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jyoti pal

Abstract


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मातृत्व की भावना

मातृत्व की भावना

10 mins 247 10 mins 247

प्रिंसी अपने घर की भी प्रिंसी हैं। वह इकलौती संतान है संगीता और नितिन की । दोनों की शादी को बाईस वर्ष बीत गए थे लेकिन उनकी अपनी संतान नहीं थी। उन्होंने एक बच्चे को गोद लेने की इच्छा से संस्था में भी गए। परंतु वहां का नियम यह था कि बच्चा वो अपनी पसंद से नहीं ले सकते थे बच्चे का चुनाव संस्था की मर्जी से होता है। संस्था वाले भी अच्छे बच्चो को ही रखना चाहते थे। बहुत बच्चे देखें किसी की पोशाक गंदी हो रही थी किसी की नाक साफ नहीं थीं तो किसी के बालों में कंघी नहीं थी किसी का दिमाग कमजोर लगता था। मिट्टी में खेलते उन मासूमों पर प्यार से ज्यादा तरस आता था।

बाप के बिना माँ अकेली कमा भी सकती है घर का काम कर सकती है साथ ही अच्छी परवरिश भी कर सकती है कोई कोई आदमी भी अकेला देखभाल कर लेता है पर सच! माँ-बाप का साया सिर पर बहुत जरूरी होता हैं यहाँ बच्चे नहीं हैं जिनके है उन्हें कदर नहीं हैं(संगीता सोचती हैं )

जो बच्चे साफ सुंदर अथवा होशियार दिखते थे उन्हें संस्था वाले देना नहीं चाहते थे। जो बच्चा संस्था की और से दिखाए गए उनमें से एक बच्चा गोद लेने के लिए स्वीकार हुए। अब कुछ दिक्कत थीं तो वह थीं वहाँ के नियमों और शर्तो की , नितिन का प्राइवेट काम था बच्चे को पालने में सक्षम तो थे,लेकिन दिक्कत थीं की भविष्य में स्थिति अच्छी रहे या ना रहे कह नहीं सकते इसलिए वह दोबारा वहाँ नहीं गए।


जहाँ उनकी दुकान थी वहाँ दुकान फ्लैट में एक कामवाली आती थी खाना बनाने उसकी मालकिन रीठा संगीता की दुकान पर अक्सर आ जाया करती थी।

अनीता को आते हुए रीठा ने पूछा -

रीठा - "अनीता बना दिया खाना?"

अनीता - "जी मैडम ! मैडम एक बात पूछनी थी"

रीठा -" बोलो !"

अनीता - "मैडम थोड़े पैसे चाहिए थे।"

रीठा - "अभी तो महीना भी पूरा नहीं हुआ । कल ही कुछ रूपए दिये थे तुम्हें । जब बच्चों को पाल नहीं सकते तो इतने पैदा ही क्यों करते हो तुम लोग।"

अनीता - "मैडम आदमी ने छीन लिए। दारू पीकर आता हैं ऊपर से लड़ाई करता हैं मैं क्या करूँ। पाँच बेटियाँ हैं उन्हें पढ़ाना हैं शादी की चिंता भी खाई जाती हैं कैसे होगा सब। मेरे माँ-पापा ही कब तक करेंगे। ससुराल वाले बोलते हैं बेटा चाहिए। इसीलिए सब करना पड़ता हैं। डर लगता हैं कभी-कभी कहीं छोड़ ना दे। मैं कहाँ लेकर जाऊँगी अपनी बच्चियों को अकेले।"

रीठा - "अच्छा ठीक हैं (पैसे देते हुए) पकड़ कल टाइम पर आ जाइयो। और ये बता तुझे कपड़े दिये थे मैंने ठीक से क्यूँ नहीं रहती । सलवार अलग सूट की दुपट्टा अलग सूट का ऐसा क्यूँ।

अनीता -" मैडम , अपको नहीं पता । मैं जिस दिन ठीक से बन कर निकलती हूँ ड्राइवर मुझे देख लाइन मारने लगते हैं। बड़े कुत्ते होते हैं ये ड्राइवर आदमी।"

रीठा - "अच्छा ठीक हैं जैसे ठीक लगे वैसे रहो।"

अनीता - "अच्छा मैडम, जी, मैडम जाती हूँ और जगह भी जाना है घरों में काम करने ।

संगीता अपने आदमी को नौकरानी की सारी बात बताती हैं और सलह मशवरा करने पर अगले दिन रीठा से बात करती है"

