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Ragini Pathak

Inspirational Children


4.0  

Ragini Pathak

Inspirational Children


परवरिश

परवरिश

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"वॉव, पापा फाइनली आज दादा दादी जी आ जायेगी।" "मैं तो बहुत खुश हूं।"

" फाइनली मुझे मम्मी की कैद से आज़ादी मिलेगी।" 10 साल के रोहन ने अपने पापा अशोक से कहा

"रोहन ! ये क्या तरीका है?"

"अपनी माँ के लिए कोई ऐसा कहता है।"

"अब तुम बड़े हो रहे हो। तो तुम्हें इतना पता होना चाहिए।" कि अपने मम्मी पापा से कैसे बात करनी चाहिए? अशोक ने रोहन को डांटते हुए कहा

रोहन वहाँ से मन ही मन मुस्कुराते हुए चला गया।


अंदर किचन से सरिता को रोहन की हरकतें देख के गुस्सा भी आ रहा था। और चिंता भी हो रही थी कि अगर ऐसा ही चलता रहा। तो रोहन कभी सुधारा नहीं जा सकता। मुझे कुछ ना कुछ करना ही होगा। लेकिन क्या और कैसे?

सरिता मन ही मन अपने आप से बातें किये जा रही थी।

कि तभी अशोक ने आवाज़ लगायी। सरिता मैं माँ बाबुजी को स्टेशन से ले के आता हूँ।


सरिता ने कहा" ठीक है। "

फिर पुरानी यादों में जैसे चली गयी। सास ससुर के सामने तो रोहन को तेज आवाज़ में बुलाना भी मुश्किल है। डांटना तो बहुत दूर की बात है। वरना दोनो लोग खाना पीना छोड़ के अनशन पर ही बैठ जाते है।

थोड़ी देर में सरिता के सास विमला और ससुर रामवतार जी आ गए। अशोक उनको घर पर छोड़ के बाहर कुछ काम से चले गए।

इधर रोहन दादा दादी को देख के ऐसे लिपट कर रोने लगा जैसे वर्षों बाद मिला हो।


तभी विमला जी ने कहा" अरे! क्या हुआ मेरे पोते को किसी ने कुछ कहा क्या?'

इतना सुनते तो रोहन शुरू हो गया। दादी आपको पता है। आप के नही रहने पर पापा ने मुझे बहुत मारा। कहा -"अगर पढ़ाई में लापरवाही हुई तो आगे भी मार पड़ेगी। पूरे एक सप्ताह से मुझे टी वी भी देखने के लिए नही मिला। और ना ही मेरा कोई पसंदीदा खाना। मुझे तो ऐसा लग रहा था जैसे मैं कैद मैं हूं। और मम्मी पापा उस जेल के पुलिस। और आज भी सुबह मुझे मार के गए।आपको लेने। अब आप आ गए हो ना। अब मैं आजाद हूं। और आप अब कभी मत जाना।"


इतना सुनते सरिता ने कहा "रोहन तुम्हें पापा ने कब मारा? सिर्फ समझाया। तुम दादी से झूठ क्यों बोल रहे हो?"

वो भी सिर्फ तुम्हारी ज़िद के कारण ....तुम्हें उन्होंने बस जंक फूड खाने के लिए और दिन भर टीवी देखने से मना किया। ताकि तुम्हारी आंखे और स्वास्थ्य ना खराब हो।

सरिता ने सास को चाय पकड़ाते हुए कहा"

सरिता का जवाब सुन के विमला जी ने कहा" हाँ !!हाँ!! अब बच्चे को झूठा बना दो। तुम्हारा तो यही काम रह गया है। अब सबके बीच झगड़े लगाती रहती हो।"

बस भड़का दिया होगा। ऐसे ही अशोक को भी कह के "कि पढ़ता नहीं है। मैगी खाता है।"

मर्द जात को गुस्सा तो आएगा ही। दस काम बाहर के करो। घर आ के शिकायतें सुनो ।तो बच्चे को ही मारेगा ना। कमजोर समझ के। लगा दिया बाप बेटे में झगड़ा बस खुद महान बन गयी।


एक सप्ताह नहीं थी मैं तो तुम को आज़ादी मिल गयी। सोचा होगा ...सास आये ही ना। जा रोहन!! बेटा देख ले टीवी... मैं भी देखूँ कौन क्या करता हैं?

