हरि शंकर गोयल "श्री हरि"

Classics

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हरि शंकर गोयल "श्री हरि"

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ययाति पुराण , भाग 94

ययाति पुराण , भाग 94

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देवयानी ने शर्मिष्ठा को हठ पूर्वक अपने कक्ष में पर्यंक (पलंग) पर बैठा दिया और स्वयं किसी दासी की पुरानी ओढनी ओढ़कर बाहर बारजे में आकर बैठ गई । उसने सेविकाओं से पृथक पृथक कई किस्म के ताम्बूल तैयार करवा लिये । सोमरस और सुरा की व्यवस्था भी कर ली थी । कुछ मिष्ठान्न और फल अपने पास रख लिये थे । "मधु यामिनी" के पर्व पर जिस जिस वस्तु की आवश्यकता होती है , उसने वह सब अपने पास सुरक्षित रख ली थी । क्या पता सम्राट कब कौन सी वस्तु मांग बैठें ? 


देवयानी अपनी अन्य दासियों के साथ बारजा में बैठकर सम्राट की प्रतीक्षा करने लगी । आज प्रथम बार वह दासियों के मध्य स्वयं दासी बनकर उनसे बतिया रही थी । यह एक अद्भुत घटना थी । सभी दासियां देवयानी पर निहाल हुई जा रही थीं । ऐसा अवसर पुन: आने वाला नहीं था । इसका भरपूर लाभ उठाया जा रहा था । दासियों से हंसी ठिठोली में अर्द्ध रात्रि कब व्यतीत हो गई, पता ही नहीं चला ? प्रहरी "जागरण" कर रहे थे और सबको सचेत करते हुए आवाजें लगा कर इधर उधर चहल कदमी कर रहे थे । सम्राट अभी तक नहीं आये थे और न ही उनका कोई संदेश आया था । देवयानी के चेहरे पर झुंझलाहट स्पष्ट नजर आ रही थी । 


"सम्राट कहां रह गये ? आज तो उनकी मधु यामिनी है । आज की रात्रि का कितना इंतजार रहता है वर वधू को ? लेकिन, महाराज का यहां कोई अता पता ही नहीं है ? ऐसा लगता है कि महाराज इस शुभ बेला को भूल चुके हैं । सुनयना , ऐसा करो , तुम जाकर सम्राट को बुला लाओ" । तनिक आवेश में देवयानी बोल पड़ी । 


सुनयना का साहस नहीं हो रहा था महाराज के पास जाने का । क्या पता महाराज क्या दंड दे दें ? वह घबराते हुएकहने लगी "यदि सम्राट क्रोधित हो गये तो ? या फिर उन्होंने कुछ अपशब्द कह दिये तो" ? यही सोचकर उसके पांव उठ नहीं रहे थे । 

सुनयना को भयभीत देखकर देवयानी गुस्से से उबल पड़ी "खड़ी खड़ी क्या देख रही है ? जल्दी जा और महाराज को साथ लिवाकर आ जा" । देवयानी ने अपनी आंखें तरेरते हुए कहा । 


सुनयना के पास देवयानी के आदेश का पालन करने के अतिरिक्त अन्य कोई विकल्प नहीं था । सुनयना सम्राट को बुलाने चली गई और देवयानी सम्राट का इंतजार करने लगी । बहुत देर होने के पश्चात भी जब न तो सुनयना लौटी और न ही सम्राट आये तब देवयानी बेचैन हो गई । उसने अपनी एक चतुर दासी रम्या से कहा "रम्या ! जरा जाकर तो देख कि सुनयना कहां अटक गई है ? कहीं वही तो मधु यामिनी का आनंद नहीं ले रही है ? अधम कहीं की ! सम्राट भी अभी तक नहीं आये हैं । जरा जाकर बुला ला उन्हें । तीन पहर रात्रि व्यतीत हो चुकी है , बस एक पहर ही शेष रही है । मधुर मिलन की बेला निकली जा रही है" । उसके चेहरे पर उद्विग्नता स्पष्ट नजर आ रही थी । 


