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कवि काव्यांश " यथार्थ "

Abstract Tragedy Classics Fantasy Inspirational Others Children

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कवि काव्यांश " यथार्थ "

Abstract Tragedy Classics Fantasy Inspirational Others Children

एक बहन की प्रतीक्षा

एक बहन की प्रतीक्षा

11 mins
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शीर्षक:

"एक बहन की प्रतीक्षा"

(एक बहन की मौन पुकार और टूटती हुई उम्मीदों की करुण गाथा)


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🌿 प्रस्तावना: राखी का अर्थ

राखी...
क्या सिर्फ एक धागा हैं — जी नहीं,
ये एक भरोसे का बंधन है, जो एक भाई को बहन से बांधे रखती है। 
वो बचपन की स्मृतियों का एक संगम है,
और एक ऐसी भावना भी है जो जन्मजन्मांतर तक दो दिलों को बांधे रखती है,  जो रिश्तों के टूटते पुलों पर भी भरोसे की पतली सी डोरी से बाँधती है। भाई और बहन का रिश्ता एक पवित्र रिश्ता है जो सदियों से पुजें जाते रहे हैं। इतिहास गवाह है कि भाईयों ने बहनों के लिए और बहनों ने भाईयों की रक्षा के लिए अपने प्राणों की आहूति दी है।


पर क्या हो जब यह डोरी हर साल डाक से लौट आए?
क्या हो जब इंतज़ार केवल रिवाज़ बन जाए?
और बहन का प्यार, केवल लिफाफों में बंद होकर बिना पढ़े ही लौट आए?



यह कहानी है

एक ऐसी बहन की,
जिसकी राखियाँ हर साल लौट आती थीं...
मगर कभी उसकी प्रतीक्षा नहीं लौटी, न कभी उसकी उम्मीदें टूटी हैं। दिन, महिने और सालों साल गुजर गए मगर उसकी प्रतीक्षा कभी समाप्त नहीं हुई, बहन ने उम्मीदों का दीया हमेशा जलाएं रखी।


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🧕 अध्याय 1: सावित्री — सावन की बहन।


सावित्री एक छोटे-से गाँव रामपुर की रहने वाली थी।
उसके माता-पिता बचपन में ही चल बसे थें।
पर उसका सहारा था उसका बड़ा भाई — सावन

सावन ने उसे माँ-बाप दोनों बनकर पाला।
स्कूल की फीस, पेंसिल-कॉपी, यहाँ तक कि स्कूल से लौटने पर उसके बालों में हाथ फेरकर रोटी खिलाना — सोते समय कहानियां सुनाना, अच्छी अच्छी बातें समझाना।
सावन ही उसके लिए सबकुछ था।


राखी के दिन, सावित्री की आँखें सुबह-सुबह सज जातीं।
रंग-बिरंगी राखियाँ, थाली में अक्षत, रोली,
और एक मीठी मुस्कान —
सावन उसके सामने बैठता, और कहता:

 “तेरी राखी मुझे शक्ति देती है बहना… जब तू बाँधती है, तो लगता है दुनिया की हर बुराई से मैं बच जाऊँगा।”


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🚉 अध्याय 2: नौकरी, शहर, और दूरियाँ।

सावन को एक दिन नौकरी मिल गई — मुंबई में।
सावित्री ने चुपचाप आशीर्वाद दिया और भैया को गले से लगा लिया और कहा भैया कहीं भी जाओ एक बात हमेशा याद रखना कि आपकी एक बहन भी जो आपकी सांसों से बंधी हुई है। आप अपने पीछे अपनी छोटी बहन को अकेला छोड़ आए हैं।

सावन ने प्यार से सहलाते हुए और उसकी नमी हुई आंखों से छलकते अश्रुओं  को पोंछते हुए कहा,

"अरे पगली ये भी कोई कहने की बात है, तेरे सिवा मेरा और कौन हैं भला। अभी तो तेरे हाथ पीले करने हैं पगली ! तुझे डोली में बैठते हुए भी देखना है और एक पिता का कर्तव्य भी निभाना हैं मुझे।" 

इतना सुनते ही सावित्री शर्मा गई और शर्माते हुए कहा,
" जाओं भैया, मैं‌ आपसे बात नहीं करती, मुझे आपको छोड़कर कहीं नहीं जाना हैं बोलें देती हूं"

" नहीं बात करनी हैं ना तो मैं चला जाता हूं फिर मुझे ढूंढती रहेगी, तब मैं कहीं नहीं मिलूंगा, देख लेना"सावन ने छोटी को छेड़तें हुए कहा।

