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HARSH TRIPATHI

Thriller


4  

HARSH TRIPATHI

Thriller


दस्तूर -- भाग-6

दस्तूर -- भाग-6

38 mins 318 38 mins 318

                                                    


जिस दिन सैयद साहब ने अली साहब को अपने घर पर शाम को मिलने के लिये बुलाया था, ठीक उसी दिन जब वो सुबह 11 बजे अपने दफ्तर पहुँचे तो बुज़ुर्ग अली साहब ने बिल्कुल किसी छोटे बच्चे की तरह खुशी से चिल्लाते हुए सैयद साहब को गले लगा लिया "....मुबारक़ हो सैयद साहब!!!...मुबारक़ हो..." और दफ्तर का करीब पूरा स्टाफ इन दोनों के चारो तरफ खड़ा हो गया और "मुबारक़ हो....मुबारक़ हो...." कहकर तालियाँ बजाने लगा. दोनो बेटे शुज़ा और मुराद भी बहुत खुश नज़र आ रहे थे और तालियाँ बजा रहे थे. फरीद कारोबार के सिलसिले में दिल्ली गये थे इसलिये वह उस खुशी में शामिल नहीं हो सके थे. सैयद साहब को समझ में नहीं आ रहा था कि क्या हुआ है. उन्होने अली साहब से गले मिलने के बाद हैरानी से पूछा "अरे भाई अली साहब!!....क्या हुआ?.....जश्न का माहौल बना रखा है आपने लेकिन हमें तो कुछ पता ही नहीं". अली साहब ने चहकते हुए कहा "पहले गुलाब जामुन मँगाइये सब के लिये.....फिर बताएंगे". सैयद साहब मुस्कुराकर बोले "मँगा देंगे, मँगा देंगे....पहले वजह तो बताइये?" कारखाने के मैंनेजर साहब बीच में ही बोले "...वजह तो ऐसी है साहब कि आप भी खुशी से पागल हो जायेंगे". सैयद साहब ने उन्हें शांत कराते हुए कहा "अरे मैनेजर साहब, हमें भी तो पता चले कुछ!!".

अली साहब जो एक मोटा सा, बड़ा लिफाफा अपने हाथ में लिये हुए थे, और जिसमें कई सारे कागज़ात भरे हुए थे, उसे लहराते हुए सैयद साहब से ऊँचे स्वर में कहा "सब्र का फल मीठा ही होता है सैयद साहब!!....ये देखिये, लखनऊ से डिपार्टमेंट ऑफ इंडस्ट्री का ये परमीशन लेटर आया है और उन्होनें कानपुर सिटी और माधवपुर में फैक्ट्री लगाने और कारोबार करने की इजाज़त दे दी है". इसे जब सैयद साहब ने सुना तो पहले तो उनको यकीन ही नहीं हुआ, कुछ देर तक वो बिल्कुल बुत जैसे खड़े ही रहे थे. फिर अली साहब ने लिफाफे मे से एक कागज़ निकाला और सबके बीच में ज़ोर से पढ़ कर सुनाने लगे "....आप की कम्पनी 'एस.जे. लेदर कम्पनी' जो प्रदेश में चमड़े की उपभोक्ता वस्तुओं तथा जूतों के निर्माण में संलग्न है, को कानपुर सिटी के धनीनगर इंडस्ट्रियल एरिया और माधवपुर के चंद्रनगर इंडस्ट्रियल एरिया में जूता निर्माण का कारखाना लगाने की अनुमति प्रदान की जाती है जो प्रदेश सरकार के उद्योग विभाग और पर्यावरण विभाग द्वारा निर्धारित शर्तों के अनुकूल ही होगी. इसके अलावा कारखाने में तैयार सामान की कानपुर और उसके आस-पास के क्षेत्रों में बिक्री की अनुमति भी दी जाती है". अली साहब के इतना पढ़ते ही पूरा स्टाफ दोगुने जोश से ताली बजाने लगा. अब तक सैयद साहब की समझ में भी बात आ चुकी थी और उनके मुँह से शब्द भी नहीं निकल पा रहे थे. उनकी खुशी अब आँसू की शक्ल में उनकी आँखो के ज़रिये बाहर निकल रही थी. वह मुस्कुराते हुए आगे बढ़े और अली साहब से ऐसे गले लग गये जैसे कोई छोटा सा बच्चा शरमाते हुए अपनी माँ के गले लग जाता है.

थोड़ी देर बाद जब वह अली साहब से अलग हुए, तो अपना होश सम्भाला, अपने आँसू पोछे और अपने स्टाफ को खिताब करते हुए कहा "मेरे प्यारे साथियों, ये सब आपके साथ, आपकी मोहब्बत, आपकी कड़ी मेहनत और आपकी आपकी दुआओं का नतीजा है कि जो काम करीब डेढ़ साल से लटका ही हुआ था, और जिस पर कम से कम हम तो उम्मीद छोड़ ही चुके थे, अल्लाह के फज़ल से आज वो मुश्किल आसान हो गयी है और आज हमें परमीशन मिल गयी है, और वह भी बिना एक पैसा घूस खिलाये....जबकि इसी काम के लिये कई बड़ी फर्मों ने लाखों की घूस दी है. अल्लाह से हमारी दुआ है, कि वह आप सबको खूब खुश रखे, खूब बरक़त दे, और आपके घर-परिवार आबाद रहें, फूले-फलें, और इस कम्पनी के लिये आप दिल लगाकर काम कीजिये जिस से इस तरह की कामयाबियों के मौके बराबर हमें मिलते रहें". पूरे स्टाफ ने पुरज़ोर ताली बजाकर अपनी खुशी ज़ाहिर की. ऑफिस का प्यून श्रीकांत तुरंत ही बोला "...और साहब, मिठाई?.....उस पर तो कुछ कहा ही नहीं?" सारा स्टाफ ठहाका मारकर हँस पड़ा. सैयद साहब ने भी हँसते हुए कहा "श्रीकांत बाबू, मिठाई तो आप ही लायेंगे" यह कहकर तुरंत ही अपनी जेब से 100-100 रुपये के पाँच नोट निकालकर श्रीकांत के हाथ पर रख दिये और कहा जाइये और पूरे पैसे के गुलाब जामुन ले आइये. एक भी पैसा वापस मत लाइयेगा". पूरे स्टाफ ने फिर से भरपूर ताली बजाई और फिर सब अपनी-अपनी जगह चले गये. श्रीकांत मिठाई लेने बाज़ार की ओर दौड़ गया था.

सैयद साहब और अली साहब बेहद खुश थे और शुज़ा, मुराद और सरवर के साथ वो सभी सैयद साहब के चैम्बर में पहुँचे. अपनी बड़ी सी, आरामदायक कुर्सी पर सैयद साहब ऐसे धँस गये जैसे सिर पर से बहुत बड़ा बोझ उतर गया हो. उन्होनें कुर्सी पर बैठ कर सिर पीछे की ओर टिका दिया और अपनी आँखे बंद कर लीं. अली साहब इस बात को बखूबी समझ रहे थे और मुस्कुराते हुए सैयद साहब के सामने वाली कुर्सी पर बैठ गये. मुराद, शुज़ा और सरवर अभी खड़े ही थे. एक दूसरे के लिये खूब प्यार-मोहब्बत होने के बाद भी ऑफिस का अनकहा क़ायदा यही था वहाँ चाहे मुराद हों, या शुज़ा या फिर सरवर, सभी स्टाफ की तरह से ही रहते थे और यह कि सैयद साहब के कहने पर ही कोई बैठ सकता था. केवल अली साहब को ही इस क़ायदे से बाहर रखा गया था. सैयद साहब के बेहद वफादार अली साहब ने खुद अपने बेटे सरवर को समझा रखा था कि किसी सूरत में ऑफिस का क़ायदा टूटना नहीं चाहिये. यह सभी के लिये बराबर ही था. कुछ पलों के बाद जब सैयद साहब की आँखें खुली तो उन्होनें देखा कि बच्चे खड़े है. उन्होने तुरंत ही उनसे कहा "अरे आप लोग खड़े क्यों हैं?....बैठिये न!". बच्चे फिर कुर्सियों पर बैठ गये.

लम्बी साँस छोड़ते हुए सैयद साहब मुस्कुराहट के साथ अली साहब से बोले "चलिये, डेढ़ साल बाद ही सही, ये मुश्किल तो आसान हुई. हम तो उम्मीद ही छोड़ चुके थे."

अली साहब ने भी हँसकर कहा "मिर्ज़ा का कमाल है सब सैयद साहब. हम लोग तो कितनी ही बार लखनऊ गये, कपूर साहब से मिले, कितनी अर्ज़ियाँ दी, जितने ऑब्जेक्शन आये, सभी को करेक्ट करके बार-बार भेजा लेकिन कुछ नहीं हुआ.....यहाँ हमारा शेर, हमारे मिर्ज़ा एक बार जाकर मिले, और न जाने कौन सी घुट्टी पिला दी कपूर साहब को कि तुरन्त ही यह सरकारी फरमान इस लिफाफे में सज-धज कर आ पहुँचा".