रम्या देवयानी से आज्ञा लेकर सम्राट के कक्ष में चली गई । उसने वहां देखा कि सम्राट "सोमरस" का पान कर रहे हैं । उनके पास उनके अनेक मित्र बैठे हुए हैं और सब लोग आपस में हास परिहास कर रहे हैं । सोमरस के साथ साथ सुरा पान भी चल रहा है । कुछ कमनीय युवतियां अपने सुकोमल हाथों से उन्हें सुरापान करा रही हैं । कक्ष में मध्यम प्रकाश फैला हुआ है जिसमें उन कमनीयाओं ने अपने सुवर्णमयी बदन की कांति बिखेर कर उस प्रकाश में और वृद्धि कर दी है । सम्राट के पास उनके मित्र और राज कवि शेखर बैठे हैः जो सम्राट को श्रंगार रस की कुछ रचनाऐं सुना रहे हैं । उस समय नायिका का "नख शिख वर्णन" और रति क्रिया का प्रसंग चल रहा था । सब लोग सांसें रोक कर उस प्रसंग को सुन रहे थे और उनके अधरों से दबी दबी आहें निकल रही थीं । वे लोग उन कमनीय युवतियों को "पी" जाने वाली मुद्रा में देख रहे थे । 


शेखर बोले "सम्राट, रात्रि बहुत हो चुकी है । अब आपको महारानी के कक्ष में जाना चाहिए । आज आपकी "मधु यामिनी" है । कहीं ऐसा ना हो कि यह यामिनी श्रंगार रस सुनते सुनते गुजर जाये और उधर "सौन्दर्य" "पौरुष" का इंतजार करते करते ही निढाल हो जाये । आपने "काम शास्त्र" का भली भांति अध्ययन किया है । आप 64 कलाओं के स्वामी हैं । कला और सौन्दर्य के पारखी हैं । बलवान , साहसी , संयमी और पराक्रमी हैं । अब तक आपने अपने पराक्रम का युद्ध क्षेत्र में प्रदर्शन किया है । आज आपके संयम और पराक्रम की परीक्षा "पर्यंक" पर होनी है । महारानी आपके पराक्रम का प्रदर्शन देखने को उत्सुक हो रही हैं राजन । अब उन्हें और अधीर नहीं करने देना चाहिए और आपको "रति युद्ध" में भी विजय श्री प्राप्त करके महारानी के समक्ष अपने पौरुष का प्रदर्शन कर देना चाहिए" । शेखर की बात पर सम्राट कुछ नहीं बोले और वे मंद मंद मुस्कुराते रहे । 


सही अवसर समझकर रम्या महाराज के समक्ष प्रकट हुई और उन्हें प्रणाम करती हुई बोली "सम्राट के चरणों में महारानी की सेविका "रम्या" का प्रणाम है । महारानी जी आपके दर्शन करने को उत्सुक हैं सम्राट । अब थोड़ी सी रात्रि ही शेष रही है इसलिए शीघ्र पधारकर इस मधु यामिनी के अनंत आनंद वन में निर्बाध रूप से विचरण कीजिये महाराज" । 


रम्या के सुमधुर वचनों ने सम्राट के कानों में मिसरी घोल दी थी । सम्राट ययाति ने मदकता से भारी हुई पलकों को उठाकर एक नजर रम्या की ओर देखा । रम्या की काया कंचन सी कमनीय थी । अप्रतिम सौन्दर्य था रम्या का । गौर वर्ण, सुडौल तन और आकर्षक चेहरा । एक नजर पड़े तो वहां से हटने का नाम ना ले । ययाति लम्पट नहीं था । अभी तक उसका कौमार्य अक्षुण्ण था । राजकुमारों की सेवा में अनेक दासियां लगी रहती हैं । एक से एक सुन्दर दासी उनकी सेवा करती हैं । अधिकतर राजकुमार उन दासियों से संसर्ग कर लेते हैं या काम शास्त्र का अध्ययन करते समय "व्यावहारिक" ज्ञान लेने के उद्देश्य से कुछ गणिकाओं के साथ संसर्ग किया जाता है जिससे काम कला में निष्णात हुआ जा सके । ययाति ने कहीं पर भी अपनी शारीरिक दुर्बलता का प्रदर्शन नहीं किया था । कुछ मित्रगण रम्या का स्पर्श करना चाह रहे थे किन्तु ययाति ने अपनी आंख के इशारे से उन्हें रोक दिया । रम्या ने ययाति की ओर कृतज्ञता भरी दृष्टि डालकर राहत की सांस ली और एक कोने में खड़ी होकर कहने लगी "मेरे साथ पधारें सम्राट । मैं आपको लेने के लिए आई हूं" । 