संगीता - "रीठा वो जो तुम्हारे यहाँ खाना बनाने वाली आती है ना , मुझे उससे बात करनी है"

रीठा - "अच्छा तुम्हें भी खाना बनवाना है"

संगीता - "नहीं जब वो आ जाए तो बता देना मुझे उसी से कुछ काम है"

रीठा - "आखिर बात क्या हैं बताओ तो सही।"

संगीता - "ठीक है, बता दूंगी फोन करके नौकरानी के आ जाने पर, या सुबह आठ बजे मेरे ही घर आ जाना।"

संगीता - "ठीक हैं यह ठीक रहेगा।"

(अनीता रीठा के घर पहुँचती हैं संगीता भी आठ बजे से पहले पहुंच रखी होती हैं)

अनीता -" क्या बनेगा मैडम बता दो, जल्दी से बना देती हूँ ।"

रीठा -" अनीता, संगीता तुमसे बात करना चाहती थीं जरा जल्दी काम निपटाकर इनसे बात कर लेना।"

अनीता जल्दी काम निपटाकर आती हैं और बोलती हैं - "सारा काम हो गया मैडम। कहिए मैडम क्या बात हैं।"

संगीता - "मुझे तुमसे कुछ बात करनी थी अनीता।"

संगीता - देखो हमारे औलाद नहीं हैं मैं सोच रही थी कि अगर तुम अपनी एक संतान हमें देना, चाहे तो । जरूरी नहीं हैं अभी बताओ , सोच समझकर अपने पति से बात करके बताना।

अनीता - कैसी बातें करती हों मैडम हम कैसे भी करके अपनी बच्चियो को पाल लेंगे पर माफ करना, मैं अपने बच्चे को कैसे दे सकती हूँ।

संगीता - देखो ! तुम्हारा नाराज़ होना लाजमी है, लेकिन ये भी तो सोचो तुम्हारी बेटी अच्छे स्कूल में पढ़ेगी, उसके सारे शौक पूरे हों जाएंगे। देखो हमारी प्रॉपर्टी बहुत हैं लेकिन संतान ना होने का दुख़ भी बहुत हैं। यह मैं भी समझ सकती हूँ कि संतान को पाने की खुशी किसे नहीं होती और संतान देने का दुख बहुत असहनीय होता हैं लेकिन मुझ पर भरोसा रखो। तुम्हारी बेटी हमारे यहां रानी बनकर रहेंगी फिर एक माँ यही तो चाहती हैं। मेरी बात तुम्हें चुभी ज़रूर होगी लेकिन एक बार सोच कर जरूर देखना।

रीठा - देखो फैसला तुम्हारा हैं बात पीड़ा पहुंचाने वाली हैं लेकिन गलत भी नहीं हैं एक बार विचार जरूर करना।

अनीता, संगीता से कुछ सोचकर - तो आप चाहती क्या है मैं अपनी बड़ी बेटी आपको दे दूं।

संगीता - मैं जानती हूँ जिस बेटी को तुमने पाला हैं उस के प्रति तुम्हारा मोह हैं तुम उसे नहीं दे सकती मैं समझती हूँ। ना चाहकर भी तुम्हारा मन उसी में अटका रहेगा। देखो मैं चाहती हूं कि तुम्हारी कोख़ में जो बच्चा हैं अगर वो लड़की हुई तो मुझे दे देना। अगर लड़का हुआ तो तुम रख लेना, लेकिन मैं चाहती हूं कि अगर बेटी हुई तो वह तुम्हारा स्तनपान भी नहीं करेगी मैं नहीं चाहती कि तुम्हें तकलीफ हो या बाद में तुम्हें मोह में अपनी बात से मुकरना पड़े। जितना टाइम चाहिए ले लो सोच लो घर में अच्छे से विचार कर लो। मुझे जल्दी नहीं हैं।

अनीता जब सब घरो में खाना बनाने के बाद घर पहुंची तो उसकी बड़ी बेटी खाना बना रही थीं। दोनों दो बेटियां आपस में लड़ रही थी और छोटी वाली शिकायत कर रहीं थीं माँ देखो ये मेरी सारी चीज़ खा गई और मुझे थोड़ी सी ही छोड़ी । इससे बोल दो अपनी चीज़ खाया करे।

