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AMIT SAGAR

Abstract


4.7  

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स्मार्ट सिटी

स्मार्ट सिटी

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मेरा दोस्त नौबहार सिंह जो कि एक ठैठ गाँव में रहता है, और वो गाँव मुरादाबाद से सटा हुआ ही है। उसको शहर से बहुत लगाव है, पर खुद की खेतीबाड़ी होने के कारण वो गाँव से कम ही निकलता है। हम लोग दसवी तक साथ ही पढ़े थे, जब वो पढ़ता था  तो रोज ही शहर आता था, पर पढा़ई छोड़ने के बाद वो गाँव का ही होकर रह गया। शहर में होने वाली गतिविधियों और नई - नई चीजो के बारे में जब वो सुनता था, तो उसको एक अलग ही खूशी मिलती थी। पिज्जा, बर्गर, नुडल्स, और भी कई तरह के फास्टफूड के नाम सुनकर उसको एक विशेष आनन्द प्राप्त होता था। इसके साथ ही कई इलेक्ट्रोनिक चीजो के नाम सुनकर तो उसे ऐंसा लगता था, जैंसे उसने कोई विशेष उपलब्धी हासिल कर ली हो। स्मार्ट फोन, स्मार्ट टीवी, स्मार्ट घड़ी, स्मार्ट कैमेरा और इन सबसे ऊपर स्मार्ट सीटी। बाकी सारी चीजों के फोटो बगैराह तो नौबहार कैंसे ना कैंसे देख ही लिया करता था, पर पूरा का पूरा स्मार्ट सीटी देखने के लियें उसने शहर आने का मन बनाया। मेरे अलावा वो शहर में किसी ओर को जानता ही ना था, इसलियें उसने मुझे ही फॉन कर‌ना बेहतर समझा। उसने मुझसे फॉ‌न करके कहा - अरे यार तुम्हारा मुरादाबाद तो अब स्मार्ट सीटी बन गया है , क्या मुझे अपने नये स्मार्ट सीटी घुमाओगे नही। 

मैंने कहा - घुमाने जैंसा तो यहाँ कुछ नया नहीं बना है, जैंसे पहले था वैसा ही अब भी है। 

वो बोला - क्या यार बहाना करते हो ताकि मैं घर ना आ जाऊँ 

‌। 

मैंने कहा ‍ - ऐंसा नहीं है, तुम्हारा ही घर है जब मन करे आ जाओ, बताओ कब आ रहे हो । 

उसने कहा - कल 

मैंने कहा - ठीक है। 

अगले दिन मैं बाईक से उसे लेने उसके गाँव चला गया। जहाँ तक गाँव की सीमा थी वहाँ तक तो हम आराम से चलते रहे, क्योकि ना तो गाँव में ट्राफिक था, और ना ही प्रदुषण। पर जैंसे ही हम हमारे स्मार्ट सीटी में घुँसे ट्राफिक जाम लगना शुरू हो गया। और प्रदूषण तो इतना जैंसे अभी जान ले लेगा। 

नौबहार मुझसे बोला - यार पहले तो ऐंसा जाम नहीं लगता था। और हवा भी थोड़ी शुद्ध थी। 

मैंने कहा- पहले यह स्मार्ट सीटी भी तो नहीं था, एक खुशहाल शहर था, जहाँ चारो तरफ शान्ती रहती थी। पर अब तो यहाँ रस्ते कम‌ हैं और राहगीर ज्यादा है, ग्राहक कम ‌दुकाने ज्यादा हैं, आदमी कम सवारी ज्यादा है, और इसी बड़ती आबादी और भीड़भाड़ को कुछ विद्वान लोग स्मार्ट सीटी कहते है। 

नौबहार बोला - अरे यार तू फिर से बहाने करने लगा। सबकुछ अच्छा तो लग रहा है। इतनी भीड़ इतने लोग गाँव में कहाँ यह सब देखने को मिलते हैं। 

मैंने कहा - ठीक है भाई गुस्सा मत हो हम अभी रुके नही है, चल ही रहे हैं। 

उन जाम भरे रस्तो से बचता बचाता मैं उसे अपने घर की और ले गया, जहाँ रास्ते में कहीं छोटे छोटे बच्चे भीख माँग रहे थे, तो कहीं बच्चे आड़ मे खड़े होकर सिगरेट पी रहे थे। कहीं कूड़े के ढैर के आपार चट्टे लगे हुए थे, तो कहीं कीँचड़ भरे गड्डे खुदे हुए थे। वो सबकुछ बहुत गौर से देख रहा था।वो बोला - यार स्मार्ट सीटी तो दिखा। 

मैनें कहा - यह स्मार्ट सीटी ही तो है। 

वो बोला अरे यार अखबारो में तो बहुत नाम सुनते हैं कि मुरादाबाद भी अब स्मार्ट सीटी बन गया है और बहुत तरक्की कर रहा है । 

मैंने कहा - कहा तरक्की तो कर रहा है पर सिर्फ अखबारो और होर्डिंग बॉर्डो पर। 

वो बोला यहाँ फिर नया क्या बना है जो रोज अखबारो मे मुरादाबाद का नाम पहले पैज पर आता है। 

मैं बोला नये तो यहाँ बस कुछ मन्त्री बने है, या फिर कुछ नये बिल्डर आये हैं जो ऊँची ऊँची बिल्डिंगे बना रहे है और उन्ही ऊँची - ऊँची बिल्डिंगो के माध्यम से  उन्होनें कागजो में हमारे मुरादाबाद को स्मार्ट सीटी बना दिया है। बाकी सब तो यहाँ बद से बद्त्तर ही हो रहा है। 


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