AMIT SAGAR

Horror Thriller


4.7  

AMIT SAGAR

Horror Thriller


पाँचवीं मंज़िल पर

पाँचवीं मंज़िल पर

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दुनिया का अन्त कहाँ है ? पाताल में लोगों के साथ क्या व्यवहार होता है ? स्वर्ग में सबसे अच्छी चीज कौन सी है ? मरने के बाद इंसान की रुह कहाँ जाती है ? हमारे उपर आसमान है, आसमान में तारे, सूरज, चन्दा हैं तो उनसे ऊपर क्या है ? दुनिया का पहला मनुष्य कैसा था, और वो कैसे उत्पन्न हुआ ? ऐसे हजारों सवाल हैं जो हमारे मन में उमड़ते रहते हैं, और सबसे बड़ा सवाल ये है कि इन सब सवालों के जवाब हमें कहाँ मिलेंगे या फिर इनके जवाब जानने के लिये हमें हमें कौन सी किताब पढ़नी होगी। यहीं से जन्म होता है कल्पना का और कल्पना जन्म देती है लेखक को। 

एक बार की बात है कि मैं छत पर लेटा लेटा यही सब सोच रहा था। तभी मेरी नजर एक तारे पर पड़ी जो कि धीरे धीरे चल रहा था, काफी देर तक मैं उस तारे को यू ही देखता रहा। तारा आगे बढ़ता हुआ मेरी आँखों से औझल हो गया, तभी मेरे मन में कई तरह के सवाल उठे कि ये तारे चलते क्यों है, और यह चलकर जाते कहाँ है ? यही सब सोचते सोचते मुझे नींद आने लगी और मैं सो गया। 

लगभग दो घण्टे बाद मेरी आँख खुली तो मैंने महसूस किया कि मेरा गला सूख रहा है यानी मुझे प्यास लगी थी। मैं पानी लेने नीचे आया गिलास में पानी लेकर मैंने सोचा क्यों ना घड़ी पर भी नजर मार ली जाये। घड़ी में पूरे 12 बजे थे। समय देखकर मैं पानी पीते हुए छत पर आकर लेट गया।  बिस्तर पर लेटते ही मैंने महसूस किया कि नीचे गली में से छम छम कि आवाज़ आ रही है। दबे पाँव मैंने नीचे झाँक कर देखा तो मेरे होश उड़ गये और मैं दौड़कर अपने बिस्तर पर जाकर चादर ओढ़ कर लेट गया पर मुझे नींद नही आ रही थी।  मैंने नीचे एक विचित्र डरावना चेहरा देखा जो ना तो मुझे आदमी लग रहा था और ना ही औरत। उसके बाल लम्बे थे और पैरो में पायल थी इसलिये मैं उसे औरत मान सकता था। पर उसका डीलडोल और पहनावा आदमियों जैसा था।  इससे पहले कि मैं कुछ और देख पाता मेरी हिम्मत जवाब दे गयी, क्योंकि मुझे बहुत डर लग रहा था। कुछ देर हिम्मत जुटाने के बाद मेरी इच्छा फिर से नीचे झाँकने कि हुई और मैं छत की मुंडेर पर पहुँच गया, नीचे झाँककर मैंने दुबारा देखा तो पाया कि उसने बहुत ढीला सफेद कुर्ता पयजामा पहन रखा था जैसे मानो कोई डरावना भूत पहनता हो।  उसके दाँत भी बहुत चमकीले थे उसके दाँत देखकर एकबार तो मुझे ऐसा लगा कि जैसे वो मुझे अपने चमकीले दाँत दिखाने ही आया है। पर ऐसा नही था। 

वो आदमी अब नीचे बैठ चुका था, और अपने आप से ही कुछ बात कर रहा था।  मैं उसकी असामान्य गतिविधि देख रहा था, पर वो अपनी बातों में मशगुल था।  उसको अच्छी तरह देखने के चक्कर में मेरी पूरी गर्दन मुंडेरी से बाहर आ गयी थी, और मेरे अन्दर से भूत का  डर भी कहीं गायब हो गया था।  तभी मैंने देखा कि वो आदमी धीरे धीरे मुंह को ऊपर उठा रहा था, मैं वहाँ से अलग हटना चाहता था पर हट ना सका, जैसे ही उसकी निगाह मेरे उपर पड़ी वो थोड़ा घबरा गया पर कुछ ही क्षण बाद वो मेरी तरफ देखकर हल्का सा मुस्कराया भी और मुझे आँखों से इशारा करके नीचे बुलाया, पर मैंने गर्दन हिलाकर मना कर दिया। तभी वो खड़ा हो गया और ना जाने कहाँ से उसके पास एक बेहोश लड़का आ गया, या हो सकता है डर के कारण मेरी निगाह उस लड़के पर ना पड़ी हो क्योंकि वो जमीन पर था।  फिर उस भयानक से दिखने वाले आदमी ने उस बेहोश लड़के को कन्धे पर डाल लिया और उसे कहीं ले जाने लगा। मैं थोड़ी देर तो यूंही खड़ा रहा पर उसके बाद मुझमें ना जाने कहाँ से हिम्मत आ गयी कि मैं भी उसके पीछे पीछे चल दिया। 

वो भयानक आदमी हमारे मोहल्ले की लम्बी लम्बी गलियों से होकर गुजर रहा था जिनमें बहुत अन्धेरा रहता था। अन्त में वो किसी दूसरे मोहल्ले की 100 मिटर लम्बी गली मे घुस गया जिसमें चार और पाँच मंजिला मकान थे। गली के आखिर के एक घर पहले दाँये हाथ पर मेरे उम्र के लड़कों की लाइन लगी थी।  कुछ लड़के मुझसे छोटे भी थे, और वो सभी लड़के आगे कुछ देखने की कोशिश कर रहे थे।  लाइन में सबसे पहले खड़े चार पाँच लड़कों का सीने पर हाथ था और वो ऐसे हिचकोले खा रहे थे जैसे उनके सीने में दर्द हो रहा हो या जैसे उनको बिजली के झटके लग रहें हों।  वो भयानक आदमी उस बेहोश लड़के को लेकर सबसे आगे उसी मकान में चला गया जिस मकान के आगे भीड़ लगी थी। मेरी जिज्ञासा और बढ़ी कि आखिर माजरा क्या है ? मेरी वहाँ जाने की इच्छा हुई पर उन हिचकोले खाते लड़कों को देखकर मुझे डर सा लग रहा था, ऊपर से लम्बी और पतली गलियाँ जिनमें घोर अन्धेरा मेरे मन में और अधिक डर पैदा कर रहा था।  पर हिम्मत करके मैं भी उसी लाइन में लग गया।  मेरे आगे खड़े लड़के मुझसे लम्बे थे जिस कारण मुझे आगे का कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा था।  पर मैं अपने आप को दूसरों से अधिक होशियार समझता था और मैंने वहाँ अपनी चालाकी दिखाने की कोशिश की मैंने सोचा क्यों ना यह नजारा छत के उपर से देखा जाये, आखिर वहाँ चल क्या रहा है। पर यदि किसी ने मुझे छत पर जाने से रोका तो,

