Dipesh Kumar

Horror Thriller Tragedy


4.8  

Dipesh Kumar

Horror Thriller Tragedy


अनजान सफर-अंतिम भाग

अनजान सफर-अंतिम भाग

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अतुल भैया और मैं अपने अपने टेंट में सोने के लिए चले गए और कल रात की बात मेरे मन मैं चल रही थी ! इतने में राकेश ने कहा-"भाई नींद नहीं आ रही क्या?" मैंने कहा-"बस भाई सोने की कोशिश कर रहा हूँ ?" 


"क्यों कोई बात हैं क्या ?-राकेश ने मुझसे कहा" मैंने कहा नहीं भाई चलो सोते हैं?


रात लगभग 1 बजे मेरी आँख खुली तो सुधीर भैया और अतुल भैया के टेंट में लाइट जल रही थी और सुधीर भैया परेशान से दिख रहे थे!


मैंने कहा-"क्या हुआ भैया?"


सुधीर भैया ने जवाब दिया-"अतुल टेंट में नहीं हैं हैं और उसका बैग भी नहीं दिख रहा हैं?"


ये सुनकर राकेश की भी नींद खुल गयी और हम तीनो लोग अपनी टोर्च जलाकर चारो तरफ देखने लगे लेकिन अतुल भैया कही नहीं दिख रहे थे" जंगल में मोबाइल नेटवर्क नहीं था, इसलिए ये सबसे बड़ी परेशानी का कारण था !


हम तीनो लोग अतुल भैया को खोजने निकल पड़े अँधेरे में डर भी लग रहा था,लेकिन अतुल भैया को खोजना जरुरी था ! 


एक घंटे तक खोजने के बाद हम लोग गुफा के पास पहुंचे लेकिन गुफा का विकराल द्वार देखकर हम तीनो की हिम्मत आगे जाने की नहीं कर रही थी ! सुधीर भैया ने कहा " क्या किया जाये दीपेश बाबू ?"


राकेश और मैं भैया का मुँह देखने लगे फिर भगवान् का स्मरण कर मैंने कहा -"चलिए भैया जो होगा देखा जायेगा !"


लेकिन गुफा के अंदर क्या हैं किसी को मालुम नहीं था ! इतने में राकेश ने कहा "भाई दो मिनट रुको" वो तुरंत दौड़कर गया और बैग के अंदर चाक़ू रस्सी और लाठिया लेकर आ गया लेकिन मुझे लग रहा था की गुफा के जरुर कोई जानवर हो सकता हैं और टोर्च अंदर के रोशनी के लिए पर्याप्त नहीं था ! इसलिए हम तीनो ने मशाल बनाया और लाइटर से आग जलाकर गुफा के अंदर चल दिए!


गुफा के मुख्य द्वार पर पहुंचने पर मैंने देखा की गुफा बहुत ही भयानक दिख रही थी,हम तीनो को डर भी बहुत लग रहा था लेकिन आगे क्या होना था क्या पता ?


थोड़े दूर अंदर पहुंचने के बाद हमने देखा की मशाल की रोशनी देख चमगादड़ो का झुण्ड ऊपर से उड़ कर निकल गया !ये देख कर हम सब और डर गए ! जब थोड़ा और आगे निकले तो हमने देखा की गुफा के अंदर एक गुप्त गुफा दिख रही थी जिसको देखकर लग रह था की उस गुफा को अभिमंत्रित करके बंद किया गया था ! बहुत सारे धागे और सिंदूर से बने उल्टे स्वस्तिक , लेकिन जब हम लोग पास में पहुंचे तो देखा की उस गुफा के द्वार पत्थर से बंद थे लेकिन किसी ने उसको खिसका रखा था ! 


मैं समझ गया था और सुधीर भैया और राकेश भी समझ गए थे की पक्का अतुल भैया ने ही ये काम किया होगा ! लेकिन इस गुफा में जाना और खतरनाक लग रहा था !


हिम्मत करके मैं आगे बढ़ा और हाथ जोड़कर हनुमान चालीसा का पाठ करके अंदर जाने लगा तो राकेश और सुधीर भैया भी मेरे पीछे पीछे आने लगे ! मुझे बस इस बात का डर था की अतुल भैया की इस गलती का भुगतान हम सबको अपनी जान गवाकर चुकाना न पड़ जाए?


लगभग 50 मीटर अंदर जाने के बाद बहुत ही अजीब सी आवाज़ आने लगी मानो कोई तेज नदी का बहाव या आंधी चल रही हो ! ये सुनकर हम तीनो डरने लगे राकेश इतना डरा हुआ था की कुछ बोल ही नहीं पा रहा था ! इस आवाज़ के बाद हम तीनो की हिम्मत ने जवाब दे दिया था,और डर क्या होता हैं आज पता चल गया था ! फिर मैंने राकेश के और मेरे द्वारा सुनी गयी आवाज़ वाली घटना का जिक्र किया तो सुधीर भैया ने उदास मन से कहा "लगता हैं अतुल अब हमें नहीं मिल पायेगा ! "


ये सुनकर मुझे बहुत दुःख हो रहा था क्यूंकि हम चारो लोगो का प्यार भाइयो से भी बढ़कर हैं !मैंने कहा भैया अब आर या पार चलो आगे चलते हैं मैंने कहा "राकेश तुम यही रुक जाओ मैं और सुधीर भैया आगे देखते हैं अगर हमे कुछ हो जाता हैं तो तुम चले जाना !"


