Sandeep Kumar Keshari

Abstract Crime Inspirational


4.0  

Sandeep Kumar Keshari

Abstract Crime Inspirational


जिंदगी और सपने

जिंदगी और सपने

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विधानसभा चुनाव की मतगणना शुरू हो गयी थी। उम्मीदवारों की धड़कनें बढ़ रही थी। दूसरे राउंड तक प्रदेश के सबसे बड़े दल के उम्मीदवार आगे चल रहे थे, किन्तु उसके बाद धीरे-धीरे निर्दलीय उम्मीदवार शीलमनी ने बढ़त बनाना शुरू कर दिया था। सातवें राउंड तक शीलमनी ने उस बड़े दल के नेता जी को 15000 वोटों से पीछे कर दिया। रात करीब 8 बजे नतीजे की घोषणा हुई।

शीलमनी ने निकटतम प्रतिद्वंद्वी को 25000 से ज्यादा वोटों से हरा दिया था। जाने कितने अरसे बाद उसकी आँखों में चमक थी। उसकी चमकती आँखों ने कब निर्मल जल की धार छोड़ दी, उसे पता ही न चला। उसकी माँ ने उसे ढाढ़स बंधाया तो शीलमनी ने अपनी माँ को गले से लगा लिया। इतने सालों की तपस्या, त्याग, संघर्ष और सपने ने आज उसे विधायक बना दिया था। उधर राज्य चुनाव का नतीजा ऐसा आया कि किसी भी दल को बहुमत नहीं मिला। बिखरे जनमत के कारण कोई भी दल सरकार बनाने में सक्षम नहीं थी।

सबसे बड़े दल को भी सरकार बनाने के लिए दो और विधायकों की ज़रूरत थी। संयोग से राज्य में दो निर्दलीय विधायक चुने गए थे, जिनसे बड़े दल के नेता संपर्क में थे। जब शीलमनी को इस सिलसिले में संपर्क किया गया तो उन्होंने अपनी शर्तों पर समर्थन देने को राजी हुई। शीलमनी के शर्त के अनुसार उसे महिला एवं बाल विकास का मंत्रालय सौंपा गया। मंत्री पद संभालते ही उन्होंने ताबड़तोड़ फैसला लेना शुरू कर दिया।

उन्होंने सबसे पहले अपने विभागीय सचिव के माध्यम से सभी जिलों के उपायुक्त एवं एसपी की मीटिंग बुलाई तथा उनको विश्वास में लेकर एक एक्शन प्लान पर काम शुरू करने का आदेश दिया। एक्शन प्लान पर काम शुरु होते ही दलालों और ठेकेदारों में हड़कंप मच गया।

सारी सरकारी योजनाओं पर नज़र रखी जाने लगी। मंत्री महोदया कहीं-भी, कभी-भी औचक निरीक्षण के लिए चली जाती थीं। उनका ख़ौफ भ्रष्टाचारियों के चेहरे पर साफ दिखने लगा था। दो साल के भीतर उन्होंने अपने मंत्रालय का कायाकल्प कर दिया जिसका असर पूरे राज्य में दिखने लगा। वे अपने लक्ष्य के काफी करीब थीं, इसी बीच उनके विरोधियों ने गड़े मुर्दे उखाड़ने शुरू कर दिए। उनके इतिहास का काला सच अब दैनिक समाचार पत्रों समेत सारे मीडिया के माध्यम से जनता तक पहुँचने लगा। कहते हैं ना, सफल लोगों के पीछे दुश्मनों की टोली होती है जो कभी आपको सफल होते नहीं देखना चाहती। ठीक वही हुआ था शीलमनी के साथ।

उनका काला चिट्ठा खुलते ही उन पर इस्तीफा का दबाव बढ़ने लगा, किन्तु वे तो अपनी शर्तों पर काम करने वाली ठहरीं, सो उन्होंने इस्तीफे से साफ मना कर दिया। विरोध बढ़ता गया, पर ये दबाव में नहीं आईं। अन्ततः मुख्यमंत्री को हस्तक्षेप करना पड़ा और उन्होंने दूसरे विभाग की पेशकश की, मगर ये भी जीवट और जिद्दी थीं तो इन्होंने उल्टा सरकार गिराने की धमकी दे दी। विरोधियों द्वारा चलाया गया प्रोपेगंडा आख़िरकार इनकी ज़िद के आगे नहीं टिक पाया और उन्हें हार माननी पड़ी। इसी ज़िद, जीवटता, मेहनत, साहस और संघर्ष के कारण उन्हें उत्कृष्ट विधायक का पुरस्कार दिया गया। इस बीच उनकी अपनी आत्मकथा ‘ज़िन्दगी और सपने’ नामक किताब प्रकाशित हुई जिसका विमोचन पुरस्कार वाले दिन माननीय राज्यपाल के हाथों किया गया। जब उनकी किताब आम लोगों के हाथों में आई तब माननीय मंत्री शीलमनी के ज़िन्दगी का काला इतिहास, स्याह सच, संघर्ष, तपस्या और जिजीविषा का साक्षात्कार हुआ।

