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Kunda Shamkuwar

Abstract Others

4.5  

Kunda Shamkuwar

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मैं पागल नहीं हूँ…

मैं पागल नहीं हूँ…

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आज पता नहीं वह किस मूड में थी। अपनी पुरानी यादों की पोटली बार बार खोल रही थी। इस बातचीत में वह बेहद खुलकर बात कर रही थी। कभी कभी मुझे बेहद वंडर लगता था की कोई बातचीत में इतना कैसे खुल सकता हैं भला चाहे सुननेवाला कोई कितना भी गहरा दोस्त क्यों न हो?
मैं कभी भी नहीं कर पाती हूँ इस तरह से फ्रीली कोई बात किसी से भी… चाहे कितनी ही ख़ास दोस्त क्यों ना हो?

वह हमेशा से ही मुझ से खुलकर बात किया करती थी।
क्यों?
इस क्यों का मेरे पास कोई जवाब नहीं था। शायद कोई ट्रस्ट की बात होगी। उसका मुझ पर कुछ ज़्यादा ही ट्रस्ट था शायद।

हाँ, बातों के दरमियान वह अपनी डायरी लेकर आयी और कहने लगी की एक ज़माने में मैंने डायरी में एक पूरे पन्ने पर "मैं पागल नहीं हूँ…" लिखा था। मैं हँस पड़ी। और बेहद अचरज से उसकी ओर देखने लगी। मेरे हिसाब से ऐसा कौन करता हैं?
क्योंकि मेरे सामने जी बैठी थी वह एक वर्किंग वुमन थी…एक फ़ाइनेंशियल इंडिपेंडेंट वुमन…जो ऑफिस में बेहद कॉन्फिडेंस और एफ़ीशिएंटली काम किया करती थी…
मेरी हँसी देखकर उसने अपनी डायरी मुझे थमा दी। मैं अचकचा गयी। किसी और की डायरी को कैसे कोई पढ़ सकता हैं भला? इट वॉज सो हेजिटेटिंग फॉर मी !!!
"तुम हँस रही हो। तुम नहीं समझोगी। तुम्हें पता भी नहीं होगा की मैं किस अज़ियत से गुज़र रही थी। मैं उस समय मेरे मन की कैफ़ियत को काग़ज़ पर उतारती रहती थी। लो पढ़ के देखों।"

मेरे मन में पता नहीं क्या क्या चलने लगा।
ऑफिस में सारे कालिग्स के साथ उसकी हार्मोनी थी। सभी से वह अच्छे से बातें करती थी। फिर? फिर?

मैं थोड़ा अटकने लगी। क्योंकि मेरे सामने बैठी एक औरत अपने डायरी के पूरे पन्ने में मैं पागल नहीं हूँ लिखने की बात कर रही थी।

उसके इसरार करने पर मैं उस डायरी को उलट पलट कर देखने लगी।
अपने मन को और अपनी कॉन्शियस को थोड़ा पीछे धकेल कर उसकी डायरी पढ़ने की कोशिश करने लगी। उसने उसने अपनी कुछ अंतरंग बातें लिखी थी।
किसी एक पन्ने में पति के पिछले कई दिनों से बात नहीं करने का ज़िक्र था। मैंने हँसते हुए कहा, " पति की बात नहीं करने की बात को भी यहाँ लिखा हैं तुमने? " ये भी क्या बात हुयी भला डायरी में लिखने की?"

वह कहने लगी, "तुम उसकी डेट देखो, वह हमारी शादी के नये नये दिनों की बात थी। एकदम से नये शहर में एक अलग ही परिवेश में आने के बाद सिर्फ़ उसी एक व्यक्ति को तो मैं जानती थी, अगर वही बात नहीं करेगा तब मेरी मनःस्थिति क्या होती? मेरे मन की उस वक़्त की कैफ़ियत हैं…"

हम्म कहकर मैं थोड़ा सीरियस होकर फिर से उस डायरी के पन्नो को पलटने लगी।

अचानक डायरी के बायी ओर के पूरे पन्नें पर मैंने "मैं पागल नहीं हूँ" लिखा देखा। अभी तक वह सिर्फ़ बोल रही थी… लेकिन अब मैंने उसे अपनी आँखों से देखा। मेरे जैसे व्यक्ति के लिए यह बेहद रिग्रेसिव मोमेंट था। भला, ये इस तरह से एक पढ़ीलिखी और वर्किंग वुमन अपने बारें में ऐसे कैसे ख़ुद लिख सकती हैं?

