Apoorva Singh

Romance Thriller


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Apoorva Singh

Romance Thriller


इंतजार...

इंतजार...

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एक अरसे बाद आज मैंने उसे कॉफी हाउस में बैठे देखा। वो जिसकी छवि आज भी मेरे हृदय पटल पर अंकित है। वो जो मेरा पहला प्यार भी है और आखिरी भी। पल्लव! हां पल्लव ही तो नाम है उसका। मै किसी आवश्यक कार्य से आज सुबह से घर से बाहर निकली थी। वापस लौटते हुए काफी थकान महसूस हो रही थी, तो जाकर कुछ देर रेस्ट के लिए एक कॉफी हाउस की शरण ली। सोचा एक कप कॉफी मिल जाएगी तो थोड़ी थकान दूर हो जाएगी। मुझे क्या पता था कि यहां मुझे वो दिख जाएगा जिसके आने का इंतजार मै हर घड़ी किया करती हूं। आज उसकी एक झलक दिखी मुझे। वो ग्रे रंग का कुर्ता पहने हुए था। और आंखो पर मोटे फ्रेम का चश्मा चढ़ा रखा था। उसकी टेबल पर एक तरफ चाय का प्याला रखा था और दूसरी तरफ रखी थी एक डायरी और पेन। जिसका उपयोग वो बीच बीच में कर लेता था। शायद कुछ लिख रहा होगा।


उसको देख कई सवाल एक साथ उठे मन में। क्या ये वही था? सांवले से चेहरे वाला, कातिल निगाहें, और मुस्कान ऐसी कि अगर जरा सा मुस्कुरा भी दे तो गालों पर डिंपल पड़ जाता। उसी डिम्पल को देख ऑफिस की लड़कियां पागल हो जाती। और उन्हीं पगलियों में से एक पगली थी मै। मै यानी मधु! मधुबाला!


एक अरसे बाद उसे देख एक एक कर सारी बीती यादे किसी चलचित्र कि तरह आंखो के सामने से गुजरने लगी। और मै न चाहते हुए भी पहुंच गई झांकने अतीत की उन संकरी गलियों में, जहां मै अगर एक बार पहुंच जाती, तो फिर निकलना मेरे लिए नामुमकिन सा हो जाता।


उसके द्वारा कहा गया पहला शब्द गुड मॉर्निंग मिस मधु! आज भी मैंने अपने जेहन में बिल्कुल वैसे ही सहेजा हुआ है जैसे उसने सालो पहले न बोला कर आज सुबह ही तो कहा था, "गुड मॉर्निंग मिस मधु!"


गुड मॉर्निंग! मिस मधु!! ऑफिस में पहले दिन कार्य करते हुए एक सुरीली लेकिन मर्दानी आवाज़ मेरे कानो में पड़ी। पहला दिन था तो किसी को जानती भी नहीं थी। मैंने बिन गर्दन ऊपर उठाए लैपी पर देखते ही देखते कहा, गुड मॉर्निंग!!


मै भी बावली।ऑफिस का पहला दिन और काम इतना कि ये तक नहीं देखा कि मुझसे गुड मॉर्निंग कहने वाला वो शख्स आखिर था कौन।


उस दिन तो वो चला गया लेकिन उसके कहे वो शब्द नहीं कहीं गए। वो सीधे दिल में उतरते गए और मुझे मजबूर कर दिया दो पल चुरा कर उसकी तरफ देखने को। मै तो उसे पीछे से जाते हुए ही देख पाई थी।


गुड मॉर्निंग मधु! ये रोज का सिलसिला बन गया था। और मै हर बार उसके आने तक काम में व्यस्त होती थी। आवाज़ सुन जब तक गर्दन उठाकर ऊपर देखती तब तक वो अंदर अपने केबिन में जा चुका होता।