तो मैं कह दूँगा कि सुबाह मेरी बॉल छत पर चली गयी थी वही लेने जा रहा हूँ।  मकान नया था और पाँचवीं मंजिल तक बना हुआ था। जैसे ही मैं घर में गया वैसे ही बहुत तेजी के साथ बाहर से घर का दरवाजा अपने आप बन्द हो गया।  दरवाजा बन्द होते ही मेरे होश उड़ गये, चारों तरफ गुप्त अन्धेरा था। मुझे एक एक करके सारे भगवानों के नाम याद आने लगे कि हे राम हे बजरंग बली हे भोले नाथ कोई तो मुझे इस मुसीबत से बचा लो, आगे कभी भी ऐसी गलती नहीं करूंगा। अभी तक मेरी नजर दरवाजे तक ही सीमित थी।  इतने सारे भगवानों के जाप करके मुझे किसी भगवान ने दर्शन तो नहीं दिये लेकिन मुझमें थोड़ी हिम्मत जाने कहाँ से आ गयी कि मैंने पीछे गर्दन घुमाने की कोशिश की।  गर्दन घुमाकर देखा तो पाया कि पीछे की दीवार पर एक छोटा सा सुराख था जिसमें से सूई की नोक के बराबर प्रकाश आ रहा था। मैंने सोचा कि शायद छत से बाहर जाने का कोई रास्ता हो, मैं डरते डरते उस प्रकाश की ओर गया और वहाँ जाकर देखा तो मुझे ऊपर जाने के लिए सीढ़ियाँ मिल चुकी थीं।  एक एक करके मैं ऊपर की सीढ़ियाँ चढ़ने लगा।  पाँच सीढ़ियाँ चढ़ने के बाद मुझे एक बड़ा सुराख दिखाई दिया जिसमें से दूसरे घर का नजारा साफ देखा जा सकता था।  मैंने उस बड़े से सुराख में झाँककर देखा तो पाया कि सुराख के उस पार वही भयानक आदमी उस बेहोश बच्चे को गोद में लिये खड़ा है, परन्तु उन दोनों के सिर धड़ से गायब थे, यानी उन दोनों की गर्दन नहीं थी।  मैंने कुछ और देखने कि कोशिश की किन्तु उस से अधिक मुझे कुछ दिख ना सका।  वो बिना सिर के धड़ देखने के बाद तो मैं डर के बारे में बिल्कुल ही भूल चुका था । मेरा रास्ता अब उपर छत की ओर जा रहा था और बेझिझक एक एक सीढ़ि चढ़ता हुआ मैं ऊपर पहली मंजिल पहुँच गया।  पहली मंजिल का नजारा बहुत भव्य था।  मुझे ऐसा लग रहा था जैसे मैं जन्नत में आ गया था हर तरफ सफाई थी जमीन पर मखमल की कालिन बिछी थी, दीवारों पर राजा महाराजाओं की तस्वीरें लगी थी।  दीवार के दोनों ओर शाही कुर्सियाँ और मेजे थीं।  मेज पर खाने के लिये बहुत सारे पकवान थे।  पकवान देखते ही मैंने इधर उधर देखना बन्द कर दिया और थाली में सजे लड्डू इमरती देख मैं खाने पर भिड़ गया। अच्छे अच्छे पकवान देखकर मैं यह भी भूल गया कि मुझे पहले भगवान को भोग लगाना था। छक कर खाने के बाद मुझे प्यास लगी, इधर उधर देखा तो कहीं भी पानी नहीं था। प्यास से मेरा गला सूख रहा था और बेचैनी बढ़ रही थी तभी मेरी निगाह सामने सजी दो राजगद्दियों पर पढ़ी।  राजगद्दी शुद्ध सोने से बनी थी और उनमें जड़े हीरे जरूरत से ज्यादा चमक रहे थे।  दोनों राजगद्दियों पर मैंने ऐसी चीज देखी जो वहाँ नहीं होनी चाहिये थी। दोनों गद्दियों पर एक एक गिलास रखा था।  मैंने सोचा शायद उसी में पीने का पानी है और यही बात सोचकर मैं राजगद्दी के पास गया, लेकिन मैं गलत निकला। उनमें से एक गिलास में ऊपर खून और नीचे पानी था, औ दूसरे गिलास में दूध था। प्यास बहुत लगी थी लेकिन मैंने किसी गिलास को हाथ नहीं लगाया। क्योंकि अगर मैं पानी वाले गिलास को उठाता तो पहले मुझे उसके ऊपर का खून पीना पड़ता पर खून पीना राक्षसों का काम है इनसानों का नहीं।  दूसरे गिलास में दूध था हो सकता है उसमें जहर हो। इसलिये मैंने दूध वाले गिलास को भी हाथ नहीं लगाया। 

अत्यधिक प्यास लगने के कारण मैं दूसरी मंजिल पर जाने का रास्ता ढूँढने लगा, तभी मेरी निगाह दीवार पर टंगे एक अलग तरह के परदे के ऊपर पड़ी।  सभी पर्दे एक ही रंग के थे सिवाय उस पर्दे को छोड़कर।  मैंने उस पर्दे को हटाकर देखा तो वहाँ से दूसरी मंजिल पर जाने का रास्ता था।  मैंने फौरन सीढ़ि चढ़ना शुरु कर दिया।  चार पाँच सीढ़ि चढ़ने के बाद मुझे फिर एक बड़ा सा सुराख दिखाई दिया।  सुराख के उस ओर फिर से झाँक कर देखा तो वहाँ एक बुढ़िया बैठी थी जिसके बाल पूरी तरह सफेद थे, सिर पर लाल पट्टी बंधी थी और माथे पर लम्बा काला टीका था। उसके चेहरे और हाथ पर अत्यधिक झुर्रियां थी। बुढ़िया का चेहरा मुझे बहुत डरावना लग रहा था, पर डर को मैं नीचे वाले कमरे में बन्द कर आया था। मैंने कुछ और देखने की कोशिश की परन्तु उस बुढ़िया के अलावा मुझे कुछ और दिखाई नहीं दिया जो कि बैठी बैठी हिल रही थी।  यह सब यहीं भूल मैं ऊपर दूसरी मंजिल पर पहुँच गया।  वहाँ का नजारा नीचे से भी अलग था। वहाँ मुझे बहुत सारे आदमी दिखाई दिये और हर आदमी के हाथ में लड़ने के लिये कुछ ना कुछ हथियार थे।  उन सभी की निगाह एक ओर बने गोल घेरे में थी।  मैं भीड़ की तरफ बढ़ा और एक आदमी से पानी के बारे में पूछा तो उस आदमी ने मेरे हाथ में भी एक कुल्हाड़ी दे दी। मैं भीड़ चीरकर अन्दर घुसा तो देखा कि दो आदमी लोहे के सरिये लेकर बुरी तरह लड़ रहे हैं। बात मेरी समझ में नहीं आयी कि आखिर यह दोनों लड़ क्यों रहे हैं। लड़ते लड़ते दोनों बहुत जख्मी हो गये थे, और कुछ ही देर में एक आदमी ने प्राण त्याग दिये, और जो जिन्दा बचा उसने मेज पर रखे जग को उठा कर उसका सारा पानी पी लिया। 

