गुनाह
गुनाह
सिपाहियों इस गुलाम को पकड़ लो, जिल्ले इलाही को इसने मार डाला हसीना बेगम चिल्ला रही थीं, बादशाह की और भी बेगमें हरम से आवाज सुन दौड़ी आईं।
चारों ओर अफरा तफरी का माहौल था, किसी को कुछ समझ में नहीं आ रहा था कौन हो सकता है, बादशाह का दुश्मन, जिसने इतनी कड़ी सुरक्षा में बादशाह की हत्या कर दी।
सभी सकते में थे, सिपाही दौड़ पड़े।
16 साल के मासूम किशोर के पास बादशाह की खून से सनी शमशीर मिली।बहुत बेरहमी से उनके पेट में उसने शमशीर घोंप दी थी।
उसे गिरफ्तार कर कैदखाने में डाल दिया गया।
अगले दिन 15 वर्षीय शहजादे को बादशाह के तख्त पर आसीन कर दिया गया, क्योंकि बादशाह के अभाव में दुश्मनों को तख्ता पलट का मौका मिल सकता था दुश्मन कई थे, घरेलू और बाहरी दोनों ।
वैसे भी हरम राजनीतिक उथल पुथल का बड़ा केंद्र था, हमेशा बेगमें एक दूसरे के लिए चालें चला करती थीं।
वैसे बादशाह ही मुख्य न्यायाधीश होता था, लेकिन यहां बादशाह की हत्या हो गई थी, और नए बादशाह अभी अनुभव हीन थे, इस लिहाज से न्याय के लिए काजी को सारे अधिकार थे और काजी की मदद मुफ्ती किया करते थे।
किशोर को पेश किया गया। पूरी अवाम कारण जानना चाहती थी कि आखिर क्यों रहमदिल बादशाह को इसने मार डाला, जिसे बादशाह ने अपने बेटे की तरह पाला, गुलाम के तबके से हटा अपने दिल में स्थान दिया।
काजी ने उससे कत्ल का कारण पूछा, किशोर चुप रहा ।
बहुत पूछने पर भी उसने कोई जवाब नहीं दिया।
आखिर काजी और मुफ्ती दोनों ने उसे पुनः गिरफ्तार कर कारागार में भेजने का हुक्म दिया, और एकांत में पूछ ताछ करने का मन बनाया।
आवाम में रोष की अतिरेकता थी।किशोर को वहां से ले जाया जा रहा था, परंतु उसके चेहरे पर लेश मात्र का भी पछतावा नहीं था।
कारावास में काजी साहब उस किशोर से मिलने गए।
उन्होंने कहा गोया तुम घबराओ नहीं, मैं समझ गया था, कि तुम आवाम के सामने बादशाह के कत्ल के बारे में बताना नहीं चाहते थे, ऐसा क्या हुआ था जो तुम्हें बादशाह का कत्ल करना पड़ा।
मैं तुम्हारी पूरी मदद करूंगा।
किशोर ने आश्वस्त होने के बाद बताना शुरू किया।
मेरा नाम जुबेर है, बात उन दिनों की है, जब बादशाह कश्मीर अपनी बेगमों के साथ आबो हवा बदलने आए थे।
मेरे अब्बा का डल झील में शिकारा था। उन दिनों अब्बा की तबियत नासाज थी, इसलिए शिकारे पर मैं ही होता था।
बादशाह अपनी बेगमों के साथ हमारे शिकारे पर तशरीफ लाए, ये हमारा भाग्य था या दुर्भाग्य पता नहीं क्या था।
मेरी उम्र उस समय 14 साल की थी।
शराब, शबाब के अंधे बादशाह मदहोश हुए जा रहे थे।
उनकी नजर बेगमों से ज्यादा मुझपर थीं।
बेगम राबिया उनकी आंखें पढ़ चुकी थी इसलिए बेगम ने मुझे पानी लाने को कहा, ताकि मैं वहां से हट जाऊं, मैं पानी लेने चला गया।
बादशाह ने बेगम से कहा कि इसे हम अपने साथ अपनी खिदमत गारी को रख लेते हैं।
बेगम ने न चाहते हुए भी हामी भरी, आखिर बादशाह का आदेश था ।जब मैं पानी लेकर आया तो, बेगम ने मुझे बताया कि तुम हमारे साथ ही पूरे समय रहोगे।
मुझे नए नए कपड़े दिला कर बादशाह के सामने पेश किया गया, बादशाह मुझे ऊपर से नीचे निहार रहे थे।
मैं उन नजरों को समझ नहीं पा रहा था ।,
बस मुझे सब कुछ बहुत अच्छा लग रहा था, तरह तरह के व्यंजन जो हम लोगों के लिए एक स्वप्न जैसा था, रोज ही बादशाह के सामने सजते, और जो बचता मुझे भी मिलता।
अब उन सबके जाने का समय हो रहा था।अब्बा के पास बादशाह का एक सिपाही आया, और उसने कहा_ बादशाह ने जुबेर को अपने साथ दिल्ली ले जाने को कहा है।
अब्बा ने मुझे उनके साथ भेज दिया।
धीरे धीरे मैं बादशाह के बहुत करीब हो गया।हरम में भी मैं बिना रोक टोक जा सकता था।