ज़िन्दगी और सपने (किताब के कुछ चुनिंदा अंश )

बात तब की है जब मैं 14-15 साल की थी। मेरे पिता की मौत एक अनजानी बीमारी से हो गयी थी। घर में मेरी माँ और दो छोटे भाई-बहन थे। हमारी आर्थिक स्थिति इतनी खराब थी कि कभी-कभी 2-3 दिनों तक खाना नसीब नहीं होता था। एक दिन मेरे पड़ोस के गाँव का एक आदमी मेरी माँ के पास आया और कहा कि तेरी बेटी को दिल्ली भेज दो, वहाँ बहुत काम है। कुछ काम करेगी तो पैसा भी बनेगा और उससे तेरे बाकी दोनों बच्चों का खर्चा भी निकल जायेगा। पहले तो माँ हिचकिचाई फिर दोनों छोटे-छोटे बच्चों का मुँह देख मुझे दिल्ली जाने की अनुमति दे दी। उस पड़ोसी ने माँ को कुछ पैसे दिए फिर वह मेरे साथ 3 और लड़कियों को राँची में ले जाकर हमें एक दूसरे अनजान आदमी को सौंप दिया। पहले तो मुझे डर लगा पर उसने हमें काफी समझाया और खाने-पीने को दिया। हम कुल 10-12 लड़कियाँ थीं जिन्हें दो दिनों तक राँची में रखने के बाद झारखंड स्वर्ण जयंती एक्सप्रेस से दिल्ली ले जाया गया। वहाँ पर उस व्यक्ति ने तीसरे किसी अनजान व्यक्ति को हमें सौंप दिया। उस तीसरे व्यक्ति ने हमारे साथ आए आदमी को नोटों की गड्डी थमाई। उस नए व्यक्ति ने हमें अलग-अलग स्थानों पर ले जाकर किसी घर में काम पर लगा दिया। वहाँ मैं काम करने लगी।

एक महीने बाद जब मैंने पैसे की माँग रखी तो घर के मालिक ने बहुत पीटा। उस घर से मुझे बाहर निकलने नहीं दिया जाता था। दो दिन में एक बार 3-4 रोटी खाने को मिलती थीं। उस घर में सिर्फ एक आदमी रहता था, अधेड़ उम्र का। उसके बच्चे विदेश में रहते थे शायद। उसकी बीवी भी उसके साथ नहीं रहती थी। वह रोज़ रात को 1 बजे के बाद आता था, मुझे जगाता था फिर मुझे अपने बिस्तर पर ले जाता था। मैं उसे रोकने एवं चिल्लाने का प्रयास करती तो मुँह में कपड़े ठूँसकर पीछे से दोनों हाथों को बाँध देता और फिर…. फिर वो….!

मुझे बहुत दर्द होता था, खून भी निकल जाता था…! मैं दर्द से चिल्लाना चाहती थी पर मुँह में कपड़ा होने की वजह से आवाज़ बाहर नहीं आती थी। बस आँखों से आँसू आ जाते थे। वह बर्बरता की हद तक ज़बरदस्ती करता था। एक दिन बोला कि बहुत चिल्लाती है ना तू… ये ले, और कहते हुए उसने मेरे मुँह में अपना **** डाल दिया। मैं बहुत रोई, गिड़गिड़ाई, पर उस पर कोई असर नहीं हुआ। उल्टा मुझे और पीटा।

बेल्ट के बकल से इतना मारा कि उसकी सिहरन और दर्द से आज भी रूह काँप उठती है। आज भी उसके दाग़ मेरे पीठ और जाँघों पर है। रोज़ रात वह 1-2 बजे आता और मेरे साथ सोता फिर अगले दिन 11.30 बजे निकल जाता। खाना न मिलने और दर्द की वजह से मैं ठीक से काम भी नहीं कर पाती थी। ऐसे ही करते-करते 3 महीने बीत गए। मैं थक चुकी था और वहाँ से निकलना चाहती थी, पर कोई रास्ता नहीं था।