मैंने एक आदमी से उस लड़ाई के बारे में पूछा तो उसने बताया लड़ाई का एकमात्र कारण पानी है।  यहाँ पर पानी की बहुत कमी है या तो प्यासे मरो या फिर पानी के लिये अपना और दूसरों का खून बहाओ।  मैंने उस से कहा कि तुम लोग पानी के लिये अलग से कोई प्रयास क्यों नहीं करते।  तो उसने लड़ाई को ही यहाँ के लोग अलग प्रयास मानते हैं।  क्योंकि यह सब वही लोग हैं जो नीचे ज्यादा पानी मिलने पर उसको जरूरत से ज्यादा बहाते थे।  एक बाल्टी पानी काम में लेते तो दस बाल्टी पानी को बहाते थे, उसी की सजा इन्हें यहाँ मिल रही है। 

मैंने मन ही मन सोचा कि मैंने तो ज्यादा पानी कभी नहीं बरबाद किया मेरे लिये जरूर कोई रास्ता निकलेगा। मैंने अपनी हाथ वाली कुल्हाड़ी फेंक दी और इधर उधर ताक झाँक शुरु कर दी पर मुझे कहीं भी तीसरी मंजिल पर जाने की सीढ़ियाँ तो दिखाई नहीं दी पर सीढ़ियों जैसा कुछ और दिखाई दिया जिसे देखकर मुझे बहुत ही अचम्भा हुआ।  दरअसल दीवार के एक तरफ सीढ़ि के आकार की तरह इनसानों की गर्दन कटी हुई रखी थी। पाँच कटे सर की एक पहरी बनी थी, और सारे के सारे कटे सिर बोल सकते थे।  और सीढ़ि की हर पहरी पर पाँच कटे सिर थे। तीसरी मंजिल पर जाने का रास्ता मुझे मिल चुका था, पर मैं कोई शैतान तो नही हूँ जो इन कटी गर्दनों के उपर पैर रख कर मानवता को गाली दूँ।  मैंने अपना रास्ता बदल दिया, तभी मुझे सारी कटी गर्दनों ने एक साथ आवाज लगाई कहा रुक जाओ हमसे ऐसे हमसे मुंह फेर के मत जाओ।  उनकी आवाज पर मैं रुक गया और मैंने उनसे उनकी इस दुर्दशा के बारे बताने का आग्रह किया तो उन्होंने बताया कि यह हमारे बुरे कर्मों का फल है।  हमने कभी भगवान के आगे सिर नहीं झुकाया,  हमारा अहंकार सातवें आसमान पर रहता था।  कभी किसी को दान नहीं दिया कभी किसी के काम नहीं आये किसी पर दया नहीं की हमेशा सब को झुका कर रखना चाहा।  इसलिये हमें यह निर्दयता की सजा मिली है।  जब तक हमारे ऊपर से एक लाख लोग नहीं गुजरेंगे तब तक हमारा शरीर यूहीं तड़पता रहेगा और आत्मा नीचे भटकती रहेगी तुम भी हमारे ऊपर से होकर गुजरो और हमारे दुख निवारण का कारण बनो।  मैंने उनकी बाता मान ली और उन कटि गर्दनों पर पाँव रख मैंने ऊपर चढ़ना शुरु किया चार पाँच सीढ़ि चढ़ने के बाद मुझे फिर एक सुराख दिखाई दिया।  सुराख के पार झाँक कर देखा तो ना वहाँ बुढ़िया थी ना वो भयानक आदमी और ना ही वो बच्चा था, बल्कि उन सबसे बड़ कर मुझे वहाँ कुछ बहुत भयंकर आसाधारण चीज दिखाई दी मैने वहाँ देखा कि एक आदमखोर जोकि दरवाजे में खड़े बच्चों में से एक एक को अन्दर बुलाकर उनके सिर, धड़ से अलग कर रहा था और उनके दिल निकालकर एक ढैर में डाल रहा था।  दिल के ढेर मे से मुझे एक हाथ आता दिखाई दे रहा था और उनमें से एक एक दिल को उठा रहा था।  इसके अतिरिक्त मुझे कुछ और दिखाई नहीं दिया।  अब यह मामला मेरी समझ से बाहर और दिमाग के अन्दर घुसता जा रहा था।  इस दृश्य को भी अधूरा छोड़ मैं तीसरी मंजिल की और चल पड़ा।  मेरी प्यास अब भी बरकरार थी और पहले की अपेक्षा अधिक तीव्र होती जा रही थी पर उम्मीद के दम पर मैं आगे बढ़ता गया ‍और साथ देने के लिये हिम्मत मेरे साथ थी।  अब अगले हालात का सामना करने के लिये मैं पूरी तरह तैयार था जाने आगे कौन सी मुसीबत सामने आ जाऐ।  परन्तु तीसरी मंजिल का नजारा देख कर मन को थोड़ी शान्ती मिली।  नजारा ही कुछ ऐसा था।  चार अलग अलग धर्म के अनुयायी वहाँ मौजूद थे।  हिन्दु, भगवान की मुर्तियों की पूजा कर रहा था।  मुसलमान कुरान शरीफ को अपनी जुबान पर दोहरा रहा था।  सिख वाहेगुरु के नाम का जाप कर रहा था और इसाई बाईविल को हाथ मे लिये गोड को याद कर रहा था।  चारों को देख कर ऐसा लग रहा था जैसे मैं स्वर्ग में पहुँच चुका था, और में सोच रहा था कि हर आदमी इन चारो की तरह ही पूजा पाठ में मग्न रहे तो दुनिया से पाप का नाम मिट जायेगा, पर मेरा सोचना गलत था।  वहाँ से आगे बढ़ा तो सोचा था कि आगे भी ऐसे ही धर्मात्मा मिलेंगे पर आगे मिलने वाले लोग इनसे बहुत अलग थे।  वो जुआरी और शराबी थे।  उनकी बुरी सूरतें देख कर ही ऐसा लग रहा था जैसे भगवान ने सारे बुरे काम करने का ठेका इनको ही दे रखा है, या हो सकता है यह पिछले जनम के राक्षस हैं।  