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AMIT SAGAR

Tragedy


4.7  

AMIT SAGAR

Tragedy


शबनम एक काला सच

शबनम एक काला सच

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शौकत साहब जो कि एक कॉलिज में लेक्चरार थे, जनाब के जीवन में हर वो सुख था जो आम लोग के लियें सिर्फ एक सपना होता है। अरे भई खुद की सरकारी नौकरी थी, एक बेटा इन्जिनियर था, दुसरे बेटे ने MBA कर रखा है, बेटी ने ईंगलिश से डबल MA कर रखा है। बड़े बेटे की शादी हो चुकी है, जिसका एक ग्याराह महीने का बेटा है, पत्नि आज्ञाकारी है, बहु संस्कारी है, बेटी गुणबन्ती है, और सबसे बड़ी बात मौहल्ले में मान सम्मान के धनि हैं। एक खुशहाल जीवन के लियें इससे अलहदा औेर क्या चाहिऐं, बस यूँ समझ लो कि शौकत साहब के जीवन में सबकुछ ठीक ही चल रहा है।

पर दोस्तो जिन्दगी की कहानी हो या घर में बनाने वाली सब्जी जब तक उसमें कुछ तीखा ना हो मजा नहीं आता। वैसे तो तीखा सिर्फ स्वाद के लियें होता हैंं, पर कभी कभी यह तीखा इतना ज्यादा हो जाता है, कि लोगो के कान, नाक, मुँह और ना जाने कहाँ कहाँ से धुआँ निकल आता है। हमारे शौकत साहब की जिन्गदी की कहानी भी खुशहाल चलते चलते एक दिन इतनी तीखी हो जाती है, कि जिसे आप सुनेंगे तो हैवानियत की नई परिभाषाऐं खौजने के लियें आपको लाइबेरी जाना पड़ सकता है।

शौकत साहब की बेटी शबनम जिसने इंगलिश से डबल MA किया था, वो एक स्कूल में पड़ाती है। स्कूल के सभी बच्चे उससे बहुत प्यार करते हैं, वजह थी बच्चो के प्रति उसका प्यार और व्यवहार। जी हाँ वो बच्चो से बहुत प्यार करती थी , और गलती करने पर भी वो बच्चो को कभी डाटती या मारती नहीं थी, बल्कि उन्हे प्यार से समझाती थी ‌। शब‌नम को उसके माँ बाप ने बड़े लाड़ प्यार से पाला था, उसके दोनो भाई भी उस पर जान छिड़कते थे, और बची कुची खुशियाँ उसकी भाभी और नन्ने मुन्ने भतीजे ने आकर दे दीं।

पर इस बात का आभाष सायद खुदा को भी ना था कि इस हँसते खेलते परिवार की सारी खुशियोँ पर ऐंसी बिजली गिरेगी जो दुनियाँ के लियें इतिहास बन जायेगा, और लोग अपनी बेटीयोँ का नाम शबनम रखना ही छोड़ देंगे। जी हाँ‌ उत्तर प्रदेश मे अमरोहा जिले के बावनखेड़ गाँव में कोई भी अपनी बेटी का नाम शबनम नहीं रखता है। बजह जानकर अपके भी होश उड़ जायेंगे।

शबनम एक पड़ी लिखी लड़की थी और धन सम्पदा वाले प्रतिष्ठित परिवार से थी वहीँ शबनम को जिससे प्यार हुआ था वो मात्र छठी पास था, और एक मैकेनिक की दुकान पर काम करता था, नाम था सलीम। शबनम और सलीम प्यार की सारी हदो से काफी आगे निकल चुके थे, जी हाँ शबनम के पेट में सलीम का छः महिने का बच्चा पल रहा था। शबनम और सलीम के परिवार के बीच धरती आसमान का फर्क था, और साथ ही दोनो की बिरादरी भी अलग थी, इसलियें शबनम के प्यार के बारे में पता चलने पर शौकत साहब शबनम की  शादी सलीम के साथ करवाने के लियें तैयार ना हुऐ। वो शबनम की शादी अपनी बिरादरी और अपनी बराबरी के किसी परिवार में कराना चाहते थे। पर शबनम तो पहले ही सलीम के साथ जीने मरने की कस्मे खा चुकी थी दुसरा उसके पेट मे सलीम का बच्चा भी पल रहा था तो वो भला किसी और से शादी क्यो करने लगी।

