अख़लाक़ अहमद ज़ई

Classics

5.0  

अख़लाक़ अहमद ज़ई

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श्रावस्ती (भाग-1)

श्रावस्ती (भाग-1)

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बौद्ध ग्रंथ दिघ्घनिकाय के अनुसार भगवान् बुद्ध से उनके प्रमुख शिष्य आनंद ने स्तूप बनवाने के बाबत प्रार्थना की कि इस अज्ञात गांव (कुशीनगर) से परिनिर्वाण करने के बजाय राजगृह, श्रावस्ती अथवा वाराणसी जैसे किसी प्रसिद्ध नगर में परिनिर्वाण करें।

और उन्हीं प्रसिद्ध नगरों में से एक नगर श्रावस्ती के खण्डहरों के बीच मैं खड़ा था। इन खण्डहरों से मुझे क्या मिला, यह तो मैं नहीं बता सकता पर उन मूक खड़ी उजड़ी-उजड़ी दीवारों में जो अदृश्य तस्वीरें दिखाई दीं उससे अवश्य ही महाभारत के पहले से लेकर महाभारत के बाद तक की राजाओं-महाराजाओं के वैभव और बरबादियों की लम्बी कहानी बनती थी। और इतनी लम्बी कहानी कि कालन्तर में यह घने जंगल से ढके हुए एक विस्तृत टीले के रूप में 'शिकारगाह' मात्र रह गयी। जन साधारण श्रावस्ती को बिलकुल भूल गये। उन्हें यह भी जानकारी नहीं रह गयी कि श्रावस्ती कभी भारत का सबसे समृद्ध नगर रहा है। 


लव की राजधानी : श्रावस्ती

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अब यदि किसी नाम को केवल वेदों-पुराणों में ही पढ़ा जाय तो वह केवल सपने से ज्यादा कुछ नहीं लगता पर यदि कहीं जाओ और अचानक यह मालूम हो जाय कि इस स्थान पर वही आदमी निवास करता था, तो दिल अजीब खुशी से भर उठता है और लगता है कि उसके निवास स्थान पर नहीं, बल्कि उसी व्यक्ति के रू-ब-रू हो गया हूँ। जब मुझे मालूम हुआ कि चौदह वर्ष का वनवास समाप्त कर, अयोध्या लौटने पर मर्यादा पुरुष रामचन्द्र समस्त आर्यवर्त्त के एक छत्र सम्राट घोषित हुए। उन्होंने अनेक राज्य जीत कर आर्यवर्त्त की सीमा का विस्तार किया। राम ने अपने साकेतवास के पूर्व अपना साम्राज्य अपने दो पुत्रों और छह भतीजों में बांटकर सूर्यवंश की अनेक गद्दियां स्थापित की। ज्येष्ठ पुत्र लव को उत्तर कोसल और कुश को दक्षिण कोसल का राज्य दिया। लव ने उत्तर कोसल की राजधानी यहीं श्रावस्ती में ही स्थापित की थी, तो दिल बल्लियों उछलने लगा। लगा, राम के पुत्र लव के रू-ब-रू आ खड़ा हुआ हूं। 

     श्रावस्ती में लव की राजधानी स्थापित हो जाने से श्रावस्ती की प्रतिष्ठा एवं समृद्धि दिनानुदिन बढ़ती गयी थी। लक्ष्मण तथा शत्रुघ्न के पुत्रों के राज्य शीघ्र ही भंग हो गये परन्तु लव का वंश दीर्घ काल तक कायम रहा था। 

