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AMIT SAGAR

Thriller


4.5  

AMIT SAGAR

Thriller


खून और खूनी ( आधा भाग )

खून और खूनी ( आधा भाग )

18 mins 259 18 mins 259

मौजुदा समय में हर ईन्सान जल्दी पैसा कमाकर अमीर बनना चाहता है खासकर युवा पीढ़ि, मेहनत करने के अलावा अलग अलग तरिकों से लोग पैसा कमाना चाहतें हैं। जिसमें कि कुछ लोग किसी का खून बहाकर पैसा कमाते हैं तो कुछ अ‍पना खून बैचकर पैसा कमाते है, कुछ जुआ खेलकर तो कुछ दारू बैचकर, कुछ किडनी की तस्करी करते हैं तो कुछ अपहरण करने लगते हैं। अब बात आती है इनके चरित्र की, वैसे तो इनकी श्रेणी बुरे लोगो में आती है, पर क्या यह लोग बाकई छठे हुए बदमाश होते हैं, या इनमें कुछ शरीफ लोग भी होते हैं , मतलब जो हलात के कारण बुरे बन जाते हैं, पर ऐंसे भी क्या हलात जो ईन्सान अपने ज़मीर को ही बोना कर दे, लेकिन अगर बात बड़ी रकम की हो तो ईन्सान अपने ज़मीर को भी ताक में रख देता है। मगर अपने ज़मीर को मारना अलग बात है और किसी का खून करना अलग बात है, और साथ ही एक शारीफ और ईमान्दार आदमी के लियें तो खून करन बड़ी बात है और तीन-तीन खून करना तो बहुत बड़ी बात है। पर खून तो हुऐ हैं, पर मौकाऐ वारदात पर पकड़े जाने के बाद भी एक शरीफ आदमी अपने को बैगुनाह बताता है। अब सवाल यह उठता है कि क्या बाकई उस आदमी ने खून नहीं किये हैं, या फिर वो अपने को बचाने के लियें पुलिस को उलझन मे डाल रहा है, और झूठ बोल रहा है , या फिर माजरा है कुछ और तो चलिऐ देखते हैं आप इस उलझी हुई कहानी में खुद उलझ जातें हैं , या फिर अन्त आने से पहले आप इस कहानी को सुलझा लेते हो।

तो कहानी कुछ यूँ है कि एक ईमानदार और सज्जन आदमी का नाम रतन है, जो एक बहुत बड़े सैठ के यहाँ पर नौकरी करता है। सीमित इच्छायें और सीमित सैलरी पर अपना जीवन यापन करने वाला रतन हमेशा अपनी फैमिली ( भाई, बहन, और माँ-बाप ) को खुश रखने की कौशिस करता है। पर कम सैलरी पाने वाला व्यक्ति अपनी फैमिली को पिज्जा बर्गर नहीं खिला पाता, वो कभी वाटर पार्क नहीं जाता वो कभी पिक्चर नहीं जाता, उसके छोटे भाई बहन इंगलिश मिडियम स्कूल में नहीं पढ़ते, पूरा जीवन काम करने पर भी कभी वो एरोप्लेन नहीं बैठ पाता, पर इन सब चीजो के वो ख्वाब तो देखता ही है, और इन्ही ख्वाबो को पूरा करने के लियें वो ना जाने कौन कौन से नये नये ख्वाब देखने लगता है। कभी तो वो ईश्वर की शरण में फरियाद करता है कि है भगवान मुझे रुपयों से भरा बैग कहीं पड़ा मिल जाये‌, तो कभी वो सोचता है कि अलादिन का चिराग मुझे मिल जाये जिससे मैं‌ अपनी और अपने परिवार की हर इच्छा पूरी कर सकुँ। इन सबसे अलग कभी वो प्लानिंग करता है किसी के अपहरण की तो कभी किसी को लूटने की तो कभी जुए में पैसे जीतने की पर यह सब कल्पनाऐ हैं जो उसके मन में सिमट कर रह जाती हैं। पर इसी के साथ एक सत्य और है वो यह कि हर ईन्सान के जीवन में एक वक्त ऐंसा जरुर आता है जब लक्ष्मी माँ उसका दरवाजा खटकटाती हैं और दिखाती हैं रास्ता उसको पैसा कमाने का, पर वो रास्ता अच्छा भी हो सकता है और बुरा भी हो सकता है , और बाकी सब तो ईन्सान की कबिलियत है कि वो कैंसे अच्छे को बुरा और बुरे को अच्छा बनाता है।