सिलसिला चलता रहा। इससे आगे न उसने कभी कुछ कहा और न ही मैंने कभी जानने की कोशिश की। डरती थी कि कहीं ऑफिस की गपशप का मसाला न बन जाऊं। हां बस ऑफिस वर्क से जब भी फ्री होती कुछ देर बाकी कलीग के साथ बैठ जाती जहां मुझे गाहे बगाहे कुछ शब्द किसी की तारीफ में सुनने को मिल ही जाते।


"हाए अपने जो मैनेजर है वो कितना चार्मिंग, और हैंडसम है। और उसके गालों पर पड़ने वाले डिम्पल के क्या कहने मै तो देखते ही खुद को हार जाती हूं।" उनकी बाते सुन मै मन ही मन कहती अजीब पागलपंती है। पागल है सब की सब।


मै ठहरी बावली। कहां जानती थी जिन्हें मै पागल कह रही हूं उन्ही में से एक मै भी तो हूं। बस फर्क इतना था कि वो पगलियां उसे स्पष्ट तौर पर जानकर उसके लिए पागल थी और मै उसे बिन जाने केवल आवाज़ के पीछे पगली थी। जिस दिन आवाज़ सुनने को न मिलती लगता जैसे दिन अधूरा सा गया...


एक दिन ऑफिस वर्क निपटाते निपटाते मुझे देर हो चुकी थी। सांझ ढल चुकी थी। काम करते करते मुझे ये तक एहसास नहीं हुआ कि ऑफिस का स्टाफ जा चुका है। बस मै थी, बॉस थे और था वो। बॉस अपने केबिन में थे। मै जल्दी जल्दी हाथ चला कर टेबल पर बिखरा सारा सामान सेटल कर रही थी। कि तभी वहीं आवाज़ मेरे कानों में पड़ी।


"मिस मधु आप अब तक गई नहीं।" आवाज़ सुन मैंने बिन समय गंवाए नज़रें ऊपर उठा कर देखा, तो सामने वो ही तो था। एक सांवला सा चेहरा, कातिल आंखे, और जानदार मुस्कान। उस पर चार चांद लगाता हुआ डिम्पल। पहली बार देखा था मैंने उसे। मै ठहरी बावली, बस देखा तो देखती रह गई।


मिस मधु! क्या हुआ कहां खो गई आप! वो आवाज़ फिर से मेरे कानो में पड़ी।


कहीं नहीं। मैंने बमुश्किल उससे कहा। कहती भी क्या और किससे। उसे तो मै बस आवाज़ से ही तो पहचानती थी। कौन था वो, ऑफिस में किस पोस्ट पर था, उसके ऑफिस में लेट रहने से इतना तो अनुमान लगा लिया शायद वो किसी महत्त्वपूर्ण पद पर ही होगा वरना इतनी देर ऑफिस में रुकने का क्या सबब। मै इन्हीं सब विचारो में डूबी हुई थी कि फिर से कुछ शब्द पड़े।


मिस मधु, ज्यादा मत सोचिए। मै यहां का मैनेजर पल्लव श्रीवास्तव। उसने हाथ बढ़ाते हुए कहा।


मै ठहरी बावली इतना भी नहीं सोचा कि उसके सामने ही इतने गहरे विचारो में डूब जाऊंगी तो चेहरे पर विचारो के भाव तो आएंगे ही न।


मैने उस दिन पहली बार किसी पुरुष से हाथ मिलाया था। क्यूंकि मै ठहरी टिपिकल भारतीय लड़की। जो हाथ मिलाने से ज्यादा हाथ जोड़ अभिवादन करने में यकीन करती थी।


उस दिन जो एहसास हुआ वो किस वजह से था मै समझ ही न पाई थी। किसी पुरुष के प्रथम स्पर्श के कारण या फिर उस आवाज़ पर अपना आधिपत्य रखने वाले शख्स के स्पर्श के कारण। स्पष्ट समझ ही नहीं पाई थी बावली जो ठहरी।


खैर उस दिन पहली बार हम कुछ कदमों की दूरी मिलकर चले। उस दूरी को तय करते समय जो अपार खुशी हुई क्या कहूं मै उसे, समझ ही न पाई।


