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Kunda Shamkuwar

Abstract Others

4.7  

Kunda Shamkuwar

Abstract Others

मुस्कुराते आँसू…

मुस्कुराते आँसू…

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अपना घर?
मेरा अपना घर?
किसी औरत के लिए यह बहुत बड़ा ख़्वाब होता हैं…
उसका भी यह एक ख़्वाब था…

स्कूल में बारहवीं के बाद उसने बीएससी - एमएससी और पीएचडी कर ली…पीएचडी के बाद बेंगलूर यूनिवर्सिटी में ऐज अ लेक्चरर जॉइन किया।
नया शहर…
नये लोग…
नयी भाषा…
नया कल्चर…

उसके लिए सब कुछ नया था…

न जाने कितनी ही एडजस्टमेंट्स उसको करनी पड़ रही थी। यह तो अच्छा हुआ की ऑफिस की तरफ़ से यूनिवर्सिटी कैंपस में उसे क्वार्टर अलॉट हुआ था।
उसका अपना घर…
क्वार्टर में शिफ्ट होने के बाद वह अपने घर को सजाने सँवारने में लग गयी…
कभी हैंडीक्राफ्ट के कुछ सामान…
छोटी बड़ी पेंटिंग्स…
लैमिनेटेड फ़ैमिली फ़ोटोज़
खिड़कियों और दरवाज़ों के सुंदर पर्दे…
महँगे कार्पेट्स…
नए बर्तनों से भरी कीचेन…

घर अरेंज्ड हो गया और ज़िन्दगी सेटल्ड…

यूनिवर्सिटी के लेक्चर्स…मीटिंग्स…टूर्स… प्रोफ़ेशनल लाइफ में वह कुछ ज़्यादा ही बिज़ी होने लगी…

लेक्चरर से रीडर और बाद में प्रोफेसर की दौड़ में वह आगे बढ़ती गयी लेकिन ज़िन्दगी में कई लड़कियों से पिछड़ गयी। हाँ, अपनी फ़ैमिली बनाने वाली दौड़ में…शादी की दौड़ में…

उसे सिर्फ़ अपने से ज़्यादा पढ़ेलिखे और अच्छी नौकरी करने वाले लड़के की चाह ही तो थी …
यह एक नार्मल चाह थी… ज़्यादा बड़ी चाह तो नहीं थी… लेकिन ज़िन्दगी में सब कुछ तो नहीं मिलता हैं…कभी जमीं तो कभी आसमाँ मिलता हैं…सिंगल रहते हुए वह प्रोफेशनल लाइफ में आगे बढ़ते गयी…

अपनी प्रोफेशनल लाइफ़ के बिजी शेड्यूल के लेट इवनिंग में काम करने के बाद जब वह अपने क्वार्टर में आती थी तो टीवी के सामने बैठ कर कभी हॉट स्टार, नेट फ्लिक्स और प्राइम पर देशी विदेशी कंटेंट एंजॉय करती रहती…
बड़े शहर की अपने प्रॉब्लम्स…बाहर लोगों से बहुत ज़्यादा मिलना नहीं होता था…वहाँ का कल्चर अलग था…

छुट्टियों में घर जाने पर अपनी माँ, अपनी नानी और दादी को देखकर उसका यह अंदाज़ पक्का हो गया की औरत का अपना कोई घर नहीं होता… बचपन से तो वह जानती हैं की घर तो जाने जाते हैं आदमी के नाम से। जैसे राय बहादुर साहब की हवेली… 201 नंबर के फ्लैट वाले मिस्टर शर्मा… बंगले के पीछे वाले झुग्गी का मालिक राम प्रसाद…हाँ, घर के सारे काम तो घर की औरतों के ही ज़िम्मे होते हैं। औरतों को यही कहा जाता हैं की तुम्हारा घर हैं तुम्ही संभालो…कहने को तो सारे ही घर उसके होते हैं…पापा के घर में वह प्रिंसेस होती हैं तो पति के घर में रानी…अमूमन सारे बेटे अपने घर के उपर लिख देते हैं माँ का आशीर्वाद…