रतन घर पर सुबाह का अखबार पढ़ रहा था। तभी उसकी निगाह जिस खबर पर पड़ी उसको देख कर वो चौंक गया, खबर थी " कल सुनशान रास्ते पर दो भाइयों से हथियार बन्द बदमाशो ने की लूटपात, लेकिन वक्त पर पुलिस के पहुँचने से उनके इरादे हुए नाकाम मौके पर पहुँची पुलिस ने तुरन्त बदमाशो पर की फयरिंग जिसमें तीन बदमाशो की गोली लगने से मौके पर ही मौत हो गयी। जिन दो भाईयों को लूटने की कौशिश की गयी थी उनमें से बड़े भाई को गम्भीर चोट आयी है जिसका नाम है रोहित और छोटे भाई नवदीप को भी मामुली चोटें आयी है " रतन यह खबर पढ़कर इसलियें चौंक गया क्योकि जहाँ रतन नौकरी करता है यह दोनो उस कम्पनी के मालिक के बेटे हैं।

रतन के मालिक का नाम शम्भू नाथ है, जिनके दो बेटे हैं, बडे़ बेटे का नाम है रोहित और छोेटे बेटे का नाम है नवदीप। शम्भूनाथ जी का व्यवहार नपा- तुला है,सभी लोग उनके बारे में बस इतना ही जानते हैं कि वो एक फैक्टरी के मालिक हैं शम्भूनाथ जी का कारोबार तो बहुत बड़ा है पर जितना बड़ा कारोबार है उतना ही अधिक कम्पनी पर कर्जा है। कर्जे के कारण दोनों भाइयो में हमेशा अनबन रहती है और बेटो की‍‍ अनबन के कारण बाप को भी हमेशा टेंशन रहती है। कम्पनी के सभी लोग यह बात जानते है मय रतन के,  पर रतन मालिको के लफड़े झगड़े से कोई सरोकार नहीं रखता है ।

शम्भूनाथ जी एक बड़े आदमी है, जिस कारण उनके यहाँ मिलने वालो का ताँता लगा रहता है।

कम्पनी में एक नैन्सी नाम की लड़की का आना जाना हमैशा लगा रहता है जो कि काफी मोडर्न है, और तीनो मालिको के साथ उसकी अनबन रहती है। वो जब भी कम्पनी में आती है हमैशा हाय- हल्ला करके ही जाती है, वो चिल्ला - चिल्ला कर बात करती और तीनो मालिको के मुँह से सिर्फ इतना ही निकलता है - नैन्सी तमाशा मत करो। पर तीनो मालिको में से किसी की इतनी हिम्मत नहीं जो उसको कम्पनी में आने से रोक सकें । पर एक बात समझ से परे है कि वो लड़की आखिर आती क्यों है, और मालिक उससे इतना डरते क्यों है, हाँ इतना तय है कि वो कुछ खाश ही है, तभी तो उसके जाने के बाद एक लम्बा सन्नाटा छा जाता है, और तीनो मालिक पसीने में तर हो जाते हैं।