राकेश बोलै मैं नहीं रुकूंगा मैं भी साथ मैं चलूँगा -बस फिर क्या था चल पड़े हम आगे ! बस फिर क्या था जब हम सब ने आगे बढ़ने का निर्णय लिया तब हमने अपने डर पर जीत पा ली थी!


ईश्वर ने हमारा साथ दिया और कुछ दूर पर हमें अतुल भैया ज़मीन पर गिरे हुए दिखे हम सब घबरा गए ! मैं तुरंत दौड़कर अतुल भैया के पास पहुंचा तो देखा की उनकी साँसे चल रही थी ! बिना समय गवाए सुधीर भैया ने अतुल भैया को कंधे पर उठाया और हम लोग बहार निकलने लगे मैं सबसे पीछे था और राकेश आगे मशाल ले कर चल रहा था कुछ देर मैं मशाल भी बुझने वाली थी !


बस गुप्त गुफा का द्वार दिख रहा था और एक रोशनी उम्मीद की किरण के रूप में दिख रही थी,राकेश और सुधीर भैया के कदम रुकने का नाम नहीं ले रहे 

थे ! राकेश बहार निकला और सुधीर भैया की मदद करने लगा मैं भी बस बहार ही निकलने वाल था की एक आवाज़ मेरे कानो पर पड़ी 


"दोबारा मत आना "


"दोबारा मत आना "


आवाज़ बिलकुल उसी तरह की थी जैसा मैंने और राकेश ने पहले दिन आभास किया था !मैंने पीछे मुड़कर देखने की हिम्मत भी नहीं की क्यूंकि अक्सर दादाजी कहा करते थे की -"अनजान आवाज़ को कभी भी पलटकर मत देखना "बस हिम्मत जुटाकर मैं भी बाहर निकल गया ! सुधीर भैया ने मुझे देख कर  "कहा क्या हुआ बाबू ?"


मैंने कहा "भैया राकेश और मैं इस पत्थर को वापिस लगा देते हैं "! 


सुधीर भैया ने कहा "जो करना हैं जल्दी करो अतुल बेहोश हैं "


फटाफट मैंने और राकेश ने उस पत्थर को वापिस उसी जगह पर रख दिया ! साथ ही साथ मैंने हनुमान चालीसा का जाप करते हुए फिर से धागो से उस द्वार को बाँध दिया लेकिन आवाज़ जो मैंने सुनी थी वो बस एक चेतावनी नहीं लग रही थी आगे भी किसी के साथ अनहोनी होने का संकेत दे रही थी, इसलिए मैंने अपने पास पड़े चाकू को ईश्वर का नाम लेकर वही गाड़ दिया ये मैंने बस अपने मन को तसल्ली देने के लिए किया था आगे ईश्वर की मर्जी !


बिना समय गवाए हम सब बहार की और भागने लगे ! 


थोड़ी देर बाद हम सब गुफे के बहार निकल चुके थे और सुबह भी हो गयी थी !


हम सभी अपने टेंट में पहुंचे और अतुल भैया को टेंट में लिटाकर होश में लाने के लिए पानी छिड़का गया !


लेकिन अतुल भैया को होश थोड़ी देर बाद आया ! बिना समय गवाए हम सब वापिस गाँव की और जाने लगे ! जब हम गाँव में पहुंचे अपनी बाइक लेकर शाम होते होते वापिस हॉस्टल की तरफ रवाना हो गए !


डर इतना था की हमने किसी से बात तक नहीं की और गाडी पर बैठने के बाद सीधा हॉस्टल ही रुके!


इस पुरे सफर का ऐसा अंत हम सबने कभी नहीं सोचा था !


अतुल भैया की तबियत बिगड़ गयी थी,कुछ दिन अस्पताल में रहने के बाद जब हमने उनसे बात करने की कोशिश की थो उन्होंने इशारे में मना कर दिया,वैसे हम सभी उस घटना का जिक्र किसी से करना नहीं चाहते थे !


इस घटना ने वास्तव में डर क्या होता हैं बता दिया और अतुल भैया भी अब ईश्वर के प्रति आस्था दिखाने लगे थे ! अंत भला तो सब भला लेकिन उस रात का राज आज तक राज ही हैं ! हम चारो ने दोबारा ऐसे जगह पर न जाने का संकल्प लिया ! लेकिन फिर भी हम यात्रा करते थे लेकिन अनजान जगहों पर कभी भी नहीं ! 


सच में बुजुर्गो ने कहा हैं की कुछ राज को राज ही रहने देना चाहिए और इस तरह उस गुफा का राज इस अनजान और डरावने सफर की तरह राज ही रह गया!उम्मीद हैं की दोबारा वहाँ कोई न पहुँचे क्यूंकि वो चेतावनी आज भी मुझे डरा देती हैं !


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