लेकिन हक़ीक़त में क्या यह सच होता हैं?
इस बात को सुनकर क्या कोई विश्वास करेगा? शायद नहीं… क्योंकि सच कई बार आईना दिखा देता हैं…

अपनी मेहनत और लगन से वह काम करती गयी। देखते ही देखते उसके रिटायरमेंट का वक्त भी नज़दीक आ गया। नौकरी शुरू हो गयी और ख़त्म भी होने को आयी…वक़्त का पता ही नहीं चला…

आज उसकी कॉलेज की फ्रेंड वंदना का फ़ोन आया। हमेशा वाली हमारी बातें होने लगी…वह पूछ रही थी, "रिटायरमेंट के बाद तुम्हारा क्या प्लान हैं? कहाँ रहना होगा मसलन गाँव में या फिर बेंगलुरु में ही?"
मैंने कहा, " देखो, वंदना, मैं तुम से झुठ नही बोलूँगी। तुम तो जानती हो की बेंगलूर जैसे बड़े शहर की अपनी फ़ितरत होती हैं। क्योंकि हम यहाँ बाहरी लोग हैं तो यहाँ हम जो भी रिलेशन बनाते हैं वह सिर्फ़ काम से होते हैं… काम के लिए होते हैं…काम ख़त्म तो उन रिलेशन्स की ज़रूरत भी जैसे ख़त्म ही हो जाती हैं…

तो मॉरल ऑफ़ द स्टोरी ये हैं माय डियर की मेरे लिए रिटायर्ड लाइफ यहाँ बेंगलोर में गुजारना थोड़ा कठिन होगा। एक बात मैं तुमसे कन्फ़ेस करूँगी की पढ़ाई के लिए और नौकरी के लिए मैं  हमेशा घर से बाहर ही रही तो अब मुझे लगता हैं की रिटायरमेंट के बाद अपने गाँव जाना ही ठीक होगा…अपने लोगों के बीच रहना एक अलग एक्सपीरियंस होगा…जैसे की अपनी जड़ों की ओर लौटना…"

"तुम सही सोच रही हो। तो बताओं कब शिफ्ट करने वाली हो?"
"अभी नेक्स्ट मंथ ही करना हैं… "
हाँ, सही हैं…आजकल तो ज़्यादा तैयारी की ज़रूरत नहीं होती हैं। मूवर्स अँन्ड पैकर्स सब अच्छे से कर देते हैं। अरे, हाँ, लेकिन इतने सालों की गृहस्थी हैं। ना ना करते हुए भी कितना सामान जमा हुआ होगा, नहीं ?"

मैंने कहा, "लेकिन कौनसी चीज़ें रखनी हैं, कौनसी नहीं? काग़ज़ों की सॉर्टिंग… ग़ैरज़रूरी काग़ज़ को निकालना… ज़रूरी काग़ज़ को रखना वगैरह…बुक्स की पैकिंग करना…कीचेन को अनपैक करना…और भी न जाने क्या क्या…"
"हाँ, तो तुमने ये काम शुरू किया होगा?"
"अरे, नहीं… सच कहूँ तो मुझे इस घर को एंजॉय करना हैं… मेरी लाइफ के सभी ऐक्टिव ईयर्स तो यहाँ इसी घर में बीते हैं…मुझे इस घर में बाद में रहने को तो नहीं मिलेगा न?"
"अरे तुम क्या रो रही हो? ये सब तो चलता हैं… इट्स ए पार्ट अँन्ड पार्सल ऑफ़ द गेम…ज़िंदगी का पार्ट हैं यह…"
शायद वंदना मेरी रूँधी आवाज़ को भाँप गयी। वह हैं ही ऐसी…पता नहीं कैसे हर बार मेरे मन की बात जान जाती हैं…

आजतक मैंने कभी उससे कोई बात नहीं छुपायी, चाहे पर्सनल फ्रंट हो या प्रोफ़ेशनल लाइफ…मैंने उसी रूँधी आवाज़ से उससे कहा, "मैं इस घर को जीना चाहती हूँ…मैं अभी कुछ भी नहीं कर रही हूँ… शिफ्टिंग तो चार दिन में हो जाएगी… वह होंगे ना पैकर्स अँन्ड मूवर्स वाले… "

