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Dipesh Kumar

Abstract Others Tragedy


4.6  

Dipesh Kumar

Abstract Others Tragedy


जब सब थम सा गया (सातवाँ दिन)

जब सब थम सा गया (सातवाँ दिन)

4 mins 167 4 mins 167

लॉक डाउन सातवाँ दिन

31.3.2020

प्रिय डायरी,


आज लॉक डाउन का सातवाँ दिन था और नवरात्रि का भी।सुबह उठा तो ऐसा लगा मानो अब इसी तरह का जीवन जिया जायेगा क्या? फिर मुझे लगा ये क्या सोच रहा हूँ मैं? सब ठीक हो जायेगा ये कुछ ही दिन की तो बात हैं ,और वैसे भी कल के आंकड़ों के हिसाब से अब धीऱे धीऱे सब कण्ट्रोल हो जायेगा।इस तरह सकारात्मक ऊर्जा और उमंग के साथ मैं उठ गया। नहाने के बाद मैं माता रानी की उपासना करते हुए मैंने उन्हें धन्यवाद किया कि बस जिस तरह कल संख्या कम होनी चालु हुए हैं उसी तरह सब ठीक हो जाये।

पूजा पाठ समाप्त करके मैं दादीजी के पास जाकर कहा कि दादीजी अब सब सही हो रहा हैं ,तो उन्होंने कहा बस बेटा भगवान् सब जल्दी से ठीक कर दे। उसके बाद 9 बजे मैं टीवी वाले कमरे में गया और टीवी चालू करके समाचार देखने लगा। समाचार देखते ही मेरा खून खोलने लगा और मेरा सकारात्मक प्रभाव तुरंत कम होने लगा।खबर देख कर मुझे गुस्सा भी आ रहा था। खबर के अनुसार कोरोना संक्रमितों की संख्या एका एक बढ़ रही थी। बढ़ने का कारण बहुत ही अमानवीय था।

प्रधानमंत्रीजी ने लॉक डाउन का आदेश दिया हैं, जिसका पालन हर भारतीय को करना हैं और नियम के अनुसार कही एक जुट नहीं होना हैं और घर पर ही रहना हैं।लेकिन कुछ लोग जो गैर जिम्मेदार हैं समझने पर भी नहीं मानते। लोग इतने समझदार हैं कि दूसरे स्थान से आये व्यक्तियों को छुपा कर रखा हैं ।जांच के दौरान उनमे से कई लोग संक्रमित पाये गए और उन लोगो से कितने लोग संक्रमित हुए अब भगवान् ही मालिक हैं। लाख प्रयासों के बाद ऐसी गलती को गलती कहे या अपराध कुछ समझ नहीं आ रहा था। मैंने टीवी बंद किया और चुप चाप अपने कमरे में आ गया। मैं सोचने लगा की इस देश का क्या होगा जब जनता ही अपने देश को बर्बाद करने में लगी हुए हैं।मैं बिलकुल निराश होकर बैठ गया।


11 बजे के लगभग मेरी प्यारी भांजी नायरा और मेरी भतीजी आरोही मेरे कमरे में आ गयी।साथ मैं मेरी छोटी बहन प्रियांशी भी आ गयी।बच्चो का साथ मैं खेलने लगा और मेरा निराश मन सही हो गया।खेलते खेलते सभी बच्चे मेरे पास ही सो गए ।मैंने अपना मोबाइल उठाया और कंप्यूटर की और जा कर बैठ गया।मोबाइल में भी वही सन्देश आ रहे थे जो टीवी पर मैंने पहले ही देख लिया था,इसलिए मैं मोबाइल छोड़कर कंप्यूटर पर अपनी कुछ पुरानी तस्वीरे देखने लगा।तस्वीर देख कर पुरानी यादें ताजा हो गयी।फिर मैंने स्कूल का कुछ काम कंप्यूटर पर किया और खिड़की से बाहर की तरफ देखने लगा,और सोचने लगा की कब तक सब यूं ही बैठा रहेगा? बच्चे कब बाहर खेल सकेंगे?और भी कई अन्य बाते।इतने में मुझे आभास हुआ की मेरे सर में कुछ दर्द सा हो रहा हैं,मैं तुरंत सोने के लिए बिस्तर पर लेट गया और कब नींद लग गयी पता नहीं चला।

4 बजे जब नींद खुली तो मैं पहले से बेहतर महसूस कर रहा था। मैं उठा और नीचे किचन में आ कर पानी पीने लगा।माँ ने पूछ क्या हुआ बड़ा उदास लग रहा हैं तबियत तो ठीक हैं न? मैंने कहा बस थोड़ा सर दर्द हो रहा था अब सब ठीक हैं।मैं बाहर की तरफ निकला तो रेम्बो मेरा प्यार पालतू कुत्ता मुझे बड़ी आस से देख रहा था।मैं उसके पास गया तो वो मेरे को देख कर उछलने लगा।दरहसल ये उसको जब बहार जाना होता हैं तो उसकी तरफ से संकेत होता हैं।मैंने गेट खोला और घर के सामने घुमाने लगा। सड़के सुनसान थी और बस पुलिस के गाडी के साईरन की अवाज़ आस पास में सुनाई दे रही थी। मैं रेम्बो को घुमा रहा था कि मेरे पास दो लड़के स्कूटी से आये और पूछे,"भैया हम लोग जरूरतमंदों को भोजन दे रहे हैं,यदि कोई आपके पास दिखे तो आप हमें सूचित कर देना, ये हमारा नंबर हैं।" इतना बोलकर वे चले गए।हालांकि दोनों लड़के अलग अलग स्कूटी पर ग्लव्स और मास्क लगाकर खाने के डिब्बे बाट रहे थे। मैंने सोचा इस समय ये लोग कितना अच्छा काम कर रहे हैं। थोड़ी देर में मैं अंदर आ गया।कुछ देर बाद सेनेटाइजेशन के लिए गाडी हमारे कॉलोनी में आ गयी और सभी के घरों के बाहर और आस पास दवाई का छिड़काव करने लगी।

शाम को हम सब पूजा पाठ करके बात कर रहे थे,की जनता क्यों नहीं समझ रही हैं कि खुद बचोगे तो सब बचेगा। इसलिए इतने दिन का लॉक डाउन किया गया हैं,देखो अब आगे क्या होता हैं।फलहार करके मैं अपने कमरे में आ गया,और पाठ्यक्रम की पुस्तक पढ़ने ल11:30 बजे मैं बिस्तर पर आकर अपनी कहानी लिखने लगा और थोड़ी देर बाद में सो गया।


इस तरह लॉक डाउन का आज का दिन भी खत्म हो गया लेकिन कहानी अभी अगले भाग में जारी हैं............गा।


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