STORYMIRROR

Shakuntla Agarwal

Abstract Classics Others

4  

Shakuntla Agarwal

Abstract Classics Others

"लत"

"लत"

6 mins
3

सम्मान योजना कै अन्तर्गत रचना

बंटी के पापा घर में दनदनाते हुए आये। बंटी कहां है ?

कमला - क्यों क्या हुआ? इतने चिखते -चिल्लाते क्यों आ रहे हो? बंटी ने ऐसा क्या कर दिया।

रमेश - तुम्हें क्या बताऊं? बताने में भी शर्म आ रही है, सिगरेट के छल्ले उड़ा रहा था, साहब हवा में।

कमला - क्या बात कर रहे हो? तुम्हें कुछ गलतफहमी हुई है। हमारा बंटी ऐसा नहीं कर सकता। तुम्हारी आंखों ने कोई धोखा खाया है जरूर।

रमेश - तुम क्या कह रही हो? तुम्हें कुछ पता भी है कमला। क्या मैं अपने बंटी को नहीं पहचानूंगा।

कमला - पन उसके पास पैसे कहां से आए?

रमेश - मुझे क्या पता? ऐसे लोग कहीं से भी जुगाड़ कर लेते हैं अपने शौक पूरे करने के लिए। बंटी ने जैसे ही घर में प्रवेश किया। रमेश जी तो पहले से ही हाथ में छड़ी उठाये तैयार खड़े थे। बंटी को धड़ाधड कई छड़ी मारी। मां की आत्मा ऐसी ही होती है। मां से बर्दाश्त नहीं हुआ। कमला छड़ी पकड़ते हुए, क्या इसकी जान लेकर ही दम लोगे, मैं इसे समझा दूंगी, आगे से ऐसा नहीं करेगा। बीच बचाव में एक दो छड़ी कमला को भी पड़ गई। बंटी को बहुत दुख हुआ, माताराम आप बीच में क्यों आई? आपको भी लग गई ना, नील पड़ गया होगा कमर को सहलाते हुए। मैं आगे से ऐसा कुछ नहीं करूंगा, कहते हुए सुुबकने लगता है। अगले दिन पांचो भाई बहन तैयार होकर अपने-अपने स्कूल -कॉलेज जाने लगते हैं, तब बंटी के पिता जी विनोद को बुलाकर हिदायत देते हैं तेरे ही कॉलेज में ही तो पढ़ता है बंटी, जरा निगरानी भी रख, कहां जाता है ? किसकी संगत  पकड़ रखी है इसने।

विनोद - हां पिताजी, मैं आगे से बंटी को अपने साथ ही लाया करूंगा, ऐसा कहकर कॉलेज बंटी को लेकर चला जाता है। कॉलेज की जब छुट्टी होती है तो विनोद बंटी को साथ लेकर जैसे ही चलने लगता है 6 -7 लड़के आकर बंटी का हाथ पकड़ कर उसको ले जाने लगते हैं ।

विनोद - देखो, तुम बंटी से जोर जबरदस्ती मत करो, मेरे बाबूजी ने साफ शब्दों में तुमसे दूर रहने की हिदायत दी है। बंटी के साथ अगर तुमने कोई जबरदस्ती की तो मुझे मजबूरन बाऊ जी को तुम्हारे नाम बताने पडेगें।

लड़के - अरे ! बता देना क्या उखाड़ लेंगे, तेरे बाबूजी कहते हुए बंटी को खींच कर ले जाते हैं, और बंटी भी झूठे मन से नानूकर करता हुआ उनके साथ चला जाता है। बहुत दिन तक तो बंटी के पापा को पता ही नहीं चलता कि बंटी क्या कर रहा है, किसके साथ जाता है, और किसके साथ आता है, लेकिन एक दिन अचानक उनको वह सड़क पर कुछ लड़कों के साथ शराब पीता हुआ मिल गया और शराब के नशे में उसने किसी स्कूटर वाले को घेर रखा था और वह उसको गालियां दे रहा था और उसको बुरा भला कह रहा था। बंटी के पापा से यह सब सहन नहीं हुआ, उन्होंने सोचा कि मेरे जैसे चरित्रवान का लड़का, इतनी घिनौनी हरकतें कर रहा है, मुझे तो मर ही जाना चाहिए। इसने तो मेरी नाक ही कटवा दी समाज में, मैं अब इसका क्या करूं, वह सोचते हुए घर गए और जैसे ही घर में प्रवेश किया तो इनको विनोद दिखाई दिया। 

रमेश जी - विनोद पर चिल्लाते हुए ,उसको लताड़ लगाते हैं कि मैंने तुम्हारी ड्यूटी लगाई थी कि तुम बंटी को अपने साथ लेकर आओगे और साथ लेकर जाओगे, फिर बंटी कैसे शराब पीने लगा। वह आज सड़क पर तमाशा बना हुआ था और उसने मेरा भी तमाशा बनवा दिया। मेरे मना करने के बावजूद तुम लोगों ने उसे सर पर चढ़ाया, आज उसी का नतीजा है और यह कहते हुए वह विनोद पर टूट पड़ते हैं और कहते हैं - इसे पैसे कौन देता है? उसको 2-4 चांटे रसीद कर देते हैं, यह सब तुम्हारी गलती है जैसे ही रमेश जी विनोद को और मारने लगते हैं तो उसकी माताराम बीच में आ जाती है और कहने लगी कि इसको क्यों मार रहे हो?  इसका क्या कसूर है यह तो मेरा कसूर है जो मैं करमजली उसको आपसे छुप -छुप कर पैसे देती रही, मुझे क्या पता था कि बंटी की ऐसी हालत हो जाएगी कि वह एक दिन भी उसके बगैर नहीं रह पाएगा? यह शुक्र करो कि बंटी चरस गांजा तो नहीं ले रहा, यहां तो हर तीसरे घर में बच्चे चरस गांजे के शिकार हो गए हैं।