रास्ते में खड़े होकर वो शराबी एक दुसरे को गालीयाँ दे रहे थे।  शर्मिन्दगी उनके अन्दर नाम मात्र के लियें भी नहीं थी।  मैं थोड़ा और आगे चला तो मुझे एक जगह जागरण होता दिखाई दिया, मैंने सोचा क्यों ना थोड़ा पुन्य कमा लिया जाये और मैं भी जागरण में शामिल हो लिया।  जागरण का हाल भी कुछ अजीब था जागरण में लोग भगवान और उनके गीतों पर तो कम,  और एक दूसरे के चेहरे पर ज्यादा ध्यान दे रहे थे।  लड़के लकड़ियां एक दूसरे से नैन मटक्का कर रहे थे।  थोड़ी देर बाद मैं वहाँ से उठकर चल दिया।  रास्ते में मुझे एक छोटा बच्चा दिखाई दिया जो कि नाली में गिरा पड़ा था और जगह जगह से कीचड़ मे सना हुआ था, साथ ही वो जोर जोर से रो रहा था।  मुझे उस पर तरस आया और मैंने उसे निकालने की कोशिश की, परन्तु वो मेरी पकड़ मे नहीं आ रहा था, मैंने उसे कीचड़ से निकालने की जी तोड़ कोशिश की लेकिन मैं नाकाम रहा।  तभी मैंने उन चारों महापुरुषों को वहाँ से गुजरता देखा तो मन को थोड़ी शान्ती मिली और सोचा कि भगवान ने जरुर इन महापुरुषों को बच्चे को बचाने के लिये भेजा है।  लेकिन ऐसा नहीं था उन चारों की निगाह उस कीचड़ मे सने बच्चे पर पड़ी पर किसी ने भी उस बच्चे को रहम नहीं दिखाया।  रहम तो छोड़ो उस बच्चे पर लगी कीचड़ से लोग ऐसे मुंह सिकोड़ के चले गयें जैसे बच्चे को देखने मात्र से ही उन्हें कोई श्राप लग जायेगा।  चारों में से किसी ने भी बच्चे को बाहर नही निकाला।  और तो और वो अपना भद्दा बखान उस बच्चे पर उढेल कर चले गये।  एक ने कहा यह इसके पिछले कर्मों का फल है, दूसरे ने कहा अगर इसने कभी कोई अच्छा काम किया होगा तो भगवान इसे खुद आकर बचा लेगा।  तीसरे ने कहा इसके माँ बाप को तो सूली पर चढ़ा देना चाहिये तो चौथे ने कहा हमें किसी के फड्डे में टाँग नहीं अढ़नी चाहिये यह कहते हुए वो चारो वहाँ से निकल गये।  मैंने पुनः उस बच्चे को निकालने की कोशिश की क्योंकि बच्चा बहुत बिलख रहा था, और मुझसे उसका दर्द देखा नहीं जा रहा था, लेकिन मैं पिछली बार कि तरह इस बार भी नाकाम रहा।  इस समय मैं अपनी प्यास के बारे मैं भूल चुका था, क्योंकि बच्चे का दुख मेरे दुख से ज्यादा था।  मैंने फिर भगवान से फरियाद की,  है भगवान ये कहाँ आ गया मै, जहाँ तुम्हारे नाम का जाप करने वाले तो लाखों हैं पर तुम्हारे बताये हुए रास्तो पर तुम्हारे आदर्शो पर चलने वाला कोई भी नहीं।  मन्दिर की मुर्तियों की सफाई करने वाले अपने मन के अन्दर का मेल साफ क्यों नहीं करते।  मस्जिद में झाड़ू पोंछा लगाने वालो को उस रोते बिलखते बच्चे की चीख और आखिर क्यों सुनाई नहीं दी। उन चारो के बारेें मेरी सोच अब बदल चुकी थी, वो चारो मुझे अब ऐसे प्रतीत हो रहे थे जैसे खूनी भेड़ीयों ने गाय का मुखोटा पहन रखा हो।  तभी मुझे एक शराबी दिखाई दिया जो लड़खड़ाता हुआ, अपनी ही मस्ती में झूमता हुआ आ रहा था।  डगमगाते हुए वो बच्चे के पास पहुँच गया और उसे रोता बिलखता देख वही रुक गया।  कीचड़ में जाकर वो अपनी नशे वाली आवाज मे बोला-- अबे तू यां कैसे पाउचाँ नाने के लिए या ढोने के लिये, चल भार निकल अब मेरे कू नाहणा है ' यह कहकर उस शराबी ने जैसे तैसे बच्चे को बाहर निकाल लिया।  इतना सब देखकर मुझे अपनी सोच बदलनी पड़ी,  जो जैसे होता है वो वैसा दिखता नहीं, और जो जैसे दिखता है वो वैसा होता नहीं।  यह सब सोचता हुआ मैं चौथी मंजिल पर जाने के लिये रास्ता ढूंढने लगा।  लेकिन अबकी बार मुझे सीड़ियों की जगह एल लिफ्ट दिखाई दी।  मैं लिफ्ट के पास पहुँचा तो लिफ्ट अपने आप खुल गयी, और मैं उसके अन्दर चला गया तभी लिफ्ट बाहर से बन्द हो गयी।  लिफ्ट बन्द होते ही मैंने पास मे निगाह डाली तो देखा कि पास में एक आदमी खड़‍ा हुआ है जो कि शाही पोशाक पहने हुए था और उसके हाथ में एक बड़ा सा भाला था।  उसकी बड़ी बड़ी मूंछे थी और सिर पर शाही शाफा था।  वो मेरे ठीक सामने खड़ा हुआ था।  उसको देख मैं थोड़ा सहम गया।  मैं उसकी तरफ बार बार देखता और निगाह नीचे कर लेता।  मुझे बार बार निगाह चुराते देख उसने कहा, क्या देख रहे हो मेरा लिबास,  क्या तुम मुझसे डर रहे हो। 

