Swati Rani

Action Crime Tragedy


4.5  

Swati Rani

Action Crime Tragedy


हथकड़ी

हथकड़ी

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बिहार के एक छोटे से गांव मे नाटक चल रहा था, भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव, हथकड़ी खुलती है, तीनों हंसते हंसते फांसी के तख्त पर चढते हैं,और जल्लाद लीवर खिंच देता है, परदा गिरता है और तालियाँ बजने लगती है। 

आदिल, राजु और हेमंत इस कहानी के मुख्य पात्र थे, कहानी तो खत्म हो गया था, पर ये किरदार उनके रूह तक उतर गया था। 

ये तीनों महानगर के इंजिनियरिंग काॅलेज में साथ पढते थे, गर्मी की छुट्टीयों में अपने शहर आये थे।

तभी उन्होंने न्युज पेपर में देखा, शहर के प्रवासी मजदुरों को महाराष्ट्र से भगा रहे थे।

तीनों हर शाम शहर के टीले पर जा कर गप्पे लगाया करते थे।

"यार हमें इन मजदुरों के लिए कुछ करना चाहिए", हेमंत बोला।

"पर इस शहर के मंत्री चुप हैं,तो हम क्या कर सकते हैं", आदिल बोला।

" शहर के विधायक से बात तो कर सकते है, इनके लिये ", राजु ने कहा।

तीनों अगले दिन विधायक के सामने थे।

विधायक रामदास ने कहा, " हम इस बारे में ज्यादा कुछ नहीं कर सकते है, क्योंकि ये पुरा सिस्टम ही भ्रष्ट है, इतने सालों से मैं तो कुछ नहीं कर पाया, जब ऊपर बात रखता हुं, मेरी बात कुचल दी जाती है, पर तुम लोग आम जनता हो बहुत कुछ कर सकते हो"।

तीनों उनकी बातें ध्यान से सुन रहे थे क्योंकि रामदास का नाम शहर के ईमानदार और गरीबों के नेता में शुमार था।

"हम क्या कर सकते हैं सर", तीनों एक साथ बोल पड़े।

"रास्ता थोडा मुश्किल है, पर सफलता कि मेरी गारन्टी है, तुम तीनों को भगत सिंह के रास्ते पर चलना होगा, सोच कर आना तब आगे का प्लान बताऊंगा", रामदास बोले।

तीनों रामदास के घर से निकले ही थे कि एक फटे-पुराने कपड़े मे दीन-हीन स्तिथि में एक बच्चा आकर हेमंत के पैर से लिपट गया और बोलने लगा, "भईया पापा परदेस में हैं, माँ दो दिन से बीमार है, कितने दिनों से कुछ नहीं खाया, कुछ पैसे दे दो"।

हेमंत ने उसे बहुत सारी चीजे खाने कि खरीद दी, वो बच्चा खुश हो कर चला गया।

तीनों फिर शहर के उसी टीले पर थे, राजु बोला, " गरीब वर्ग भी अपने शहर में ही भोजन और कपड़ा पाने के अधिकारी हैं। ये लोग पढ़े- लिखे नहीं है, इसलिए इनकी आवाज कोई नहीं सुनता"।

"हां और चुनाव के वक्त पैसे कपड़े दे कर इनका वोट ले जाते हैं नेता", हेमंत बोला।

" बताओ भला अपने ही भारत वर्ष में इतना भेद भाव की एक शहर से दुसरे शहर में भगा रहे हैं लोग इनको, कोई ये भी नहीं कि मुफ्त कि रोटी मांग रहे है, बकायदा मेहनत करते हैं ", आदिल बोला।

" मजदूर वर्ग ना हो तो एक दिन ना चलेगी, इन अमीर लोगों की और महानगर तो जैसे रूक जायेगा, सारे छोटे काम यही तो करते हैं ", राजु बोला।

"धरने पर बैठ कर भी क्या करेंगे कुछ दिन में भुख से खुद काम पर लग जायेंगे", आदिल ने अफसोस जताया।

" सच यार हमें वापस रामदास जी से मिलकर उनकी योजना सुननी चाहिए और इनकी मदद करनी चाहिए ", हेमंत बोला।

तीनों वापस रामदास के पास जाते हैं वो उनको देखकर मुस्कुराता है और बोलता है, " मुझे पता था तुमलोग आओगे"।