वंदना ने कहा, "हाँ, यार..वह बड़े प्रोफेशनल होते हैं… झट झट सामान पैक पर देते हैं और पहुँचा भी देते हैं…"
मैंने कहा, "क्योंकि वह उनका घर नहीं होता हैं… ना ही वहाँ उनकी कोई यादें होती हैं।"

फ़ोन के दूसरी तरफ़ वंदना भी ख़ामोश हो गयी…उसने कुछ अटकते हुए कहा, "लेकिन ये तो क्वार्टर था… तुम्हारा पुराना सरकारी क्वार्टर…जिसकी दीवारें वाइट वॉश करने के बाद भी उदास ही लगती थी…" मुझे याद आया अपनी पिछली विजिट में भी वह यही कुछ कह रही थी…
चलो, बहुत बातें हो गयी हैं। रखती हूँ…अपना ख़याल रखना… और हाँ, बेंगलुर छोड़ने के पहले फ़ोन ज़रूर करना।"

मैं उसे कैसे बताती की इन दीवारों ने उसके अकेलेपन में कितना साथ दिया हैं… इन पर्दों ने न जाने कितनी ही बार उसके दर्द को छिपाया हैं…लोगों के सामने आने से बचाया हैं… हाँ, एक बात और ज़रूरत पड़ने पर इन्ही पर्दों ने हवा और रोशनी को घर में आने भी दिया हैं… इस घर की उदास दीवारों और ऊँची छत ने हमेशा ही उसे महफ़ूज़ होने का अहसास दिया हैं…मैं उनका यह क़र्ज़ लौटा नहीं सकती हूँ…"

मेरी इस कहानी को पढ़कर पाठक सोचेंगे की पता नहीं यह लेखिका क्या आयँ बायँ लिख रही हैं… सरकारी क्वार्टर छोड़ते वक़्त क्या कोई रोता हैं भला?

शायद वे कभी नहीं जान पायेंगे की नौकरी करनेवाली एक कुमारिका के नाम पर ही वह घर होता हैं… उसका अपना घर…चाहे वह कोई पुराना गवर्नमेंट क्वार्टर ही क्यों ना हो?
वह उसके नाम पर चाहे काग़ज़ पर ही क्यों न हो? चाहे कुछ सालों के लिए ही क्यों न हो…

वो सोच तो रही थी कि अब अपने उसी घर में चली जाए जहाँ उसकी जड़ें थी…जहाँ से उसकी ज़िन्दगी की शुरुआत हुई थी…
लेकिन सहसा एक डर भी लगा… क्योंकि इतना आसान नहीं हैं यह सब…इतने सालों तक वहाँ से ज़्यादा ताल्लुक़ात नहीं रहे वहाँ फिर शुरू से शुरुआत करना उसे कठिन लग रहा था…पता नहीं वहाँ कौन होगा? कौन उसका साथ देगा?

वह प्यार से अपने सरकारी घर के उन खूबसूरत पर्दों को और पेंटिंग्स को निहारने लगी…उन सारी चीज़ों को देखने लगी जिनको पैकर्स अँन्ड मूवर्स चंद दिनों के बाद शिफ्ट करने वाले थे…
उसने बड़े प्यार से उन चीज़ों को सहलाया जैसे उनसे कह रही हो...'तुमने आज तक मेरी तन्हाई और मेरी उदासियों में मेरा साथ दिया हैं और हर छोटी बड़ी ख़ुशीयों के सेलिब्रेशन में मेरे साथ मुस्कुराते रहें...तुम सब मेरी सुंदर यादों का टुकड़ा हो... तुम्हारी यादें वहाँ पर भी भी मेरे साथ होगी...'

उसे ऐसा लगा जैसे उन बेजान चीज़ों में जान आ गयी हो और वे कह रही हों… हम सब हमेशा से तुम्हारे साथ थे…हमने एकदूसरे का भरपूर साथ निभाया…फिर से हम उन खूबसूरत यादों से तुम्हारा साथ निभायेंगे... पहले से कहीं ज़्यादा मज़बूती से…

उसके आँसू मुस्कुराने लगे...अनजाने में ही वह उन पर्दों को सहलाने लगी…






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