फिर मैंने उसकी कमज़ोरियों पर निगाह रखना शुरू किया। मैंने गौर किया कि जिस रात जब वह मुझे साथ लेकर सोता, मुझे वह बांधता नहीं था। एक रात जब वह हर बार की तरह ज़बरदस्ती किया और फिर सो गया, तो मैंने उसके दरवाज़े की चाबी उठायी और मेन गेट खोलने को जाने लगी, लेकिन तभी मुझे ख्याल आया कि यहाँ बाहर एक गार्ड भी रहता है। कहीं उसने चिल्ला दिया तो जो भी बचा-खुचा माँस है, उसे भी ये वहशी खा जाएगा। मैं यह सोचकर ही सहम गई। फिर मैंने इधर-उधर देखा, सोचा, फिर हार मानकर मालिक के कमरे में आकर टेबल पर चाबी रखने जा ही रही थी कि एक बिल्ली पास वाले दरवाज़े से अंदर घुसी। वह दरवाज़ा हमेशा बंद रहता था। मैंने सोचा कि अगर ये बिल्ली उस दरवाज़े से आई है तो जरूर उसके पीछे कुछ है। मैंने उस चाभी के गुच्छे से ताला खोलना शुरू किया।

अंत में एक चाबी से वह ताला खुल गया। मैंने धीरे से दरवाज़ा खोला, फिर मालिक की ओर देखा, वह खर्राटे ले रहा था। मैंने दरवाज़े के बाहर देखा, भयानक गंदगी फैली थी, पर उसी गंदगी में एक सीढ़ी भी थी। मुझे कुछ उम्मीद दिखी। मैंने सबसे पहले उस दरवाज़े को बाहर से बंद किया क्योंकि अगर मैं उसे बंद न करती तो वहाँ फैले कचरे की दुर्गंध से मालिक पक्का जाग जाता। समय रात के करीब 2 बज रहें होंगे।

मैं चुपचाप सीढ़ी चढ़ गई। छत से दिल्ली दिख रही थी। मैं पागलों की भाँति भागना चाह रही थी। कपड़ा के नाम पर देह पर सिर्फ सलवार-कमीज़ और नीचे बनियान थी, हाथ खाली थे पर चेहरे पर सुकून था और दिल में तूफान। कई मकानों की छतों को पार कर अंत में मैं एक पाइप के सहारे नीचे उतरकर भागी। मुझे नहीं पता था कि मैं कहाँ जा रही हूँ, बस इतना पता था कि मैं आज़ाद हो चुकी हूँ। मैं भागना चाहती थी और बस भाग रही थी।

भागते-भागते सुबह हो गयी, फिर शाम, फिर सुबह, फिर शाम, फिर सुबह फिर शाम… जाने इसी तरह कई दिन बीत गए, फिर हफ्ते और फिर महीने…! रास्ते में कहीं कुछ मिल जाए तो खा लिया, वरना भूखे पेट भी कई रात सोना पड़ा। इस अनजाने सफर का कोई मंज़िल न थी, न कोई सहारा था और न ही कोई ही किसी पर भरोसा। मुझे पढ़ना-लिखना भी नही आता था, न ही हिंदी आती थी। दिलो-दिमाग़ में ऐसा ख़ौफ था कि कोई कुछ पूछता तो भी सहम जाती।

किसी को छूना तो दूर, कोई पास भी आता तो मैं खुद में सिमट कर उससे दूर हो जाती थी। मेरी आँखों में मेरा डर, दर्द और सूनापन साफ उभर आता परन्तु किसी को दिखता नहीं था। रास्ते में किसी ढ़ाबे या होटल में कभी बर्तन धो देती तो कुछ खाने को मिल जाता, फिर मेरा अनजाना सफर शुरू हो जाता। कई रात तो पेड़ों पर गुज़ारनी पड़ी। मौसम ने करवट बदली, ठंड शुरू हो गयी। तन पर अब भी वही सलवार थी, जो कई दिनों तक साफ नहीं होने की वजह से धूसरित और मैली हो गयी थी। दो महीनों से मैंने भी नहीं नहाया था। बालों की जटा बन गया गयीं थीं, पैरो में छाले पड़ गए थे, दाँतों में कीड़े लग गए थे, चेहरे, होंठ और हाथ सर्दी से फट गए थे। उसके बावजूद मेरा चलना न रुका। एक तो ठंड और ऊपर से भूख, आखिर मेरी हिम्मत ने जवाब दे दिया और एक रात मैं सड़क किनारे गिरी तो फिर होश न रहा। जब आँखें खुली तो जबलपुर के किसी अस्पताल में खुद को पाया। वहाँ तीन दिन रहने के बाद मुझे महिला थाना ले जाया गया।