मुराद और शुज़ा की मुस्कान गायब हो गयी और दोनों अली साहब की ओर देखने लगे. इन सबसे बेखबर अली साहब बोल रहे थे "....सच पूछिये तो सैयद साहब, उम्मीद तो हमने भी छोड़ ही दी थी…..फिर भी दिल कि किसी कोने में एक उम्मीद थी कि मिर्ज़ा गये हैं लखनऊ......कुछ तो करके आयेंगे ही. ऐसा तो नहीं हुआ अब तक कि मिर्ज़ा ने कोई काम हाथ में लिया हो और खाली हाथ ही आये हों. यही सोच के लगता था कि क्या पता मिर्ज़ा की कोई तरकीब काम कर ही जाये और हमें परमीशन मिल जाये.....और अल्लाह का करम देखिये, मिर्ज़ा की तरकीब काम कर ही गयी".

"बिल्कुल सही फरमाते हैं आप अली साहब.....न जाने क्या जादू खेलकर आये मिर्ज़ा कि इतने दिनों से लटका हुआ यह काम आज हो ही गया". सैयद साहब ने कहा.

"फरीद का काम भी दिल्ली में सही रास्ते पर चल रहा है. वहाँ भी मिर्ज़ा ने अपना ज़ोर लगाया हुआ है. उम्मीद है कि हमें दिल्ली में भी अपना कारोबर जमाने की खुशखबरी जल्द ही मिल जायेगी". अली साहब ने कहा.

इसी तरह से कुछ-कुछ बातें उन लोगों ने की, और फिर तीनो बच्चे अपनी-अपनी जगह पर चले गये, केवल अली साहब, सैयद साहब के साथ वहाँ बैठे थे. सैयद साहब ने उनसे कहा "अली साहब, मै ज़्यादा देर आज यहाँ दफ्तर में नहीं रुकूँगा, अभी एक-डेढ़ घंटे तक कामकाज देखूँगा फिर मैं घर चला जाऊँगा.......जहाँआरा भी आ गई होगी घर. आप भी याद करके शाम 4 बजे तक चले आईयेगा अकेले. आपसे कुछ ज़रूरी बात करनी है, याद है न आपको?"

"जी, जी सैयद साहब.....अकेले ही आ जायेंगे हम". अली साहब ने कहा.

फिर वह भी कमरे से बाहर निकल गये. अगले एक-दो घंटे तक सैयद साहब दफ्तर और कारखाने में घूमते रहे और फिर ड्राईवर से गाड़ी निकालने को कहा, और अपने घर की तरफ निकल गये.

शुज़ा कारखाने में ही घूम रहे थे और मशीनों पर चलता हुआ काम देख रहे थे. लेकिन मुराद के दिमाग में खलबली मची हुई थी, और वह सीधे ही शुज़ा के पास पहुँच गये. मशीनों की गड़गड़ाहट के बीच उन्होनें दूर से ही ऊँची आवाज़ में पुकारा "भाईजान!"

शुज़ा ने उनकी ओर देखा. मुराद ने कहा "थोड़ा इधर आइयेगा, बात करने है कुछ".

शुज़ा एक मशीन पर काम कर रहे कारीगर को कुछ बातें समझाकर, अपने कपड़े झाड़ते हुए मुराद के पास आये "कहिये मुराद".

मुराद ने कहा "आईये, चलते हुए बात करते हैं थोड़ा", और दोनों साथ में ही कारखाने में घूमने लगे.

शुज़ा ने कहा "चलिये, बताईये अब?"

मुराद ने चिढ़कर कहा "मैं हैरान हूँ कि आपको कुछ नज़र क्यों नहीं आ रहा है?"

शुज़ा ने ताज्जुब किया "अरे!!..क्या हो गया?"

मुराद ने सीधे कहा "अब ये कानपुर और माधवपुर वाला मामला भी सुलझ गया".

शुज़ा ने कहा "तो ये तो बहुत अच्छी बात हुई है.....अब्बा हुज़ूर और अली साहब पिछले डेढ़-दो साल से परेशान थे इसके पीछे. कितनी दफा तो लखनऊ के चक्कर भी लग चुके थे. अब जाकर बात बनी है. कारोबार बढ़ना तो अच्छा ही है न?.....जितना कारोबार बढ़ेगा, उतना ही पैसा आयेगा, उतना ही मुनाफा बढ़ेगा".

मुराद ने कहा "बात ये नहीं है कि अब हमारा कारोबार बढ़ेगा......बात ये है कि अब्बू और अली साहब के दिमाग में यह बात बैठ गयी है कि यह मामला मिर्ज़ा की वजह से सुलझा है.....और अब इस वजह से मिर्ज़ा का कद कारोबार में भी और घर में भी काफी ज़्यादा बढ़ने वाला है. बात समझ रहे हैं न आप?"

शुज़ा मुराद को देख रहे थे.

"अली साहब को देखा?.......उछल-उछल कर बोल रहे थे 'हमारा शेर मिर्ज़ा.......हमारा शेर मिर्ज़ा....' जैसे हम लोगों ने आज तक कारोबार की बेहतरी के लिये कुछ किया ही नहीं है" मुराद की जलन साफ ज़ाहिर हो रही थी.

शुज़ा अभी भी खामोश थे.

"अली साहब कह रहे थे कि वहाँ दिल्ली में भी फरीद भाई का काम सही रास्ते पर है और मिर्ज़ा ने भी पूरा ज़ोर लगा दिया है........उम्मीद है कि वहाँ से भी अच्छी खबर जल्द आयेगी. इसका मतलब समझ रहे हैं आप भाईजान? दिल्ली के कारोबार से भी होने वाले पूरे मुनाफे पर भी मिर्ज़ा और फरीद भाई का ही हाथ रहेगा....."

शुज़ा चुपचाप मुराद की बातें सुन रहे थे.

"....इसका सीधा सा मतलब यह कि कारोबार की सारी मलाई फरीद भाई और मिर्ज़ा मिलकर खायेंगे, और हमारे और आपके हिस्से मे आयेगा बड़ा सा ठेंगा." मुराद ने अपने दायें हाथ का अंगूठा शुज़ा की तरफ दिखाते हुए चिढ़कर कहा.

शुज़ा ने मुराद से कहा "ऐसा नहीं होगा मुराद......अब्बू हैं अभी और उन्होनें कारोबार में हमारी मेहनत भी देखी है. वो कतई कोई नाइंसाफी नहीं करेंगे."

मुराद ने फिर कहा "....और जब अब्बू नहीं रहेंगे तो?......उनकी भी उम्र हो चली है, तबियत भी नासाज़ ही रहती है........अब्बू के न रहने पर हमारे बीवी-बच्चे क्या करेंगे? क्या फरीद भाई और मिर्ज़ा के आगे हाथ फैलायेंगे?"

शुज़ा खामोश रहे.

मुराद ने कहा "थोड़ा सोचियेगा ज़रूर भाईजान इस पर." और इतना कहकर मुराद चले गये. शुज़ा अभी भी अपनी जगह खड़े थे और मुराद की कही बातों को मन ही मन तौल रहे थे.

उसी रोज़ सुबह करीब 11 बजे, जब सैयद साहब अपने दफ्तर में थे, जहाँआरा अपने बच्चों के साथ अपने मायके आ गयी थी. करीब 1 बजे के आस-पास सैयद साहब वापस आ गये थे. दोपहर के खाने के बाद करीब 2 बजे वह अपने वालिद के कमरे में गयी ताकि सैयद साहब को उनकी दवाओं की याद दिलाई जा सके. दवाओं के मामले में सैयद साहब काफी लापरवाह थे और अक्सर दवाएं वक़्त पर लेना भूल जाते थे. उस वक़्त सैयद साहब अपने कमरे में बिल्कुल अकेले थे, और दीवार पर लगी अपनी मरहूम बेगम की एक बड़ी सी ब्लैक एंड व्हाइट फोटो के आगे, उसे देखते हुए बिल्कुल खामोश खड़े थे. उन्हें पता भी नहीं चला कि पीछे दरवाज़ा खोलकर जहाँआरा कमरे में दाखिल हुई थी. कमरे में सिर्फ खिड़कियों से आने वाले हवा के झोकों की ही आवाज़ आ रही थी, और बीच-बीच में सैयद साहब की सिसकियाँ इस खामोशी को तोड़ रही थी.

रुखसार ने जहाँआरा को अब्बू के कमरे की तरफ जाते देख लिया था और तेज़ी से जहाँआरा के पीछे-पीछे उस ओर भागी थी. न जाने क्यों उसे ऐसा लग रहा था कि सैयद साहब जहाँआरा के साथ कुछ खास बात करना चाहते थे, और रुखसार को उस बात से बे-खबर रखना चाहते थे. वह सैयद साहब के कमरे के दरवाज़े तक पहुँचकर चुप-चाप खड़ी हो गयी और दरवाज़े पर कान लगा दिये.