सिलसिला ये रोज का बन गया। अक्सर वो और मै साथ ही जाते। चंद कदमों का ये साथ चलते चलते न जाने कब दिल में ये ख्वाहिश जगा गया कि काश.. उसके साथ चले गए वो चंद कदम जिंदगी भर का साथ बन जाए।


लेकिन मेरी ये ख्वाहिश तो ख्वाहिश ही बन कर रह जानी थी। अब मै ठहरी टिपिकल भारतीय लड़की। जो खुद से पहल कर इन प्यार इश्क़ की भावनाओ का इजहार करने में शर्म महसूस करती थी। न मैंने कुछ कहा और न उसने कभी कोशिश की।


ऐसे ही एक दिन राह में साथ चलते चलते उसने कहा, मिस मधु! बहुत दिनों से मै तुमसे कुछ कहना चाहता हूं। कहना क्या किसी से मिलाना चाहता हूं।


उसकी बात सुन कर मन में खुशी के लड्डू फूटने लगे। सोचा कि पल्लव जी भी मेरे लिए वहीं महसूस करते है जो मै करती हूं।इसीलिए शायद अपनी मां से मिलवाना चाहते हैं।


क्या करूं अब मै ठहरी बावली। सकारात्मक सोच रखने वाली। जो ये नहीं सोचा कि जरूरी नहीं लड़के मिलाने की बात कर रहे है तो वो मां या अपने परिवार के सदस्यों से ही मिलाएंगे। अब पत्नी या प्रेमिका भी तो हो सकती है।


खैर मैंने झिझकते हुए अटकते हुए उससे पूछा, पल्लव जी, किससे मिलवाना है आपको?


मिस मधु क्यूंकि तुम मेरी इकलौती और सबसे अच्छी दोस्त हो मै तुम्हे अपनी प्रेमिका कलिका से मिलाना चाहता हूं। दरअसल तुम मेरी इतनी अच्छी दोस्त हो और ये बात मैंने कलिका को भी बताई। लेकिन वो भी एक लड़की है और उसे तुम्हे लेकर कुछ संदेह...! तुम समझ रही हो न जो मै तुमसे कह रहा हूं।


उस दिन उसकी बाते सुन कितना दुख हुआ था मुझे। तुरंत ही मेरी आंखे छलक गई थी। लेकिन वो कहीं देख न ले ये सोच पी गई थी मै उन आंसुओ को। और जबरन मुस्कुराने की कोशिश करते हुए मैंने कहा था, पल्लव मुझे खुशी होगी अगर मै तुम्हारे किसी काम आ सकी तो। तुम मुझे मेरी सहूलियत अनुसार समय बता दो मै कलिका से मिल लूंगी।


उस दिन पहली बार उसने मुझे खुशी से गले लगाया था। और उसके आलिंगन का वो एहसास मेरे तन और मन दोनों को भिगो गया था। उस दिन ये कुदरत भी मुझ पर मेहरबान हो गई थी। और झमाझम बारिश होने लगी। उसी बारिश में उससे लिपटी मै पूरी तरह भीग चुकी थी। और वो भी तो गले लगा हुए था ऐसे जैसे मै उसकी दोस्त मिस मधु नहीं कलिका थी। कलिका.. उसका ख्याल आते ही बिजली की फुर्ती से मै उससे अलग हुई थी। मैंने उसकी आंखो में झांका तो उस वक़्त मुझे एहसास हो रहा था क्यूं कलिका को ऐसा लग रहा था कि पल्लव और मै......! छी।नहीं!! सोच, दौड़ पड़ी थी वहां से।और ऐसे दौड़ी कि फिर कभी उसकी तरफ लौट ही नहीं पाई। पल्लव....! खुद से ही कहते हुए मेरी आंखे भर आती है जो कॉफी शॉप में बैठे बैठे ही छलक जाती है।