वहाँ सबसे पहले मुझे गर्म कपड़े दिए गए और चाय पिलायी गयी। मैं काफी डरी-सहमी हुई फ़र्श पर कोने में दुबक कर बैठी थी। कुछ लोगों ने मुझे प्यार से कोने से उठाया और बेंच पर बिठाया। शायद वे कोई एन. जी. ओ. वाले थे जो थाने में पुलिस के साथ मुझसे पूछताछ कर रहे थे। वे लोग हिंदी में पूछ रहे थे लेकिन मुझे संताली के अलावा कोई दूसरी भाषा नहीं आती थी। मैं उनकी बात समझ नहीं पा रही थी। मैं सिर्फ 'झारखंड' बोली। उन्हें अंदाजा हो गया था कि मैं उनकी भाषा नहीं समझ पा रही हूँ, लेकिन 'झारखंड' शब्द से उन्हें क्लू मिल गया।

मप्र. पुलिस ने झारखंड पुलिस कंट्रोल रूम से संपर्क किया और मेरे बारे में जानकारी दी। दो दिनों के बाद झारखंड पुलिस जबलपुर आई और फिर मुझे राँची वापस लेकर आ गई। वहाँ मुझे बाल कल्याण समिति में रखा गया जहाँ मैंने सपने देखना शुरू किया। मैंने वहाँ पढ़ाई शुरू की, हिन्दी सीखी। 24 साल की उम्र में दसवीं, 26 साल में बारहवीं और 30 साल की उम्र में मैंने राजनीति विज्ञान (पॉलिटिकल साइंस) से ग्रेजुएशन किया। पढ़ाई का एक ही ध्येय था - मेरी जैसी हालत किसी का न हो, और मानव तस्करी पूरी तरह खत्म हो जाए। मैंने इसके लिए कई एन. जी. ओ के साथ काम किया, कई संगठनों के साथ जुड़ी, पर धीरे-धीरे मुझे महसूस हुआ कि मैं इन छोटे संगठन से अपने लक्ष्य नहीं पा सकती। उसके लिए बड़ा सोचना और करना होगा। फिर मैं अपने क्षेत्र संथाल परगना (संथाल -आदिवासियों की एक प्रजाति, परगना- प्रांत, जिसमें झारखंड के छह जिले यथा दुमका, गोड्डा, पाकुड़, जामताड़ा, साहिबगंज एवं देवघर आते हैं|)

में गई, 4-5 सालों तक घर-घर जाकर सभी परिवारों से मिली, उन्हें शिक्षित किया उनका विश्वास जीता और विधानसभा चुनाव में निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर खड़ी हुई। यहाँ की जनता ने मुझे इतना प्यार दिया और मुझ पर भरोसा जता कर मुझे विधानसभा में भेजा। मैंने मानव तस्करी को पूरी तरह खत्म करने एवं महिलाओं तथा बच्चों के सामाजिक, आर्थिक एवं शैक्षणिक स्थिति को सुधारने के लिए ही महिला एवं बाल विकास मंत्रालय का कार्यभार संभाला। मुझे खुशी है कि मैंने तमाम केंद्रीय एवं राज्य की योजनाओं को पूरे राज्य में सही ढंग से लागू करवाया जिससे महिलाओं तथा बच्चों के जीवन स्तर में बहुत सुधार हुआ। मैंने मानव तस्करी पर पूरी तरह लगाम लगा दिया।

यही बात दलालों, एवं ठेकेदारों को हज़म नहीं हुई तो उन्होंने मेरे खिलाफ कीचड़ उछालना शुरु कर दिया, पर शायद वे भूल गए थे कि मैं भी कीचड़ से ही निकली हूँ। मैं अपनी यह जगह ऐसे ही नहीं बनाई है। एक लंबा संघर्ष, त्याग, तप और लड़ाई लड़ी है मैंने, किसी के अनर्गल आरोप और प्रपंच मुझे नहीं रोक सकते।

मुझे गर्व है कि मैं एक संथाली हूँ, झारखंडी हूँ और एक भारतीय हूँ। मुझे खुशी है कि मैंने कई लोगों का जीवन सुधारा है। बस, एक कसक है कि मेरे साथ गई लड़कियों का कोई अता-पता नहीं है।

किताब हिंदी में लिखी गई थी, जो उस साल की बेस्टसेलर साबित हुई। उसके बाद उसका अंग्रेजी एवँ संथाली भाषाओं में भी अनुवाद हुआ।

अगले विधानसभा चुनाव में जनता ने फिर प्यार बरसाया और उन्हें रिकॉर्ड मतों से विजयी बनाया|

(नोट:- झारखंड से हर साल हजारों लड़कियाँ मानव तस्करी की शिकार होती हैं जिनमें अधिकांशतः आदिवासी होती हैं और 18 से कम उम्र की होती हैं। खूँटी, सिमडेगा, राँची, लोहरदगा, गुमला, दुमका, पाकुड़, गोड्डा एवं साहबगंज जिले सबसे ज्यादा प्रभावित हैं।)


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