सैयद साहब इन सबसे बेखबर अपनी बेगम के फोटो को देखते हुए, रोते हुए कह रहे थे "क्यों चली गईं आप बेग़म?.....हमें तन्हा छोड़कर क्यों चली गयीं?.....हमारे साथ इस वक़्त क्यों नहीं हैं आप?......"

"....आपके बगैर हम कितने कमज़ोर, कितने लाचार हो गये हैं, पता है आपको?......ये हालत हो गई है कि अब हम अपने घर के फैसले भी खुद से नहीं ले सकते. अब हमें हर घरेलू फैसले के लिये भी दूसरों से सलाह लेने की ज़रूरत आन पड़ी है. आप जो होतीं तो ऐसा कभी भी नहीं होता बेगम.......आपके रहते हमें कभी कोई सहारा नहीं लेना पड़ा.....किसी और की कोई ज़रूरत कभी महसूस नहीं हुई...."

"….दुनिया के इस ज़हर से लड़ने के लिये, यहाँ तड़पने के लिये आपने हमें अकेला छोड़ दिया, और खुद चली गयीं. बताईये क्यों किया ऐसा?......ऐसा कीजिये, अब जल्दी से हमें भी अपने पास बुला लीजिये, अब यहाँ दिल नहीं लगता हमारा.....ज़िन्दगी बिल्कुल खाली बर्तन हो चुकी है....अब कुछ नहीं रहा इसमें. हम मरना चाहते हैं बेगम.....अपने पास बुला लीजिये हमें." सैयद साहब फूट-फूट कर रो रहे थे.

किसी ने उनके कंधे पर धीरे से हाथ रखा. सैयद साहब ने मुड़कर देखा तो जहाँआरा थी. उसकी भी आँखें नम हो रखी थीं. अपने हाथों से उसने सैयद साहब के आँसू पोछे और रुंधे गले से कहा "रोइये मत अब्बू, खुदा के वास्ते न रोइये.......हमारे बारे में तो सोच लीजिये कुछ. अभी बच्चे ही तो हैं हम, और हमें बे-इंतेहा ज़रूरत है आपकी. घर पर बुज़ुर्गों का साया बहुत ज़रूरी होता है अब्बू. अम्मी नहीं रही लेकिन कम से कम आप ऐसी बातें न कीजिये. हमें रास्ता दिखाइये अब्बू......हमें छोड़कर जाने की बात कतई न कीजिये.....चुप हो जाइये अब्बू".

सैयद साहब खुद को सम्भालने की कोशिश कर रहे थे.

..."यहाँ, इधर बैठिये आप". फिर जहाँआरा सैयद साहब का हाथ पकड़कर उन्हे पास में ही रखे सोफे की तरफ ले जाने लगी और वहाँ पहुँच कर आरम से उन्हें बैठा दिया. खुद वह सामने वाले दूसरे सोफे पर बैठ गयी.

कुछ पल दोनो बाप-बेटी खामोश ही रहे. फिर सामने मेज पर पड़ी दवाओं की थैली उठाते हुए जहाँआरा ने कहा "लीजिये अब्बू, खाने के बाद की दवा खा लीजिये".

सैयद साहब मेज की तरफ देखते हुए लम्बी साँस छोड़कर बोले "दवाओं से क्या होगा बेटी?.....कुछ दिन की उम्र और बढ़ जायेगी......तुम्हारी अम्मी के बगैर ज़िंदा रहने की मजबूरी और तकलीफ भी और कुछ ज़्यादा दिनों के लिये बढ़ जायेगी". यह बोलकर वह फिर से गमज़दा हो गये और उनकी आँखें फिर भर आयीं.

जहाँआरा ने फिर से उन्हें चुप कराया. फिर उसने थैली मे से दवाएं निकालीं और अपने साथ वह गिलास में पानी भरकर लाई थी, वह भी सैयद साहब की ओर बढ़ाते हुए बोली "लीजिये अब्बू, दवाएं खा लीजिये".

अबकी सैयद साहब ने बिना कुछ बोले, चुपचाप दवाएं खा लीं.

दवा खाकर फिर जब वह सोफे पर आराम से बैठे, तो जहाँआरा ने उनका हाथ अपने हाथ में लेकर पूछा "कहिये अब्बू, ऐसी भी क्या ज़रूरी बात थी जिसके लिये आपने कल रात घर पर फोन कर दिया था और मुझे यहाँ आने को कहा था?"

"बात है बेटी कुछ ज़रूरी........आप से करना मुनासिब समझा हमने, और किसी से तो नहीं कर सकते थे....."

रुखसार चुपचाप दरवाज़े पर खान लगाये हुई थी.

"......रुखसार थोड़ा सा अलग, कुछ अजीब फितरत की है, इसलिये उससे ये बात नहीं की हमने, और अपने चारों बेटों से तो ये बात करनी भी नहीं थी.....इसलिये आपको बुलवाया."

रुखसार सुन रही थी.

जहाँआरा ने कहा "जी, बतायें अब्बू."

सैयद साहब लम्बी साँस छोड़ते हुए बोले "देखिये बेटी, हमारी हालत तो आपसे छुपी नहीं है. तबियत अक्सर नासाज़ बनी रहती है. दवाओं के सहारे जब तक चल रहे हैं, तब तक चल रहे हैं.......बाकी बुलावा तो कभी भी आ सकता है. हमारा जिस्म तो बता ही चुका है कि हमारे दिन अब पूरे होने वाले हैं......बस शमां की आखिरी लौ है जो जल रही है.....".

जहाँआरा अब्बू का हाथ पकड़कर खामोश बैठी रही.

".....ऐसे में हम चाहते हैं कि हमारे रहते ही हम एक ऐसे इंसान की तलाश कर लें जो हमारी बच्चों की तरह पाल-पोस कर बड़ी की गयी कम्पनी और हमारे घर-परिवार दोनों को महफूज़ रखे, और जिसकी निगेहबानी में कम्पनी और परिवार दोनों फले-फूलें और तरक्की करें......अगर ऐसे एक भरोसेमंद इंसान के हाथ में हम अपनी कम्पनी और घर की बागडोर अपने जीते जी दे सके, तो हम बहुत चैन से मर सकेंगे बेटी." सैयद साहब ने अपने मन की बात कह दी.

जहाँआरा बिल्कुल चुप थी.

"....इसी मसले पर बात करने के लिये आपको बुलाया था हमने. बताइये, ऐसा कोई है आपकी नज़र में?"

दरवाज़े पर खड़ी रुखसार इन बातों को बड़े गौर से सुन रही थी.

जहाँआरा ने हिचकते हुए कहा "अब्बू कारोबारी मामलों में मेरी समझ तो बिल्कुल भी आप जितनी या अपने भाईयों जितनी नहीं है......ऐसे में मै क्या राय दे सकती हूँ? बेहतर है कि आप अली साहब से राय लीजिये......वह आपके साथ पिछले 40-45 साल से हैं, और आप दोनों ने ही इस कारोबार और कम्पनी को इस मुक़ाम तक पहुँचाया है......वह आपको सौ फीसदी सही और बेहतर राय देंगे".

सैयद साहब ने कहा "बुलाया तो उनको भी है आज इसी मसले पर बात करने के लिये....अभी शाम चार-पाँच बजे तक आयेंगे वह भी.......लेकिन फिर भी, आप हमारी बड़ी बेटी हैं, अपने भाई-बहनों में सबसे बड़ी और सबसे ज़्यादा सुलझी हुई हैं, इसीलिये तो आपको बुलाया है बेटी."

"अच्छा, तो अली साहब भी आज शाम को आयेंगे. शाम चार-पाँच बजे मतलब जब घर में फरीद, मुराद या शुज़ा नहीं होंगे तब." रुखसार ने अपना दिमाग लगा दिया.

जहाँआरा ने सैयद साहब से कहा "फिर भी अब्बू, कारोबार के बारे में मै क्या बोल सकती हूँ?.....कारखाने भी शायद ही कभी गयी होऊँगी मैं....."

सैयद साहब ने मुस्कुराते हुए बीच में ही जहाँआरा की बात काटी ".....सुनिये, सुनिये....आपने शायद हमारी पूरी बात सुनी नहीं. हमने कहा कि कारोबार और घर-परिवार.......दो चीज़ें शामिल हैं इसमें." सैयद साहब ने अपने हाथ की उंगलियों से 'वी' बनाकर इशारा किया.

"मतलब?"

"...मतलब यह बेटी कि सिर्फ कारोबार की ही बात नहीं है. हमारे घर-परिवार और हम लोगों की जो इज़्ज़त, जो मुकाम हमारे माशरे में है, उसकी भी बात है."

जहाँआरा खामोश थी.