जब शबनम को अपना प्यार सूली पर चड़ता नजर आया तो उसने सलीम के साथ मिलकर एक ऐंसा प्लान बनाया, जिसके बारे में सोचकर ही हमारा दिल जोर जोर से धड़कने लगता है, और हम भगवान से प्रार्थना करने लगते हैं कि ऐंसी बेटी हिन्दुस्तान तो क्या इस जहाँन में किसी को ना दे। इस कहानी को पढ़कर सायद आपकी आत्मा भी रो देगी। जी हाँ दोस्तो चाण्डाल शबनम के प्यार ने बहशियत का रुप ले लिया था। उसने सोचा क्यों ना परिवार के सभी लोगो की हत्या कर दी जाये, इन सभी के मरने के बाद सारी जायदाद की मैं अकेली वारिस. हो जाऊँगी और सारा जीवन सलीम की बाँहो मे गुजार दुंगी। अरे वाह रे मेरी कलयुग की बेटी तेरी सोच, तेरी करतूत, और तेरी चान्डालता के लिये सायद अभी कोई गन्दी गाली या बद्दुआह बनी ही नहीं है जो मैं तुझे दूँ। शबनम ने 14 अप्रेल 2008 की रात सलीम से नशे की गोलियाँ मँगवायी और वो गोलियाँ अपने परिवार वालो के खाने मे मिला दी, और सारे परिवार वाले जब बेहोश हो गये तो उसने सलीम को भी अपने घर बुला लिया, और एक एक करके अपनी माता, पिता, भाभी, दोनो भाई और बेचारी रिश्तेदारी में छुट्टियाँ मनाने आयी उसकी मौसेरी बहन की भी गर्दन कुल्हाड़ी से काट डाली। अकबर जौधा के सलीम ने प्यार की खातिर अपने ही पिता के खिलाफ युद्ध का आगा़ज कर दिया था, और इस सलीम ने अपने प्यार को पाने के लियें अपनी ही महबूबा के साथ मिलकर उसके सारे परिवार को मार डाला। बेहौश किये गये सभी लोगो को मारने के बाद शबनम सलीम को कुल्हाडी़ और खून से सने कपड़ो को नदी में फैकने के लियें भेज देती है, तभी उसका ग्याराह महीने का भतिजा जो अभी रोटी खाना भी ना सीखा था, वो माँ के दूध की तलप लगने के कारण रोने लगता है। शबनम सायद इस समय जायदाद और सलीम के प्यार में इतनी पागल हो चुकी थी कि वो नहीं चाहती थी कि उसके परिवार में उसके सिवा कोई दुसरा वारिस बचे, इसलियें उसने एक बार फिर सलीम को फोन किया, और कहा कि मेरा ग्याराह महीने का भतीजा बच गया है तुम जल्दी से कुल्हाडी़ वापिस लेकर आओ। बच्चे का नाम सुनकर सायद सलीम की भी रूह काँप उठी थी, और उसने आने से मना कर दिया, पर शबनम कहाँ मानने वाली थी उसने ग्याराह महीने के भतीजे का गला भी अपने ही हाथो से घोट दिया। ऐ मेरे भगवान इतनी निर्दयता, जिसके खुद के पेट में 6 महीने का बच्चा पल रहा है, जो खुद माँ बनने वाली हो वो किसी दुसरे की ममता का गला कैंसे घोट सकती है। पर उस राक्षसनी ने ऐंसा किया और उसे अपने किये पर जरा भी पछतावा नहीं था। बल्कि सात सात हत्यायें करने के बाद परिवार के प्रति उसके असीम प्रेम का झूठा ड्रामा शुरु हो जाता है। मौहल्ले वाले आतें है, पुलिस आती है, बड़े बड़े अधिकारी आते हैं, नेता आते है, और सभी उस कुल्टा को मासूम समझकर सत्तावना देकर चले जाते हैं। और फिर शुरू होती है खूनी को पकड़ने की तहकीकात, दौलत और हवस के अन्धेपन में‌ खून करके शबनम और सलीम ने इतने सबूत छोड़ रखे थे कि कोई नौसिखिया भी उन दोनो के बारे में पता लगा सकता था, जबकि यहाँ तो खूनी को पकड़ने के लिये कई काबिल अफसर लगाये गये थे, और वो अफसर 24 घन्टे में ही शबनम और सलीम का पर्दा फास कर देते हैं। पुलिस द्वारा पकड़े जाने पर शबनम दहाड़े मार मारकर रोने बिलखने लगती है। पर उसके रोने बिलखने से अब किसी को कोई फर्क नहीं पड़ने वाला था। अब तो हर कोई शबनम को बस दुत्कार ही रहा था।

खैर मामला अब कोर्ट में पहुँचता है जहाँ शबनम को फाँसी की सजा सुना दी जाती है। इसी बीच शबनम एक बेटे को जन्म देती है जिसको गोद ले लिया जाता है। शबनम ने फाँसी से बचने के लियें हर वो प्रयास किये जो वो कर सकती थी, हाई कॉर्ट, सुप्रीम कॉर्ट, यहाँ तक कि भारत के राष्टपति को भी अपनी दया याचिका भेजी पर शबनम ने जो राक्षसप्रवर्त्ती का काम किया था वो दया की पात्र तो बिल्कुल ना थी।