लव के पौत्र राजा ध्रुव सिन्धु की दो शादियाँ हुई थीं। पहली कलिंगपति की पुत्री मनोरमा से और दूसरी उज्जैनपति युद्धाजित की पुत्री लीलावती से। राजा ध्रुव सिंह आखेट में मारे गये। मंत्रियों ने मनोरमा पुत्र बालक सुदर्शन को राजा बनाया। इस पर कलिंग और उज्जैन नरेश अपने दौहित्रों के पक्ष में लड़ने को तैयार हो गये। श्रृंगवेरपुर में भयंकर युद्ध हुआ जिसमें कलिंग नरेश मारे गये। सुदर्शन ने भागकर प्रयाग में भारद्वाज के आश्रम में शरण ली। भारद्वाज के आश्रम में रह कर सुदर्शन महान विद्वान हो गये। कुछ दिन बाद काशी के राजा सुबाहु की पुत्री शशिकला का स्वयंवर हुआ शशिकला सुदर्शन के गुणों से प्रभावित थी। उसने चुपके से उन्हें बुला भेजा। स्वयंवर में युद्धाजित, शत्रुजित, कारुषपति, भद्रशर, सिंह राज, महिष्मतीपति, पांचालराज, कामरूप, कर्णाटक, केरल, विदर्भ, चोल इत्यादि राजाओं का जमघट था। युद्धाजित ने आपत्ति की कि सुदर्शन कहीं का मुकुटधारी राजा नहीं है अत: वह स्वयंवर में शामिल नहीं हो सकता। पर केरल नरेश ने उसका पक्ष लेकर कहा--"वह ध्रुव सिंधु का बड़ा पुत्र है अत: माननीय राजपुरुष है।" इसका युद्धाजित ने कड़ा विरोध किया तथापि शशिकला ने जयमाला सुदर्शन के गले में डाल दी। इस पर युद्धाजित तथा लीलावती का पुत्र शत्रुजित दोनों केरल नरेश से युद्ध के लिए तैयार हो गये। घमासान युद्ध हुआ। युद्धाजित और शत्रुजित युद्ध में मारे गये। सुदर्शन शशिकला से विवाह कर श्रावस्ती के राजा बने। यही वंश महाभारत तक चला। इस वंश का राजा वृहद् बल महाभारत संग्राम में मारा गया। (हिमवर्ष और नेपाल-- शेखर सिंह गौतम, पृष्ठ 97-98)

     कोसल का सूर्यवंशी राजा वृहद् बल महाभारत युद्ध में कौरवों की ओर से लड़ते हुए वीर अभिमन्यु के हाथों मारा गया। (महाभारत वन पर्व अ. 253, सभापर्व अ. 30, भीष्म पर्व अ. 16)

     जैन हरिवंश पुराण भानुर्विष्णुर्वृहद्ध्वज: ||130||50 में भी महाभारत युद्ध में भाग लेने वाले राजाओं में एक राजा वृहद्ध्वज नामक बताया गया है। बहुत संभव है कि जैनाचार्यों ने वृहद् बल को ही वृहद्ध्वज कहा हो। 


इतनी स्वर्ण मुद्राएं कि भूमि ढंक ले

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     महाभारत के पीछे जो सूर्यवंशी राजा हुए उनमें प्रसेनजित 27वें थे। ये श्रावस्ती नरेश अरनेमिब्रह्मदत्त के पुत्र थे। बौद्ध मत के ग्रंथों में प्रसेनजित का नाम महाकोसल है। वस्तुतः कोसल राज्य के अधिपति होने के कारण यह उनकी उपाधि थी परन्तु जैनियों के धर्म ग्रंथों में इनका नाम जितशत्रु आता है।

     प्रसेनजित भगवान् बुद्ध के श्रावस्ती आने से पहले जैनियों के अंतिम तीर्थंङ्कार महावीर के अनुयायी थे और उनका प्रसेनजित पर गहरा प्रभाव था। प्रसेनजित बड़ा ही शक्तिशाली राजा था। इनकी दो रानियां थीं एक मगध नरेश बिम्बसार की बहन वार्षिका तथा दूसरी कपिलस्तु के शाक्य महानामा की बेटी मल्लिका। दोनों रानियों से एक-एक पुत्र हुए। वार्षिका से जेत तथा मल्लिका से विरुद्धक।