सैयद साहब बोल रहे थे "किसी भी काम की शुरुआत घर-परिवार से ही होती है बेटी. अब आप खुद को देखिये. आपकी शादी हो चुकी है, अल्लाह के फज़ल से बच्चे भी हैं और शौहर, बच्चों के साथ आप एक सुकून भरी ज़िंदगी बसर कर रही हैं. आपके सास-ससुर, देवर-देवरानी सभी आपको बहुत पसंद करते हैं और वह सभी आपसे प्यार करते हैं. कुल मिलाकर आपकी ससुराल में ज़िंदगी अच्छी गुज़र रही है. लेकिन यही बात हम रुखसार के बारे में इतने यकीन से नहीं कह सकते हैं......उनकी उनके ससुराल में कुछ न कुछ खटपट चलती ही रहती है. आपकी अम्मी जब ज़िंदा थीं तब, और अभी भी, हम लोग हमेशा रुखसार को कितना ही समझा कर भेजते हैं कि परिवार ऐसे बेतरतीब ढंग से, जेठानियों और ननदों से ऐसे छोटी-छोटी बात पर बहसबाज़ी करने से, हर बात पर ऐसे मुँह फुलाकर बैठ जाने से नहीं चल पाता है, लेकिन ये कुछ समझने को तैयार ही नहीं होतीं…….जेठानी और ननदों की तो बात छोड़िये, इनकी इनके शौहर से आये दिन नाराज़गी हो जाती है. हमारी दो बेटियाँ हैं, लेकिन दोनों के सोचने-समझने के तरीके में फर्क है. एक ने अपना घर अच्छा बनाकर रखा है, और दूसरी ने नहीं........"

जहाँआरा अभी भी चुप थी.

".....यह वो बात है जो हम आपको समझाना चाह रहे हैं."

दरवाज़े पर खड़ी रुखसार को यह सुनकर बहुत ज़्यादा बुरा लगा, और उसका मन किया कि अंदर जाकर अभी सैयद साहब को खरी-खरी सुना दे, लेकिन वह चुपचाप दरवाज़े पर कान लगाये खड़ी रही.

सैयद साहब बोल ही रहे थे ".....और देखिये तो कारोबार या कम्पनी है क्या?......एक तरह का घर-परिवार ही तो है न? फर्क सिर्फ इतना है कि यहाँ हमारे घर-परिवार में 15-20 लोग हैं, और वहाँ करीब 1000-1200 लोग हैं......बाकी तो कोई फर्क है नहीं. कारोबार आखिर हमारे घर के बच्चे ही तो चला रहे हैं, और आगे भी वही लोग चलायेंगे. जो इंसान अपने छोटे से घर-परिवार को सलीके से, प्यार से नहीं रख सकता, जो हमेशा अपने माँ-बाप, भाई-बहनों से बहसबाज़ी और झगड़े में मशगूल रहे, उस से कैसे उम्मीद की जा सकती है कि वह कम्पनी को अच्छे ढंग से चला लेगा? जो अपने घर के लोगों की बात नहीं सुनता, वह कम्पनी के स्टाफ की बात कैसे सुनेगा? जो घर के लोगों की इज़्ज़त नहीं करता, स्टाफ की इज़्ज़त कैसे करेगा?......और कम्पनी तो स्टाफ से चलती है बेटी, और यह बात हम सभी ने बड़ी शिद्दत से महसूस की है. आपकी अम्मी के इंतकाल के बाद, जब हमारी तबियत भी बहुत बुरी बिग़ड़ गयी थी, अगर हम लोगों को हमारे वफादार स्टाफ का साथ न मिला होता तो हमारा पूरा कारोबार अब तक चौपट हो चुका होता. हमारा स्टाफ हमारे साथ हमेशा खड़ा रहा, पता है क्यों?......क्योंकि हमने अपने स्टाफ को भरपूर इज़्ज़त और प्यार दिया है. उसके खिलाफ नहीं गये हम और अपने हर फैसले पर उनकी राय ली......उन्हें ऐसा महसूस नहीं होने दिया कि वे महज़ स्टाफ हैं जिन्हें हम काम के बदले तनख्वाह दे रहे हैं, बल्कि उन्हें ऐसा महसूस कराया कि ये कम्पनी, ये कारोबार उनका भी है, वे भी हिस्सेदार हैं इसमे, और वे भी हमारा परिवार ही हैं."

जहाँआरा ने सिर हिलाकर हामी भरी "जी, बिल्कुल दुरुस्त बात है आपकी".

सैयद साहब ने अब सीधे तौर पर अपना सवाल सामने रखा "हमें यही पूछना है आपसे, कि इतनी बड़ी ज़िम्मेदारी किसको दी जाये?"

जहाँआरा ने पूछा "आपकी नज़र में है कोई?"

सैयद साहब ने कहा "चार बेटे है हमारे........मुराद को तो नहीं बैठा सकते हम ऐसी जगह, इसलिये फरीद, शुज़ा और मिर्ज़ा, इन्हीं तीन बेटों में किसी एक को यह ज़िम्मेदारी देनी होगी."

जहाँआरा ने अपनी बात रखी "देखिये अब्बू, मैं कारोबारी बारीकियाँ ज़्यादा नहीं जानती, लेकिन जैसा कुछ अभी तक आपने बताया है, मेरे ख्याल में फरीद सही रहेंगे......लेकिन वह कारोबारी मामलों में कितने तेज़ है, ये मुझे कुछ भी पता नहीं है."

"और शुज़ा?"

"लोगों के साथ तो शुज़ा का बर्ताव भी अच्छा रहता है......ऐसा कोई ऐब भी नहीं है, लेकिन अब्बू मेरी जानकारी कमज़ोर है, मैं नहीं जानती कि शुज़ा असल में कारोबार में कितना अच्छा काम करते हैं."

"और मिर्ज़ा?"

जहाँआरा ने हँसकर कहा "मिर्ज़ा तो मिर्ज़ा हैं अब्बू!!.....उनकी तो बात ही अलग है. मुश्किल काम को हमेशा आसान बना देने की गज़ब की काबिलियत है उनमें, लेकिन दूसरों से तालमेल बिठाने, या दूसरों की बात सुनने की उनकी फितरत नहीं है."

सैयद साहब ने मुस्कान के साथ कहा "यही तो उलझन है बेटी. जो सबको साथ लेकर चल सकता है, सबको प्यार और इज़्ज़त दे सकता है, उसकी कारोबारी समझ कुछ कम है, और जो कारोबारी समझ में माहिर है, वह किसी की सुनता नहीं, और सबको साथ लेकर नहीं चल सकता...........हम इसी बात से परेशान हैं."

इसी मुद्दे पर बातें वह दोनों करते रहे.

रुखसार ने यह बातें सुनकर मन ही मन गणित की "...अच्छा, तो फरीद भाईजान और मिर्ज़ा के बीच में फँसे हैं अब्बूजान!....लेकिन जहाँआरा आपा तो सीधे तौर पर फरीद भाईजान की तरफदारी कर रही हैं." इसके बाद रुखसार वहाँ से बिना आवाज़ किये हट गयी.

थोड़ी देर बाद जहाँआरा भी सैयद साहब के कमरे से निकलकर अपने कमरे में चली गयी.

शाम के करीब 4:30 बज रहे थे, और रुखसार अपने कमरे की खिड़की से बड़ी बेचैनी से सड़क की ओर देख रही थी और अली साहब के आने का इंतज़ार कर रही थी. जैसी ही अली साहब गेट खोलकर अंदर दाखिल हुए, रुखसार तेज़ी से भागकर रसोई में पहुँची और चाय बनाने की तैयारी शुरु कर दी.

दरवाज़े पर दस्तक सुनकर जहाँआरा दरवाज़ा खोलने गयी. उसने दरवाज़ा खोलकर बड़े अदब से सलाम किया "अस्सलाम वालेकुम अली साहब!!". अली साहब ने प्यार से उसे गले लगा लिया और पूछा "सैयद साहब कहाँ हैं बेटी?"

"अ‍पने कमरे में ही हैं अब्बू, आइये आप." जहाँआरा ने कहा और अली साहब को सैयद साहब के कमरे तक ले गयी.

"आइये, आइये अली साहब, हम आप ही की राह देख रहे थे." अली साहब को गले लगाते हुए सैयद साहब बोले. जहाँआरा ने मुस्कुराकर कहा "आप लोग बातें कीजिये, मै चाय बनाती हूँ."

जहाँआरा जब रसोई में पहुँची तो देखा वहाँ रुखसार अदरख कूट रही थी. "अरे रुखसार!!...तुम यहाँ रसोई में?" जहाँआरा ने ताज्जुब किया.

रुखसार ने हँसकर कहा "जी आपा, अली साहब को आते मैंने देख लिया था कुछ देर पहले ही, इसलिये चाय बनाने मैं आ गयी. आप अपने कमरे में जायें, मैं आपकी चाय वहीं ले आती हूँ."

जहाँआरा मुस्कुराई, और अपने कमरे में चली गयी.

चाय बनाकर रुखसार पहले जहाँआरा के कमरे में ले गयी. चाय रखते हुए बोली "ये लीजिये चाय आपा. अभी मैं अब्बू के कमरे में चाय लेकर जाती हूँ." इतना कहकर और चाय रखकर वह चली गयी.

सैयद साहब के कमरे के बाहर वह फिर से बिल्कुल चुप होकर खड़ी हो गयी.