मित्तल नाम के एक सज्जन भी अक्सर कम्पनी में आते रहते हैं, जो कि शम्भू नाथ जी के दोस्त हैं। शम्भूनाथ जी और मित्तल साहब जब भी मिलते थे खूब ठहाके बाजी होती थी। दोनो एक दुसरे से अपने सुख दुख की कहकर कभी उदास हो लेते तो कभी हँस लेते, पर मित्तल साहब को देखकर जाने क्यूँ ऐंसा लगता था जैंसे वो अन्दर से कुछ ओर हैं, बाहर से कुछ ओर हैं, और साथ ही एेंसा भी लगता है जैंसे वो अपने मन में शम्भूनाथ जी के खिलाफ कोई बहुत बड़ी साजिश रच रहें हों, क्योकि वो अन्दर से तो हँसते हुऐ आते थे, पर बाहर आते ही उनकी हँसी छुमन्तर हो जाती, और चेहरे पर अजीब सी हैवानियत प्रकट हो जाती, ऑफिस को देख वो ऐंसे जल भुन जाते जैंसे पल भर में ही कम्पनी को नष्ट करना चाह रहे हों।

उसके बाद बारी अाती है दरोगा जी की वो भी हर तीसरे दिन कम्पनी में आ टपकते है नाम है मनवीर , अभी पिछले दिनों रोहित और नवदीप पर जो जानलेबा हमला हुआ था उसी सिलसिले में वो यहाँ आते है। उनके हाव भाव से ही पता चलता है कि वो एक नम्बर के रिश्वतखौर हैं। पर एक बात समझ से परे है कि जानलेबा हमला तो रोहित और नवदीप पर हुआ था, फिर यह दरोगा जी हमलाबरो का पता लगाने की बजाये शम्भूनाथ जी के पास बार बार क्यूँ आते रहते हैं। और यही बात शम्भूनाथ जी भी दरोगा जी से कहते हैं कि आप गुन्डो के बजाय हमें परेशान क्यों करते हो। कई बार तो शम्भूनाथ जी और दरोगा जी में इस बात को लेकर गरमागरमी भी हो चुकी है, पर दरोगा जी फिर भी हर तीसरे दिन वहाँ आ धमकते हैं।

इसी के साथ एक 50 से 55 साल का आदमी भी वहाँ अक्सर आता है जिसके एक हाथ और एक पाँव पर लकवा पड़ा है,रिश्ते में यह शम्भूनाथ जी के सगे भाई हैं और यह भी जब जब यहाँ आते कोई ना कोई बखेड़ा खड़ा करके ही जाते हैं । इनका झगड़ा अक्सर जायदात को लेकर ही होता था। अभी तक कुवाँरे हैं और एक होटल में रहते हैं। नाम है विश्वनाथ। कभी कभी तो कम्पनी में इतना शोर शराबा होता था कि शम्भूनाथ जी से ज्यादा उनके स्टाफ को गुस्सा आता था।

कुल मिलाकर शम्भुनाथ जी की जिन्दगी एक खटारा कार की तरह हो गई है, खटारा कार कहने को तो कार ही होती है पर चलती धक्को और झटको से है।

एक बार जून की गर्मी में रतन ऐंसे ही ऑफिस जा रहा था चिलचिलाती धूप से तंग आकर उसने भगवान से फरियाद की कि , है भगवान कब तक यूँही मुझे कष्ट दोगे, इतनी तेज धूप में मुझे आज भी मीलो पैदल चलना पड़ता है  । यूहीं शिकयते और फरियाद करता हुआ वो अपने ऑफिस पहुँच जाता है और अपना काम करने लगता है। कुछ दैर बाद रोहित अपने ऑफिस मे रतन को बुलाता है। ऑफिस में पहुँचने पर -

रोहित,- रतन बैठ जाओ मुझे तुमसे कुछ बहुत जरुरी बात करनी है।

रतन अचम्भित था क्योकि अब से पहले कभी भी रतन के तीनों मालिको में से किसी ने ऐसे बात नहीं की थी।

रतन के बैठने के बाद रोहित ने कहा रतन क्या तुम ज्यादा पैसा कमाना चाहते हो।

फौरन रतन के मन में खयाल आया कि लगता है आज तो भगवान ने मेरी सुन ली है, रोहित सर जरुर मेरी प्रमोशन करने वाले हैं।