     प्रसेनजित के ही समय श्रावस्ती में एक धनाढ्य व्यापारी सुदत्त था। बड़ा मुक्तहस्त। अनाथों के लिए उसका भण्डार सदैव खुला रहता था। इसीलिए उसे लोग उसके असली नाम से कम, अनाथपिण्डक (संस्कृत में अनाथपिण्डद) के नाम से अधिक जानते थे। एक बार अनाथपिण्डक अपने साले के घर राजगृह गया। वहां बुद्ध के उपदेशों को सुनकर बहुत प्रभावित हुआ और बौद्ध धर्म स्वीकार कर भगवान् बुद्ध को श्रावस्ती आने को निमंत्रित किया लेकिन श्रावस्ती में बुद्ध के निवास के लिए कोई विहार नहीं था इसलिए भगवान् बुद्ध ने उसके निमंत्रण को उस समय स्वीकार नहीं किया। घर लौटकर सुदत्त ने बुद्ध के स्वागतार्थ एक उत्तर विहार बनवाने में कोई कसर बाकी नहीं रखा। सातवीं शताब्दी का भारत पर्यटक चीनी यात्री ह्वेसांग लिखता है कि भगवान बुद्ध का प्रमुख शिष्य सारिपुत्र विहार-निर्माण कार्य में सहायता देने के लिए सुदत्त के साथ श्रावस्ती गया। वहां इस विहार के लिए केवल एक ही उचित स्थान था और वह था राजा प्रसेनजित के पुत्र राजकुमार जेत का उद्यान। जब सारिपुत्र ने राजकुमार को वह स्थान बेच देने के लिए कहा तो उसने उसका बहुत बड़ा मूल्य मांगा। अर्थात इतनी स्वर्ण मुद्राएं जितनी भूमि पर बिछाने से सारे उद्यान को ढक ले। सुदत्त में भगवान बुद्ध के प्रति अपार श्रद्धा थी। उसने वह मूल्य देना स्वीकार कर लिया और अपने कोष में से बाग की लगभग सारी भूमि सोने की मुहरों से ढक दिया जब थोड़ी-सी भूमि शेष रह गयी तो राजकुमार ने सुदत्त को रोक दिया और उस बची हुई भूमि पर उसने स्वयं मंदिर बनवाया। ह्वेनसांग अपने इतिवृत्ति में लिखता है कि इन भेटों की पुण्य-स्मृति को जीवित रखने के लिए बुद्ध भगवान ने आदेश दिया कि भविष्य में इसका नाम ' जेतवन विहार का अनाथपिण्डक आराम' व्यवहार में आये। 

     प्राचीन बौद्ध ग्रंथों में इस घटना के भिन्न-भिन्न विवरण कुछ इस प्रकार मिलते हैं--सुदत्त ने जो स्वर्ण-मुद्राएं भूमि पर बिछायी उनकी संख्या 18 करोड़ थी जिन्हें जेत ने बुद्ध के लिए महल बनाने पर व्यय किया। इसके अतिरिक्त अनाथपिण्डक ने 18 करोड़ और स्वर्ण मुद्राएँ मंदिर, संघाराम, कोष्ठागार, कुएं इत्यादि बनवाने में खर्च की। यह भी वर्णन आता है कि जेतवन-विहार की प्रतिष्ठा विधि पूर्वक की गयी और इस पर भी अनन्त धन व्यय हुआ। भगवान् बुद्ध के जीवनकाल में उनके तथा उनके शिष्यों के लिए देश में बना यह पहला विहार था। इस घटना का सुन्दर चित्रण भार्हुत से प्राप्त ईसापूर्व दूसरी सदी के एक मूर्तिफलक पर उत्कीर्ण है। चित्र में दो इमारतें भी दिखायी गयी हैं जिसमें से एक पर 'गंधकुटि' और दूसरी पर 'कोसम्बकुटि' नाम अंकित है। मूर्तिफलक पर यह लेख है--'अनाथपिण्डक द्वारा करोड़ों स्वर्ण मुद्राओं से क्रीत जेतवन का दान' 