"सेविका ! आज की रात्रि हमारे जीवन की अद्भुत रात्रि है । इस मधु यामिनी को हम विशेष प्रकार से मनाना चाहते हैं । मुझे ज्ञात है कि महारानी देवयानी के साथ में महाराज वृषपर्वा की पुत्री शर्मिष्ठा महारानी की दासी बनकर यहां आई है । अत: हम चाहते हैं कि या तो महारानी स्वयं अथवा उनकी दासी शर्मिष्ठा हमें बुलाने आयें । उसके पश्चात ही हम अंत:पुर में प्रवेश करेंगे । आज हमने ऐसा व्रत ले रखा है । अत: आप यहां से जाकर यह बात महारानी जी को बता दीजिए" । रम्या की ओर सोने की अंगूठी उछालते हुए ययाति बोला । 


रम्या ने यह बात देवयानी को बताई तो वह असमंजस में पड़ गई । वह कैसे जाये सम्राट के पास ? वह तो शर्मिष्ठा बनी बैठी है । शर्मिष्ठा महारानी बनी बैठी है इसलिए वह भी नहीं जा सकती है । विचित्र दुविधा में डाल दिया है सम्राट ने तो । कोई और उपाय नहीं देखकर वह अपने मुखड़े पर एक अवगुंठन डालकर वह सम्राट के पास रम्या को साथ लेकर चली गई । रम्या ने कहा "सम्राट, महारानी की विशेष दासी शर्मिष्ठा आपको लेने के लिए आई है । अब तो चलिये महाराज" । 


ययाति ने एक भरपूर नजर शर्मिष्ठा बनी देवयानी पर डाली और उसके सौन्दर्य की प्रशंसा करते हुए कहने लगा "शर्मिष्ठे, तुम्हारा सौन्दर्य निष्पाप है , अपरामृष्ट (अनछुआ) है , अद्भुत है, अवर्णनीय है, अकल्पनीय है । मन करता है कि मैं तुम्हें अनिमेष देखता रहूं । मेरे पास आकर बैठो, शर्मिष्ठे" । 


ययाति की बात सुनकर देवयानी को धक्का सा लगा लेकिन वह शांत बनी रही । ययाति ने उसे अपने नजदीक आने के लिए हाथ का इशारा किया तो शर्मिष्ठा बनी देवयानी बोली 

"यदि महारानी जी को पता चल गया कि मैं आपके पास आकर बैठ गई थी तो वे मेरी खाल उधेड़ देंगी" । 

उसकी बात सुनकर ययाति ने एक जोरदार ठहाका लगाया । "हम सम्राट हैं शर्मिष्ठे , और हम तुम्हें अभय दान देते हैं । हमसे डरो नहीं । हम तो बस तुम्हारे अनुपम सौन्दर्य का दर्शन करना चाहते हैं" । मुस्कुराते हुए ययाति ने कहा । 


अब तक देवयानी संभल गई थी । वह भी बहुत बुद्धिमान थी । उसने अपने बचाव का रास्ता निकाल लिया था । वह विनीत भाव से बोली 