मैंने गर्दन हिलाकर जवाब दिया नहीं। 

क्योंकि मुझे ज्यादा बात करने की आदत नहीं है पर सामने वाला व्यक्ति मुझे कुछ ज्यादा ही बातूनी लग रहा था। 

वो फिर मुझसे बोला कहाँ से आये हो ?

मैंने कहा नीचे से। 

वो बोला यहाँ सब नीचे से ही आते हैं।  यह बताओ स्वर्ग लोक से आये हो या नर्क लोक से। 

मैंने कहा प्रथ्वी लोक से आया हूँ। 

वो बोला - इसका मतलब तुम्हें अभी सजा नहीं मिली है। 

वो मुझसे ऐसे ही सवाल पे सवाल किए जा रहा था। 

उसने मुझसे पूछा तुम यहाँ पहुँचे कैसे ?

तब मैंने उसको सारी आप बीति सुनाई। 

उसने कहा कि अभी तुम्हारे पास एक मौका और है। 

मैंने पूछा कैसा मौका ?

इतने में चौथी मंजिल आ गई। 

उसने कहा - मैं तुम्हें अब कुछ नहीं बता सकता, बस इतना समझ लो कि हिम्मत के साथ साथ तुम्हें अब मेहनत भी करनी होगी। 

जैसे ही मैं लिफ्ट से नीचे उतरा लिफ्ट वापिस नीचे चली गयी।  मैंने पीछे मुड़कर देखा तो वहाँ चारों तरफ रेत ही रेत था।  यह देखकर मेरी हिम्मत टूटने लगी, लेकिन तभी मुझे लिफ्ट वाले आदमी की बात याद आयी, पर मेरी समझ में नहीं आ रहा था कि मैं किस ओर चलूँ और कहाँ तक चलूँ ? फिर मैंने सोचा अगर आँखे खोलकर चला तो मेरे मन में लम्बे रास्ते का भय बना रहेगा, क्यों ना आँखें बन्द करके चला जाए। आँखे बन्द करके मैंने चलना शुरु किया।  लगभग 100 मीटर चलने के बाद मैं ठोकर खाकर गिर पड़ा।  आँख खोलकर देखा तो मुझे खुशी और डर दोनों एक साथ महसूस हुए।  खुशी इस बात की, कि मुझे वहाँ कुछ लोग दिखाई दिये।  और डर इस बात का, कि कितने भयानक और कितने अजीब और डरावने चेहरे वाले लोग दिखाई दिये उन सभी लोगों में कोई भी आदमी पूर्ण नहीं था।  किसी की आँख नहीं थी तो किसी का हाथ नहीं था, किसी की टाँग नहीं तो किसी का कान नहीं, किसी का मुँह टेढ़ा तो किसी की नाक टेढ़ी, कोई दो फुट का तो कोई नौ फुट का, किसी के दाँत नहीं तो किसी के बाल नहीं, कोई अपने कटे सिर को हाथ में लेकर चल रहा है तो कोई 180 डिगरी का कोण बनाकर चल रहा है। 

मुझे देखकर एक टाँग वाला आदमी बोला - यह तो बिल्कुल सही इंसान है।  इसे मारकर यहाँ से भगाओ

यह सुनकर बिना टाँग वाला बोला - खबरदार जो इसे किसी ने कुछ कहा यह तो कोई सज्जन मालूम पड़ता है। 

तभी एक आँख वाला बोला - इसकी दोनों आँखें सलामत है यह यहाँ नही रह सकता। 

तो बिन आँखों वाला बोला - तेरी भी तो एक आँख सलामत है  जबकि मेरी एक भी नहीं तो फिर तू भी यहाँ रहने के काबिल नहीं है। 

तभी गंजा बोला यह हमारी शोभा बिगाड़ रहा है। 

यह सुनकर लम्बा बोला - तू भी तो हमारी शोभा बिगाड़ रहा है।  सिर पे एक बाल भी नहीं गंजे। 

फिर पोपला बोला इसके सारे दाँत सलामत हैं यह हमसे जल्दी और ज्यादा खाना खायेगा

तो टिंगु महाराज बोले- ले पोपले तू मेरे हिस्से का खाना भी खा लेना। 

धीर धीरे उन लोगों की बातों ने हिंसा का रूप धारण कर लिया।  यह देखकर मुझे अपने आप में शर्म महसूस होने लगी कि मेरी वजह से यह लोग आपस में झगड़ा कर रहे हैं।  मैंने वहाँ पड़ा एक गढांसा उठा लिया और झगडे़ को अपनी तरह से रोकने की कोशिश की, मैंने कहा कि तुम लोगों को इस बात का दुख क्यों है कि मैं तुमसे अलग हूँ।  मेरे हाथ पाव आँख नाक सब सलामत है।  तो ठीक है मैं अपने शरीर को विकार कर लेता हूँ, पर मेरा कुरूप देखकर तुम लोगों को क्या मिलेगा।  तुम लोग समझते हो कि मैं तुम्हारी शोभा बिगाड़ रहा हूँ तो बताओ मैं अपने शरीर का कौन सा हिस्सा काटूँ पर जरा सोचो कि जिस भगवान ने तुम्हें बनाया है उसी ने मुझे भी बनाया है, और हम लोग आखिर क्यों भगवान की बनाई हुई चीजों से इतनी नफरत करने लगते है।  मेरी बात को नजरअन्दाज करते हुए वो सभी मुझको अपने जैसा बनने पर जोर डालने लगे।  कोई कहता है अपना हाथ काटो तो कोई कहता है अपनी टाँग काटो, किसी ने आँक बताई तो किसी ने नाक बताई।  इस बात पर भी वो लोग आपस में झगड़ने लगे।  इस झगड़े को खत्म करने के लिये मैंने उन्हें फिर समझाने की कोशिश की।  मैंने उनसे कहा कि यही वजह है जो तुम लोग आधी अधुरी जिन्दगी जी रहे हो तुम लोग अपने को क्षीण और दूसरों से घृणा करना छोड़ दोगे तो तुम्हें तुम्हारा यही शरीर दूसरों से अच्छा लगेगा।  भगवान ने जितना दिया है उसी में खुश रहना सीखो।  इस दुनिया में ऐसे करोड़ों लोग है जो शारीरिक रूप से विकार होने पर भी करोड़ों लोगों के दिलों पर राज करते है।  क्योंकि वो मानसिक रुप से विकार नहीं है, वो अपने दिमाग का सही इस्तेमाल करके लोगों की भलाई के काम करते हैं, तुम्हारी तरह यूँ हर किसी से घृणा नहीं करते।  हर इन्सान को धन दौलत और वैभव से पहले मन की शान्ती आवश्यक है।  बिना मन की शान्ती के यह सारी चीजे इंसान के लिये बेकार है।  इंसान के पास जितना है उतने को ही सबसे ज्यादा मानकर अपने को शान्त और खुश रखना चाहिये।  हम आगे और कितना बेहतर कर सकते हैं इसी सोच के साथ हमें जीवन जीना चाहिये।  तुम लोगों के यह नहीं सोचना है कि तुम लम्बे पतले छोटे हो तुम्हें यह सोचना चाहिये कि तुम्हारे पास जिन्दगी है । यह मत सोचो कि तुम काले गट्टे मोटे हो बल्कि यह सोचो कि तुम्हे इस दुनिया में इंसान का जन्म मिला।  यह मत सोचो कि तुम किसी नीची जात या ऊँची जात से सम्बन्ध रखते हो बल्कि यह याद रखो कि तुम एक इंसान हो और हर इंसान का यह फर्ज बनता है कि वो दूसरों के काम आये।  और अब तुम अपने बारे में जरा सोचकर देखो, क्या तुमने कभी किसी की कोई मदद की है तब जाकर उनकी समझ में कुछ बात आयी, और वो मुझसे पूछने लगे कि हमें अच्छा इंसान बनने के लिये क्या करना चाहिये।  उनको समझाते हुए मैंने कहा - कड़ी महनत भगवान पर भरोसा और खुद पर विश्वास, इसके अलावा अगर तुम लोग मेरी यहाँ से निकलने मे मदद करोगे तो यह तुम्हारी अच्छाई की राह पर पहला कदम होगा।  तब उन्होने मुझे बताया कि यहाँ तक आना ही बहुत मुश्किल था, पर यहाँ से आगे जाना नामुमकिन है क्योंकि कई बाधाएं हमारी राह में है।  सैकड़ो पेड़ हमें रास्तों से हटाने होंगे।  नदियों और दलदल के लिये कोई नाव या मांझी नहीं है।  कदम कदम पर काँटे हैं जैसे वहाँ पानी नहीं काँटे बरसते हों