     बोधगया से प्राप्त एक दूसरे फलक पर भी यही विषय कुछ संक्षिप्त रूप में चित्रित है। गंधकुटि और कोसम्बकुटि के अलावा जेतवन विहार में और भी कई दर्शनीय प्रासाद थे। जैसे--करेरिकुटि, करेरिमंडल माल और सललघर। 

     सम्बोधि प्राप्त करने के अनन्तर चौदहवीं वर्षा ऋतु में भगवान बुद्ध जेतवन विहार में आये और तब से छह वर्षों का अन्तर देने के साथ लगातार चौबीस वर्षों तक वह हर वर्ष चौमासे में यहां निवास करते रहे। अपने पुत्र जेत का अनुसरण करते हुए राजा प्रसेनजित ने भी जेतवन में बुद्ध के दर्शन किये और उनके उपदेशों को सुना, जिसके फलस्वरूप उसने बौद्ध धर्म ग्रहण कर लिया। बौद्ध धर्म स्वीकारने के बाद 'सलल घर' प्रसेनजित ने बनवाया। बौद्ध ग्रंथों में बुद्ध और प्रसेनजित के बीच धर्म चर्चा के अनेक प्रसंग आये हैं। जिससे पता चलता है कि राजा के हृदय में बुद्ध के लिए असीम श्रद्धा और भक्ति थी। राजा प्रसेनजित बुद्ध का समवयस्क था और साथ ही दोनों की जन्मभूमि भी एक ही कोसल देश थी। 

     भार्हुत के एक मूर्तिफलक पर उत्कीर्ण चित्र में दिखाया गया है कि राजा चार घोड़ों वाले रथ पर सवार होकर, सजधज कर बुद्ध के दर्शनार्थ जा रहा है। इसमें बुद्ध का संकेत केवल धर्मचक्र से किया गया है। ह्वेनसांग ने लिखा है कि राजा ने अपने महल के निकट धर्म चर्चा के लिए एक धर्मशाला बनवाई थी। 


बरबादी का पहला चरण

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     मगध नरेश बिम्बसार ने भी उन्हीं दिनों बौद्ध धर्म की दीक्षा ली। बिम्बसार की रानी बासवी का पुत्र अजातशत्रु था। बुद्ध के विरोधी देवदत्त ने अजातशत्रु को पट्टी पढ़ाई कि अपने बाप को मारकर राज्य ले लो। अजातशत्रु के विद्रोह करने पर बिम्बसार राज्य और कोष छोड़कर विरक्त हो गये परन्तु अजातशत्रु ने उन्हें कारागार में डाल दिया जहाँ उसकी मृत्यु हो गयी। अजातशत्रु द्वारा अपने पिता बिम्बसार को यातनाएं दिये जाने पर प्रसेनजित, जो बिम्बसार का बहनोई था, का अजातशत्रु से बिगाड़ हो गया। दोनों के युद्ध में अजातशत्रु पकड़ा गया। अन्त में दोनों में संधि हो गयी और प्रसेनजित की पुत्री बाजिरा का विवाह अजातशत्रु से सम्पन्न हुआ। 

     बिम्बसार की तरह प्रसेनजित की मृत्यु भी शोचनीय रही। प्रसेनजित का पुत्र विदूडभ (विरुद्धक) शाक्यों का नाती था परन्तु उसकी माँ मल्लिका शुद्ध शाक्यानी नहीं थी, बल्कि दासी पुत्री थी। एक दिन किसी ने दासी-पुत्री कहकर ताना मारा। युवराज को पता चला कि उसके पिता के साथ छल करके शाक्यों ने अपनी कन्या न देकर दासी-पुत्री दिया है तो उसका खून खौल उठा। उसने निश्चय किया कि अभिमानी शाक्यों का उच्छेद करके रहूंगा। (महामानव बुद्ध-- राहुल सांकृत्यायन) 

      