"महाराज, मेरी धृष्टता क्षमा करें । मैं महारानी जी की दासी हूं इसलिए मुझ पर उनका पूर्ण स्वामित्व है । आप अभी अंत:पुर में बैठे हैं और यहां पर अंतिम आदेश महारानी का ही चलेगा । इसलिए आप मेरे साथ चलना चाहें तो ठीक है अन्यथा मैं तो चली" । यह कहकर देवयानी पीछे मुड़कर जाने लगी । 

"रुको शर्मिष्ठा, मैं भी चलता हूं तुम्हारे साथ" । ययाति को ज्ञात हो चुका था कि शर्मिष्ठा को अंत:पुर के समस्त नियम पता हैं । उन्होंने खड़े होते हुए कहा "चलो शर्मिष्ठे , सचमुच में बहुत देर हो गई है" । 


देवयानी मन ही मन मुस्कुरा रही थी कि वह सम्राट को "छका" रही है । वह चुपचाप चलती रही और सम्राट को बारजा में लेकर आ गई और उन्हें एक उचित आसन पर बैठा दिया । अन्य दासियों ने सम्राट के पैर धोए और एक स्वच्छ वस्त्र से पोंछे । देवयानी ने उन्हें जलपान कराया । सम्राट देवयानी के कोमल हाथों को देख रहे थे । बीच बीच में देवयानी के अवगुंठन से उसके चेहरे को देखने का भी प्रयास कर रहे थे । जलपान करने के पश्चात देवयानी ने उन्हें एक ताम्बूल खिलाया तो ययाति प्रसन्न हो गया । उसने अपने गले से एक हार उतारा और उसे देवयानी की ओर उछाल दिया । इसके पश्चात सम्राट ययाति खड़े हो गये और अंदर कक्ष की ओर बढने लगे । 

"क्षमा कीजिए महाराज ! आप अंदर नहीं जा सकते हैं । महारानी जी का आदेश है" । देवयानी सम्राट के आगे रास्ता रोककर बोली । 

सम्राट इस घटना से हतप्रभ रह गये । उनके मुंह से इतना ही निकला "क्यों" ? 


किसी ने कोई उत्तर नहीं दिया तो सम्राट को क्रोध आ गया । वे गरज कर बोले "बोलिए शर्मिष्ठा, क्यों नहीं जा सकते हैं हम अंदर ? यदि अंदर नहीं जा सकते हैं तो हमें लेकर यहां क्यों आई हो" ? सम्राट का चेहरा तमतमा गया था । 

"धृष्टता क्षमा करें महाराज । बात ही कुछ ऐसी है इसलिए आप अंदर नहीं जा सकते हैं" । 

"ऐसी क्या बात है, जरा हमें भी तो पता चले" ? 

"वो क्या है सम्राट कि जब हम आपको लिवाने गये थे तब तक महारानी जी बिल्कुल ठीक थीं । किन्तु अब ..." ! देवयानी मन ही मन हंसती हुई बोली 

"किन्तु क्या ? ये पहेलियां बुझाना छोड़िये और स्पष्ट बताइये कि मेरी देव को क्या हुआ है" ? 


ययाति के मुंह से अपने लिए "मेरी देव" संबोधन सुनकर देवयानी को बहुत अच्छा लगा । यदि वह शर्मिष्ठा का अभिनय नहीं कर रही होती तो अब तक ययाति को बांहों में भरकर सुख के सागर में डुबकी लगा लेती । पर वह अभी ययाति को और तंग करना चाहती थी इसलिए प्रत्युत्तर देते हुए बोली 

"महाराज, अभी अभी ज्ञात हुआ है कि महारानी जी "एक वस्त्रा" हो गई हैं" । वह दबी दबी हंसी हंसते हुए बोली । 

"एक वस्त्रा ? वह क्या होता है" ? 