मुँह पे हाथ रख के रोहन हँस रहा था, गुस्से का घुट पी के सरिता वहाँ से किचन में चली आयी।

तभी विमला जी ने आवाज़ दी। कि आज रोहन के लिए पास्ता बना देना।

सरिता को मन तो हो रहा था कि रोहन को दो थप्पड़ लगाए। लेकिन सास ससुर के अनशन के बारे में सोच के डर जाती।


अगले दिन सरिता ने रोहन से कहा "रोहन!अब टीवी बंद कर के चलो पढाई करने दस दिनों में परीक्षा शुरू होने वाली हैं। और तुमने अभी तक नोट्स भी पूरे नही किये हैं। "

दादी देखो ना मेरा सिर दुख रहा हैं। और माँ मुझे पढ़ने के लिए कह रही हैं।

हाय! मेरा बच्चा आ जा । मैं सिर दबा देती हूं। लेकिन बेटा थोड़ा पढ़ाई पर भी ध्यान दिया कर। बेटा...

हाँ ! दादी देता तो हूँ। आपका संस्कार चैनल लगा दूँ ।


हाय! मेरा पोता कितना प्यारा हैं।

दादी का कितना ख्याल रखता है

हाँ !जा लगा दे।

सरिता का मन रो के रह जाता।


एग्जाम हुआ। और रोहन के उसमें नंबर बहुत कम थे। क्लास टीचर ने बताया "कि रोहन क्लास में भी बहुत बदतमीजी से पेश आता है।"

सरिता घर आयी। रात को अशोक को ये बात बतायी। अशोक ने कहा"कल बात करता हूं।"

तभी सरिता ने कहा !!नही.. अशोक! अब डांट डपट के काम नहीं चलेगा। वापिस वो माँ बाबूजी के पास जाकर वही काम करेगा। वो माँ बाबूजी के प्यार का गलत फायदा उठाता है। उसे पता है कि हम माँ बाबूजी की बात कभी नही टालेंगे।।

और वो लोग भी फिर से खाना पीना छोड़ देंगे और फिर रोहन पर ध्यान देने की जगह हम उनको मनाते रहेंगे।


अब मुझे ही कुछ करना होगा। जिससे माँ बाबूजी का दिल भी ना दुखे और रोहन भी रास्ते पर आ जाये।

देख लो !! जैसा तुम्हें ठीक लगे।

बस माँ बाबूजी का ख्याल रखना।


हाँ!

अगले दिन सरिता बाथरूम में गिर गयी। डॉक्टर को दिखाया तो पता चला। मसल्स फैक्चर हैं। बेडरेस्ट करना होगा। कम से कम एक सप्ताह।

ये बात! अशोक ने घर आ के अपनी मां को बतायी।

माँ! "अब कैसे होगा?" मुझे भी ऑफिस के काम से आउट ऑफ स्टेशन जाना है कल।

तू चिंता मत कर बेटा मैं सब संभाल लूंगी।

सच माँ ! चलो अब मेरी चिंता दूर हुई।

अब घर के सारे काम विमला जी को करने होते। वो सरिता को उसके रूम में ही या तो खुद खाना दे देती या कभी रोहन से भिजवा देती।

रोहन के खाने की फरमाइश पर अब ताला लग गया।

क्योंकि उनको पास्ता बर्गर इत्यादि जंग फूड बनाने नही आते थे। मुश्किल से माँजी सादा भोजन बना पाती। घर के चक्कर मे उनकी भजन मंडली, सखी सहेलियां सब छूट गए थे। अब तो अपने पसंदीदा सीरियल भी मुश्किल से देख पाती।

इधर रोहन की हर रोज नयी फरमाइशें होती । कभी रामवतार जी बाजार ले जा के पूरी कर देते तो कभी विमला जी को करनी पड़ती। लेकिन अब उनकी परेशानी उनके चेहरे पर साफ झलक रही थी।

इधर सरिता चुपचाप सब कुछ देखती। एक दिन दोपहर के खाने पर रोहन ने कहा "दादी आप रोज एक जैसा ही खिला रही है। मुझे आज पास्ता ही खाना हैं।"


तब विमला जी ने कहा बेटा "पास्ता सेहत के लिए अच्छा नहीं होता। पोष्टिक खाना खाते है। चख के तो देखो कितना स्वादिष्ट बनाया हैं।"

रोहन ने खाने का प्लेट खुद से दूर फेंकते हुए कहा" नहीं खाना मुझे ये खाना। मुझे तो लगा आप खाना बनाएगी तो मुझे अच्छा खाना मिलेगा। मैं पूरी आज़ादी से जो मर्जी करें, खा सकता हूं। लेकिन आप तो मम्मी से भी बेकार है।"

चटाक!!!!