पल्लव को वहां देख मेरे मन में अनगिनत सवाल उठने लगते है। क्या मुझे एक बार जाकर मिलना चाहिए उसे। क्या सोचेगा वो मेरे बारे में कि मिलने का वादा किया था और दोबारा लौट कर ही नहीं आई। क्या करूं मै। कहीं वो यहां बैठा कलिका का इंतजार तो नहीं कर रहा। क्या करूं मै।


मै ठहरी बावली! इंतजार करना कहां आता था मुझे। सब्र रखना नहीं आता था। अगर आता होता तो उस दिन यूं दौड़ कर नहीं चली जाती।


मैंने कॉफी हाउस के एक वेटर को आवाज़ देकर बुलाया और उससे पूछा वो जो सामने की टेबल पर बैठे हुए है क्या तुम उन्हें जानते हो।


मेरी बात सुन वेटर ने मुझे हैरत भरी निगाहों से देखा फिर उसने जो कहा वो मुझे हैरत में डाल गया।


अरे मैडम जी काहे खाली पीली दिमाग खराब कर रही हो उस टेबल पर कोई नहीं बैठता है वो तो पूरे टाइम खाली ही रहता है।कितने लोगो ने कोशिश की वहां बैठने की लेकिन न जाने क्या एहसास होता है लोगो को, कि भाग खड़े होते है। उस टेबल से संबंधित परेशानी को देख यहां के मैनेजर ने उस टेबल को वहां से हटवाने की कोशिश की लेकिन कामयाब नहीं हुआ। न जाने उसके साथ क्या घटना घटी की उसका मानसिक संतुलन ही बिगड़ गया। वो टेबल वहां से कोई नहीं हिला पाता है। न जाने क्या है उस टेबल में। पहले ऐसा कुछ नहीं था लेकिन जबसे उस टेबल पर एक व्यक्ति की मौत हुई है तबसे ही ये परेशानी खड़ी हो रही है। हम सब कॉफी हाउस वालो ने जब ये महसूस किया कि इस कॉफी हाउस में किसी को परेशानी तभी आती है जब कोई उस टेबल को हटाने की या उस पर बैठने की कोशिश करता है सो हम सभी स्टाफ वालो ने उसे वहीं रहने दिया और उस पर रिजर्व लिख दिया। ताकि कोई उस पर ध्यान ही न दे। लेकिन आज जो आप कह रही हैं उसे सुन मेरे तो होश ही उड़ गए हैं, कि उस पर कोई बैठा है।


क्या...! उस वेटर की बात से मै अंदर तक सहम जाती हूं! इसीलिए नहीं कि मै डर गई थी। बल्कि इसीलिए मै पल्लव के साथ कुछ अनिष्ट होने के ख्याल से घबरा गई थी। मै खुद ही उठ कर पल्लव के पास चली जाती हूं। और खुद से बड़बड़ाती हूं ये लोग भी न कैसी अजब गजब कहानी बुन रहे है कि इस टेबल पर कोई नहीं बैठा है। अरे ये लगभग छह फीट का अच्छा खासा नौजवान दिखाई नहीं देता इन्हे हद हो गई...!


मै जाकर पल्लव की टेबल पर बैठ जाती हूं। मुझे वहां बैठा हुआ देख वेटर के साथ साथ बाकी स्टाफ भी हैरान हो जाता हैं।

हेल्लो पल्लव! मैंने उससे कहा।


मेरे द्वारा कहे शब्द सुनकर वो डायरी पर लिखना छोड़ मेरी तरफ मुस्कुराते हुए देखता है और कहता है, हेल्लो मिस मधु। तो अब जाकर तुम लौट कर आ पाई हो। मैंने कितना इंतजार किया तुम्हारे लौटने का। खैर अब तुम आ ही गई हो तो मै चलता हूं। मेरा इंतजार पूर्ण हुआ।


मै ठहरी बावली भला उसकी बातें कैसा समझ आती मुझे। कि वो कहां जाने की बात कर रहा है।