"जी कैसे याद किया सैयद साहब?...कौन सी उलझन है आपकी जिसने तंग कर रखा है आपको?" अली साहब मुस्कुराकर बोले.

सैयद साहब ने कहा "सोच रहे हैं अली साहब, मेरे बाद इस कम्पनी और मेरे घर-परिवार का क्या होगा?"

"ऐसा क्यों सोच रहे हैं आप?......अल्लाह की मेहर से बिल्कुल चुस्त-दुरुस्त हैं आप अभी. 20-25 बरस तो कहीं नहीं जा रहे आप" अली साहब ने कहा.

"अरे नहीं अली साहब, उम्र हो चली है अब......दवाओं पर ज़िंदा हैं बस. बुलावा तो कभी भी आ सकता है. उससे पहले एक बार कम्पनी और अपने परिवार की बागडोर किसी ज़िम्मेदार इंसान के हाथ मे दे दें बस, फिर चैन से मर जायेंगे......नहीं तो जन्नत में भी चैन न मिलेगा."

अली साहब बोले "अरे मरें आपके दुश्मन!!, ये क्या अजीबोगरीब खयालात अपने मन में ला रहे हैं आप?" 

मुस्कुराकर सैयद साहब ने कहा "सच्चाई है ये अली साहब. जितना जल्दी इसे मान लें, उतनी तकलीफ कम होगी आगे जाकर.....इस दुनिया में कोई हमेशा के लिये घर बनाने के वास्ते थोड़ी आता है अली साहब?......मुसाफिर है इंसान, इस सराय में रुकने आया है. कभी तो जाना ही होगा."

"फिर भी अभी बहुत वक़्त है." अली साहब ने कहा.

"इसीलिये तो अली साहब!!....इसीलिये ये तय करना बेहद ज़रूरी है कि कारोबार और घर का मालिक किसे बनाया जाये?....ताकि अगर कोई गलती हो जाये फैसला लेने में, तो वह सुधारी भी जा सके."

अली साहब अब खामोश थे. सैयद साहब ने आगे पूछा "बताइये न अली साहब! किसके हाथ में कमान दी जाये?"

अली साहब ने कहा "ये कीड़ा आपके दिमाग में उठा है न!!.....तो बताइये कि अपने होने वाले जानशीन में क्या-क्या खूबियाँ देखना चाहते हैं आप?....कुछ तो सोचा होगा आपने भी?"

"पिछले 40-45 सालों से आप हमारे साथ हैं अली साहब, और हम यह कह सकते हैं कि हमारी मरहूम बेगम के बाद आप ही हैं जो हमें हमसे भी ज़्यादा जानते हैं. आप कहिये, वह इंसान कैसा होना चाहिये जिसकी निगेहबानी में हमारा कारोबार और हमारा घर-परिवार तरक्की कर सके, और आबाद रहे?" सैयद साहब ने कहा.

"जानशीन ऐसा होना चाहिये, जिसके अंदर दो खूबियाँ ज़रूर हों. एक तो यह कि कारोबारी मामलों की बेहतर समझ हो, साथ ही यह भी कि यहाँ घर में अपने और अपने भाई-बहनों के परिवारों, और वहाँ दफ्तर में अपने स्टाफ को साथ लेकर चल सके. उन्हें यह एहसास दिला सके कि वह उन सभी को बहुत प्यार करता है, पूरी इज़्ज़त देता है, और उसके साये में वे सभी महफूज़ हैं." अली साहब ने साफ-साफ कहा.

"वही तो अली साहब. यही बातें हमने भी सोची हैं कि उस इंसान के अंदर ज़रूर हों. जो घर-परिवार और रिश्तों को अच्छा रख लेगा, जो हमारे स्टाफ को अच्छा रख लेगा वही कारोबार भी अच्छा कर लेगा. जिस से अपने रिश्ते नहीं सम्भाले गये, और जिसने स्टाफ के बारे में नहीं सोचा, वह कारोबार भी गर्क कर देगा." सैयद साहब बोले.

"तो क्या सोचा है आपने?.....किसी का नाम तो सोचा होगा आपने ज़ेहन में?" अली साहब ने पूछा.

"दो नाम हैं, इन्हीं में से किसी एक पर मुहर लगानी है."

"कौन से दो नाम?"

"जी फरीद और मिर्ज़ा."

यह सुनकर रुखसार ने बिल्कुल इसी वक़्त कमरे का दरवाज़ा खोला, चाय की ट्रे लेकर वह कमरे में दाखिल हुई और धीरे-धीरे सोफे की मेज की तरफ बढ़ने लगी.

इतने में अली साहब ने सैयद साहब से कहा "मेरे खयाल में फरीद बेहतर साबित होंगें."

"एक मिनट, एक मिनट......चाय लीजिये पहले." यह कहते हुए सैयद साहब ने अली साहब को चुप रहने का इशारा किया. चाय की ट्रे मेज पर रखते हुए रुखसार ने अपनी नीचे झुकी हुई लेकिन तेज़, तिरछी निगाहों से इसे देख लिया था. वह दोनों के लिये चाय निकाल कर रख रही थी. अली साहब और सैयद साहब अभी खामोश थे.

चाय रखकर रुखसार कमरे से बाहर आ गयी, और पहले की तरह बिल्कुल चुपचाप दरवाज़े पर कान लगाकर खड़ी हो गयी.

सैयद साहब ने चाय पीते हुए पूछा "फरीद क्यों बेहतर होंगे अली साहब?"

अली साहब ने चाय की चुस्कियों के साथ अपनी बात रखी "देखिये साहब, ये बात तो हम सभी मानते हैं कि कारोबारी समझ के मामलों में और अहम फैसले लेने में फरीद, मिर्ज़ा के मुकाबले उन्नीस ही रहते हैं. पिछले दस-एक सालों में मिर्ज़ा से कारोबारी राय-सलाह लेने और उस पर अमल करने से हमें काफी फायदा भी हुआ है, इसमें दो राय नहीं है. इंतज़ामियत में वह एक बड़े ओहदे पर हैं, आई.सी.एस. हैं, इसका भी हमें फायदा ही होना है.......लेकिन कारोबारी ज़बान में हम जिसे कहते हैं 'मैन मैनेजमेंट स्किल', वहाँ पर फरीद बीस नहीं बल्कि एक्कीस ही लगते हैं...."

सैयद साहब सुन रहे थे.

".....आप दफ्तर या कारखाने में ही देख लीजिये, एक मामूली से स्वीपर और ट्रांसपोर्टर के एक अदने से ट्रक ड्राईवर से लेकर मैनेजरों, बड़े डिस्ट्रीब्यूटरों, कारोबारी साझीदारों तक को फरीद बिल्कुल नाम से जानते हैं, और न केवल जानते बल्कि उन सभी के साथ उनके बेहद शानदार ताल्लुक़ात भी रहते हैं. कारखाने में किस मजदूर के घर कौन बीमार है, किसके घर शादी है, किस मैनेजर के यहाँ नाती-पोता पैदा हुआ है, फरीद को सब पता होता है. वे सबके घर जाते हैं और कम्पनी की तरफ से मदद भी देते हैं.......और सच पूछिये तो यही सब वह छोटी-छोटी मगर अहम बातें हैं जिनकी वजह से हमारा स्टाफ किसी भी हालत में हमारे साथ मज़बूती से खड़ा रहता है, और हमारा कारोबार अच्छा बढ़ रहा है."

"लेकिन अली साहब, आप ये कानपुर और माधवपुर वाला मामला देख लीजिये. हम सब ने पूरा ज़ोर लगा दिया था, कितना समय भी ज़ाया किया लेकिन हुआ नहीं कुछ, जब तक कि मिर्ज़ा लखनऊ जाकर कपूर साहब से नहीं मिले. मिर्ज़ा के उनसे मिलते ही हमारा काम कितनी जल्दी हो गया.....और फिर दिल्ली और पंजाब में अपना कारोबार जमाने के लिये भी हम मिर्ज़ा के ऊपर ही निर्भर हैं, और दिल्ली में तो हम सही रास्ते पर काफी आगे बढ़ चुके हैं, जैसा आप बता ही रहे थे. ऐसे में मिर्ज़ा को कमान देना क्या ठीक नहीं होगा?" सैयद साहब ने कहा.

"बिल्कुल वज़ा फरमाते हैं आप. आपकी बात से हम इंकार नहीं कर रहे हैं बल्कि हमने तो पहले ही कहा आपसे कि मिर्ज़ा के साथ कुछ ऐसी खूबियाँ ज़रूर है, जिसकी हमारे कारोबार में काफी अहमियत है.....लेकिन साहब, आप याद कीजिये अपने अब्बा हुज़ूर की बातें, वह लगातार कहते थे कि पैसा और कारोबार में नफा-नुकसान हाथ का मैल है......आज है, कल नहीं है, लेकिन परसों फिर आ जायेगा. लेकिन किसी कारोबारी की असल दौलत होते हैं उसके अपने वफादार लोग यानि कि उसका स्टाफ. आप उससे पैसा लूट लो, उसकी दुकान जला दो, लेकिन अगर उसके वफादार लोग उसके साथ बने रहे तो कल को वह पहले से कहीं बड़ी दुकान खड़ी कर लेगा, पहले से कहीं ज़्यादा पैसे कमा लेगा लेकिन जो उसके लोगों ने उसका साथ छोड़ दिया, फिर वह कहीं का नहीं रहेगा...."

