Sushma s Chundawat

Abstract

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Sushma s Chundawat

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खुशी की खोज

खुशी की खोज

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अकेलेपन से उकता गयी थी वो। मतलबी दुनिया के मतलबी रिश्तों से घबराकर खुद को खुद ही में समेट लिया था उसने पर अब घबराहट होती थी उसे ऐसे रहने में। आस-पास ऐसा कोई नहीं था जिससे दोस्ती की जा सकती थी और दफ्तर में सभी अपने-अपने कम्प्यूटर पर सिर झुकाए या फाइलों में आँखे गडाये व्यस्त रहते थे, सिर्फ औपचारिक रूप से बातचीत होती थी उनसे ।

एक दिन खाली कमरे में बैठे-बैठे बहुत बोरियत महसूस होने लगी तो वह 'क्या करूँ, कहाँ जाऊं' सोचती-सोचती गले में कैमरा लटकाये बेफिजूल शहर की सडकों पर निकल गयी । फोटोग्राफी का शौक था उसे, कई देर तक भटकने के बावजूद उसे एक भी नज़ारा ऐसा नहीं लगा जिसे कैमरे में कैद किया जा सके । वही भीड़ भरी गलियाँ, तेज़ रफ़्तार में भागते दो और चार पहिये वाहन, वही यंत्रवत चलते लोग !

घूमते हुए थकान हो गयी थी तो वो पास के एक पब्लिक पार्क में जा पहुँची । वहां कुछ छोटे-छोटे बच्चे एक हाथ में अपनी मम्मी या पापा की ऊँगली और दुसरे हाथ में गुब्बारे की डोर थामें ठुमक-ठुमक कर चल रहे थे। कुछ नवदंपति हाथों में हाथ लिए सेल्फी ले रहे थे तो कुछ बुजुर्ग अपने दोस्तों या पत्नी के साथ ठहाके लगाते या गपशप करते टहल रहे थे।

ये सब देखकर उसका अकेलापन और गहराता चला गया। खालीपन के एहसास ने उसकी आँखे नम कर दी।

तभी उसने देखा कि पार्क के एक कोने में कुछ चार पांच गरीब बच्चे भी बैठे-बैठे खेल रहे थे जिनकी निगाहें बार-बार गुब्बारे बेचने वाले की ओर उठ रही थी, रंग-बिरंगे हवा में उड़ते गुब्बारे उनकी निगाहों को बांध रहे थे पर खरीद ना पाने की विवशता उनके चेहरे पर साफ़ नज़र आ रही थी।

फिर उसने देखा कि पार्क में दो-तीन बुजुर्ग अकेले ही घूम रहे थे धीरे-धीरे, थके कदमों से।

वह एक झटके में उठी, गुब्बारे बेचने वाले के पास गयी, गुब्बारे खरीदें और गरीब बच्चों में बांट दिये।

गुब्बारों के चटकीले रंग उन बच्चों की आँखो में इन्द्रधनुष के समान चमकते देख कई दिनों बाद उसके दिल को सुकून मिला।

मुस्कुराती हुई वो आगे बढ़ी तभी एक नवविवाहिता की नाराज़गी के स्वर उसके कानों में पड़े । गांव की कोई गौरी थी जो अपने पति से ढंग की फोटो नहीं लेने की वजह से नाराज़ हो रही थी, देहाती पति का फोन साधारण सा था, अच्छी फोटो आ ही नहीं रही थी । वो उन दोनों पति-पत्नी की ओर बढ़ी और अपने कैमरे से उनकी फोटोज़़ लेने की पेशकश की। कुछ लजाते,शर्माते दोनों ने हामी भर दी। अलग-अलग एंगल लेते हुए उसने दंपति के कई अच्छे फोटो लिए और हाथों-हाथ उन्हें थमा भी दिये । इन फोटो का मूल्य गौरी के चेहरे पर आयी खुशी के आगे कुछ नहीं था इसलिए पैसे लेने का तो सवाल ही नहीं था। चमकते चेहरे के साथ ग्रामीण नववधू और उसके पति ने बहुत-बहुत धन्यवाद दिया तो उसे अपूर्व मानसिक शांति मिली। उसकी मुस्कान और गहरी हो गयी।

इसके बाद वो पार्क में अकेले घूम रहे बुजुर्गों के पास गयी और उनसे थोड़ी-थोड़ी देर बातें की, मन का रीतापन छूमंतर हो गया था उनके साथ वक्त गुजार कर।

फूल सी हल्की हो गयी थी वो, अब अकेलापन महसूस नहीं हो रहा था, जीने का ढंग जो समझ में आ गया था।


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