बड़ी बेटी - अच्छा जब में लाती हूँ तब ये भी तो उसमें से खाती हैं ।

अनीता - मेरा सर मत खाओ। शांत हो जाओ । पूजा और आस्था कहाँ गई हैं।

सबसे छोटी बेटी - वो बाहर खेल रही हैं अपनी सहेलियों के साथ और मुझे अपने साथ नहीं खिलाती। बोल रही थीं तुझे हम नहीं खिलाएंगे तुझे खेलना नहीं आता।


तभी अनीता का पति आता है शराब में धुत और अनीता को पता था कि सुबह भी उठते के साथ पीने को दारू चाहिए। अनीता ने सुबह संगीता से हुई सारी बात बताई

अनीता का पति कहता है हमें नहीं चाहिए बेटी । हमारी बेटी वहां सुखी रहेगी तो क्या दिक्कत है। हमें बेटा चाहिए अगर इस बार लड़की हुई तो दे देंगे। पर अनीता का मन नहीं मानता वो महीने भर सोचती हैं रोती हैं मेरी ही किस्मत कितनी खराब है। एक बेटा हो जाता तो ये दिन ना देखना पड़ता।

अनिता (सकारात्मकसोचते हुए) - शायद बेटा ही हो जाए इस बार। वैसे भी बेटियां तो हमारे हैं ही । उस बिचारी की भी गोद भर जायेगी और बड़े घर में रहेंगी तो आराम से रहेगी। वरना यहां तो उतरन ही पहनने को मिलेगी। और भर पेट खाना भी मिल जायेगा। वह यह सोचकर मन को समझा लेती हैं और बेटी देने के लिए राजी हो जाती हैं।वहां संगीता भी यह ख़बर सुनकर खुश हो जाती हैंसंगीता सोचती है कि बेटी हो जाए और अनीता सोचती है इस बार बेटा हो जाए।


संगीता अनीता को बड़े हॉस्पिटल में दिखाती है और उसे अपना ध्यान रखने के लिए रूपए भी देती रहती है। लेकिन वह घर के खर्चे में उन रुपयों का उपयोग करती है।

चार महीने बाद अनीता फिर एक बेटी को जन्म देती हैं अनीता लेकिन उसे संगीता ले जाती है और कुछ रुपए भी दे जाती हैं । अनीता का मन उसे देखने को करता पर वो खुद को दिलासा देते हुए रुक जाती है।


संगीता बहुत ख़ुश है। उसकी बरसों की माँ बनने ख्वाहिश अब पूरी हों गई। नामकरण करवाया, पूजा अर्चना की।

और पूरे मातृत्व की भावना से बच्ची की सेवा में लग गई।आस पास के लोगों को चर्चा का नया विषय मिल गया। महिलाओं के बीच कुछ दिनों यही चर्चा चल रही हैं । संगीता की गोद में बच्ची को सब देखकर महिलाओं में पीठ पीछे खुसर-फुसर शुरू हो जाती हैं।

पहली महिला-किसी झुग्गी की किसी औरत की बच्ची है बिचारी के लड़का हो जाता तो मजबूर ना होती। इसी के कोई बच्चा हों जाता तो इसे भी चिंता ना होती लड़की लाई है बड़ी होगी तो ससुराल चली जायेगी। कौन से बुढ़ापे में देखभाल करेगी।

दूसरी महिला - आजकल लड़कियां लड़को से कम हैं क्या ? लड़को से ज्यादा लड़कियां माँ - बाप की सेवा करती हैं , मेहनती भी होती हैं।

तीसरी महिला - हाँ यह बात तो सच है , लड़को से ज्यादा तो आजकल लड़कियां आगे बढ़ रही हैं अब पहले जैसा जमाना नहीं रहा।

पहली महिला- अरे! मैंने तो खुद देखा है लड़की को काली और कमजोर है बहुत। किस्मत अच्छी है लड़की की जन्म झुग्गी में हुआ और आ गई यहाँ, यहाँ देखभाल भी अच्छी हो जाएगी।

दूसरी महिला - कुछ भी कहो घर में किलकारी भी गूंजेगी बिचारी का टाइम भी कट जायेगा । रोज़ शॉपिंग करने जाती हैं इसकी शॉपिंग ही पूरी नहीं होती। पर जिसके संतान नहीं हैं उसी को पता हैं दिल पर क्या बीत रही होती हैं ऊपर से ताने सुनने पड़ते हैं।

तीसरी महिला - ऊपर वाला जो करता हैं अच्छा करता है। पूर्व जन्म के कर्मो का ही फल हैं कि अच्छे घर में आ गई। वरना गरीब, अनाथ लड़कियों की कमी हैं क्या?