उसने झट से हाँ कह दिया। 

फिर रोहित ने कहा क्या पैसो के लिये तुम कुछ भी कर सकते हो।

अबकि बार रतन चुप रहा और मन में सोचा कि आखिर कुछ भी का मतलब क्या है।

रोहित फिर बोला मैं तुम्हें पाँच लाख रुपय दुंगा अगर तुम मेरा काम करोगे।

रतन अब भी चुप रहा। 

रोहित समझ गया कि रतन नर्वस है।

रोहित फिर से बोला कि मैं तुम्हे कल तक का वक्त देता हूँ, और साथ ही यह भी सोच लेना रकम बहुत बड़ी है और काम कुछ भी हो सकता है, कुछ भी मतलब कुछ भी। अब तुम जाओ।

रतन बुत सा बना ऑफिस से बाहर निकल आया और तरह तरह की बाते उसके दिमाग में दौड़ने लगी, कि आखिर रोहित सर मुझसे से क्या काम करवाना चाहते हैं। कहीं वो किसी चीज की स्मगलिंग तो नहीं करते या हो सकता है वो ड्रग्स का धन्दा करते हों  क्योंकि इतना पैसा तो वो यूहीं मुझे देने से रहे। रतन कोई भी गलत काम करके पैसा नहीं कमाना चाहता था, पर पाँच लाख रुपये बहुत बड़ी रकम थी इसलियें उसका ईमान डगमगा रहा था। घर जाकर भी उसके मन में यही बातें चल रही थीं  , रात को वो ठीक से सो भी नहीं पाया। फिर सबकुछ उसने भगवान के ऊपर छोड़ दिया अगर मेरा भगवान मुझसे हाँ कहलवायेगा तो हाँ अगर ना कहलवायेगा तो ना ।

रतन को रोहित की नियत पर शक था इस लियें रतन ने रोहित के पास जाने से पहले एक सीक्रेट विडियो बनाने की प्लानिंग की।

अगले दिन रोहित ने उसे ऑफिस बुलाया और पूछाँ क्या तुम मेरा काम करने के लियें तैयार हो .

रतन ने झट से हाँ कह दिया और पूँछा सर काम क्या है।

रोहित ने कहा मेरे भाई को खत्म करना है।

यह सुनकर रतन दंग रह गया। रतन सोचने लगा कहीं मैं सपना तो नहीं देख रहा हूँ या फिर मुझसे सुनने में कोई गलती तो नहीं हो गयी। रतन ने कनफर्म करने के लियें फिर से पूँछा, नवदीप सर को, 

रोहित ने कहा - हाँ।

पक्का करने के बाद रतन सन्न रह गया, रतन उनसे यह भी नहीं पूछ सकता था कि सर वजह क्या है। पर फिल्में ज्यादा देखने के कारण मैं भी खुद को पैशेवर कातिल समझने लगा और पूँछ ही लिया - कोई खास वजह,

तो रोहित ने कहा - वजह ज्यादा जरुरी है या पैसा।

इतना सुनकर रतन चुप हो गया पर वो समझ चुका था कि भाई के हिस्से से अलग और क्या वजह हो सकती है और जब वो ही पैसो के लियें अपने भाई को मारना चाहता है तो मैं चिन्ता क्यों करुँ। रतन ने कहा ठीक है सर मैं तैयार हूँ पर मुझे पाँच नहीं दस लाख रुपये चहिंये वो भी पहले।

सायद रोहित अपने भाई से कुछ ज्यादा ही नफरत करता था क्योकि उसने रतन को झट से दस लाख रुपय दे दिये। फिर रोहित ने रतन को प्लान बताया कि हर शनिवार को नवदीप अपने दिल्ली वाले शोरुम से पैसे लेकर आता है हाइवे खत्म होते ही वहाँ सुमशान जगह देखकर तुम किसी बहाने से गाड़ी रुकवाना, गाड़ी से उतरकर कुछ ऐंसा करना की नवदीप भी गाड़ी से बाहर आ जाए और वहीं उसको खत्म कर देना ।