प्रसेनजित शलजम खाकर मरा

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     बुद्ध भक्त प्रसेनजित के रहते शाक्यों पर आक्रमण करना संभव नहीं था। इसलिए विरुद्धक राज्य हड़पने के लिए पिता के विरुद्ध षडयंत्र रचने लगा। उसने प्रसेनजित के 500 सभासदों को मिला लिया पर दीर्घाचार्य न मिला किन्तु कुछ दिन बाद वह भी मिल गया और अपने स्वामी से मन का भाव छिपाये रहा। एक दिन प्रसेनजित रथ में बैठकर, जिसका सारथी दीर्घाचार्य था, बुद्धदेव के दर्शन को गये। जब रथ नगर के पास पहुंचा तो उसने राजचिन्ह, छत्र, चमर इत्यादि दीर्घाचार्य को इस विचार से दे दिया कि गुरू के सामने विनीत भाव से जाना चाहिए पर वह वंचक दीर्घाचार्य तुरन्त श्रावस्ती लौट गया और उसने राजचिन्ह विरुद्ध को दे दिया। विरुद्धक कोसल राज के सिंहासन पर बैठ गया। राजा प्रसेनजित बुद्धदेव का दर्शन करके लौटे तो उनको विदित हुआ कि दीर्घाचार्य ने धोखा दिया है। वह पैदल राजगृह की ओर चल पड़े। वहां उनकी दोनों पत्नियां वार्षिका और मल्लिका मिलीं। प्रसेनजित ने मल्लिका से कहा कि तुम अपने बेटे के साथ राज्य का सुख भोग करो और उसे समझा-बुझाकर श्रावस्ती लौटा दिया। वार्षिका के साथ प्रसेनजित राजगृह आने का समाचार देने वार्षिका अजातशत्रु के पास चली गयी। पहले तो अजातशत्रु कुछ डरा परन्तु जब उसे मालूम हुआ कि प्रसेनजित राज्यच्युत होकर अकेला अपनी रानी के साथ आया है तो उसके उचित अतिथि सत्कार का प्रबन्ध करने लगा। उधर भूखा-प्यासा प्रसेनजित एक शलजम के खेत में चला गया जहाँ किसान ने उसे कुछ शलजम उखाड़कर खाने को दिया। भूख का मारा प्रसेनजित शलजम जड़-पत्ते समेत चबा गया और पानी पीने एक तालाब पर पहुंचा। पानी पीते ही उसके पेट में दर्द उठा और उसके हाथ-पांव ऐठने लगे। वह सड़क की पट्टी पर गिर पड़ा। वहां इतनी धूल उड़ रही थी कि उसी से उसका दम घुटकर मृत्यु हो गयी। (अयोध्या का इतिहास -- अवधवासी लाला सीताराम, पृष्ठ 52)

     कोसल नरेश प्रसेनजित की मृत्यु हो जाने पर जमाता अजातशत्रु, जो शिशुनाग वंश का राजा था, ने विधिवत् उसकी दाहक्रिया की। उसने श्रावस्ती का शासन-प्रबंध अपने हाथ में ले लिया। अब उत्तर कोसल का शासन राजगृह (मगध) से होने लगा। अजातशत्रु की मृत्यु 563 ई. पूर्व में हो जाने के बाद उसके पुत्र-पौत्र सैकड़ों वर्ष राज्य करते रहे पर शिशुनागवंशी राजाओं के शासन काल (463-422 ई. पूर्व) में कोसल का प्रबन्ध सुदूर मगध से होने के कारण पर्याप्त उन्नति नहीं हुआ इसलिए श्रावस्ती का वैभव धीरे-धीरे क्षीण होने लगा। ( गोण्डा : अतीत तथा वर्तमान-- जगदेव सिंह, पृष्ठ 23-24)


कोसल की उन्नति में ज्वार-भाटा

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     273 ई. पूर्व में अशोक मगध का सम्राट हुआ। उसने बौद्ध धर्म ग्रहण कर लिया इसलिए उसके शासनकाल में समस्त देश उन्नति के शिखर पर जा पहुंचा। 