राबिया बेगम मुझसे स्नेह रखती थीं, हरम में नूर नाम की मेरी ही हमउम्र की बेगम थी, धीरे धीरे मुझे उससे प्यार हो रहा था ।
अब मैं 16 साल का किशोर हो चुका था, एक दिन बादशाह ने बुलाया और कमरे से सभी को दफा होने का हुक्म दिया।
मैं हैरान था, आखिर क्या बात करना चाहते हैं, बादशाह जो सभी को बाहर जाने को कहा।
बादशाह का असली रूप मेरे सामने था, उसने मेरे सारे कपड़े धीरे धीरे कर उतरवाए, और फिर मुझे चूमने लगा।
मैं रोता रहा, चिल्लाता रहा लेकिन उस दरिंदे पर कोई असर नहीं हुआ, उसे मेरे चिल्लाने पर आनंद आ रहा था।किसी तरह जब मेरी जान छूटी, मैं भाग कर अपने कमरे में आया, नूर मेरा इंतजार कर रही थी, किस मुंह से जाता उसके पास।
तीन चार दिनों तक मेरी आंखों के आंसू नहीं सूखे, राबिया बेगम को मेरी फिक्र हो रही थी, वो ढूंढते मेरे पास आईं, उन्हें अंदाज लग चुका मेरे चेहरे को देख कर।
मैं फफक फफक कर उन्हें देख रो पड़ा । बेगम की आंखें नफरत और गुस्से से लाल थीं उनकी मुट्ठियां भिंच रही थी, कुछ देर खामोशी के बाद उन्होंने खुद को संयत कर कहा _"मुझे पहले दिन से ही बादशाह की नियत तुम्हारे प्रति खराब लगी ।तुम्हारी खूबसूरती, मासूमियत उन्हें अपनी ओर खींचने में कामयाब हो गई थी। उन दरिंदे को तुम्हें भोगने की लालसा थी, वे समलैंगिक भी हैं।बहुत से गुलामों के साथ उन्होंने दुष्कृत्य किया है।
मुझे पता है तुम नूर को चाहते हो, नूर का यहां कोई भविष्य नहीं है तुम उसे लेकर दूर कहीं चले जाओ।
मैं चुपचाप रोता रहा और उनकी बातें सुनता रहा। नूर के प्यार ने मुझे रोक रखा था, बादशाह जब तब मेरा यौन शोषण करता ।
एक दिन मैंने मन ही मन कठोर फैसला लिया उस दिन मैं खुद ही बादशाह के पास गया, मैने उनसे कहा कि आपने मेरा बहुत शोषण किया है, इसके बदले में मैं आपकी बेगम नूर को चाहता हूं, आप मुझे नूर दे दें, मैं यहां से बहुत दूर चला जाऊंगा।
मेरी बात सुन कर बादशाह तिलमिला गया, उसके लिए ये शर्म की बात थी कि लोग बातें करें की बादशाह की हरम की बेगम किसी गुलाम के साथ चली गई।
बादशाह ने साफ मना कर दिया, और फिर तो गुस्से में उसने मेरे साथ बेरहमी की हदें पार कर गंदा खेल खेलने लगा ।शराब से वो अपने होशो हवाश में नहीं था और हताशा से मेरा गुस्सा बढ़ता ही जा रहा था।मुझे अब अपनी जान की परवाह नहीं थी मैं तो रोज ही मर रहा था, फिर क्या था, मैने आव न देखा ताव उनकी टंगी तलवार उतार उनके पेट पर लगातार वार करता गया, इस तरह से मैने उसे मार डाला।
मैं आवाम के सामने नहीं कहना चाहता था, इसलिए चुप रहा।
अगले दिन काज़ी पूरे आवाम के सामने थे, सामने जुबेर भी लाया गया।
काज़ी ने कहा _ जुबेर जब कमरे में गया तो, बादशाह पर तलवार का वार कोई व्यक्ति कर रहा था, उसे देख नकाबपोश भाग निकला , बादशाह कराह रहे थे, इसलिए वह नकाबपोश के पीछे भागने के बजाय बादशाह के पास गया, और तलवार उनके पेट से निकाला, इतने में हसीना बेगम आ गईं और उन्होंने जुबेर को गुनाहगार समझ सिपाहियों से पकड़वा दिया।
इसी आपा धापी में असली गुनाहगार भाग निकला।
इसलिए जुबेर को गुनाहगार न मानते बरी किया जाता है ।
जुबेर रिहा हो गया था वो अब महल के इस गंदे वातावरण में एक मिनट भी नहीं रहना चाहता था, खुला आसमान और हसीन वादियों में पले जुबेर को उसका शिकारा उसके अपने लोग जैसे बुला रहे थे वो हरम पहुंचा, राबिया बेगम से मिलने ।
राबिया बेगम ने उसके हाथ में नूर का हाथ सौंपा और कहा "अब तुमदोनों आजाद हो, अपनी जिंदगी अपने ढंग से खुशी से जिओ।"
आज नूर के साथ साथ जुबेर की भी विदाई थी।