पैसे तो रतन ले गया पर अब भी उसके कदम डगमगा रहें थे कि मैं यह क्या कर रहा हूँ , मुझे किसी का खून करके लखपति नहीं बनना है पर मैंने रोहित से पैसे भी तो ले लिये हैं खून तो करना ही पडे़गा। रतन ने फिर भगवान से फरियाद की, है भगवान क्या ऐंसा नहीं हो सकता कि किसी की जान भी ना जाए और यह पैसा भी मुझे मिल जाए। पर भगवान अब रतन की क्यों सुनने लगे उसने पैसा कमाने का रास्ता माँगा था और वो रास्ता भगवान ने उसको दिखा दिया। अब मर्जी उसकी है वो उस रास्ते पर चले या रास्ते को बदले या फिर रास्ते को ठीक करे फिर उस पर चले ।

रतन ने भी कुछ ऐंसा ही सोचा कि पहले रास्ते को ठीक करते हैं फिर उस पर चलते हैं, और अभी तो मैंने इस रास्ते पर चलना शुरु ही किया है दस लाख हाथ में आ चुका है पर इससे क्या होगा अभी तो रास्ते में पैसा बिखरा पड़ा है क्यों ना थोड़ा और बटोर लिया जाए।

यही लालच का कटोरा लिये रतन ‍शम्भू नाथ के पास गया और बोला - सर मुझे आपसे कुछ बात करनी है।

शम्भू नाथ - हाँ कहो रतन क्या बात है।

रतन - सर आपके दोनो बेटो की जान खतरे मैं है

शम्भूनाथ के चेहरे की हवाईयाँ उड़ गई। उसको ऐंसा लगा जैंसे उसके बैटे कुछ ही पल के मेहमान हैं। वो इतना घबरा गया कि तुरन्त उठकर बेटे के ऑफिस की तरफ दौड़ पड़ा। पर रतन ने उनको रोका और कहा सर घबराइए मत पहले मेरी पूरी बात सुन लिजिए और मैं आपके दोनों बेटो की जान बचाने का वादा करता हूँ।

शम्भूनाथ- पहले मुझे यह बताओ कि मेरे बेटो को आखिर कौन मारना चाहता है, और क्यों मारना चाहता है।

रतन - सर आपके दोनो बेटे ही एक दुसरे को मारना चाहते हैं।

शम्भूनाथ को रतन की बात पर जल्दी विस्वाश ना हुआ पर उसके मन में अपने बेटो के लियें कुछ शंका जरुर थी।

शम्भूनाथ रतन से - तुम यह कैंसे कह सकते हो।

रतन - सर मेरे पास सबूत है

इतना कहकर रतन ने शम्भूनाथ को वो विडिओ दिखाई जो उसने रोहित से बात करते समय बनाई थी। विडिओ देखते ही शम्भूनाथ के चेहरे पर तुरन्त घबराहट की लहरें दौड़ने लगी।  वो चाहते तो अभी दोनो भाईयो को डाट- फटकार लगा सकते थे, पर उससे उनके दिलो की दुश्मनी कम नहीं होती, उन्होने सोचा हो सकता है रतन के पास कोई अच्छा आईडिया हो, और वो रतन की बातों में फँस गये।

शम्भूनाथ रतन से - बेटा किसी भी तरह मेरे बेटो को बचा लो मैं तुम्हारा यह एहशान कभी नहीं भूलूंगा। और बदले में जो भी तुम माँगोंगे वो मैं तुम्हे दुंगा।

रतन के मन का लालच का द्वार अब खुल चुका था , और वो शम्भूनाथ से यही सुनना चाहता था। रतन ने झट से कहा मूझे पाँच लाख रुपये चाहिँये।

शम्भूनाथ को पैसो से ज्यादा बेटे प्यारे थे, उन्होनें तुरन्त रतन को पाँच लाख रुपये दे दिये। पैस लेकर रतन को लगा कि उसने शम्भूनाथ से कम पैसे माँगें है। रतन ने फिर से कहा सर एक बेटे के पाँच लाख रुपय दो बेटो के तो दस लाख रुपये होंगे।