सावित्री ने अपना एक हाथ अपने भैया के होंठों पे रखा और कहा,

"ना ना भैया ये क्या कह रहे हैं, मैंने ऐसे तो नहीं कहा था, शुभ शुभ बोलिए ना भैया, तुम्हारे बगैर मेरा क्या होगा इतने बड़े संसार में आपकी छोटी का क्या होगा कभी सोचा है"।

तभी सावन ने प्यार से पुचकारते हुए कहा,
"मेरी नन्ही परी अभी बड़ी हो गई है, बिल्कुल हमारी मां की तरह बातें करती हैं, हमेशा ये याद रखना तुम हो तो मैं हूं वर्ना मेरा जीवन मेरी नन्ही परी के बिना बिल्कुल अधूरा हैं"

सावित्री के आंखों से आंसूओं की धाराएं बहने लगी। ये देख सावन उसके आंसू पोंछते हुए कहा,
"मुझे पहले वहां स्थाई होने दें पगली, फिर तुझे भी मैं अपने साथ ले जाऊंगा, ठीक है ना"।

"और हां तब तक तुझे अपना ख्याल खुद ही रखना होगा, समय पर खाना भी खा लिया करना, ठीक से अपना काम करना, बाहर ठीक से आना जाना, तुझे अपनी लड़ाई खुद ही लड़नी होगी, कुछ भी हो मुझे नि: संकोच कह देना "
इतना कहकर उसने सावित्री से अलविदा कहा और अपने सफर के लिए निकल पड़ा। 


शुरुआती दिनों में रोज़ फोन से बातें होती और एक दूसरे का हाल चाल पूछा जाता, और उसके बाद रोज़ के फोन धीरे-धीरे हफ्तों में बदले, फिर महीनों में और अब वर्षों में।

सावित्री को आदत हो गई थी —
प्रतीक्षा की।

लेकिन राखी का दिन...
वो दिन कुछ और था।


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📮 अध्याय 3: पहली बार डाक से राखी भेजी गई

सावन ने वादा किया था —

 “मैं आ नहीं पाऊँगा बहन, पर राखी ज़रूर बाँधूगा… भले डाक से भेजना।”


सावित्री ने बड़े प्रेम से राखी खरीदी,
उसके साथ एक छोटी चिट्ठी जोड़ी:

 “भैया, यहां सब ठीक है। आप अपना ख्याल रखिएगा और बस सुरक्षित रहिएगा। आज बहुत दिन हुए आपसे बातें किए हुए। कहां हो और कैसे हो? 
 भैया यह राखी तुम्हारे लिए है…
जैसे बचपन में थी — वैसे ही स्नेह से इसे बांध लेना।”

(तुम्हारी नन्ही परी)

उसने वह राखी पोस्ट कर दी।
पर राखी कुछ ही दिनों में लौट आई —
लिफ़ाफ़े पर लिखा था: "पता गलत है।"


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📆 अध्याय 4: लौटती रहीं राखियाँ।


पहले वर्ष में — पहली राखी लौटी।
दूसरे वर्ष में — सावित्री ने पुराने पते पर फिर भेजी, फिर लौट आई।
तीसरे वर्ष में — उसने सावन के एक दोस्त से पता माँगा, और उस पते पर भेजा — पर राखी फिर लौट आई।


हर साल, एक ही दृश्य —
डाकिया हर बार आकर लिफ़ाफ़ा लौटाता, और सावित्री की आँखें बैचैनी में अक्सर नम हो जाया करती थीं। उसके दिल में हमेशा एक ही डर लगा रहता कहीं भाई को कुछ हो न गया हो। भाई कभी इतने लापरवाह नहीं हो सकते। खासकर अपनी चहेती बहन के प्रति।


गांव की औरतें कहतीं है:

सावित्री बहन, अब छोड़ो न… भाई ने अगर याद किया होता, तो ख़ुद आ भी गया होता।”



पर सावित्री कहती:

 “बहनें कभी राखी भेजना नहीं छोड़ती…
शायद भाई को कभी लौटकर आना हो — तो उसे याद रहे, आज भी उसकी बहन उसका बेसब्री से इंतज़ार कर रही हैं।”


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🪔 अध्याय 5: हर साल का एक रिवाज़


हर साल राखी से दो दिन पहले,
सावित्री बाज़ार जाती, राखी खरीदती, एक प्यारी-सी चिट्ठी लिखती:

 “भैया, आज भी मैं उसी चौखट पर मैं बैठी हूँ जहाँ तुम मुझे छोड़ गए थें। तुम्हारी ये बहन आज भी उम्मीदों के सहारे जी रही हैं।
यह राखी सिर्फ धागा नहीं — मेरी उम्मीदों का दर्पण भी है।”



डाक से भेजती — और वापस आने की प्रतीक्षा करती।

राखी के दिन वो थाली सजाती,
रोली लगाती, मिठाई बनाती —
और सावन के लिए खाली कुर्सी रखती।


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🧓 अध्याय 6: अकेलेपन की राखियाँ

देखते देखते वर्षों गुजर गए सावित्री अब 45 की हो चुकी थी।
बालों में सफेदी झलकने लगी थी।
घर सूना था — ना पति, ना संतान।

पर उसका रिवाज़ अब भी जीवित था —
हर साल राखी भेजना।

कभी-कभी गांव के बच्चे पूछते:

“बुआ, तुम्हारा भाई कभी क्यों नहीं आता?”



सावित्री मुस्कराकर कहती:

शायद उसकी दुनिया बहुत बड़ी हो गई है… पर मैं अब भी उसकी छोटी-सी बहन ही हूँ।




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🛬 अध्याय 7: वो दिन… जब सावन लौटा

25वीं राखी —
सावित्री ने इस बार राखी के साथ अपनी आखरी उम्मीद भी भेजी।


एक अभागे बहन का पत्र अपने भाई के नाम —
(भावनाओं से भीगी, राखी से बंधी)


भैया,

आज भी उसी चौखट पर मैं बैठी हूँ, जहाँ तुम मुझे छोड़ गए थे। वही पुरानी देहरी... वही टूटा-सा आसमान, वही धूप की लकीरें — बस तुम नहीं हो।
वहीं बैठी हूँ, आँचल में राखी लिए… और आँखों में सैलाब छुपाए।

भैया, तुम्हें याद है? जब तुमने मेरा माथा चूमा था और कहा था —
"जल्दी लौटूंगा छोटी, राखी पर तो ज़रूर!"
तब मैंने तुम्हें नहीं रोका था, क्योंकि मुझे तुम पर भरोसा था। लेकिन ये भरोसा अब उम्मीद बनकर हर साल राखी के दिन टूट जाता है।

हर सावन में जब बादल घिरते हैं, तो मेरी सांसें रुकने लगती हैं।
कहीं तुम भीग तो नहीं रहे? कहीं भूखे तो नहीं हो?
क्या तुम्हें मेरी राखी की डोर अब भी याद है भैया?

ये राखी अब बस एक धागा नहीं रही —
ये मेरी हर उस साँस की कसक है,
जो तुम्हारे इंतज़ार में गूंथी गई है।

मैंने तुम्हारे हिस्से की खीर आज भी बनाई है,
तुम्हारे नाम की थाली आज भी सजी है —
लेकिन उसमें तुम्हारी मुस्कान नहीं,
सिर्फ मेरी आंखों की नमी है।

भैया, माँ को तो ना मैंने कभी देखा और ना ही पिता किसे कहते हैं ये भी नहीं जानती,
जब से मेरी आंखें खुली और दुनिया को समझा, तब से मैंने सिर्फ आपको ही देखा है और पाया है।
मेरा आपके सिवा इस दुनिया में है ही कौन? आप ही बताइए।

मैं आज भी वही हूँ — तुम्हारी बहन,
जिसके हाथ की राखी अधूरी है,
जिसका भाई कहीं है… पर कहीं नहीं है।

मुझे नहीं पता तुम किस शहर में हो, कहां हो और किस हालत में हो,
या हो भी कि नहीं इस दुनिया में…
पर मेरी राखी हर साल तुम्हें ढूंढ़ती है,
हर साल मेरी कलाई सुनी रह जाती है।

तुम्हारे पुराने कुरते की खुशबू आज भी मेरी अलमारी में है।
तुम्हारे बचपन की तस्वीरों को मैंने कितनी बार छू-छू कर पुकारा है —
"भैया… एक बार तो लौट आओ…"
पर हर बार सिर्फ सन्नाटा जवाब देता है।

कभी सोचा है भैया,
उस बहन का क्या होता है जिसका भाई सिर्फ यादों में रह गया हो?
क्या उसकी राखी बाँधने के लिए समय भी लौट सकता है?