मैंने कहा कि इसी का नाम जिन्दगी है । इसी नामुमकिन वाले चक्रव्यूह को तोड़ने के लिये हमारे पास हिम्मत नाम का ऐसा हथियार है जो हर चक्रव्यूह को तोड़ सकता है।  सच्चाई नाम की ऐसी शक्ति है जो हमेशा हमारी ढाल बनती है।  विश्वास नाम का ऐसा मन्त्र है जो हर अच्छे काम में हमारा साथ देता है । इसी बात को ध्यान में रखकर हमे आगे चलना चाहियें।  आगे चलकर हमने वही सबकुछ पाया, जैसा उन लोगों ने बताया था।  पर मन में चैतना थी आगे बढ़ने की और मंजिल प्राप्त करने की और ऐसा ही हुआ भी।  मुझे ऊपर जाने का रास्ता मिल गया।  पर यह अब तक का सबसे खतरनाक रास्ता था।  जो कुछ राज खोल रहा था।  ऊपर जाने के लियें ईंट मिट्टी की सीड़ियां नहीं थी, बल्कि एक भयानक दृश्य मेरी नजरों के सामने था जिसे सुनकर शायद कोई यकीन नहीं करता, क्योंकि उस दृश्य को बिना देखे शायद मैं भी इस पर विश्वास ना करता पर यह सच था।  मैंने देखा ऊपर जाने के लियें लच्छेदार सीड़िया थीं जो किसी की रस्सी नहीं बल्कि जहरिली नागिनों से जुड़कर बनी थी उसके आजु बाजु शीशे के दो दो कमरे बने थे, जिनके पिछे लड़कियों की लम्बी कतारें थीं, और हर कमरे में लड़कियों को अलग अलग हालातो से जूझना पड़ रहा था।  जैसे कि पहले कमरे में वर्फ गिर रही थी पर उस कमरे मे जो लड़कियाँ थी वो ऐसे कपड़े पहने थीं जिनमें कि गर्मीयों के महिनेें भी ठन्ड लग जाए तो सोचो वर्फ गिरने पर उनका क्या हाल हो रहा होगा।  लड़कियाँ ठन्ड से ऐसे कंपकंपा रही थी जैसे थाली में पानी थरथराता है।  दूसरे कमरे में वो लड़कियाँ थी जिनके कदमों के नीचे केवल उतनी ही जमीन थी जितने पर उनके कदम आ सकें और वो लड़कियाँ एक ही अवस्था में खाड़ी थीं साथ ही वो बहुत थकी हुई लग रही थीं।  तीसरे कमरे की लड़कियों की दशा इससे भी ज्यादा खराब थी।  कमरे के आजु बाजु मल के कीडे़ चल रहे थे।  उस कमरे को देख कर ऐसा लग रहा था जैसे सारे संसार की गन्दगी उसी कमरे में समा गई हो।  मल के कीडे़ लड़कियों के ऊपर गिर रही थी।  लड़कियाँ जितना ज्यादा उस से घ्रणा करती उतनी ज्यादा गन्दगी उनके ऊपर गिरती।  चौथे कमरे में जो लड़कियाँ थी वो बहुत बैचेन थी।  कभी वो अपना सिर खुजाती कभी नाक कभी कान कभी हाथ कभी पाँव तो कभी कमर।  ऐसा लग रहा है जैसे उनके पूरे बदन पर खुजली है।  हर पल उन पर बेचैनी सवार हो रही थी।  उन चारों कमरों पर बहुत ही बारीकी से कुछ लिखा था। जिसे पढ़ने के लिये मुझे कमरे के पास जाना पड़ा।  वर्फ वाले कमरे पर लिखा था यह वो लड़कियाँ हैं जो फैशन के रंग ढंग के कारण उतने कपडे़ भी नहीं पहनती जितने सात साल की छोटी बच्ची पहनती है।  कम जमीन वाले कमरे पर लिखा था, यह वो लड़कियाँ हैं जो इश्कबाजी के चक्कर मे पड़कर अपने आशिकों के साथ घर से भाग जाती थीं।  गन्दगी वाले कमरे पर लिखा था यह वो लड़कियाँ है जो सफाई पर बिल्कुल ध्यान नही् देती थी।  अपने बच्चो को गन्दा रखती थीं और पास पड़ौश मे भी गन्दगी फैलाती थी।  खुजली वाले कमरे पर लिखा था यह वो लड़कियाँ है जो दूसरों को चैन से नहीं रहने देती थी।  हमेशा दूसरों को परेशान करती थीं।  बात बात पर झूठ बोलती थीं।  इस तरह मुझे उन कमरों के सारे राज पता चले।  पर उपर जाने का रास्ता मुझे अभी भी पता नहीं चला।  मैंने चारो और निगाह दौड़ा ली पर मुझे कहीं कोई रास्ता दिखाई नहीं दिया।  मैंने सोचा यही मेरी आखिरी मंजिल है, यहीं मेरे कर्मो का फल मुझे मिलेगा, और जब मुझे सजा मिलनी ही है तो क्यों ना थोड़े हसीन ख्वाब देख लिये जाएं इसलिये पीछे हटकर मैं कम कपड़ों वाली लड़कियों के कमरे को देखने लगा पर वो कहतें हैं ना कि मन में अच्छाई और सच्चाई हो तो भगवान हर बुरे काम से बचा लेता है।  जैसे ही मैनें पिछे हटकर उन लड़कियों की तरफ देखा तो पाया कि वो शीशे के कमरे ही असल में सीढ़ियाँ थी।  जो कि बहुत ही बारिकी से देखने पर ही दिखाई दे रहे थे।  और इस तरह काफी नजरे गढ़ा के देखने के बाद मुझे पाँचवीं मंजिल की सीढ़ियाँ भी मिल चुकी थी।  पाँचवीं मंजिल ही मेरी आखिरी मंजिल थी और इस आखिरी मंजिल तक पहुँचना ही मेरा मकसद था। और मैं चल दिया था अपने मकसद को पूरा करने उस पाँचवीं मंजिल की ओर।  एक एक सीढ़ी पर आगे बढ़ते हुए मेरे दिल की धड़कन तेज होती जा रही थी। मन मैं हजारों तरह के सवाल फिर से हलचल पैदा कर रहे थे, इस पाँचवी मंजिल पर आखिर होगा कौन, और वो क्या कर रहा होगा, या फिर वहाँ भी होंगे नीचे की तरह कुछ अजीब से लोग, जो देंगे मुझे कुछ नई सीख जिन्दगी जीने की, या उठेगा कोई नया पर्दा किसी झूठ या सच से, या फिर खुलेंगे सारे राज इस पाँचवीं मंजिल पर।  इन सारे सवालों की मालाएं मन में जपता हुआ मैं ऊपर पहुँच चुका था। 

