Mridula Mishra

Classics


4.0  

Mridula Mishra

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*मृत्यु पथ*

*मृत्यु पथ*

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"चल कमली अब अपने गांव चलते हैं।यहाँ मुम्बई में अब रहना मुश्किल सा लग रहा है।" शिनेचरा से यह सब सुनकर कमली जोरों से रो पड़ी। "मैंने तो कहा ही था मुनिया के बाबू पर तुम मेरी सुनते ही कब हो।"

" अरे मैंने तो सोचा था यहाँ अच्छा काम -धाम करेंगे और गाँव में सबकी बेगारी करने से बच जायेंगे। लेकिन अब तो गांँव ही जाने में भलाई है।"

" मुनिया के बापू कहते तो सही हो पर,इस कोरोना बिमारी में सब तो बंद है हम जायेंगे कैसे उतनी दूर।साथ में छोटा बच्चा खाना-पानी सब कैसे होगा?"

"कमली इतना मत सोच अभी चले जायेंगे तो खोली का किराया नहीं देना पड़ेगा सरकार ने यह ऐलान किया है।न जाने कब तक लॉकडाउन रहेगा और टूटने के बाद भी हमें काम-धाम मिलेगा या नहीं यह कौन जानता है। हमारे गाँव वाले भाईयों ने यही तय किया है। आज रात को पांव-पैदल ही निकल जायेंगे।"

"ठीक है जब तुमने सोंच ही लिया है तो चले-चलेंगे।"कमली जाने की तैयारी करने लगी बर्तन की पोटली अलग और बचे-खुचे अनाजों की अलग पोटली बांधकर रख लिया।बच्चे के लिए कुछ बिस्किट आदि भी रख लिया। शाम तक वह बिल्कुल तैयार थी।रात में आठ-दस गाँव बाले अपने गांँव के लिए निकल पड़े। दो-तीन दिन का रास्ता किसी तरह निकल गया।अब खाना-पानी भी खत्म हो रहे थे।थककर चूर हुए ये सब रेल की पटरी पर ही सुस्ताने लगे थोड़ी देर बाद कमली ने अपने पति से बेटी के लिए कुछ खाने का इंतजाम करने को कहा शिनेचरा कमली का पति झूंझला उठा। कहाँ से लाऊं?

कुछ देर के बाद उसने कहा ,"कमली,तू तो एक काम कर पास में कुआँ है उसमें इस मुनिया को डाल दे, वैसे भी लड़की है दूसरे घर ही चली जायेगी"। कमली सन्न रह गई ये क्या कह दिया उसके पति ने अपने बच्चे को वह कुएं में डाल दें वह भी इसलिए कि वह लड़की है।? लेकिन उसने शिनेचरा को कहा, "अरे मैं भी यही सोच रही थी।लड़का होता तो जरूर डाल देती। (क्योंकि वह जानती थी कि लड़के के लिए यह बात उसका पति कभी न कहता)  लेकिन लड़की है इसकी शादी होगी तो इसका पति हम-दोनों के पैर छूयेगा और इज्जत करेगा। लेकिन लड़के की बीबी हम-दोनों की कोई इज्जत न करेगी ,उल्टे गालियाँ ही देगी।"(वह माँ थी उसे तो लड़का-लड़की नहीं बल्कि अपने बच्चे को बचाना था।)कमली का दांव चल गया था।शिनेचरा चुप हो गया।रात के भूखे-प्यासे,थकान से चूर सब पटरी पर ही लेट गए।इतने में किसी ने कहा कि, सरकार के तरफ़ से खाना बंट रहा है शिनेचरा आदि दौड़ पड़े पर कुछ इतने अशक्त थे कि उठ ही नहीं पाये।कमली भी बच्ची को छाती से लगाये रोटी की आशा में लेटी रही।तभी धड़धड़ाती हुई मालगाड़ी वहाँ से गुजर गयी सभी कि चीख-पुकार गाड़ी की शोर में दब गया। शिनेचरा खुशी-खुशी आठ-दस रोटी सब्जी लेकर पटरी पर आया लेकिन यह क्या कहाँ थी कमली और कहाँ थी बेटी और गाँव बाले सब कहाँ थे? सबके सब टुकड़ों में बंट चुके थे।

शिनेचरा पुलिस के सामने कभी ठठाकर हंसता तो कभी रोने लगता। कभी बड़बड़ाता अरे गुस्से से कमली ने बेटी के साथ-साथ अपने को भी खत्म कर लिया।ऐसा भी क्या गुस्सा। नीम पागल शिनेचरा।



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