Sanjita Pandey

Tragedy


4.5  

Sanjita Pandey

Tragedy


वृद्धाश्रम

वृद्धाश्रम

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प्रेरणा अपनी 6 साल की बेटी सुगंधा कोगोद में लेकर ढेर सारी जन्मदिन की शुभकामना देती है और बड़े प्यार से पूछती हैं, इस बार अपने जन्मदिवस पर क्या स्पेशल करने वाली है हमारी सुगंधा बिटिया।बिटिया बड़े सहज स्वर में बोलती है" मम्मा हम लोग हर जन्म दिवस पर अनाथ आश्रम जाते हैं!क्यों न इस बार वृद्धा आश्रम चलें।आप और पापा तो हमेशा चले जाते हो मुझे कभी नहीं ले जाते हैं।"

बेटी के मुख से ऐसी बातें सुनकर प्रेरणा मन ही मन बहुत गर्व महसूस कर रही थीं।प्रेरणा बेटी के सर पर हाथ फेरते हुए बोलती है , "ठीक है इस बार हम सभी चलेंगे।"

प्रशांत और प्रेरणा किचन में तरह-तरह के पकवान बनाने में लग जाते हैं,तभी प्रेरणा को याद आता है की वृद्ध आश्रम में कुछ लोगों को स्वास्थ्य संबंधी परेशानियां है तो भोजन सादा और सुपाच्य ही होना चाहिए, वह प्रशांत से कहती हैं बाजार से नमकीन और बिस्कुट के पैकेट लेते आना और हां परले जी मत लाना उस बार कमल अंकल कह रहे थे कि वह ज्यादा मीठा होता है 50-50 लाना और नमकीन भी हल्की मूंग दाल वाली ही लेना।

शाम को 6:00 बजे खुशी से चहकती हुई सुगंधा पूरे परिवार के साथ आश्रम पहुंचते हैं और खुशी खुशी सबको नाश्ते का पैकेट पकड़ाते हुए पैर छूकर सब का आशीर्वाद लेती हैं।सब लोग बड़े प्यार से उसको आशीर्वाद देते हैं और पूछते हैं कि बड़ी होकर क्या बनोगी ?

वह बड़ी सहजता से सब के प्रश्नों का उत्तर दे रही थी, तभी प्रेरणा को किसी के कराहने की आवाज सुनाई देती है ।उसने पूछा यह किसकी आवाज़ है तो कमल अंकल ने बताया नए आए हैं सुखी राम जी बहुत तकलीफ में है विचारें।

कोतुहल बस प्रेरणा उनके कमरे में गई ।बहुत तेज बदबू आ रही थी सो सुगंधाको उसने बाहर ही रुकने को कहा, और खुद अंदर गई । वहां एक 60- 65 साल के बुजुर्ग थे जो बहुत तकलीफ में लग रहे थे। शायद बिस्तर से उठ भी नहीं पा रहे थे इसीलिए बाथरूम बेड पर ही कर रहे थे।

प्रेरणा ने सबसे पहले उनके रूम की सफाई करवाई फिर उनके आंसुओं को पोछते हुए उनके हाथों को अपने हाथ में लेकर पूछा "आपको क्या तकलीफ है अंकल जी?" उन्होंने बिलखते हुए बहुत ही करुणा भरी आवाज में बताया कि वर्षों पहले उनका एक्सीडेंट हो गया था, उसके बाद उनके दोनों पांव में लोहे की रॉड डाली गई थी । अब वह बहुत दर्द दे रही है। प्रेरणा ने उनके आंसुओं को पोछते हुए कहा

"आप घबराइए मत अंकल कोई फाइल वगैरह है तो मुझे दीजिए" अंकल ने कोने में रखे हुए अपने ब्रीफकेस की तरफ इशारा किया।

उसे खोल कर फाइल निकाल रही थी तभी दो तीन फोटो और एक आई -कार्ड एक लिफाफे में था जो नीचे गिर गया।प्रेरणा ने फोटो उठाई और चौंकते हुए पूछा"अंकल यह आपका परिवार है?" उन्होंने उदास स्वर में कहा हां। फिरआप यहां कैसे? प्रेरणा ने पूछा।उन्होंने रूधते गले से बताया कि उनके दो बेटे हैं दो बहुएं है और दोनों के एक- एक भी बच्चे हैं।पत्नी स्वर्गवासी हो चुकी हैं। प्रेरणा ने पूछा बेटे क्या करते हैं? उन्होंने बताया पुणे में बड़ा बेटा सॉफ्टवेयर इंजीनियर हैं, छोटा बेटा बेंगलुरु में बैंक में हैं।