अभी तक की चारों मंजिलों पर मैं किसी उड़ते हुए आजाद पंछी की तरह था जो कहीं भी आ रहा था कहीं भी जा रहा था, किसी को सलाह दे रहा था तो किसी से सलाह ले रहा था।  कहीं भी बैठ रहा था कुछ भी देख रहा था।  पर यहाँ पाँचवीं मंजिल पर ऐसा कुछ भी नहीं था।  यहाँ मैंं एक कैदी सा बनके रह गया था।  क्योंकि मुझसे कुछ ही दूरी पर वही भयानक आदमी उस बेहोश बच्चे को लिये खड़ा था जो मेरे यहाँ आने का कारण और साथ ही वो बुढ़िया भी जिसने मुझे एहसास कराया था एक भयानक डर का और साथ ही मेरे सामने थे दो भगवान, अच्छाई का भगवान और बुराई का भगवान।  जो करने बैठे थे मेरे गुनाहों का फैसला मेरी अच्छाई और बुराई का फैसला।  पर मैं तो एक बच्चा था, तो क्या हुआ गलती या गलत काम करने पर सजा तो सभी को मिलनी चाहियें।  मेरे चेहरे पर अब थकावट थी और थोड़ी उदासी थी कि अब क्या फैसला होगा मेरे कर्मों का। 

सबसे पहले अच्छाई का भगवान मुझसे बोला - बालक क्या तुमने हमें पहचाना

मैंने जवाब दिया- हाँ आप हो अच्छाई के देवता, जिसके पास लिखी होती है हर इंसान की हर अच्छाई और अच्छे काम।  साथ ही इंसानों का मन ही आपके रहने का स्थान है।  आप हर इंसान के मन में निवास करते हो। 

उसके बाद बुराई का भगवान बोला - और क्या तुमने, मुझे पहचाना। 

मैंने कहा हाँ - आप हो बुराई के देवता आप इंसान की नियत में निवास करते हो जो मन से बहुत नीचे है, और इसी कारण नीच लोग आपकी ज्यादा सुनते है।  साथ ही नीच लोग अच्छे से और बहुत जल्दी समझते हैं।  =इसलिये वो आपके प्रिय होते हैं और वो कभी आपकी छत्र छाया से निकलना नहीं चाहते हैं।  वो सदा के लिये आपके ही होकर रह जाते है। 

उसके बाद मुझसे वो भयानक आदमी बोला - क्या तुमने मुझे पहचाना ?

(मैने अपनी छोटी सी जिन्दगी मैं भी इतने अनुभव और शिक्षाएँ नहीं ली थी जितनी इन पाँच मंजिलों पर आते आते मुझे ज्ञान मिला, अजी ज्ञान क्या ज्ञान का भन्डार मिला।  हर सवाल को समझने का ज्ञान और उस सवाल का उत्तर देने की जो मेरे अन्दर प्रज्वलित हो चुकी थी।  )

मैं उस भयानक आदमी से बोला हाँ, मैं जानता हूँ आपको।  आप हो मेरे मन के किसी छोटे से कोने में छिपे लालच की अनन्त जिज्ञासा।  इसी के कारण ही मैं यहाँ तक पहुँच पाया।  लेकिन मैंने आपको तवज्जो नहीं दी मैं आपके पीछे तो गया पर आपके पास नहीं पहुँच पाया।  आप मेरे मन के द्वार से बहुत आगे निकल गये। 

उसके बाद मुझसे उस बुढ़िया ने पूँछा - क्या तुम मुझे भी पहचानते हो। 

मैंने कहा- हाँ । आप हो मन का भय, इंसान के अन्दर छिपा डर।  आप हमेशा उसी के साथ रहते हो जो बुरे कर्म करते हैं।  चोर,  रिश्वतखोर और बेईमान आपको अतिप्रय हैं

आप हमेशा उनके मन में वास करते हैं।  मैंने कभी कोई बुरा काम नहीं किया इसलिये आप मेरे मन के द्वार से बहुत पीछे रह गये। 

उस भयानक आदमी के हाथ में जो बच्चा था वो अभी भी बेहोश था, जिस कारण उसने मुझसे कुछ नहीं पुछा, और मैंने भी उसके बारे में जानना अभी जरुरी नहीं समझा। 

बुराई के‌ भगवान कुछ सोच रहे थे, और कुछ क्षणों बाद उन्होंने मुझसे पुछा, हाँ तो बालक बिना झूठ बोले सब कुछ सच सच बताओ तुमने क्या-क्या बुरे कर्म किये हैं। 

मैंने उनसे कहा कि अपने बुरे कर्मो के बारे में, मैं आपको क्यो बताऊँ।  वो सब तो मैं बुराई के भगवन को बताऊंगा। 

अच्छाई के भगवान बोले - यहाँ ऐसा नहीं होता, यहाँ उलटा होता है।  यहाँ अच्छाई की बाते बुराई के भगवान सुनते हैं, और बुराई की बाते अच्छाई के भगवान सुनते हैं। 

मैंने पूछा - यहाँ ऐसा क्यों होता है ?

अबकी बार बुराई के भगव‌ा‌न बोले - यहाँ ऐसा इसलिये होता है, क्योंकि यहाँ की  यही रीत है।  और तुम कौन होते हो हमसे सवाल जवाब करने वाले, जितना कहा जाये उतना बताओ। 

मैंने कहा - क्यों बताऊं मैं आप लोगों को कुछ भी, आप भी कौन होते हो मुझसे कुछ पूछने वाले। 

बुराई के भगवान फिर बोले - हम तुम्हारे भगवान हैं इसलिये बताओ हमें सब कुछ। 

मैंने कहा - अगर आप भगवान हो तो आपको तो सब कुछ पता होना चाहिये मुझसे क्यों पूछते हो। 

अबकि बार बुराई के भगवान चुप रहे और अच्छाई के भगवान बोले - हमें तुम्हारे बारे में कुछ भी नहीं पता क्योंकि हम भगवान तो है, पर हम भी यहाँ सजा ही काट रहे हैं।  हम दोनों सगे भाई हैं और हमने अपने माता पिता को बहुत दुख दिये है।  कभी सच बोलकर तो कभी झूठ बोलकर।  हमने हर वो गलत काम किया जिसे हमारे माता पिता करने के लिये मना करते थे।  हमने कभी उनका कहना नहीं माना इसी कारण हम यहाँ सजा भुगत रहें है।  जब तक यहाँ आने वाले लोगों का सच झूठ से ज्यादा नहीं होगा तब तक हमारी सजा बरकरार रहेगी। 

मैंने कहा - पर आप तो भगवान हो आपको सजा क्यों मिली।

तो अच्छाई के भगवान बोले - इस दुनिया में जो भी बुरे कर्म करता है, उसको तो सजा मिलनी ही मिलनी है, अब चाहे वो इंसान हो, शैतान हो, या भगवान जिसने बुरा किया है वो बुरा भुगतेगा।  अब तुम हमें बताओ क्या -क्या बुरे कर्म किये हैं। 

मैंने कहा - अभी तक तो मैंने कोई गलत काम नहीं किया। 

बुराई के भगवान बोले- अगर तुमने कुछ गलत नहीं किया तो तुम यहाँ कैसे पहुँचे।  बिना कुछ बुरा किये यहाँ पहुँचना असम्भव है।  सच सच बताओ।