सैयद साहब, अली साहब की बातें गौर से सुन रहे थे, और अपने अब्बू की सलाहें याद कर रहे थे.

अली साहब ने बोलना जारी रखा ".....फरीद के साथ हमारे स्टाफ, और न सिर्फ स्टाफ बल्कि दूर-दराज़ के कारोबारी साझीदारों से बॉन्डिंग भी काफी अच्छी है. दिल्ली में ही देख लीजिये, फरीद वहाँ लगातार जाकर लोगों से मिल रहे हैं, बात कर रहे हैं, और हम वहाँ बिल्कुल सही रास्ते पर जा रहे हैं.......इसी तरह लखनऊ, कलकत्ते, जयपुर तक में फरीद की कितनी अच्छी जान-पहचान है, और उसका फायदा क्या हो रहा है, आपसे छिपा नहीं है."

"मिर्ज़ा को हम लोग बचपन से देखते आ रहे हैं, उनकी सोच कभी-कभी ज़रूरत से ज़्यादा सख्त और गैर-अमली हो जाती है. ये सही बात है कि ज़रूरत से ज़्यादा नरमी नुकसानदेह हो सकती है, लेकिन ये भी सही बात है कि ज़रूरत से ज़्यादा सख्ती, और वो भी बिजनेस में तो कतई ही नुकसानदेह होती है......"

"....और कानपुर या माधवपुर की बात आप कर रहे हैं. ये सही है कि मिर्ज़ा की वजह से ये काम हो सका है, जो कि अच्छी बात है, लेकिन सैयद साहब, पिछले दो बरस से यह मामला लटका पड़ा था. आप यह बताएं कि पिछले दो बरस में क्या कम्पनी को इस वजह से कुछ नुकसान उठाना पड़ा कि कानपुर और माधवपुर में हम कारोबार नहीं कर पा रहे हैं?"

"नहीं, ऐसा कुछ खास नुकसान तो हुआ नहीं. बाकी जगह तो कारोबार काफी अच्छा ही चल रहा था, तो कानपुर या माधवपुर से ज़्यादा कुछ फर्क नहीं आया." सैयद साहब ने जवाब दिया.

अली साहब ने कहा "मैं वही कहना चाह रहा हूँ सैयद साहब. चाहे कारोबार हो, या फिर ज़ाती ज़िंदगी, रिश्तों और अपनों की कीमत, सपनों से ज़्यादा ही होती है. कभी रिश्तों या अपनों को दाँव पर लगाकर तरक्की हासिल नहीं हो सकती और अगर हासिल हो भी गयी, तो भी उस तरक्की की उम्र बहुत कम होगी."

सैयद साहब अभी भी चुप थे. 

"और फिर मिर्ज़ा अपने घर के बच्चे है. क्या घर के काम में इतनी मदद भी नहीं कर सकते?........आप ने उनको पढ़ाया लिखाया, इस काबिल बनाया कि वो आई.सी.एस. जैसा इम्तेहान पास कर सके, एक-दो बार नाकाम रहने पर भी आपने उनका पूरा साथ दिया. अब अगर उन्होनें कानपुर और माधवपुर वाला मसला सुलझा लिया तो ये तो काफी अच्छी बात है."

"देखिये सैयद साहब, मैं जो बताना चाह रहा हूँ कि अपनों का प्यार, भरोसा और इज़्ज़त बहुत बड़ी चीज़ होता है साहब, और बहुत ही मुश्किल से हासिल किया जाता है, रुपया-पैसा कभी भी वह अहमियत हासिल नहीं कर सकता." अली साहब ने कहा.

सैयद साहब ने फिर अपनी उलझन सामने रखी "लेकिन अली साहब. जिसको आप 'मैन मैनेजमेंट स्किल' कह रहे हैं, और जहाँ आप फरीद को आगे बता रहे हैं, हमारे ख्याल से 'मैन मैनेजमेंट स्किल' तो एक तजुर्बेकार नौकरशाह की ही सबसे अच्छी होगी......आखिर लाखों की आबादी का ज़िला चलाने वाला कलेक्टर ही होता है जिसकी कलम से फैसले होते हैं. वही ज़िले के हर विभाग का प्रमुख होता है, सारे काम उसी के ऑर्डर से होते हैं, सारी फाईलें उसी की मेज से होकर जाती हैं, ऐसे में उसकी 'मैन मैनेजमेंट स्किल' तो सबसे बेहतर होगी न?....और फिर मिर्ज़ा को तो दस-बारह साल हो चुके हैं यह करते-करते?"

अली साहब ने समझाया "जो आप कह रहे हैं, वह सारी बात अपनी जगह सही है सैयद साहब, लेकिन एक बात पर ध्यान दीजिये कि एक नौकरशाह के हाथ में कितनी ताकत होती है. पूरा का पूरा सिस्टम उसके पीछे खड़ा होता है. किसी ज़िले के जितने भी सरकारी मुलाज़िम होते हैं, चाहे पुलिस हो या कोई भी, सब उसकी कलम के आगे डरे-सहमे रहते हैं.......वह जो चाहे, वह काम डंके की चोट पर, लोगों को कानून और जेल का डर दिखाकर करवा सकता है. कितने ही लोगों की नौकरियाँ वह एक झटके में छीन सकता है, और उसके बाद भी उसके किसी काम में रुकावट नहीं आती है.......लोग उनके ऑर्डर को इसलिये नहीं मानते कि वो मानना चाहते हैं, या कि उस नौकरशाह से बहुत प्यार करते हैं, बल्कि इसलिये मानते हैं कि अगर नहीं मानेंगे तो उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई हो जायेगी. यहाँ हम कारोबार कर रहे हैं, हमारे पास सिस्टम की ऐसी कौन सी ताक़त है? हम किसको जेल या कानून का डर दिखा कर अपना काम करवा सकते हैं?.....हमारी बात हमारा स्टाफ इसलिये मानता है क्योंकि वह हमसे प्यार करता है, हमारी इज़्ज़त करता है, और यह इसलिये है कि हम अपने स्टाफ के दिल में खौफ बना कर नहीं रखते हैं. किसी नौकरशाह का काम तो खौफ के बगैर चल ही नहीं सकता है, जबकि कारोबार में खौफ की तो कोई जगह नहीं होती है."

सैयद साहब सुन रहे थे.

"....और फिर यह भी तो बात है साहब कि नौकरशाह, अपनी नौकरी और ओहदे को लेकर बेफिकर रहता है. उसको पता है कि एक बार आई.सी.एस. बन जाने के बाद किसी का बाप भी उसको 60 साल तक नौकरी से नहीं हटा सकता, उसको मिलने वाले गाड़ी-बँगले, सुविधाएं नहीं छीन सकता, उसकी पगार में एक पैसे की कमी तक नहीं कर सकता. उसका इंक्रीमेंट और प्रमोशन सब अपने समय से खुद-ब-खुद हो जाता है. इसीलिये वह इस बेखौफ, बेफिक्र तरीके से काम करता है, और लोग उस से डरते हैं. यहाँ हम अपना कारोबार चला रहे हैं. हमें कुछ नहीं पता कि कब हमें मुनाफा होगा, कब घाटा ; न हमारी ऐसी कोई पक्की नौकरी है कि काम करें या न करें, 60 बरस तक बैठ कर खायेंगे. न हमें बँगला मिलता है, न ही गाड़ी, न हमारा इंक्रीमेंट होता है, न प्रमोशन, लेकिन अपने स्टाफ को टाइम पर हमें पगार देनी होती है, उसकी मेहनत का आकलन करके उसको इंक्रीमेंट भी देना होता है, और उसको कम्पनी के भीतर हम प्रमोशन भी देते हैं.......मेरा मतलब यह है, कि एक नौकरशाह के ज़िला चलाने, और एक कारोबारी के कारोबार करने में कोई तुलना नहीं की जा सकती है. नौकरशाह ज़िला चलाता है डंडे के ज़ोर पर लेकिन हम डंडे के ज़ोर पर कारोबार नहीं कर सकते हैं. एक नौकरशाह के लिये सख्त होना अच्छा होता है, लेकिन एक कारोबारी के लिये लचीला होना बहुत ज़रूरी है.......मिर्ज़ा डंडा चलाते हैं, फरीद लचीले हैं." अली साहब ने तफ्सील से समझाया.

कुछ सोचते हुए सैयद साहब ने पूछा "क्या जहाँआरा को बागडोर नहीं दी जा सकती अली साहब?"

यह सुनकर रुखसार के कान खड़े हो गये थे.