     धर्म-यात्रा प्रसंग में अशोक ने जेतवन और श्रावस्ती बौद्ध तीर्थों के भी दर्शन किये और इस यात्रा की स्मृति को जीवित रखने के लिए उसने हर तीर्थ स्थान पर कोई न कोई स्मारक बनवाया। (श्रावस्ती -- एम. वेंकटरमय्या) 

     ह्वेनसांग लिखता है कि जेतवन के पूर्वी द्वार के दोनों ओर अशोक ने 2100 से.मी. ऊंचे दो स्तम्भ बनवाये जिसमें से एक के शिखर पर धर्मचक्र और दूसरे पर बैल था। इन खम्भों के निकट ही अशोक ने एक समाधि-स्तूप का भी निर्माण कराया जिसमें बुद्ध की अस्थियाँ गाड़ी गयीं। यह स्तूप उस कुएं के पास बनवाया गया, जहाँ से बुद्ध नित्य जल भरा करते थे तथा साथ ही चक्रम मार्ग भी था और जहाँ वह भ्रमण किया करते थे। 

     बौद्ध ग्रंथों में उल्लेख है कि सम्राट अशोक, सारिपुत्र, मौद्ग्लायन, महाकाश्यप तथा आनन्द के समाधि-स्तूपों की भी पूजा किया करता था। 

     परन्तु मौर्यवंश के अन्तिम राजा वृहद्रथ को उसके सेनापति पुष्यमित्र ने मार दिया और स्वयं राजा बन बैठा। इसी से शुंगवंश चला। शुंग सम्राट ने अपनी राजधानी मगध से हटाकर अयोध्या बनायी। शुंग नृपतियों के शासन काल में अयोध्या कोसल राज्य की राजधानी रही। अयोध्या के साथ गोण्डा जनपद भी उस समय पर्याप्त समृद्धि पर था। पुष्पमित्र के राज्यकाल में वैदिक धर्म के पुनरुत्थान के साथ संस्कृत साहित्य को भी प्रोत्साहन मिला। संस्कृत के बहुत से महत्वपूर्ण ग्रंथ शुंग के समय में ही लिखे गये। वैदिक धर्मशास्त्र की सबसे महत्वपूर्ण स्मृति मनुस्मृति इसी काल की रचना है। 

     काल प्रवाह के कारण संस्कृत भाषा के स्वरूप में काफी अन्तर आ गया था। संस्कृत में ऐसे अनेक शब्दों का प्रचलन हुआ जो पाणिनीय व्याकरण के नियमों के अनुरूप नहीं थे। भाषा के इस परिवर्तित स्वरूप को स्थिर करने के लिए गोनर्द (उत्तर प्रदेश में गोण्डा) के निवासी पतंजलि ने पाणिनी के अष्टाध्यायी व्याकरण पर एक वृहद् महाभाष्य लिखा। (प्राचीन भारत-- राजबली पाण्डेय, पृष्ठ 180)

     उसी महाभाष्य में महर्षि पंतजलि ने अपने द्वारा शुंग सम्राट पुष्यमित्र को अयोध्या में यज्ञ कराने तथा यवन शासक मिलिन्द (मिनाण्डर) के अयोध्या पर आक्रमण करने का उल्लेख किया है -- 'इह पुष्यमित्र याजयामः' 'अरुणद्यवनः साकेतम्। अरुणद्यवनः माध्यमिकाम्'(महाभाष्य 3/2/111)

     परन्तु बौद्ध साहित्य में पुष्यमित्र का वर्णन बौद्ध धर्म के शत्रु के रूप में मिलता है। दिव्यावदान के अनुसार उसने बहुत से विहारों को जलवा दिया और साकल(स्यालकोट) के पास यह घोषणा की कि एक श्रमण बौद्ध भिक्षुक के सिर के लिए वह एक सौ दीनार देगा-- "यो मे एकं श्रमण शिरोन दास्यति तस्याहं दीनार शतं दास्यामि।" ( दिव्यावदान) 


