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Sanjita Pandey

Abstract

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Sanjita Pandey

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हिंदी मेरा अभिमान

हिंदी मेरा अभिमान

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मैं हिंदी भाषी क्षेत्र उत्तर प्रदेश से हूं जहां हिंदी लोग खाते हैं पीते हैं जीते हैं।मेरी परवरिश एक ऐसे ही परिवेश में हुई , परिवार में 4 शिक्षक सभी हिंदी और संस्कृत के प्रवक्ता शो पूरा माहौल हिंदी में था।मुझे बचपन से हिंदी व संस्कृत से विशेष लगाव था। सो मैंने पूरी पढ़ाई हिंदी मीडियम से की पहले संस्कृत से एम् ए . किया फिर हिंदी से एम् ए .. किया ,बी एड किया और एक शिक्षण संस्थान में शिक्षिका के रूप में हिंदी संस्कृत का अध्यापन भी किया ।

सब ठीक चल रहा था मैं हिंदी पढ़ने और पढ़ाने का आनंद ले रही थी ।

फिर मेरा विवाह हो गया और मैं गुजरात आ गई यहां मेरे लिए सब कुछ नया था नया शहर नई भाषा। मेरे पति एक महारत्न कंपनी ओएनजीसी में इंजीनियर के तौर पर कार्यरत थे, पर माहौल वहां बिल्कुल अलग था वहां या तो लोग अंग्रेजी में बात करते थे या गुजराती में लेकिन मैंने सदैव हिंदी का दामन पकड़े रखा वहां सोसाइटी में कुछ प्रोग्राम था टैलेंट शो जैसा सब लोग अपना टैलेंट दिखा रहे थे सो मैंने भी हिम्मत करके अपनी एक स्वरचित हिंदी कविता सुनाने का साहस किया डर भी लग रहा था, यहां मेरी हिंदी किसको समझ आएगी लेकिन माइक पकड़ते ही सारा डर दूर हो गया, जब मैंने कविता पढ़ी सभी लोग खड़े हो गए मेरा अभिवादन करने लगे उस दिन अपने हिंदी भाषी होने पर बहुत गर्व हुआ, साथ ही यह भी समझ आया यहां हिंदी सबको आती है, बोलना पसंद नहीं करता है कोई और मुझे मेरी सोसाइटी में हमेशा कवियत्री का कर संबोधन करने लगे सभी लोग। इस प्रकार वहां भी मैं हिंदी से जुड़ी रही कुछ न कुछ रचती रही और सुनाती रही। हाल ही में मेरे पति का ट्रांसफर आसाम हो गया, मैं भी परिवार के साथ आसाम पहुंच गई यहां पर काम करने वाले और कॉलोनी में रहने वाले लगभग सभी लोग स्थानीय थे जिन्हें हिंदी बड़ी मुश्किल से समझ आती थी, बोलना तो दूर की बात । मुझे लग गया की यहां पर तो मेरे कविता को सुनने और समझने वाला कोई मिलने वाला नहीं खैर यहां छोटे शहर में करने को कुछ खास नहीं था तो मैंने यहां महिला समिति ज्वाइन की जहां विभिन्न तरह के कार्यक्रम होते रहते थे पर यहां भी स्थानीय लोगों की संख्या लगभग पूरी ही थी एक बार मैंने भी एक कार्यक्रम में भाग लिया और मैंने अपनी स्वरचित कविता सुनाने का प्रयास किया इस प्रतियोगिता में मुझे कोई स्थान तो नहीं मिला लेकिन सभी ने मुझे आकर बहुत सराहा कुछ ने कहा तुम्हारी हिंदी मुझे समझ नहीं आई लेकिन सुनने में बहुत अच्छा लग रहा था आप अच्छा बोलती और लिखती हैं सच कहूं उस दिन मुझे अपने हिन्दी व खुद पे बहुत गर्व हुआ, वैसे तो सारी भाषाएं सम्मान के योग्य है लेकिन कहते हैं ना सारा सिंगार कर लो पर बिंदी नहीं लगाई तो सिंगार अधूरा लगता है उसी तरह यह हिंदी है यह हमारे भारत माता के माथे की बिंदी है, इसे अपने मुख मंडल पर सजाए रखिएगा ।आप सबसे करबद्ध प्रार्थना है हिंदी का सम्मान करें यह हमारी मातृभाषा है !


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