मैंने दबी जबान से कहा, "क्या तुम मुझे बता सकती हो कि यह तुमने क्यों लिखा था? क्या हालात थे उस वक्त? मुझे बेहद ख़राब लग रहा हैं…क्योंकि मेरा दिल दिमाग़ यह सब एक्सेप्ट करने के लिए तैयार नहीं हो रहा हैं…"

वह थोड़ा याद करते हुए बोली, "उस वक्त शायद मेरी भाभी घर आई थी। और मेरे पति मेरे बारें में उलजलूल बातें कर रहे थे। तब मेरी भाभी ने कहा, दामाद साहब ये कोई पागल थोड़े ना हैं जो इस तरह की बातें करेगी।
तब मैंने ख़ुद को समझाने के लिए यह सब लिखा था। अरे, मैं चाय चढ़ाकर आयी थी। हो गयी होगी चाय। मैं चाय लेकर आती हूँ।"

मैं एकदम सुन्न हो गयी।
डायरी रख कर मैं सोच में पड़ गयी। कोई किसी के ब्रेन को ऐसे कंट्रोल कर सकता हैं?

मुझे मेरी सोच से निकालते हुए वह कहने लगी, "चाय ले लेते हैं, ये लो, नमकीन भी हैं। तुम्हें पसंद आयेगा…"
चाय पीते हुए मैं उसकी ओर देखने लगी…

आज की वह एकदम अलग थी…डायरी वाली पर्सनालिटी से अलग…

मैंने पूछा, "लेकिन तुम तो उनसे बेटर थी। यू वर फ़ाइनांशियली साउंड…जैसा की तुम बता रही हो की ही वाज नॉट वर्किंग…बिज़नेस भी उनका कोई ख़ास नहीं था तो फिर ये सब कैसे?"

"तुम को बताऊँ एक बात? मेरे पैर का प्रॉब्लम जो मुझे उनके आगे हरदम कमतरी का अहसास दिलाता रहता था। माँ बाप के जाने के बाद और भाभियों के ज़माने में मायके का सपोर्ट नहीं था। और तुमने देखा तो हैं मेरे पति को।"

"हाँ, मैंने कहा, मैंने देखा हैं उनको। वह काफ़ी ऊँचे पूरे और हट्टे कट्टे हैं…बहुत पहले मैं उनसे एक बार मिली थी तो बातचीत में भी अच्छे लगे थे।"

"तुमने भी तो यही सही मान लिया था न उस वक़्त…ऐसे ही सभी उसकी पर्सनालिटी से इम्प्रेस होकर उसकी बातों में आते थे… मेरे छोटे छोटे बच्चें थे…फिर क्या?
वह मुझे जताता रहता था की उसने मेरे जैसी से शादी कर के कोई उपकार किया हैं…"

मैंने उसको डायरी दे दी। डायरी साइड पर रखते हुए वह फिर से कहने लगी, "अभी मैं इस घर में सुकून से हूँ। अपने मन पसंद तरीक़े से रहती हूँ…मनपसंद चीजों से घर सजाती हूँ…जो खाना होता हैं वह बनाती हूँ…जब चाहे तब बनाती हूँ…नहीं खाना होगा तो नहीं भी बनाती हूँ..."

मैंने कहा, " हाँ, नज़र आ रहा हैं। कहाँ से मँगवाती हो इतना आर्टिस्टिक सजावटी सामान?"

"बहुत सी चीज़े ऑनलाइन मँगवा लेती हूँ।या कभी कभी दिल्ली हाट से या फिर बंजारा मार्केट से भी …"
उसके घर का हर कोना बड़े ही नफ़ासत से सजा हुआ था। सोफ़े और परदों की चॉइस भी अच्छी थी। घर में कैलेंडर भी कुछ अलग था।

डायरी की वह और आज की वह में ज़मीन आसमाँ का अंतर था।
उसे वहाँ आज़ादी थी… अपने मन की करने की आज़ादी… हर वक्त कंट्रोल करने वाले पति को छोड़कर वह अब बहुत आगे निकल आयी थी…पुरसुकून और मस्त….


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