सर्वास्तिवादी बौद्ध संप्रदाय का उदय

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     ईसा के लगभग 40 वर्ष पूर्व कुषाण लोगों ने भारत पर आक्रमण करना प्रारंभ कर दिया था। यह मध्य एशिया की एक जाति थी। कुषाण राजाओं ने शीघ्र ही मध्य एशिया से सिन्धु नदी तक का प्रदेश जीतकर अपना साम्राज्य स्थापित कर लिया और धीरे-धीरे पूरे उत्तर भारत पर अधिकार जमा लिया। 

     कुषाण राज्य वंश की स्थापना 'कुजुलाक द फिसेस ने की। तत्पश्चात इसका पुत्र विमाक द फिसेस इसका उत्तराधिकारी हुआ। यह गंगा की घाटी तक घुस आया था। विमाक का उत्तराधिकारी कनिष्क प्रथम कुषाण राजाओं में सर्वश्रेष्ठ हुआ है। इसने साकेत (भगवान् बुद्ध के समय से चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य के राज्यारोहण काल तक अयोध्या 'साकेत' नाम से विख्यात था।) के राजा को हराकर कोसल प्रदेश अपने शासन के अधीन कर लिया। कनिष्क की राजधानी पुरुषपुर (पेशावर) में थी। गोण्डा जनपद उसका एक प्रान्त था। इसका शासन मथुरा के क्षत्रप द्वारा किया जाता था। 

(गोण्डा: अतीत तथा वर्तमान--जगदेव सिंह, पृष्ठ 26ग) 

     कुषाणकाल में राजप्रसाद के कारण बौद्ध धर्म बहुत लोकप्रिय हो गया। उस समय जेतवन के मठ और मंदिरों का जीर्णोद्धार के साथ सर्वास्तिवादी बौद्ध सम्प्रदाय का भी उदय हुआ। नये स्तूप और मंदिरों का निर्माण हुआ उनमें बौद्ध मूर्तियां स्थापित की गयी। इनमें से बहुतों के ध्वंस आज भी विद्यमान हैं। (श्रावस्ती-- एम. वेंकटरमय्या) 

     लेकिन गुप्तकाल में बौद्ध धर्म का ह्रास हुआ। श्रावस्ती की बौद्ध इमारतें जीर्ण-शीर्ण हो चुकी थी और कई एक के स्थान पर हिन्दू मंदिर स्थापित हो गये थे। चीनी यात्री फाह्यान, जिसने श्रावस्ती के तत्कालीन ध्वंसावशेषों को पांचवीं शताब्दी के प्रारम्भ में देखा था; लिखा है कि ब्राह्मणों ने बौद्ध स्थानों को अपना लिया था। ह्वेनसांग ने भी लिखा है कि श्रावस्ती का विक्रमादित्य नाम वाला राजा बहुत प्रसिद्ध और प्रतापी था परन्तु वह श्रमणों का द्वेषी था। 

     सम्राट हर्षवर्धन जिसका उपनाम 'शीलादित्य' था, के शासन काल ( 606-647) में में चीनी यात्री ह्वेनसांग ने श्रावस्ती देखी। उस समय यह प्रायः उजड़ी पड़ी थी परन्तु फिर भी कुछ बौद्ध और बहुत से अन्य धर्मों के लोग यहाँ रहते थे। उसने सुदत्त और अंगुलिमाल के स्तूप तथा प्रजापति भिक्षुणी के विहार तथा कुछ ऐसे टूटे-फूटे स्तूपों का भी उल्लेख किया है, जहाँ बुद्ध के जीवन की कई घटनाएं घटी थीं। उसने लिखा है कि जेतवन इतना जीर्ण-शीर्ण हो चुका था कि वहाँ के मठों में कोई भी निवास नहीं करता था। उन स्मारकों को जिन्हें वह पहचान सका, अशोक के दो स्तम्भ और एक ईंटों का बना अकेला मंदिर था। इस मंदिर में अभी भी बुद्ध की मूर्ति पड़ी थी। 


