीक्षा रही. आखिर उसका पति उसके साथ, रात गुजारने आ गया...एक मोहिनी गणिका के बारे में सुनकर, लोभ- संवरण न कर सका. अपनी पत्नी से वह, पूरे पाँच वर्षों में मिल रहा था पर उसे पहचान नहीं पाया. कैसे पहचानता? क्या वह अपनी सरल, पतिव्रता सहचरी से, ऐसी अपेक्षा कर सकता था? प्रेम की निशानी के तौर पर, तात्री ने उसकी अंगूठी रखवा ली. दिन के उजाले में जब उसने, अपनी नई संगिनी का मुख देखा तो वह चीखा और भाग खड़ा हुआ.

 बात खुलने पर, तात्री के दूसरे प्रेमी भी, वहां से पलायन कर गये; किन्तु फिर भी बच न सके. तात्री के पास से, उनकी अंगूठियाँ, कमरबंद और अंगौछे जैसे अनेक साक्ष्य, बरामद हुए; जिनके आधार पर, अनैतिक संसर्ग के आरोप में, समाज के ६४ गणमान्य नागरिकों को, धर लिया गया. कहते हैं, ६५ वाँ अभियुक्त, स्वयं कोचीन का राजा हो सकता था. तात्री ने उसे एक अँगूठी दिखाई थी जिसे देखते ही, राजा ने अपना फैसला सुना दिया... संभवतः, अपनी खुद की रक्षा के लिए. अनुमान है कि वह तथाकथित मुद्रिका, उसकी ही रही होगी; अतः साधनम को डरा- धमका कर या कोई लोभ दिखाकर, फैसला बदलने का, प्रयास नहीं किया गया.

 इस प्रकार ऐतिहासिक ‘स्मार्तचरितं’ का समापन हुआ और समाज के संचालक, अपने ही सिद्धांतों को लेकर, वैचारिक- मंथन पर बाध्य हो गये. फलस्वरूप ‘सम्बन्धम’ एवं ‘वेली’ जैसी परंपराओं पर, पुनर्विचार हुआ. १९०५ में घटी इस घटना ने, कुरीतियों की जड़ पर प्रहार किया. इसके उपरान्त बहुविवाह की, कुप्रथा पर रोक लगा दी गई. यह था एक नम्बूदिरी नारी का, अपने पति और पुरुषप्रधान व्यवस्था से प्रतिशोध. वह स्त्री, जिसका नाम लेना भी पाप था; अकेले दम पर, परिवर्तन की, वह चिंगारी जला गई; जिसने कालान्तर में अग्नि बनकर, रूढ़ियों को भस्म कर दिया।

 

      


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