एक साल तक संगीता को प्रिंसी की कमज़री के कारण उसकी बहुत सेवा करनी पड़ी। लोगों ने कहा लड़की के लिए क्यों घटती जा रही हैं । तू खुद नहीं रहेगी तो उसे कैसे पालेगी अपना भी ध्यान रखा कर। लेकिन आखिर संगीता की मेहनत रंग लाई प्रिंसी हस्ट पुष्ठ हो ही गई ।

जिससे उसका रंग भी निखर गया। संगीता सेवा अपनी बच्ची के साथ माँ बनने की हर खुशी अनुभव कर रही थी जो जन्म देने वाली एक माँ करती हैं। समाज में यह बात बड़ों के साथ हर बच्चे को भी पता थी कि प्रिंसी को नितिन और संगीता कहाँ से अचानक ले आए ।


जब प्रिंसी थोड़ी बड़ी हो गई तो वह कुछ बच्चों के साथ पार्क में खेलती है। तभी एक लड़के द्वारा प्रिंसी को पता चलता हैं कि वह उनकी बेटी नहीं हैं । वह सारे खिलौने छोड़कर अपनी माँ के पास रोती रोती जाती है।

संगीता - ( गले लगाकर) क्या हुआ किसी ने मारा। क्या हुआ बताओ?

प्रिंसी - मम्मा, मैं आपकी बेटी नहीं हूं ना। आप मेरी मम्मा नहीं हैं।

संगीता - तुमसे किसने कहा । झूठ बोलते हैं सब।

प्रिंसी - रोते हुए नहीं आप झूठ बोल रहे हो। राहुल भाई बता रहे थे।

संगीता - नहीं ऐसा नहीं हैं वो झूठ बोल रहा था।

संगीता ने आंसू पोंछे।संगीता के नारीत्व पर जैसे सवाल खड़े हो रहे थे। राहुल के घर जाकर समझा लो अपने बेटे को मेरी बेटी को क्या बता रहा है यही सिखाते हो तुम अपने बेटे को।

राहुल की माँ - बच्चा है नासमझ है, बोल दिया तो क्या हुआ झूठ तो नहीं बोला। अपनी बेटी को को बोलो ना यहां खेलने ना आया करे। कभी ना कभी तो सच पता चल ही जाएगा। अब जान लोगी क्या मेरे बच्ची की खुद ने बच्चें पैदा किए हों तो कुछ पता भी हो।

संगीता - जब चलेगा चल जाएगा (चिल्लाकर) कोई मेरी बेटी को परेशान करने की कोशिश मत करना। बच्चा पैदा नहीं किया तो क्या मैं भी अब एक माँ ही हूँ।


तब से संगीता प्रिंसी को व्यस्त रखने के लिए और भविष्य में सुरक्षित रहे इसलिए वह उसे पढ़ाई के अतिरिक्त जूडो प्रशिक्षण भी दिलाती है। इसी तरह वह व्यस्त रहती और जब वह बड़ी हुई तब भी वह बचपन के सभी मित्रों से भी बातचीत करती है पर सब बड़े है और समझदार समय के साथ अब किसी और को भी यह पता नहीं चलता कि यह उनकी कोख से पैदा नहीं हुई। जिंदगी में बहुत उतार चढ़ाव आये, कभी तंगी भी आयी, फिजूल खर्च भी हुआ, कर्जा भी हुआ, कभी घाटा भी हुआ, और कभी मुनाफा भी। पर कुछ नहीं घटा तो वो था अपनी इकलती बेटी प्रिंसी के प्रति नितिन और संगीता का स्नेह, ममता, और रिश्तों में मिठास अब संगीता की बेटी, बेटी होने के साथ दोनों की अच्छी मित्र भी बन गई थी। प्रिंसी के माँ-पिता से कोई लड़ने की हिम्मत नहीं करता क्योंकि सब जानते है जूडो की गोल्ड मैडलिस्ट वाली डबंग लड़की से पंगा लेना भारी पड़ सकता हैं।



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