सुहेलदेव से खोई वैभव मुस्करायी

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सन् 1020 ई. में श्रावस्ती में इतिहास प्रसिद्ध बैस राजा त्रिलोक चन्द्र के भुक्तिपाल मयूरध्वज शासन कर रहे थे। गोण्डा का सम्पूर्ण क्षेत्र उनके अन्तर्गत था। मयूरध्वज के पश्चात हंसध्वज, मकरध्वज, सुहृद्ध्वज श्रावस्ती के राजा हुए। (आर्केलाजिकल सर्वे आफ इंडिया--भाग-1 पृष्ठ 329) सुहृद्ध्वज का नाम सुहृददेव और सुहेलदेव भी मिलता है। यह बड़ा सहसी, प्रभावशाली और धर्मनिष्ठ राजा था। इसके शासन काल में श्रावस्ती दिल्ली के अधीन न रह कर, पूर्ण स्वतन्त्र राज्य का गौरव पा चुकी थी। सुहेलदेव के नीति पूर्ण शासन में श्रावस्ती एक बार पुनः अपनी खोई वैभव पाकर मुस्करा उठी। राजा सुहेलदेव के इक्कीस सामन्तगण श्रावस्ती के गौरव को बढ़ाने में तल्लीन रहते थे।

वीरवर सुहेलदेव ने इस भूखण्ड पर शान्ति और धर्म का सुशासन स्थापित कर रखा था। सुहेलदेव के बाद उनके पुत्र-पौत्र इस प्रदेश में शासन करते रहे किन्तु सबके दिन एक से नहीं रहते। लगभग 50 वर्षों बाद चन्द्रदेव गहड़वाल ने श्रावस्ती के दुर्बल तथा विलासी राजा को मार कर इस भूखण्ड को भी अपने अधीन कर लिया। 1085 ई. से गोण्डा जनपद का शासन फिर कन्नौज से होने लगा तब गोण्डा कन्नौज साम्राज्य का एक प्रान्त मात्र रह गया। (गोण्डा : अतीत तथा वर्तमान-- जगदेव सिंह) 

 चन्द्रदेव के बाद उसके पुत्र मदनपाल और पौत्र गोविन्द चन्द्र प्रतापी राजा हुए। गोविंद चन्द्र ने अपने युवराज काल में ही (1109 ई.) तुर्कों के आक्रमण को अपनी वीरता से विफल किया। 1114 ई. में उनका राज्याभिषेक हुआ। गोविंद चन्द्र की रानी कुमारी देवी बौद्ध थीं। उन्होंने श्रावस्ती के बौद्ध विहारों का जीर्णोद्धार कराया। 

 मदनपाल और गोविंद चन्द्र के शासन काल के कुछ लेख जेतवन के संघाराम में मिले हैं जो अन्य स्मारकों की अपेक्षा सुरक्षित दशा में हैं। संवत् 1176 (ई. 1119)का मदनपाल का लेख बतलाता है कि राजा के मंत्री विद्याधर ने शैव धर्म त्याग कर अपना सारा धन जेतवन में एक विहार बनवाने के काम में लगा दिया था। दूसरा लेख जो गोविंद चन्द्र के शासनकाल (1129-30ई.)का है, सूचित करता है कि राजा ने श्रावस्ती के आसपास बुद्ध भट्टारक तथा जेतवन महाविहार के दूसरे भिक्षुओं को छह गांव दान कर दिया था। संभव है, गोविंद चन्द्र ने यह भूदान बौद्ध धर्मावलंबिनी अपनी रानी कुमार देवी के आग्रह पर दिया हो। सारनाथ के बौद्ध विहारों को दिये अपने दानों के कारण भी यह रानी विख्यात है।             (शेष भाग - 2 में पढ़ें)   

           



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