"अब सुनो मेरा प्लान, जैसे भगत सिंह और उनके साथियों ने संसद पर हमला किया था क्योंकि उनकी बात गोरों और आम जनता के बीच आये, ठीक वैसे ही हमें इन भ्रष्टाचारियों के दिमाग पर चोट करना होगा", रामदास ने कहा।

"और ये चोट कैसे होगा", राजू ने चाय की चुस्की लेते हुये कहा।

" सब बताता हुं, थोडा़ सब्र करो,तुम लोगों को मेरा अपहरण करना होगा", रामदास बोले।

"क्या", तीनों आखें फाड़ कर एक साथ बोल पडे़।

" हां क्यों कि इसके बिना कोई तुमलोगो कि सुनेगा नहीं और तुमलोगों को मुझे कुछ नुकसान थोड़े पहुंचाना है, बस मेरे जरिये अपनी बात लोगों तक पहुँचानी है, जब देश कि जनता जानेगी कि तुम्हारा उद्देश्य गरीब जनता कि भलाई है ,तो तुमलोगों को कुछ नहीं होगा", रामदास बोले।

तीनों हतप्रभ हो सुन रहे थे।

"अपहरण के बाद तुम तीनों को लाईव आना होगा फेसबुक पर, जनता और सरकार से यही गुजारिश करनी होगी कि तुम तीनों कि मिटिंग श्रम और लघु उद्योग मंत्री से आमने-सामने करा दे", रामदास ने कहा।

"पर यही दोनों मंत्री क्यों? आदिल ने बात काटते हुये कहा।

"क्योंकि यही हैं मजदुरों के मंत्री और एक नंबर के घोटाले बाज", कहते हुये रामदास ने कई फाईलें रखी जिसमें इन दोनो मंत्रियों का काला चिट्ठा था और कई सौ करोड़ के घोटाले थे जो उन्होंने बिहार में कारखानों और मजदुरों के हक के नाम पर किये थे।

" तुम लोगों को उनसे मिटिंग के वक्त अपने कान में बलू टुथ लगा कर रखना होगा और जो-जो सवाल मैं करुं वही उनसे पुछना,पुरा देश लाईव इनका इंटरव्यू देखेगा, जो वो बोलेंगे उनको करना पड़ेगा। जरुरत के बंदुक और सामान मेरे आदमी तुमको दे देंगे, मन में कोई भी सवाल हो तो तुमलोग बस अपने एक नंबर से मेरे इसी नंबर पर काॅल करके पुछ सकते हो और हां जब तक ये काम हो ना जाये तब तक ये सारी बातें तुम्हे गोपनीय रखनी होगी", रामदास जी बोले।

तीनों रामदास जी का अपहरण एक रैली में जाते वक्त योजनान्तर्गत तरीके से करते हैं ताकि किसी को कोई शक ना हो।

तीनों अब श्रम और लघु उद्योग मंत्री के सामने बैठे थे, जो-जो सवाल रामदास जी पुछ रहे थे, उन्होंने दोनों मंत्रियों से पुछा और उनके घोटालों का पर्दाफाश किया और भविष्य कि उनकी मजदुरों के बारे मे योजनाओं के बारे में पुछा।

दोनों बोले कि सरकार के पास उचित फंड नहीं है, वो पुरी कोशिश करेंगे।

इधर से रामदास जी झल्लाहट में बोले, "वही चिर- परिचित जवाब, कुछ नहीं करेंगे ये भ्रष्टाचारी, लोगों के सामने हमने इनको गलत साबित कर ही दिया है,ऐसा करो इन दोनों को मार दो,वैसे भी इनको दुनिया कि नजर में भ्रष्टाचारी साबित करने पर ये छोड़ेगे नहीं तुम तीनों को, इससे क्रांति फैलेगी और हम अपनी बात ऊपर रखेंगे।

तीनों रामदास कि बातों में इतना आ गये थे कि इन्होंने आव देखा ना ताव,दोनों मंत्रियों को मार दिया और हवाई फायरिंग करते हुये भाग के वहीं आये जहाँ रामदास को रखा था।

वहां रामदास के आदमियों ने उनसे सिम और फोन मांगा और सबको जला दिया कि पुलिस उनको ना पकड़ पाये।

उन्होंने कहा रामदास जी चले गये हैं और आगे का प्लान आप लोगों को बताया जायेगा।

तीनों वेश बदल कर इधर-उधर छुपने लगे, सारे शहर कि पुलिस उनके पीछे थी।

तभी अगले दिन के न्युज पेपर में तीनों ने देखा, हेड लाईन में था, तीन आतंकवादियों ने देश के दो दिग्गज नेताओं को मारा, रामदास बड़ी बहादुरी से अपने जान पर खेलकर बचे और उनकी पद्दोनती कैबिनेट मंत्री में कर दी गयी थी।