अरे इतनी जल्दी क्या है पल्लव जी। अभी तो हम मिले है। मैंने भी उसे रोकने के उद्देश्य से कहा।


नहीं मिस मधु। अब मै और नहीं रुक सकता। मेरे यहां रुकने का उद्देश्य पूरा हो गया। उसने कहा और वो कुर्सी से उठ बाहर की तरफ चला जाता है। पल्लव जी कहते हुए मै भी उनके पीछे जाती हूं लेकिन मेरे पहुंचने से पहले ही वो जा चुका होता है।


मै वापस लौट कर आती हूं और आकर उसी टेबल पर बैठ जाती हूं। जहां उसकी डायरी रखी होती है। मै डायरी उठाती हूं और उसमे लिखे शब्द पढ़ने लगती हूं।


मै पल्लव श्रीवास्तव। आज एक लड़की से मिला। थी वो औरो से बिल्कुल अलग। सादगी का लिबास पहने वो मेरे ऑफिस की एक डेस्क पर बैठ बड़े ही लगन से काम कर रही थी। ऑफिस में केबिन की तरफ बढ़ते मेरे कदम अचानक रुक गए। और मै कुछ क्षण उसकी डेस्क पर रुका। वहां उसके टेबल पर लगी नेम प्लेट में मैंने उसका नाम पढ़ा। मधुबाला! मैंने मन ही मन नाम दोहराया और उसे शॉर्ट कर "गुड मॉर्निंग मिस मधु" कह वहां से चला आया। ये रोज का सिलसिला हो गया। मै तो सिर्फ उसे अपनी दोस्त समझता था। लेकिन जब मेरी प्रेमिका कलिका ने उसे लेकर मुझसे कुछ प्रश्न किए तब मुझे कलिका का यूं प्रश्न करना नहीं अच्छा लगा और मैंने मिस मधु से इस बारे में बात की। उस दिन पहली बार मै खुशी के आवेग में मिस मधु के गले लगा और उस समय मेरे मन में कलिका का ख्याल बिल्कुल नहीं था। तब मुझे इस बात का एहसास हुआ कि मिस मधु के लिए मेरे मन में भावनाए है, जो कि गलत है। कब मुझे मिस मधु की सादगी उसका भोलापन भा गया मुझे पता ही न चला। मिस मधु को शायद इस बात का एहसास हो चुका था और वो बिन कुछ कहे वहां से चली गई। और मै भी वहां से चला आया। लेकिन वहां कोई और भी था जो मेरी नजरो के सामने तो नहीं था लेकिन किसी के होने का एहसास मुझे हो रहा था। वो थी कलिका।


उस दिन शाम के झुरमुट में तीन जिंदगियों के जीवन में अंधेरा फैल चुका था। और इसकी वजह कहीं न कहीं शायद मै था। क्यूंकि अगले दिन मै इसी कॉफी शॉप में कलिका और मिस मधु दोनों का इंतजार कर रहा था लेकिन दोनों में से कोई नहीं आई।आया तो सिर्फ कलिका का संदेश कि मै उसे भूल जाऊं। क्यूंकि मैं एक धोखे बाज इंसान हूं। मै इसी उम्मीद में यहां इंतजार कर रहा कि मिस मधु आएंगी और यहां आकर सब ठीक कर देंगी। लेकिन वो नहीं आयी। आया तो सिर्फ मेरी मृत्यु का संदेश। इंतजार करते करते अत्यधिक तनाव के कारण मेरे दिल की धड़कन रुक गई और मै इंतजार ही करता रह गया...! ...।।


नहीं....! मै वहीं बैठ जोर से चीखती हूं और मूर्च्छित हो जाती हूं.....? जब अपनी आंखे खोलती हूं तो स्वयं को श्वेत वस्त्रों में उसी कुर्सी पर बैठे हुए पाती हूं ... ... ... उसी के इंतजार में जिसके कहे शब्द मेरे जेहन में अब भी गूंजते है "गुड मॉर्निंग मिस मधु..."


समाप्त


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