Sanjita Pandey

Inspirational


4.3  

Sanjita Pandey

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उड़द की बड़ीयांँ

उड़द की बड़ीयांँ

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शीर्षक - उड़द की बड़ीयांँ  


सुधा सुबह से ही बहुत उदास और परेशान थी।दोबारा लॉक डाउनलोड हो जाने से उसका धैर्य जवाब दे रहा था।बच्चों के बारे में सोच कर और परेशान हो रही थी।

यह वैश्विक बीमारी तो पूरी दिल्ली को अपने घेरे में लिए जा रही थी।

अब तो हर चीज की समस्या होने लगी थी सब्जी फल बड़ी मुश्किल से मिल रहे थे।

बच्चे ठीक से कुछ खा ही नहीं रहे हैं,सिर्फ हर टाइम दाल चावल खा कर बोर हो गए है ।

यही सब सोचते-सोचते सुधा रसोई में गई । दो आलू और एक प्याज बचा था अब तो उसे जैसे रोना आ रहा था।

सोच ही रही थी कि आज मैं क्या बनाऊं खाने में तभी उसकी ५ साल की बेटी आकर कहती है,"मम्मा आज कचोरियां बनाओ ना ।"            

सुधा को गुस्सा आ गया।डांटते हुए बोली, "जाओ यहां से खाने को कुछ नहीं है तुम्हें कचौड़ी खाना है ।"बाद में मन ही मन उसे अपने बर्ताव पर पछतावा हो रहा था यह तो बच्ची है इसे क्या पता।

स्टोर रूम से आटा निकाल ही रही थी तभी उसकी नजर प्लास्टिक के एक बड़े से डिब्बे पर पड़ी कौतूहल बस उसने उसे खोला।उसमें उड़द की बड़ियाँ 2-3 थैलियों में कसकर बांध के रखी हुई थी।

उसका गला आंसुओं से भर आया अरे यह तो वही बड़ियाँ हैं जिसको पिछली बार हितेश जब घर गए थे तो मां ने भिजवाए थे।जिसको मैंने गुस्से में खोला भी नहीं था यह कह कर कि तुम्हारी मां को और कुछ नहीं मिलता भेजने के लिए यह क्या फालतू की चीजें भेजती रहती है ।

आज शर्म से खुद ही झुकी जा रही थी । एक- एक थैलियों को खोले जा रही थी । किसी थैली में घर के बने हैं अचार के मसाले और किसी में सूखे आंवले के अचार ।

सुधा को महसूस हो रहा था काश कि वह यह सब अपनी सासू मां से सीख ली होती। आज उनकी बनाई हुई चीजों से उसका महीना भर आराम से निकलेगा । बड़ीयो की कचौड़ी बनाते हुए लगातार उसकी आंखों से आंसू निकल रहे थे।

मन ही मन सोच रही थी हमारे बड़े बुजुर्ग कितने अनुभवी थे हर चीजों का सदुपयोग करना कितना अच्छे से जानते थे।

दोनों हाथ जोड़े हुए बहुत देर तक उनके फोटो के पास खड़ी थी सुधा। मानो माफी मांग रही थी।।




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