शम्भूनाथ समझ चुके थे कि रतन के मन में अब लालच भर चुका है। शम्भूनाथ ने खिसियाकर रतन को पाँच लाख रुपये और दे दिये क्योकिं शम्भूनाथ के लियें बेटो के सामने पैसा कुछ भी नहीं।

चार दिन पहले तक रतन एक सीधा साधा आदमी था जिसने कभी किसी के साथ छल कपट नहीं किया था, पर आज ऐंसा नहीं है, उसके कदम बेईमानी की ओर ऐंसे बढ़ रहें हैं जैंसे रोहित शर्मा अपनी फर्स्ट सैंचुरी के बाद डबल सेंचुरि की ओर बढ़ता है। बीस लाख मिलने के बाद भी उसका मन नहीं भरा था। उसने सोचा क्यों ना बीस के तीस कर लिये जाऐं। और जैंसे ही तीस लाख होंगे मैं अपने परिवार को साथ लेकर यहाँ से कहीं दूर चला जाऊंगा। इसी तरह मन में झूठी खुशियों का पुलिन्दा बाँधे वो नवदीप के पास गया।

रतन नवदीप से - सर मुझे आपसे कुछ बात करनी है।

नवदीप - हाँ बोलो।

रतन - सर आपको कोई मारना चाहता है।

नवदीप - मुझे पता है। और मुझे मारने के लियें मेरे ही भाई से तुमने दस लाख रुपये लिये हैं। और फिर मेरे बाप से मुझे बचाने के लियें भी दस लाख रुपये लियें हैं। और अब मुझे बचाने के लियें मुझसे भी दस लाख रुपये लेने आये हो।

रतन नवदीप की बाते सुनकर शोक्ड‌ हो गया। नवदीप वो बाते भी कैंसें जानता है जो सिर्फ मेरे मन में चल रहीं हैं। रतन अपने को शर्म और व्यसमय के समुन्दर में डुबता देख रहा था। रतन को यूँ चुप देख नवदीप जोर से हँसता है, और कहता है - क्यों मुन्ना। इतना ही झटका काफी हैं या कुछ ओर‌ सुनना चाहोगे।

रतन अब भी चुप था और सोच रहा था कि मैं‌ यहाँ फँसाने आया था , लेकिन लगता है अब मैं खुद ही फँस गया हूँ। पर उसको यह तो जानना ही था कि नवदीप को सब कैंसे पता चला, सो उसने पूँछ ही लिया।

रत‌न - सर आपको कैंसे पता चला ?

नवदीप - तुम्हे यह जा‌नना जरुरी तो नहीं कि मुझे कैंसे पता चला , लेकिन फिर भी मैं तुम्हे बता ही देता हूँ

नवदीप रतन को अपने डिवाइस पर रतन की वो क्लिपिंग दिखाता है जिसमें रतन, रोहित से और बाद में उसके बाप से पैसे ले रहा था । रतन यह देखकर सन्न रह जाता है।

नवदीप - अब ध्यान से मरी बात सुनो मैं‌ जानता हूँ कि खून करना तुम्हारे बस की बात नहीं है , और हम तीनो से पैसा लेकर तुम कहीं दूर भागने वाले थे। पर अब ऐंसा नहीं होगा, खून तो तुम्हे करना ही पड़ेगा लेकिन मेरा नहीं रोहित का और मेरा बाप का वो भी अगले‌ दो दिन के अन्दर। दो दिन बाद पापा और रोहित जमशेदपूर जा रहें है और पापा साथ में तुम्हे भी ले जाने वाले हैं। वहाँ का रास्ता बहुत सुनसान रहता है। उसी सुनसान रास्ते पर मेरे आदमी पहले से ही मौजूद रहेंगे बस तुम्हें किसी बहाने से फ्लाईऑवर से पहले गाड़ी रकवानी हैं। बाकी सारा काम मेरे आदमी कर लेंगे । अब बात करते हैं पैसो की तो बीस लाख तो तुम्हारे पास पहले से ही है, मैं बीस लाख तुम्हे और देता हूँ वो भी कैश और मेरे खयाल से चालीस लाख रुपये बहुत बड़ी रकम होती है और इन पैसो से तुम अपना और आपने बच्चो का भविष्य बहुत उज्जवल बना सकते हो  