मैंने याद करना शुरु किया और कुछ देर बाद - हाँ याद आया मैं बताता हूँ आपको - जब मेरे घर में कोई नहीं होता है तो मैं डिब्बे में से चिनी निकालकर खा लेता हूँ या फिर दूध की मलाई खा लेता हूँ इसके अतिरिक्त मैंने कोई गलत काम नही किया। 

मेरी बात सुनकर वहाँ मौजूद सारे लोग जोर जोर से हँसने लगे, और अच्छाई के भगवान बोले - तुम जो करते हो वो इतना बुरा भी नहीं है।  पर मेरी समझ में यह नहीं आ रहा कि तुम यहाँ क्यों आये हो,  और किसने भेजा है तुम्हें यहाँ। 

वहाँ मौजूद चारों लोग यही सोच सोच के परेशान हुए जा रहे थे।  चारों लोग आपस में खुसर पुसर कर रहे थे।  और पाँचवा तो वो बच्चा बेहोश था ही।  पर यह बच्चा अभी भी बेहोश क्यों है।  अब मेरा ध्यान सब जगह से हट गया, और उस बच्चे पर जाकर सट गया।  यह बच्चा कब तक यूँ ही बेहोश रहेगा,  कहीं यह मर तो नहीं गया।  लगता है इसके पास जाकर देखना पड़ेगा।  वो चारों अभी भी मेरे बारे में ही बाते कर रहे थे कि मेरे यहाँ आने का कारण क्या है । मैंने इसका पूरा फायदा उठाया और दबे पाँव उस बच्चे के पास पहुँच गया उसके ऊपर सफेद चादर पड़ी थी।  मैं बहुत ही धीरे से नीचे बैठ गया, और उसके मुंह से चादर हटाने वाला ही था कि उन चारों की निगाह मझ पर पड़ गयी।  यह देखकर मैं घबरा गया, पर मुझसे 10 गुना ज्यादा वो लोग घबरा गये।  और चारों ही लोग मुझे अलग अलग तरीके से धमकियाँ देने लगे। 

बुराई के भगवान ने कहा - यह कर हो मुर्ख अनर्थ हो जायेगा अगर तुने इसका मुँह देखा तो प्रलय आ जायेगी सब कुछ नष्ट हो जायेगा कहना मान हट जा वहाँ से बरना बहुत बुरा होगा। 

बुराई का भगवान तो मुझे पहले ही पसन्द नहीं था, ऊपर से उसकी धमकियाँ सुनकर मुझे उससे और नफरत हो गयी, तो मैंने उसकी सारी बाते नजरअन्दाज करना ही बेहतर समझ। 

अच्छाई के भगवान ने कहा - ऐसा मत करो बालक, उसका चेहरा देखकर तुम्हे कुछ हासिल नहीं होगा अपितु हमारे सामने अनको परेशानियाँ खड़ी हो जायेंगी।  अभी हम सारे लोग तुम्हारी भलाई के बारे में ही बाते कर रहे थे।  हो सकता है उसका चेहरा देखकर तुम्हारे साथ कुछ बुरा घटित हो जाये। 

मुझे उनकी बाते अच्छी भी लगी और बुरी भी लगी जिस कारण मैं उनकी बाते सनकर कनफ्युज हो गया। 

उधर वो डरावनी बुढ़िया और और वो भयंकर आदमी भी चिल्ला चिल्लाकर कह रहे थे, बेटा ऐसा मत करो तुमने ऐसा किया तो हम सब खत्म हो जायेंगे, कोई भी जिन्दा नहीं बचेगा। 

पर ना जाने मुझे क्या हो गया था जो कि चाहकर भी मैं उनकी बात नहीं मान पा रहा था।  मेरा हाथ निरन्तर उस कपड़े को हटाने के लिये आगे बढ़ रहा था जो कि उस बेहोश लड़के के ऊपर पड़ा था। 

बुराई का देवता अबकि बार और जोर से चिल्लाकर बोला - भैया रोको इसे वरना प्रलय आ जायेगी और इस बालक को बहा ले जायेगी ।

इतना सुनते ही मेरे हाथ में बिजली जैसा झटका लगा और मेरे हाथ से वो कपडा़ हट गया।  कपड़ा हटते ही जो मैंने देखा वो व्यतीत करने मात्र से ही मेरी रुह काँप जाती है।  उस सफेद कपड़े के नीचे था एक मेरी ही उम्र का मेरे जैसा लड़का, पर उसकी आँखें खून से लाल थीं।  उसका चेहरा जगह जगह से फटा हुआ था।  चेहरा मानो ऐसा जैसे उसको मिट्टी से नहीं कोयले से बनाया हो।  उसके दाँत से इतनी बदबु आ रही थी जैसे वो रोज सड़े हुए चूहे खाता हो।  उसके कानों से खून टपक रहा था।  मुझे देखते ही उसने मुझ पर झपट्टा मारा और दोनों हाथों से मेरी गर्दन पकड़ ली, वो बहुत ताकतवर था जिस कारण मैं उससे अपनी गर्दन छुटा नहीं पा रहा था।  मुझे तड़पता देख वो चारों लोग भी मेरे पास आ गये, और मुझे छुटाने की कोशिश करने लगे पर उसने उन चारों को भी एक धक्का मारा, और वो पीछे गिर गये।  अपनी गर्दन छुड़ाने की मुझे कोई युक्ति नहीं सूझ रही थी।  मेरा दम घुट रहा था।  उन चारों ने भी मुझे फिर से छुड़ाने कि कोशिश की पर इस बार भी वो नाकाम रहे।  अब मेरी जान निकलने को तैयार थी पर उससे पहले ही मैं बेहोश सा हो गया।  मुझे बेहोश होता देख वो मेरे पास से हट गया और वो जोर जोर से हँसने लगा।  उधर उन चारों में से तीन लोग उस लड़के के डर के कारण पीछे खड़े थे पर वो बूढ़ी औरत मेरे पास आकर मेरे सीने पर जोर जोर से हाथ मारने लगी, और साथ ही कह रही थी उठ बेटा उठ जल्दी उठ, वो लड़का अभी भी जोर जोर से हँस रहा था।  बुढ़िया की आवाज धीरे धीरे मेरे कानों मे पहुँच रही थी और मुझे होश आ रहा था।  होश आने पर जो देखा उम्मीद से परे था, मैंने देखा कि मेरा छोटा भाई जोर जोर से हँस रहा है और माँ मुझे हौले हौले थप्पड़ मारकर उठा रही है । आँख खुलने पर मेरे चेहरे पर ऐसी मुस्कान थी जैसे मुझे पहली बार कोई खुशी मिली हो और मेरे अपने मुझसे सदियों बाद बिछड़ के मिले हों इस एक रात के डरावने सपने ने मेरे दिल को दहला कर रख दिया।  मुझसे शायद जीवन भर भी इतने अनुभव ना मिलते जितने इस एक रात के सपने ने मुझे सिखलाया।  यह मेरा एक सपना था जो मेरे जीवन की कहानी मे हमेशा के लिये जुड़ चुका है। 

               


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