औेर अाज वो दिन आ ही गया जब शबनम को फाँसी दी जानी थी। आज सुबाह से ही शबनम अपने बीते दिनो को याद करके बस रोती ही जा रही थी, उसके पीछे गुजरे हुए दिनो की जहरीली यादों की खाई थी जिसमे वो जितनी धँस रही थी उतनी तड़प रही थी, और उसके आगे फाँसी के रूप में एक काला अन्धेरा था, जिसके आगे वो ना तो कुछ देख पा रही थी, और ना ही कुछ सोच पा रही थी। शबनम को फाँसी के लिये तैयार कर लिया गया, और फाँसी वाली जगह पर ले जाया गया। शबनम के‌ लिये आज का पल पल बहुमुल्य था, आज उसकी आखो के सामने उसका बचपन  , उसकी जवानी, सलीम के साथ बिताया गया समय और जैल में बीता समय रॉकेट से भी ज्यादा तेज रफ्तार से चक्कर लगा रहा था।

जल्लाद ने शबनम के दोनो हाथ पीछे बाँध दिये, और चेहरे को काले कपड़े से ढक दिया, उसकी आखो के आगे काली यादो का  गुप्त अन्धेरा छा जाता है, और उन्ही अन्धेरी यादो की गलियों से गुजरती हुई वो बारह साल पीछे उसी मन्जर पर पहुँच जाती है जहाँ उसने अपने परिवार के लोगो को मौत के घाट उतारा था। सबसे पहले वो अपने बाप की गर्दन काटने के लियें कुल्हाडी उठाती है, वक्त एकाएक ठहर जाता है, और शबनम इस ठहरे हुऐ वक्त से फरियाद करती है कि ए वक्त क्या तू बदल नहीं सकता, यह वही बाप है जिसने मुझे लाड़ो से पाला था, मेरे पैदा होने पर ढोल‌ नगाड़े बजवाये थे, घर घर लड्डू बटवाये थे, और मै आज उसी बाप की हत्या करने जा रही हूँ, ए गुजरे हुए वक्त मैं कठोर हूँ पर तू क्यों इतना कठोर बन रहा है, कुछ ही पलो में,  मैं अपनी माँ , दोनो भाई, बाप, भाभी , बहन, भतीजे सभी को मारने जा रही हूँ, और उसके कुछ पलो बाद मुझे फाँसी लग जायेगी। ए वक्त क्या इस काले सच को तू एक डरावना सपना नहीं बना सकता  , क्या तू पीछे नहीं जा सकता, मेरे लिये ना सही मेरे उस मासूम भतीजे के लिये ही पीछे चला जा जिसका मैने बेरेहमी से गला घोटा था, ए वक्त क्या तूझे भी वो लम्हा याद आ रहा है जब वो दूध के‌ लिये रो रहा था, और मैं उसका गला घोटने के लिये उसके पास गयी थी तो वो मुझे देखकर रोते रोते हँसने लगा था, वो समझ रहा था कि उसकी बुआ उसे दूध देने आयी होंगी पर जैंसे ही मैंने उसका गला पकड़ा वो चौक गया, और सायद सोच रहा था कि मैने क्या गुनाह किया है जो मेरा गला घोट रही हो, मुझे छोड़ दो बुआ मैं मर जाउगाँ, उसकी मासूम सी रोती हुईं आखो मैं ढैर सारी फरियादे थी जो अपना‌ गला छुडा़ने के लियें मेरे सामने गुहार लगा रही थी, पर मैं इश्क मे अन्धी कुछ देख ही ना पायी।   ए वक्त मै अपने हर पाप का प्रायश्चित करने के लिये तैयार हूँ, मुझे एक मौका देकर तो देख।

इतने में ही जल्लाद ने शबनम के गलेें फाँसी का फन्दा डाल दिया और उसे सूली पर लटका दिया। शबनम के पास अब कुछ ही साँस बची थी, और उन्ही अन्तिम साँसो में उसके परिवार का हर सदस्य बारी बारी उसकी आखो के सामने आता है और कहता है, क्या यही वो खुशी थी जिसके लिये तूने हमारी जान ले ली। और फिर अन्त में उसके बेटे की काली परछायी उसके सामने आती है और कहती है कि है माँ मुझे डर है कहीँ तेरे बूरे कर्मो का फल इस जहान मे मुझे भुगतना ना पड़ जाये, और फिर शबनम के प्राण निकल जाते हैं।

दोस्तो हमारे देश मे कही जाने वाली कहावते भी कभी कभी हमें कनफ्युज कर देती हैं। जैंसे कि एक कहावत लोग कहते हैं प्यार अन्धा होता है, पर क्या इतना अन्धा होता है कि अपने ही ग्याराह महीने के भतिजे का गला घोटकर मार दिया जाये। दुसरी कहावत यह है कि प्यार और जंग मे सब जायज़ है, तो क्या शबनम ने अपने परिवार वालो को मौत के घाट उतारकर एक जायज़ काम किया था। नहीं उसने एक दरिन्दगी की थी जिसकी सजा उसे फाँसी के रूप में मिली है।


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