अख़लाक़ अहमद ज़ई

Inspirational

4.5  

अख़लाक़ अहमद ज़ई

Inspirational

शर्म

शर्म

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मैं सामने रखी थाली से निवाला उठाकर मुंह में रखने ही वाला था कि बाहर से बिल्ली की आवाज़ आयी तो बिन देखे ही अन्दर कुछ 'ठक' से लगा। मन में  टीस उठी और मैंने दरवाज़े की तरफ नज़र उठाकर देखा ।दरवाज़े के सामने बिल्ली बैठी कातर नज़रों से तके जा रही थी और अजीब-सी आवाज़ निकाल रही थी जैसे कह रही हो– मुझे भी दो।

यह बिल्ली पालतू नहीं है लेकिन जब यह छोटी-सी थी तभी से इसे दूध वगैरह देते रहे थे। पिता जी अक्सर कहते थे कि हमारी कमाई में केवल मेरा ही हिस्सा नहीं होता है। उस पर पहला हक़ परिवार का होता है फिर गरीब-गुरबा का फिर चरिंदों-परिंदों का। लेकिन इधर कुछ दिनों से बिल्ली को खाना देना बंद कर दिया था। कारण, मोहल्ले वालों को मेरे और मेरे परिवार द्वारा दिया जाने वाला खाना अखर रहा था। उनका तर्क है कि तुम लोग खाना खिलाते रहते हो इसलिए बिल्ली यहीं सामने और हम लोगों के घर में घुसकर गंदगी फैलाती रहती है। 

"इस मोहल्ले में रोज़ पचासों बाल्टी पानी फेक दिया जाता है गली धुलने के लिए। उसमें उसकी गंदगी भी तो धुल ही जाती है।" 

सामने वाले ने तुनक कर कहा–

 "फिर इसे अपने घर में रख लो ना! खिलाते रहना और गंदगी साफ करते रहना।" 

 सामने वाले की बातों पर हंसी आ गयी थी क्योंकि उसके घर में सामने की दीवार पर एक स्टिकर चिपका हुआ था–'जीवों पर दया करो।'

उसने एक बार मेरा चेहरा देखा फिर घूमकर अपने घर में देखा। वह अन्दर गया और दीवार से स्टिकर छुड़ाकर लाया और मेरे हाथ पर रख दिया–इसे तुम ही रखो। तुम्हारे बहुत काम आयेगा। 

मैंने कुछ कहना ज़रूरी नहीं समझा। जो इंसान इस हद तक संवेदनहीन हो जाय फिर उससे क्या बहस करना। 

मैंने बिल्ली से मन ही मन माफी मांगी और थाली उठाकर दूसरे कमरे में चला आया। मुझे बिल्ली के सामने खाते हुए शर्म महसूस हो रहा था 


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