केसरिया उमापति

Romance Tragedy Fantasy


4.0  

केसरिया उमापति

Romance Tragedy Fantasy


बारिश और लड़की

बारिश और लड़की

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रात लगभग 9 बजे। गाँव से दूर एक घर की पहली मंज़िल पर संजीव बालकनी में खड़ा चाय पी रहा था। सावन का महीना और पहली बारिश, वह भी झूमकर। बिना चमक और गरज के आज बादल ऐसे बरस रहे थे जैसे वे अपने संताप को चुप्पी से बाहर निकाल रहे हों। काफी देर से वह चाय की प्याली को हाथ में थामे बालकनी के रॉड वाली चाहरदीवारी पर पैर टिकाये खड़ा था। तभी दरवाज़े पर एक आहट हुई। संजीव नीचे देखा, दरवाज़े पर एक लड़की थी जो पूरी तरह से भीगी हुई थी। अंधेरे की वजह से उसका चेहरा दिखाई नहीं दे रहा था। उसके हाथ में एक टूटी छतरी थी जिसे वह ठीक करने का असफल प्रयास कर रही थी। तभी उसकी माँ ने दरवाज़ा खोला। दरवाज़ा खोलते ही लड़की ने संजीव की माँ से कहा – “आंटी, बाहर बहुत जोर की बारिश हो रही है और अभी मेरा पीरियड चल रहा है। इस बारिश की वजह से मेरा छाता भी टूट गया जिससे मैं बुरी तरह भीग चुकी हूँ। अगर आप बुरा न माने तो क्या मैं आपके बाथरूम इस्तेमाल कर अपना पैड बदल सकती हूँ?”

"ठीक है, आ जाओ", कहते हुए संजीव की माँ ने उसे बाथरूम का रास्ता दिखा दिया।

संजीव ने देखकर अनदेखा कर दिया। उसने चाय की प्याली रखी और अपने कमरे में जाकर टी वी चालू कर दिया।

नीचे उस लड़की ने अपने पैड बदले। माँ ने तब तक चाय बनाकर टेबल पर रख दिया था। उस लड़की के बाथरूम से बाहर आते ही माँ ने उसे चाय के लिए बोला। वह मना करती रही, पर माँ नहीं मानी। अंततः उसे चाय पीनी पड़ी। कुछ देर के बाद लड़की जाने को तैयार हो गई। इधर बारिश भी थम गई थी। उसके जाने के कुछ देर बाद माँ ने संजीव को खाने के लिए नीचे बुलाया। वह नीचे आकर हाथ मुँह धोने बाथरूम गया। अंदर जाने पर उसे उस लड़की का एक पायल मिली जो शायद गिर गयी थी। उसने पायल उठाया और गौर से देखा। ध्यान से देखने पर वह हड़बड़ाते हुए बाहर आया और अपनी माँ से चिल्लाते हुए पूछा – “माँ, अभी जो लड़की आई थी, किधर गई?”

वह तो चली गयी, अब किधर गई मुझे नहीं पता। पर तू उसे क्यों खोज रहा है, माँ ने रसोई से आवाज़ दी?

वह तब तक दौड़कर बाहर की ओर भागा। रात के अंधेरे में लड़की तब तक गुम हो चुकी थी। आधी रात तक वह बदहवास इधर उधर उसकी तलाश में भटकता रहा। उसके पीछे माँ भी देखती रही और पूछती रही, पर उसने कोई जवाब नहीं दिया। अंततः हार मानकर वह अपने कमरे में आकर चुपचाप बैठ गया। कुछ देर यूँ शांत बैठने के बाद उसने अलमीरा से अपनी डायरी निकाली और उसमें लिखी चार साल पुरानी उस कविता को पढ़ने लगा जो उसने विभा को सुनाया था -

जाने कब वो रात होगी,

जब झूमकर बरसात होगी।

सावन का महीना होगा,

और तू मेरे साथ होगी।

चेहरा मय का प्याला होगा,

ये घर तेरा मयखाना होगा।

नयन उसका हाला होगा,

होठ तेरा मधुशाला होगा।

ये दिल तेरा दीवाना होगा,

पूरा हर अफ़साना होगा।

भीगी हुई कायनात होगी,

जाने कब वो रात होगी…


उसने फिर विभा का जवाब भी पढ़ना शुरू किया जो उसने जाते समय उससे कहा था पर पूरा पढ़ न सका। उसकी आँखों के किनारे से निकली मोटी-सी धार डायरी को भिंगाने लगी।

मैं आऊँगी उस रात को,

तू बस मेरी राह देखना,

दर पर एक आहट होगी,

दरवाज़ा तू खोल कर रखना।

दिल का एक तराना होगा,

ना किस्सा ये पुराना होगा,

खुशियों की सौगात होगी,

जरूर वो एक रात होगी,

जब झूमकर बरसात होगी।

सावन का महीना होगा, 

और मैं तेरे साथ हूँगी।


विभा को दिया पैर की एक पायल उसके हाथ में झूल रही थी और दूसरी विभा की पैरो में!

             



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