"फिर आप यहां क्यों रह रहे हैं ? प्रेरणा ने पूछा।"अंकल अपने आंसुओं को रोकते हुए कहते हैं"जब तक पत्नी जीवित थी सब ठीक था हम लोग मुंबई में रहते थे ।बच्चों का शादी ब्याह कर दिया ।वह अपनी दुनिया में खुश थे कभी-कभी आते भी थे। लेकिन एक दिन अचानक पत्नी की हृदय गति रुक गई और वह असमय ही चल बसी।उसके बाद मैं दोनों बच्चों के पास बारी बारी रहने लगा एक डेढ़ साल सब ठीक चला।धीरे-धीरे मेरा शरीर कमजोर हो गया। मैं रोज बच्चों को गार्डन नहीं ले जा पाता या सब्जियां नहीं ला पाता था तो बहूएं बहुत गुस्सा होती।

एक दिन छोटी बहू के यहां कुत्ते को टहलाते हुए गिर गया तब से चलना फिरना बहुत कठिन हो गया। डॉक्टर ने बोला इलाज में बहुत खर्चा होगा।

थोड़े दिनों तक मेरा इलाज भी करवाया ।लेकिन धीरे-धीरे बहू बेटों को मैं भारी लगने लगा फिर इलाज कराने के बहाने दोनों बेटे मुझे सूरत लेकर आए और यहां पर छोड़ गए, यह कह कर कि यहां पर आपके उम्र के लोग हैं आपका मन लगा रहेगा और हम लोग तो आते जाते भी रहेंगे तब से 6 महीने हो गया आज तक कोई नहीं आया कहते ही अंकल फफक कर रो पड़े।

अभी प्रशांत डॉक्टर को लेकर आए ।डॉक्टर ने देख कर कहा इनका फिजियो चालू करना पड़ेगा।और कुछ दवाएं भी बताई जो रेगुलर लेनी थी।

प्रेरणा ने अंकल को विश्वास दिलाया कि मैं आपका पूरा इलाज कराऊंगी और हर महीने दवा समय पर पहुंचा दूंगी।प्रेरणा को वृद्धा आश्रम से विशेष लगाव हो गया था।अब तो सुखी राम के सेहत में भी काफी सुधार हो गया था।वह अपना नित्य कर्म खुद ही कर ले रहे थे।

होली का दिन था ।सब लोग हर्षोल्लास से होली मना रहे थे । तभी प्रशांत ने प्रेरणा से कहा कि वह लोग अपने परिवार को कितना याद कर रहे होंगे चलो हम लोग भी वृद्धाश्रम चलते हैं।सच में वहां पहुंचकर प्रेरणा अचंभित थी। सबके सुनी आंखों में एक अलग ही चमक आ गई थी। उसे देख कर फिर सबको मिठाई खिलाया सब का आशीर्वाद लिया। तभी सुखी अंकल ने डबडबाई आंखों से कहां कि अगर मैं मर जाऊं तो आप ही लोग मेरा अंतिम संस्कार करना मेरे बेटे बहू को मत बुलाना।एक दिन अचानक फोन आता है की सुखी राम अंकल अब नहीं रहे।सुनकर बहुत दुख हुआ लेकिन एक संतोष भी मिला चलो अब वह सुखी हो गए।क्योंकि उनकी तड़प देखी नहीं जाती थी।

करीब 2 महीने बाद कुछ जरूरी सामान और दवाएं लेकर आश्रम के ऑफिस में पहुंची तो वहां पर दो सज्जन बहुत ही कहासुनी कर रहे थे मैनेजर से। "आप ने कि आपने हमें क्यों नहीं सूचित किया? हम वहां अपने समाज वालों को क्या बताएंगे ?हमें उनका अंतिम संस्कार तो करना था।"

तभी मैनेजर साहब ने मुझसे कहा "प्रेरणा जीयह सुखी राम जी के बच्चे हैं।अपने पिता के तर्पण के लिए शांति पाठ कराना चाहते हैं भव्य रूप में।" तभी उसमें से एक सज्जन आगे बढ़कर कहते हैं की यहां की व्यवस्था बहुत खराब है इन लोगों ने तो तेरहवीं करने के बाद हमें सूचित किया।

अब हमें समाज के लिए कुछ तो करना पड़ेगा। इसलिए हमने एक भव्य शांति पाठ रखा है।उनकी याद में आप जरूर आइएगा, कहते हुए

उन्होंने कार्ड पकड़ाया। कार्ड देखते ही प्रेरणा को अजीब सी घुटन होने लगी । वह तेजी से कमरे से बाहर निकलीं और कार्ड को फाड़ कर उड़ाते हुए

अपने मन में बनारसी भाषा में बड़बड़ाने लगी।

जियते बाप के पानी नहीं,

मरले बाप के पिंडा।।

यह कहानी सत्य घटना से प्रेरित है।



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