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vijay laxmi Bhatt Sharma

Abstract


4.2  

vijay laxmi Bhatt Sharma

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लॉक्डाउन२ चौथा दिन

लॉक्डाउन२ चौथा दिन

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प्रिय डायरी लॉक्डाउन दो का चौथा दिन है ... धीरे धीरे नीरसता अपना घर बना रही है लोगों में हालाँकि बहुत से व्यक्ति अपनी रुचियों के अनुरूप कार्य कर रहे हैं ... उस कार्यों को सोशल मीडिया पर भी डाल रहे हैं ... ऑनलाइन काव्य गोष्ठियाँ भी हो रही है खूब... पर कुछ छूटता सा भी प्रतीत हो रहा है... या हमे गतिमान रहने की आदत सी हो गई है। 

 आज कुछ पुरानी यादों को टटोला तो याद आया पहले हम इतने डिजिटल नहीं थे और चिट्ठियाँ लिखा करते थे अपने परिजनों को.. अपने मित्रों को... उस सौंधी सौंधी चिट्ठी की खुश्बु मे जाने कितनी कहानियाँ छिपी होतीं थीं... चिट्ठी खोलने से पहले कितनी बार दिल धड़कता था जाने क्या होगा इसमें.. और फिर शुरू होता था चिट्ठी पढ़ने का सिलसिला... एक एक चिट्ठी कई कई बार पढ़ी जाती थी ... इसके दो कारण होते थे एक लिखने वाले के भाव अपने अन्दर महसूस करना दूसरा चिट्ठी का जवाब क्या बनाना है... इसी मंथन में समय बीत जाता था... आज भी अगर किसी के पास पुरानी चिट्ठियाँ हों तो जब भी फुर्सत होती होगी उन्हें वो पढ़ते जरूर होंगे ... चिट्ठियों में होती ही है इतनी कशिश की वो हर किसी को बांधे रखती हैं। आज की पीढ़ी ने वो सुख देखा ही नहीं तो उन्हें ये समय की बर्बादी लगती है, उन्हें समझ नहीं आ पाये शायद लम्बे इन्तज़ार के बाद चिट्ठी के क्या माइने होते हैं और कितना सुख छिपा है इन चिट्ठियों में और उनकी यादों में।

  प्रिय डायरी मेरी सखी चिट्ठियों की तरह ही आज मुझे बचपन की एक और याद ताजा हो रही है ... तख़्तियाँ... बचपन में स्कूल में तख़्तियाँ लिखाई जाती थीं ताकि आपकी लेखनी सुन्दर हो। तख़्तियाँ लकड़ी की बनी होती थीं उन्हें फिर चिकनी मिट्टी से पोता जाता था उसके बाद सुखा कर कलम स्याही और दवात ले तख़्ती लिखी जाती थी... गुरुकुल की अनुभूति होती थी... एक एक अक्षर को सुन्दर लिखने की होड़ होती थी... समय का पता ही नहीं चलता था इतने कामों के बीच तख़्ती पोतनी सुखानी लिखनी... कितना सुकून था ना मोबाइल थे ना टीवी ही थे केवल परिवार और दोस्त ही जीवन हुआ करते थे। 

प्रिय डायरी ,लॉक्डाउन की वजह बेशक अच्छी नहीं परन्तु इस लॉक्डाउन ने पुराने कुछ दिन लौटा ज़रूर दिए... जीवन की नई राह भी दिखाई... परिवार का महत्व समझाया... सबसे बड़ी बात मिल जुल कर काम करने के प्रचलन को लौटा दिया... किसी चीज़ के बुरे और अच्छे दोनो प्रभाव होते हैं ... अगर आशावादी होकर सोचेंगे तो ये लॉक्डाउन भी कुछ जीने के नए तरिके ही सिखा कर जायेगा... हमारी ज़िंदगी मे कुछ अच्छा ही प्रभाव लायेगा। प्रिय डायरी आज इतना ही अपनी इन पंक्तियों के साथ विराम लूँगी:

तख्तियों की लिखावट में

खो गयी जिंदगी कहीं

लगता है डिजिटल की होड़ में

कलम गुम हो गई है कहीं।


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