रमेश - चिल्लाते हुए, हां -हां वह भी लत लगा दो इसको, वही तो बचा है एक शौक लगाने के लिए, हवा में उड़ेगा तो पता चलेगा तेरा बेटा, तेरे लाड़ प्यार ने आज यह दिन दिखाया है, आगे पता नहीं क्या-क्या भोगना लिखा है, कुछ सालों तक यही खेल चलता रहा, कभी उसे नशा मुक्ति केंद्र में दाखिल करवा देते तो वह दो-चार महीने ठीक रहता, लेकिन फिर उसकी वही हालत हो जाती, मातराम को उसकी हालत देखकर तरस आ जाता, वह मातारम के पैरों में पड़कर रोने लग जाता, आज बस और आज पैसे दे दो कल से नहीं लूंगा और ना ही पियूंगा लेकिन रोज का यही सिलसिला। 

माताराम - सभी भाई-बहनो ने काबिल होकर अपनी गृहस्थी बसा ली। लेकिन तू आज भी 45 साल की उम्र में कुंवारा बैठा है, हम हैं जब तक तो फिर भी तुझे दो निवाले मिल जाते हैं, बाद में तेरा क्या होगा? यही सोच - सोच कर मेरा जी घबरा रहा है और कहते हुए रोने लगती है। आज मैं तुझे बिल्कुल पैसे नहीं दूंगी, तू जब ही सुधरेगा। बंटी माताराम के पैरों में लेट गया, दे दो ना माताराम, मेरा सारा शरीर टूट रहा है , मुझे अजीब सा लग रहा है, मैं उसके बगैर नहीं रह सकता।

माताराम - आज मैं हरगिज नहीं दूंगी, सभी मुझे ही बुरा-भला कहते हैं कि तूने ही बिगड़ा है। वह माथे पर हाथ मारते हुए, तू मरता भी तो नहीं करमजले, अपने पैर छुड़ाकर घर से बाहर निकल जाती है, की ना इसकी हालत देखूंगी, ना ही तरस आयेगा। लेकिन बंटी भी अपनी माताराम के पीछे-पीछे ही निकल जाता है, भाई बहन किसी को यह नहीं पता कि बंटी कहां गया है, वह बाजार से सल्फास की गोलियां लेकर आता है और फिनायल तो घर में ही रखा था और वह अपने कमरे में अंदर जाकर चिटकनी लगा लेता है और वह सल्फास की गोलियां खा लेता है और फिनायल भी पी लेता है, सब सोचते हैं कि बंटी जाकर गुस्से में सो गया होगा। लेकिन जब खाना तैयार होता है तो उसे उठाने लगते हैं, तो कमरे की अंदर से चटकनी बंद कर रखी थी, सब बंटी- बंटी आवाज लगाते हैं परंतु दरवाजा नहीं खुलता, सब दरवाजे को जोर-जोर से खींचने लगते हैं लेकिन अंदर से कोई आवाज नहीं आती, सब ने मिलकर सोचा क्यों ना दरवाजा तोड़ दिया जाए और सब मिलकर दरवाजा तोड़ देते हैं, तो जैसे ही नजर पड़ती है तो सब सन रह जाते हैं, बंटी पलंग पर आधा ऊपर आधा नीचे लटका हुआ है, उसके मुंह से झाग निकले हुए हैं , बिस्तर के बगल में थोड़ी सी उल्टी भी पड़ी थी और पास में ही फिनायल की बोतल और सल्फास की गोलियों की शीशी पड़ी थी, नब्ज नहीं चल रही थी, सांस भी बंद हो चुकी थी । अस्पताल ले जाने का कोई मतलब नहीं रह गया था क्योंकि अस्पताल ले जाने का मतलब था चीर - फाड़ करवाना, यानी पोस्टमार्टम और केस बनता सो अलग, आनन - फानन में दाह-संस्कार  कर दिया, लेकिन माताराम ने कोहराम मचा रखा था रो-रो कर । मैं पूरी उम्र उसको पैसे देकर उसकी जेब भरती रही, आज मैंने उसको पैसे क्यों नहीं दिए? उसके काल ने मेरे हाथ पकड़ लिए। काश ! मैं आज भी पैसे दे देती तो मेरा बेटा आज मेरी आंखों के सामने होता, लेकिन सब लोग यह सोच रहे थे कि एक शराब की लत ने आखिर बंटी को हमसे छीन लिया। लत ऐसी लगी उसने बंटी को मार कर ही दम दिया। लत कोई भी हो इंसान को जानवर बना देती है । 

                                 

- शकुन्तला अग्रवाल, जयपुर


Rate this content
Log in

Similar hindi story from Abstract