अली साहब ने ताज्जुब करते हुए कहा "क्या बात करते हैं सैयद साहब?.....जहाँआरा को इतनी बड़ी ज़िम्मेदारी कैसे दे सकते हैं?....उनकी अपनी ससुराल की ज़िंदगी है, उसका क्या होगा?.....नहीं, नहीं, मैं आपको ये सलाह तो बिल्कुल नहीं दूँगा. फिर आगे चलकर इसमें एक कानूनी पेँच भी फँस सकता है."

"क्या?"

"पहले तो जहाँआरा को बागडोर देने से आपको आपके बेटों के गुस्से का सामना करना पड़ सकता है. फिर कल को जहाँआरा के बच्चे जो बड़े हुए, तो इस कारोबार पर वह अपना भी हक़ समझने लगेंगे, और फरीद, शुज़ा, मिर्ज़ा और मुराद के बच्चों से उनकी लड़ाई ही होती रहेगी." अली साहब ने समझाया.

"ह्म्म्म्म.....यह तीसरी बात तो सोची भी नहीं हमने." सैयद साहब ने कहा. फिर कुछ देर बाद बोले "...लेकिन इल्तुतमिश ने भी तो रज़िया सुल्तान को अपना जानशीन बनाया था."

अली साहब ने कहा "रज़िया सुल्तान केवल सुल्तान ही थी, एक कामयाब सुल्तान के तौर पर तो गिनती नहीं होती उसकी........आप खुद सोचिये कि अपनी कम्पनी के लिये आप क्या चाहते हैं?"

".....आखिर इंदिरा भी तो बनी हैं न वज़ीर-ए-आज़म इस मुल्क की?" सैयद साहब ने फिर अपनी बात रखी.

"जी, और वो इसलिये क्योंकि नेहरू जी का कोई बेटा नहीं था......फिर नेहरू जी के चापलूसों और सिपहसालारों ने इंदिरा को वज़ीर-ए-आज़म बनाया ही इसलिये है जिससे उस मोम की गुड़िया को वे अपनी उँगलियों पर नचा सके." अली साहब बोले.

सैयद साहब उन्हें देख रहे थे.

"इसीलिये मैंने शुरु में कहा था कि फरीद बेहतर होंगे इस काम के लिये." अली साहब ने कहा.

यह सारी गुफ्तगू सुनकर, रुखसार वहाँ से हट गयी और अपने कमरे में चली गयी.

 इस बीच मौलवियों, और उलेमाओं के कड़े विरोध के बीच रशीदा नक़वी ने हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील भी दायर कर दी थी.

रुखसार अपने कमरे में इधर से उधर बेचैन होकर टहल रही थी. उसे यह बात साफ-साफ समझ में आ रही थी, कि घर और कारोबार की बागडोर फरीद के हाथों में जाने वाली थी. सैयद साहब, अली साहब और जहाँआरा, ये तीनो इस बात पर रज़ामंद थे कि ये बेहद अहम ज़िम्मेदारी फरीद को दी जानी चाहिये, क्योंकि एक भाईयों में एक वही हैं जो सभी की बात सुनते-समझते हैं, और सभी को साथ में लेकर चल सकते हैं. मिर्ज़ा को इस लायक समझा नहीं जा रहा है. रुखसार यही सोच रही थी कि "......जब सभी इस बात पर राज़ी हैं, कि कारोबारी समझ मिर्ज़ा की फरीद से कहीं ज़्यादा है, जब मिर्ज़ा फैसले लेने के मामले में भी फरीद से बेहतर हैं, जब मिर्ज़ा इंतज़ामियत में एक बड़े ओहदे पर काबिज़ एक सीनियर अफसर हैं, फिर तो कारोबार की बागडोर मिर्ज़ा को ही मिलनी चाहिये. फरीद भाई को क्यों तवज्जो दी जा रही है?.........पहले जहाँआरा और अली साहब ने अब्बू के दिल-ओ-दिमाग पर जादू सा कर दिया है कि फरीद मिर्ज़ा से बेहतर हैं."

इसी के साथ-साथ रुखसार के दिमाग में यह भी बात आ रही थी कि "......फरीद के हाथ में बागडोर जाने का मतलब है, कि अब्बा हुज़ूर के गुज़र जाने के बाद फरीद के ऊपर जहाँआरा की पकड़ और भी ज़्यादा मज़बूत हो जायेगी, यानि कारोबार से जुड़े मामलों में भी जहाँआरा का दखल ज़ाहिर तौर पर बढ़ ही जायेगा. और इसका सीधा ये मतलब है कि घर में भी जो रुतबा जहाँआरा का अभी है, वह और ज़्यादा बढ़ जायेगा, और इसी बात का ये भी मतलब है कि घर में रुखसार का पलड़ा और भी ज़्यादा कमज़ोर हो जायेगा. फरीद अभी ही जहाँआरा की बात कितनी ज़्यादा मानते हैं जबकि अब्बू ज़िंदा हैं, जब अब्बू नहीं रहेंगे तो फरीद तो पूरी तरह जहाँआरा के चंगुल में ही आ जायेंगे.......और अब्बा हुज़ूर के क्या कहने!! वह भी जहाँआरा पर ही सबसे ज़्यादा भरोसा करते हैं. अपना जानशीन उनको चुनना है, यह बात उन्होनें घर में किसी से नहीं कही, यहाँ तक कि अपने बेटों से भी नहीं. अपनी छोटी बेटी रुखसार से भी नहीं. सिर्फ और सिर्फ जहाँआरा से ही उन्होने यह बात साझा की.....इसका मतलब ही यही है कि अब्बू अपनी सभी औलादों में जहाँआरा को ही सबसे बेहतर मानते हैं. उन्होने तो अली साहब से यहाँ तक पूछ लिया "क्या जहाँआरा के हाथ में बागडोर दी जा सकती है?", जहाँआरा को गद्दी पर बिठाने के लिये रज़िया सुल्तान और इंदिरा गाँधी तक की बात कर डाली उन्होनें……मतलब अब्बू जहाँआरा को लेकर यहाँ तक सोचते हैं…."

रुखसार को यह बात आज फिर से हद से ज़्यादा बुरी लग रही थी कि हर बार उसकी जहाँआरा से तुलना की जाती है. पिछले 20-22 सालों में हर बार, बचपन से लेकर आज शादी के बाद तक, रुखसार को बेइज़्ज़ती का ये घूँट पीकर चुप रह जाना पड़ता था कि 'जहाँआरा, रुखसार से बेहतर है.' हर कोई यही बात कह देता था और बेचारी रुखसार अपने कमरे में अकेले जाकर तकिये में मुँह छिपाकर रोया करती थी. आज सैयद साहब ने फिर से उसके ज़ख्मों पर नमक रगड़ दिया था, और वो भी किसके सामने?.....जहाँआरा के ही सामने. सैयद साहब ने सीधे-सीधे ही जहाँआरा से कहा था "......आपके सास-ससुर, देवर-देवरानी सभी आपको बहुत पसंद करते हैं और वह सभी आपसे प्यार करते हैं. कुल मिलाकर आपकी ससुराल में ज़िंदगी अच्छी गुज़र रही है. लेकिन यही बात हम रुखसार के बारे में इतने यकीन से नहीं कह सकते हैं......उनकी उनके ससुराल में कुछ न कुछ खटपट चलती ही रहती है. आपकी अम्मी जब ज़िंदा थीं तब, और अभी भी, हम लोग हमेशा रुखसार को कितना ही समझा कर भेजते हैं कि परिवार ऐसे बेतरतीब ढंग से, जेठानियों और ननदों से ऐसे छोटी-छोटी बात पर बहसबाज़ी करने से, हर बात पर ऐसे मुँह फुलाकर बैठ जाने से नहीं चल पाता है, लेकिन ये कुछ समझने को तैयार ही नहीं होतीं…….जेठानी और ननदों की तो बात छोड़िये, इनकी इनके शौहर से आये दिन नाराज़गी हो जाती है. हमारी दो बेटियाँ हैं, लेकिन दोनों के सोचने-समझने के तरीके में फर्क है. एक ने अपना घर अच्छा बनाकर रखा है, और दूसरी ने नहीं........". इसको लेकर रुखसार बहुत दु:खी थी कि आज उसके अब्बू ने फिर से जहाँआरा के सामने उसे बहुत छोटा साबित कर दिया था.

रुखसार सोच रही थी "अभी भी जहाँआरा अब्बू के दिल पर राज करती है और रुखसार कहीं नहीं है, और सिर्फ अब्बू ही क्यों, हर कोई जहाँआरा का मुरीद है, और रुखसार की तो जैसे कोई हस्ती ही नहीं है, न उसकी ससुराल में, न उसके मायके में. काश कि रुखसार के हाथ में कोई एक कत्ल माफ होता तो जहाँआरा का गला काट देती वो.......बहन न हुई, पनौती हो गयी है. हर जगह रुखसार की खुशियों को बरबाद करने के लिये जहाँआरा हाज़िर रहती है. बचपन से लेकर आज तक रुखसार की ज़िंदगी की यही एक सच्चाई रही है."

