Vijaykant Verma

Abstract

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Vijaykant Verma

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मकान का कब्ज़ा

मकान का कब्ज़ा

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रघु भाई पुलिस स्टेशन में-"साहब, मैं पिछले 10 साल से मुम्बई में रह कर सरकारी नौकरी कर रहा हूं। अगले माह रिटायर होकर यहां आ रहा हूँ, पर यहां मेरे मकान पर कुछ गुंडों ने कब्जा कर रखा है। कृपया मेरी मदद कीजिये..!"

पुलिसवाला-"ठीक है, आप रिपोर्ट लिखवा दीजिये, हम कार्रवाई करेंगे।"

"पर साहब मेरा मकान एक महीनें में खाली तो हो जाएगा न..?"

"कुछ कह नही सकते। वैसे मकान की रजिस्ट्री की कॉपी भी साथ में लगा दीजिएगा।"

"साहब, यहां अपना मकान होने के बावजूद मैं होटल में ठहरा हूं और रोज 1000 खर्च हो रहा है..!"

"आप नोट पानी कितना खर्च करेंगे?"

"साहब, एक लाख से ज़्यादा की हमारी औकात नहीं है.!"

"ठीक है, आप पैसा लाइये, और कल ही अपने मकान में शिफ्ट हो जाइये..!"

रघु भाई ने एक लाख रुपये और मकान की रजिस्ट्री की कापी उन्हें दे दी।

थोड़ी देर बाद उसी पुलिस वाले ने किसी नम्बर पर फोन की घंटी घुमाई और एक व्यक्ति को आदेश देते हुए कहा-"तू अभी इस मकान को खाली कर उसी लाइन में चौथे मकान में शिफ्ट हो जा। वो मकान भी कई दिनों से खाली पड़ा है..! और हां, आज रात दारू की बोतल और कबाब की पार्टी मेरी तरफ से..! ओ के..!!"

"ओके"

उधर रघु भाई को दूसरे दिन ही अपने मकान का कब्ज़ा मिल गया था, और वो एक बार फिर उसी पुलिस वाले से मिलने जा रहे थे, उसका शुक्रिया अदा करने..!!


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