चालीस लाख रुपये का  नाम सुनकर रत‌न के अन्दर का बहशी शैतान जाग जाता है, पचास लाख के लियें वो दो खून तो कर ही सकता है। अब रतन यह भूल चुका था कि वो कभी एक ईमान्दार ईन्सान हुआ करता था, और वो यह भी भूल चुका था कि लालच बहुत बुरी बला है। रतन तो बस अपनी डील पक्की करके घर चला जाता है।

घर जाकर अपने परिवार वालो के पास बैठकर रत‌न के कदम फिर से डगमगाने लगते हैं , अगर मुझे कूछ हो गया तो मेरे परिवार का क्या होगा अगर मैं जैल चला गया तो मेरा परिवार तो भूँखा मर जायेगा पर अब मैं कुछ कर‌ भी तो नहीं सकता मैंने तो उनसे‌ पैसे भी ले लियें हैं। रतन की आँखो में पचास लाख के हसी‌न सपने और जैल जाने का भय आपस में कुश्ती लड़ रहे थे, और दो दिन इसी कुश्ती में बीत जाते हैं  पर अन्त में जीत हसीन सपनो की हुई।

अब वो दिन आ ही गया जब रतन को अपने काम को अंजाम देना था। रतन, रोहित और शम्भूनाथ गाड़ी में बैठकर जमशेदपुर जा रहे थे और उनका पीछा करते हुए नवदीप भी जमशेदपुर जा रहा था। रतन को तो बस किसी बहाने से गाड़ी रुकवानी थी। फ्लाईऑवर आने ही वाला था सो रतन ने अपनी जुगत लगानी शुरू कर दी कि किस बहाने से गाड़ी को रुकबाया जाए।

रतन - सर गाड़ी रोक दीजिये मुझे टॉयलेट जाना है।

शम्भूनाथ - यह क्या कह रहे हो रतन यहाँ तो चारो ओर जंगल है, यहाँ बहुत खतरा हो सकता है, दस मिनट में हम होटल पहुँचने वाले हैं।

रतन - सर मुझे प्रॉबलम है। गाड़ी रुकवा दीजिये प्लीज।

शम्भूनाथ - प्रॉबलम हो चाँहे कुछ हो गाड़ी नहीं रुकेगी। मै तुम्हारे चक्कर में हम सब की जान खतरे मे नहीं डाल सकता।

पर रतन कहाँ मानने वाला था उसपर तो चालीस लाख का भूत सवार था। उसने स्टेयरिंग पर झपट्टा मारा पर नवदीप ने उसका हाथ पीछे झटक दिया। रतन अब आपे से बहार हो गया उसने अबकी बार स्टेयरिंग को पकड़कर घुमा दिया। गाड़ी बैकाबु होकर पैड़ से टकरा जाती है। शम्भूनाथ जी को रतन पर बहुत ज्यादा गुस्सा आता है। और गुस्से में वो रतन को भला बुरा कहने लगता है।

तभी वहाँ तीन लोग गन लेकर आते हैं और गाड़ी में बैठे लोगो से बाहर निकलने को कहते हैं। रोहित, शम्भूनाथ और रतन गाड़ी से बाहर निकल आते हैं। तभी गन लियें खड़े तीन लोगों में से एक आदमी रतन से कहता हैं कि तुम हमारे पास आ जाओ। रतन बिना कुछ कहे सुने ही उनके पास चला जाता है। रतन को उनके साथ मिला देख शम्भूनाथ को अत्याधिक क्रोध आता है और वो रतन को भला बुरा कहने लगते हैं

शम्भूनाथ - नमक हराम तो इसलिये तू गाड़ी रुकबाना चाहता था, तू ही है वो आस्तीन का साँप जो हमें मरवाना चाहता है।

रतन - माफ करना सर पर पचास लाख के लियें मैंने अपने जमीर तक को मार डाला, तो सर आपको मारना मेरे लिये बड़ी बात नही़ है,, और वैसे भी जो आपकी जान लेना चाहता है वो मैं नहीं आपका अपना बेटा है । 

शम्भूनाथ - क्या बकते हो रोहित ऐंसा कभी नहीं करेगा।

रतन - कर सकता है पैसे के लियें कोई कुछ भी कर सकता है। रोहित, नवदीप को मरवा सकता है,  नवदीप रोहत को मरवा सकता है। और ....