".....अब वो वक़्त आ गया है कि रुखसार जहाँआरा का सिर अपने पैरों तले कुचल सके. अब वो वक़्त आ पहुँचा है कि रुखसार जहाँआरा की हस्ती को धूल में मिला दे, और उसके गुरूर को ज़मींदोज़ कर सके. अब वो घड़ी आ गयी है कि बचपन से लेकर आज तक जहाँआरा की वजह से उसकी जो भी बेइज़्ज़ती हुई है, वह अब सबका बदला एक-एक करके लेगी. वह फरीद की बजाय, मिर्ज़ा को सैयद साहब का जानशीन बनाने के लिये पूरा ज़ोर लगा देगी........हाँ, रुखसार बिल्कुल ऐसा ही करेगी. वह जहाँआरा की ताक़त इस घर में कतई बढ़ने नहीं देगी. वह फरीद को जानशीन कतई नहीं बनने देगी. जो काबिल है, जो लायक है, जो ताक़तवर है और जो मज़बूती से फैसले ले सकता है, जानशीन वही बनेगा. जो नाकाबिल है, जो नालायक है, जो कमज़ोर है और जो मज़बूती से फैसले नहीं कर सकता, वह बिल्कुल जानशीन नहीं बनेगा. मिर्ज़ा ही जानशीन होगा इस घर का और इस कारोबार का, फरीद भाईजान बिल्कुल नहीं.........हाँ, रुखसार यही करेगी!!!.....उसके सोच लिया है, रुखसार यही करेगी!!"

अली साहब और सैयद साहब की इस अहम मुलाक़ात के करीब पंद्रह दिन बाद तक रुखसार सारी गुणा-गणित अपने मन में करती रही थी. वह जल्दबाज़ी में कोई कदम लेना नहीं चाहती थी. हर तरफ से होने वाले नफे-नुकसान को वह बारीकी से तौल रही थी, और काफी सोच-विचार करने के बाद उसने फैसला किया कि वह मिर्ज़ा को ये बातें बता देगी, और उन्हें राज़ी करने की भरपूर कोशिश करेगी कि आगे बढ़कर वह परिवार और इस कारोबार की बागडोर अपने हाथ में लें, वह उनको समझायेगी कि मिर्ज़ा, फरीद के मुकाबले ज़्यादा काबिल और होशियार हैं, लिहाज़ा जानशीन तो वही होने चाहिये. 

यही सब बातें सोचकर वह एक इतवार की दोपहर अपने घर के कॉमन हॉल में रखे टेलीफोन के पास आयी जब वहाँ आस-पास कोई नहीं था. सभी लोग खाना खाने के बाद सो रहे थे. रुखसार ने मिर्ज़ा को फोन लगा दिया.

इतवार होने की वजह से मिर्ज़ा भी घर पर ही थे. टेलीफोन की घंटी बजी तो मिर्ज़ा ने ही फोन उठाया "हैलो!!"

"हैलो!!, मिर्ज़ा,…..हम रुखसार बोल रहे हैं सौघरा से."

"जी, जी आपा, अस्सलाम वालेकुम!!" मिर्ज़ा ने मुस्कुराकर कहा.

"वालेकुम अस्सलाम मिर्ज़ा!!....और कहिये कैसे हैं आप?"

"बस आपा, आप लोगों की दुआएं, और अल्लाह की नेमत है, खैरियत है सब......और आप बताएं, वहाँ ठीक है सब?.....अब्बा हुज़ूर का क्या हाल है?"

"यहाँ भी ठीक है सब. अब्बा हुज़ूर भी ठीक हैं."

"कहिये आपा, कैसे याद किया?"

"बस ऐसे ही मिर्ज़ा, आपसे बात करने का दिल किया. काफी दिनों से आपसे बात नहीं हुई थी हमारी."

"जी आपा, सही कह रही हैं आप……..अपनी सुनाएं आपा, क्या हाल हैं?"

"हमारा हाल तो ठीक है मिर्ज़ा.....हमें तो आपकी फिक्र रहती है, आप छोटे भाई हैं हमारे आखिर."

"हमारी फिक्र मत कीजिये आपा, यहाँ पर तो हम और हमारा परिवार, दोनों ही आराम से हैं बिल्कुल."

"....लेकिन यहाँ चीज़ें वैसी नहीं चल रही हैं जैसा आप सोच रहे हैं मिर्ज़ा....इसीलिये आपकी फिक्र है हमें." रुखसार ने चालाकी से बात की.

"क्या मतलब?"

रुखसार ने चारों तरफ देखते हुए फोन पर धीरे से कहा "पहले आप वायदा कीजिये कि जो कुछ हम आपको बताने जा रहे हैं, सिर्फ हमारे और आपके बीच में ही रहे, किसी भी तीसरे शख्स को गलती से भी पता न लगे. यह बात आप किसी को बताएंगे नहीं, कसम खाइये हमारी."

मिर्ज़ा मुस्कुराए "अरे!! ऐसी भी क्या बात हो गयी आपा?"

रुखसार ने कहा "है कुछ बात मिर्ज़ा.....वादा कीजिये कि किसी को भी आप कुछ नहीं बताएंगे."

मिर्ज़ा ने कहा "हम वादा करते हैं आपसे आपा, हमारी-आपकी ही बात रहेगी....आप बेफिक्र होकर बताएं. हमसे आगे यह बात कहीं नहीं जायेगी."

रुखसार ने बताया "दरअसल यहाँ अब्बा हुज़ूर अब अपना जानशीन खोज रहे हैं, जो उनके बाद इस कारोबार और इस परिवार की निगेहबानी करे."

"क्यों?.....मतलब तबियत ज़्यादा खराब है क्या उनकी?"

"नहीं लेकिन शायद उन्हें लगता है कि अब जिस्म में जान नहीं बची है....बुलावा कभी भी आ सकता है."

"अच्छा, फिर?"

अब्बा हुज़ूर ने इस बात को लेकर लोगों से राय-मशविरा भी शुरु कर दिया है, और जिस इंसान से सबसे पहले राय ली, वो हैं जहाँआरा आपा."

"ये तो होना ही था, आपा सबसे बड़ी और समझदार भी हैं, और अब्बू के शायद सबसे ज़्यादा करीब भी......उनसे तो अब्बू एक बार ज़रूर पूछेंगे."

रुखसार को मिर्ज़ा का जहाँआरा की तारीफ करना कुछ बुरा ज़रूर लगा लेकिन उसने गुस्सा ज़ाहिर नहीं किया और आगे कहा "...और जानते हैं मिर्ज़ा, केवल इसी बात पर सलाह करने के लिये अब्बा ने जहाँआरा को एक दिन सुबह ही उनके ससुराल से घर बुलवा लिया था, और यहाँ घर में किसी को इस बात का पता नहीं लगने दिया."

"अच्छा, फिर?"

"उसी रोज़ शाम को अली साहब भी आये थे, जब घर में फरीद भाई, शुज़ा और मुराद नहीं थे तब. उनसे भी अब्बू ने इस पर लम्बी बात की........वह तो मैं चाय देने गयी थी, तो इत्तेफाक़ से मैंने सुन लिया नहीं तो मुझे भी कुछ पता नहीं चलता इन बातों का. अब्बू ने इसे राज़ रखने की पूरी कोशिश भी की थी......इसीलिये मैं कह रही हूँ कि ये बात मेरे-आपके बीच में ही रहनी चाहिये."

"ह्म्म्म्म.....तो क्या बातें हुईं?"

"अब्बू के दिल में तो यही था कि जहाँआरा आपा को यह ज़िम्मेदारी दे दी जाये, लेकिन अली साहब ने कई सवाल उठा दिये, जिस से अब्बू बाद में पीछे हट गये."

"अच्छा, फिर?"

"अली साहब ने दो नाम सुझाये हैं. बिल्कुल यही दो नाम आपा ने भी अब्बू को सुझाये थे. उन दोनों की बातों से अब्बू राज़ी भी हो सकते हैं."

"कौन-कौन से दो नाम?.....और दो जानशीन थोड़ी होंगे, एक ही होगा न कोई?"

"हाँ जानशीन एक ही होना है. अब इस से ज़्यादा बात मैं फोन पर नहीं कर सकती, वैसे भी फोन यहाँ हॉल में रखा हुआ है, जहाँ कोई न कोई आता-जाता ही रहता है.......आप एक चक्कर सौघरा का लगा जाइये. मैं आपको सारी बात तफ्सील से बताऊँगी कि अली साहब और उसके पहले आपा ने अब्बू से क्या बात की.....मगर इसका ज़िक्र किसी से न कीजियेगा."

"ठीक है आपा, वक़्त निकालकर मैं आऊँगा सौघरा. अभी तो यहाँ काम ज़्यादा है."

"ठीक है, मगर ध्यान रखियेगा.....यहाँ आने वाले वक़्त में हलचल बढ़ सकती है."

"जी बहुत अच्छे....अच्छा, खुदा हाफिज़ आपा."

"खुदा हाफिज़ मिर्ज़ा."

इस तरह से रुखसार ने अपनी पहली चाल चल दी थी.

 

     

 

 



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