अब तीनों का माथा ठनका और उनको सारा खेल समझ में आया कि वो रामदास के चाल का शिकार हुये है, ये सारा स्वांग रामदास ने राजनीति में अपना कद और पद बढाने के लिये किया था और सिम और फोन को जलवा कर अपने खिलाफ सबूत भी हटवा दिया था।

रामदास के आदमियों ने तीनों से मिलकर कहा कि अगर वो तीनों चाहें तो रामदास उनको विदेश भिजवा सकते हैं जिससे वो सुरक्षित रहें, पर उन्होंने मना कर दिया।

रामदास जैसे मक्कार का पर्दाफाश बहुत जरूरी था, जो मुहिम छेड़ी थी उसकाे अंजाम देना जरूरी था। चाहे उनकी जान ही क्यों ना चली जाये, तीनों ने मन ही मन ये सोचा।

पेपर में निकला,कुछ दिन बाद रामदास कि रैली थी।

तब अचानक आदिल को याद आया, उसका फोन चार्ज ना होने से उसने रामदास को बंदुक और जरुरी सामान के लिये अपने अब्बु के फोन से काॅल किया था। 

आदिल ने अपने एक करीबी दोस्त से पापा का वो फोन मुश्किल से मंगवाया, क्योंकी घर के बाहर पुलिस का सख्त पहरा था। 

 फोन में वो रिकार्ड था, और वो ही आखिरी और एकमात्र सबुत था रामदास के खिलाफ।

मंच पर खडा़ वो गरज रहा था, "मैनें मौत को एकदम करीब से देखा है सिर्फ आपके लिये, मजदुरों के लिये अपना एक क्या सौ जन्म कुरबान है मेरा, अब कैबिनेट में मंत्री बनने के बाद आपलोगों कि बात ऊपर तक पहुँचाना आसान है हमारे लिये।

अचानक तीनों बंदुक के नोक पर मंच पर चढ गये।

आदिल मंच के एक तरफ बंदुक ताने खड़ा था, हेमंत सीढ़ियों पर खड़ा था और राजु रामदास के सर पर बंदुक तानकर उनका माईक छिन लिया और वो रिकॉर्ड चला दिया।

रैली में लाखों लोगों कि भीड़ थी और मिडिया का लाईव कवरेज भी था और रामदास कि किसी करतूत घर-घर पहुंच गयी थी।

राजु ने कहा, "हम सबमें भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव हैं, हमनें अपने अंदर के उन्हीं को जगाया है, हमने जो किया उसका हमको अफसोस नहीं है, क्योंकि दोनों ही भ्रष्टाचारी नेता थे, ये हमसे है, हम इनसे नहीं। आजाद होते हुये इन भ्रष्टाचारियों के गुलाम हैं हम, हमने दोनों का खुन कर ये मुहिम छेड़ दी है, आप इसे आगे ले जाये, ये मुहिम सिर्फ मजदुरों के लिये नहीं वरन देश के सारे प्रताड़ित वर्गों के लिये है। आप अपने हक के लिये लड़ो, असली मायने में अब आजादी का मतलब समझे है हम तीनों, वतन के सीने से कुछ पापियों का बोझ हटाया है"।

कहते हुये राजु ने रामदास का सर गोलियों से छलनी कर दिया।

तभी गोलियों कि तड़तडाहट से पुरा माहौल गुंज पडा़।

राजु और आदिल गिरे पडे़ थे मंच पर, अजीब सी शांति और हल्की मुस्कान थी चेहरे पर।

हेमंत जिंदा बच गया था, पुरी भीड़ उसको बचाने के लिए टुटी तो पुलिस ने लाठीचार्ज कर दिया।

हाथों में हथकड़ी लगा कर हेमंत जेल पहुंचा, केस चला और उसको मौत कि सजा हुयी।

स्थिति काबू से बाहर ना चला जाये इसलिए तय समय से एक दिन पहले ही हेमंत को फांसी घर लाया गया।

हाथों से हथकड़ी खोलकर हेमंत हंसते हुये खुद फांसी के तख्ते पर चढने लगा, भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव जैसे।

भले ही कानून के नजर में वो गुनाहगार थे, पर लोगों के दिलों-दिमाग पर उनका नाम सुनहरे अक्षरों से अंकित हो गया था।


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