"इतने अधीर मत होइए महाराज ! अभी बताती हूं , जरा संयम से काम लीजिए । अभी अभी महारानी जी ने बताया है कि वे 'रजस्वला' हो गई हैं । इसमें न तो महारानी जी का कोई दोष है और न हम लोगों का । इस 'मासिक चक्र' पर किसी का कोई नियंत्रण नहीं है महाराज । इसलिए अब आपको कम से कम चार दिन और इंतजार करना होगा । जब महारानी जी ऋतु स्नान कर लेंगी तब आप दोनों का मधुर मिलन हो पायेगा । तब तक आप अपने धैर्य की ढाल को और मजबूत बनायें और अपने संयम की तलवार पर और तेज धार धरें" । देवयानी अपने अभिनय पर इतराने लगी थी । "कैसा मजा चखाया है सम्राट को ! आनंद आ गया" । ऐसा भाव था उसके मन में । 


सम्राट हताश होकर वहीं पर धम्म से बैठ गये और "एकान्त" कहकर समस्त दासियों को चले जाने को कहा । शर्मिष्ठा बनी देवयानी को छोड़कर बाकी सब दासियां एक एक करके चली गईं । देवयानी अपने स्थान पर ही खड़ी रही । 

देवयानी को सामने खड़ी देखकर ययाति ने कहा "अरे, यदि देवयानी एकाएक रजस्वला हो गई है तो कोई बात नहीं है । मेरे सामने सौन्दर्य की दूसरी देवी शर्मिष्ठा खड़ी है । आज तुम्हारे साथ ही मधु यामिनी मना लेते हैं । क्यों शर्मिष्ठे" ? अब ययाति के अधरों पर मुस्कान थी और देवयानी के माथे पर चिंता की लकीरें । 

"ये क्या कह रहे हैं सम्राट ? मैं तो आपकी पत्नी की दासी हूं । मैं आपके साथ मधु यामिनी की बात सोच भी कैसे सकती हूं" ? 

"तुम मत सोचो शर्मिष्ठे ! सोचने का काम पुरुषों का है । तुम तो बस मेरी आज्ञा का पालन करती रहो । तुम मेरी भोग्या हो इसलिए मेरे साथ मधु यामिनी मना सकती हो । अत: इधर आओ , मेरे पास आकर मेरे अंक में बैठ जाओ और अपने अमृत तुल्य अधरों का पान मुझे करने दो" । ययाति ने आगे बढकर एकाएक देवयानी का हाथ पकड़ लिया । इस अचानक आक्रमण से देवयानी भयभीत हो गई और कांपने लगी । 

"भयभीत होने की आवश्यकता नहीं है दैव ! मुझे तुम्हारे समस्त प्रहसन के बारे में सब कुछ पहले से ही ज्ञात है । मैं भली भांति जानता हूं कि तुम देवयानी हो और अंदर शर्मिष्ठा बैठी हुई है । तुम क्या समझती हो कि तुम शर्मिष्ठा बनकर मुझे "छका" सकती हो ? माना कि तुम बहुत बुद्धिमान हो और योग्य हो किन्तु तुम्हें यह भी ज्ञात होना चाहिए कि हम भारत के सम्राट हैं और हमसे कुछ भी गुप्त नहीं रह सकता है । यहां तक कि तुम्हारे बदन पर एक एक तिल की भी जानकारी है हमें । यदि तुम अपना प्रहसन खेल रही थीं तो हम भी अपना प्रहसन खेल रहे थे" । ययाति ने हंसकर देवयानी का हाथ पकड़कर उसका अवगुंठन उलट दिया जिससे उसका चांद सा मुखड़ा दिखाई दे गया । 


"बाहर आ जाओ शर्मिष्ठे, तुम्हारी सब पोल पट्टी अब खुल चुकी है । अब अंदर बैठे रहने का कोई औचित्य नहीं है" । ययाति ने जोर से कहा । शर्मिष्ठा लजाती सकुचाती हुई कक्ष से बाहर निकली और ययाति के पैरों में गिर पड़ी 

"हमारी धृष्टता को क्षमा कर दीजिए महाराज ! महारानी जी ने हमसे यह सब जबरन करवाया है । हम निर्दोष हैं" । शर्मिष्ठा ने क्षमा याचना के नाम पर अपने मन मंदिर के सम्राट के चरण स्पर्श कर लिये । 



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