इससे पहले कि रतन कुछ और बोल पाता

अचानक गोलियाँ चल‌ने लगती है चारो तरफ धुँआ ही धुँआ हो जाता है। अत्याधिक गोलियाँ चल‌ने के कारण धुँआ इतना फैल जाता है कि सबकुछ धुंधला धुंधला हो जाता है, और साथ ही अत्याधिक धुँए के कारण रतन का खाँसते खाँसते दम घुटने लगता है और वो बैहोश हो जाता है।

हौश आने पर रतन अपने को पुलिस थाने में पाता है, उसके हाथ पिछे की ओर बँधे हैं, और उसके चारो तरफ पुलिस वाले हाथो में डण्डा लिये खड़े है। रतन समझ जाता है कि रोहित और शम्भू नाथ के खून का इल्जाम उसके उपर ही आने वाला है, पर इस बारे में वो अभी चुप रहता है, और अन्जान सा बन पुलिस वालो से सिर्फ इतना पूँछता है कि, " मुझे बाँध क्यो रखा है।

पुलिस वाला - क्यो तुझे नहीं पता, कि तूने तीन तीन खून कियें हैं।

तीन खून का नाम सुनकर रतन चौंक जाता है और मन में सोचता है, 'नवदीप ने अपने बाप और भाई को मारा है यह तीसरा खून किसका हो गया'।

रतन पुलिस वालो से कहता है कि मैंने किसी का खून नहीं किया और तीसरा खून किसका हुआ है मेरे साथ तो रोहित और शम्भूनाथ सर थे।

अबकि बार पुलिस वाले कड़क आवाज में कहते है - तीसरा खून नवदीप का हुआ है, जो कि ठीक तुम्हारे पीछे आ रहा था,

रतन ( मासुमियत दिखाते हुए ) - पर मैं नवदीप का खून क्यो करुँगा ?

पुलिस ( रतन की आवाज को दवाते हुए ) - यानि तुम मानते हो कि तुम रोहित और शम्भूनाथ का खून कर‌ सकते हो ।

रतन ( सच बताने की कौशिश करते हुए ) - नहीं मैने उनको नहीं मारा, मैने किसी को नहीं मारा है।

पुलिस (हल्की गुस्से वाली आवाज में ) - तो यह चालीस लाख रुपय तुम्हारे पास कहाँ से आये ?

रतन के पास अब सच बोलने के सिवा दुसरा रास्ता ना था।

रतन ( सबकुछ सच बताते हुए ) - यह तो मुझे नवदीप, रोहित. और शम्भुनाथ जी ने दिये थे।

पुलिस रोब दिखाते हुए- खुद को मरवाने के लियें

रतन - नहीं एक दुसरे को मरवाने के लियें। पर मैंने किसी को नहीं मारा।

लाख दुहाई देने के बाद भी पुलिस रतन की एक नहीं सुनती क्योकिं सारे सुबूत उसके खिलाफ हैं। रतन को एक बात समझ नहीं आती कि आखिर खून किये किसने हैं, और अपने को बैगुनाह साबित करने के लियें आखिर उसे करना क्या होगा, फँस तो वो गया ही है अब या तो फाँसी के फन्दे पर झूलो या फिर बैगुनाही साबित करने के लियें कोई जुगत लगाओ।

दोस्तो यह आधी कहानी हो चुकी है, और मैं यह जानना चाहता हूँ क्या आप गै़स कर पाये कि खूनी कौन है। अगर हाँ तो कमेंट में जवाब दिजिये । बाकी का आधा भाग और खूनी को मैं जल्द ही लेकर लोटुंगा।


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