रोहन के गाल पर तमाचे आज सरिता ने अपने सास ससुर के सामने मारे।


रोहन ये थी तुम्हारी आज़ादी की सीमा। जो तुम्हें अभी तक नहीं मिली थी। आज़ादी का मतलब भी जानते हो तुम दस साल की उम्र में इतनी बड़ी बातें।

तुम्हारी इस हरकत और फरमाइशों को आज़ादी नही बदतमीजी कहते हैं। समझे। कोई अपने दादा दादी के साथ ऐसे पेश आता है।

माफ़ी मांगो दादी से और जा के चुपचाप अपनी प्लेट उठाओ और सफाई करो। समझे।

रोहन अपनी मम्मी का ये रूप देख के डर गया । आज विमला जी और रामवतार जी भी चुप थे।

रोता हुआ । रोहन दादी के पास जा के बोला "दादी ! मम्मी ने मुझे मारा और आप ने मुझे बचाया भी नही।"

हाँ!बेटा औऱ आगे बचाऊंगी भी नहीं। क्योंकि मम्मी ने तुम्हारे गलत व्यवहार के लिए तुम्हें मारा। अब तुमको मम्मी पापा की बात माननी ही पड़ेगी। जैसा वो बोलेंगे वैसा ही करना होगा।

जाओ!जा के प्लेट उठाओ। और सफाई करो। विमला जी ने कहा


आज सरिता के सास ससुर शर्मिंदा थे। क्योंकि उनको पता था कि रोहन के इस व्यवहार के कहीं ना कहीं वो भी जिम्मेदार है।

सरिता कमरे में जाने लगी। तो विमला जी ने रोकते हुए कहा" बहु सुनो ! आज से यही हमारे साथ ही खाना खाना। और हाँ हो सके तो मुझे माफ़ भी कर देना। "

तब सरिता ने कहा "नही माँजी इसमें माफ़ी नही समझ की जरूरत है। बेशक आप अपने पोते को प्यार कीजिए। मुझे तो और खुशी होगी,इस बात से ....क्योंकि मैं उसकी माँ हूँ। लेकिन उसकी गलत हरकतों पर उसको टोकिये रोकिए। बताइए कि सही गलत का फर्क समझाइये।

मुझे भी डाटिये मेरी गलतियों पर लेकिन कोशिश ये रहे कि ये सब रोहन के सामने ना हो और अगर कभी हो तो उसको ये पता चले कि गलती किसी की भी बर्दाश्त नही की जाएगी।ना कि सभी गलत बातों पर भी उसका सहयोग कीजिए। बच्चों को आज़ादी का सही मतलब समझाइये। उन्हें समय और नियमों के उपयोग के महत्व समझाइये ...बड़ो की इज्ज़त करना सीखेगा तभी समाज हमारे संस्कारो पर उंगली नही उठा पायेगा बस !!मैं इतना ही चाहती हूं।

सही कह रही हो!!! बहु


रोहन ने अपनी दादी को माफ़ी मांगते देखा तो उसे भी अपनी गलती का एहसास हो चुका था।

रोहन ने आ के सरिता से कहा" मम्मी मुझे माफ़ कर दो।" देखो मैने प्लेट रख दी और सफाई भी कर दी।

तभी पीछे से अशोक भी आ गए।

सरिता ने रोहन को गले लगाया और कहा" कोई बात नहीं। लेकिन अगली बार से अब कभी नही होना चाहिए।"


पक्का प्रॉमिस! माँ रोहन ने कहा

चलो अब दादा दादी को" सॉरी कहो जल्दी।"

"सॉरी दादी दादाजी"

तभी रामवतार जी ने कहा"अच्छा अब सब चलो खाना खाने वरना ।खाना ठंडा हो जाएगा।"

तभी अशोक ने सरिता के कान में धीरे से कहा "अच्छा हुआ सच पता नहीं चला तुम्हारा। वरना अभी अनशन शुरू हो जाता।"

अंत भला तो सब भला पति देव । वो गाना सुना है ना पर्दे में रहने दो। सरिता ने धीरे से कहा।


तभी विमला जी की आवाज़ आयी अरे बहु जल्दी आओ दोनो खाना ठंडा हो जाएगा। कब से खड़ी हो डॉक्टर ने आराम करने के लिए बोला हैं।

जी माँजी आयी। कहते हुए सरिता और अशोक पूरे परिवार के साथ खाना खाने बैठ गए।


दोस्तों बहुत से संयुक्त परिवार की ये समस्या होती हैं कि बच्चा सबके प्यार का गलत फायदा उठाता है औऱ तरह तरह की गलतियां और खराब आदते सीख लेता है। झूठ बोल के सबका ध्यान अपनी तरफ़ ही रखना चाहता है। है। आपस की समस्या का असर बच्चों पर ना होने दे।बच्चों को प्यार बेशक कीजिए। लेकिन उन्हें अनुशासित जीवन जीना भी सिखाना बहुत जरूरी हैं। जिससे वो बड़ों का आदर सम्मान भी करना सीखे।



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