भैया, अगर ये पत्र तुम तक पहुँचे…
तो लौट आना,
कम से कम इतना तो बता जाना कि तुम ठीक हो…
कि मुझे भूल तो नहीं गए…
कि तुम्हें अब भी मेरी राखी की कसक महसूस होती है।

तुम्हारी यह बहन,
जिसकी हर साँस तुम्हारे नाम की माला है,
आज भी उम्मीदों के सहारे जी रही है…
तुम्हारे इंतजार में।

– तुम्हारी “नन्ही परी”
(जिसकी कलाई अब भी तुम्हारे लौटने की राह देखती है…)

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अंत में बस एक पंक्ति लिखी:


 “अब मैं थक गई हूँ भैया, इंतजार की घड़ियां गिनते गिनते, आखिर कब तक मैं सहूं, कब तक और तड़पती रहूं आपके इंतजार में। अब तो मेरी तबियत भी ठीक नहीं रहती, न‌ जाने कब ये आंखें राह ताकतें ताकतें ओझल हो जाएगी… इस बार शायद ये मेरी अंतिम राखी हो।”


“ और इस बार राखी नहीं लौटी…

जब मां-बाबा गुज़र गए,
तो उसकी उँगलियाँ थामकर ही मैं बड़ी हुई।
सपनों से भरी मेरी आंखों में
भाई की हँसी की परछाईं थी,
और आज…
ईश्वर ने उसको भी मुझसे दूर कर दिया।

मैं कितनी अभागी हूँ ना। ना मां को पाया ना पिता को और अब भाई को भी हमेशा के लिए  के लिए को दिया।

जो भाई कभी बिना बताए कहीं नहीं जाता था, वो आज बरसों से मेरे जीवन से ही गुम है।"



साल बीतते गए, सावित्री के आंसू सूख चुके थे,
पर दिल का दर्द गीला था अब भी।
राखियों की गिनती अब अधूरी रह जाती,
और उम्मीद की डोर धीरे-धीरे टूटने को थी।



तीन दिन बाद…


गांव की मिट्टी पर एक बड़ी गाड़ी आकर रुकी।
धूल उड़ी, लोग चौंके।
गाड़ी से उतरा एक शख्स —
सफेद बालों में चाँदी,
सूट-बूट में लिपटा शरीर,
पर आँखें… वही पुरानी…
पछतावे से डूबी हुई।

वो सावन था…
सावित्री का भाई।

गांव वालों ने उसे पहचानने में समय लिया।
क्योंकि सालों में सिर्फ चेहरे नहीं बदलते,
मन और हावभाव भी पराए हो जाते हैं।

सावन को चबूतरे पर बैठाया गया।
सवालों की बौछार शुरू हो गई—
“इतने साल कहां थे?”
“क्यों नहीं लौटे?”
“बहन को क्यों अकेला छोड़ दिया?”

वो कुछ कह न पाया,
सिर्फ निगाहें सावित्री को खोज रही थीं।
घर पर ताला लटका देखा,
तो मन ने कहा—
"वो कहीं बाहर गई होगी, आ जाएगी…"

गला भरा हुआ था, फिर भी बोला—
“मैं जब घर से निकला था,
तो सिर्फ एक सपना था—बहन को खुशहाल बनाना।
एक कंपनी में नौकरी लगी,
और कुछ ही महीनों में मालिक का विश्वास जीत लिया।
जब मैंने अपनी बहन को साथ लाने की बात की,
तो मालिक ने सहर्ष स्वीकृति दी।

मगर उसी दिन…
कंपनी में एक भयानक दुर्घटना हुई,
जिसमें मैं बुरी तरह घायल हो गया।
छह महीने कोमा में रहा।
जब आंख खुली तो याददाश्त तक खो चुकी थी।

मालिक, जो मुझे अपने बेटे की तरह मानते थे,
मुझे विदेश ले गए इलाज के लिए।
वहां मैं 25 वर्षों तक रहा।
कुछ ही साल पहले याददाश्त लौटी,
और फिर जब अपने पुराने सामान में
सावित्री का एक पत्र मिला—
जिसमें उसकी आंखों की नमी अब भी थी…
तब मेरी आत्मा जागी।
मैं दौड़ा चला आया…
अब मुझे बस इतना बताओ—
सावित्री कहां है?

गांव के मुखिया ने सिर झुका लिया।
लोगों की आँखों में आँसू थे।
किसी में कुछ कहने का साहस नहीं था।

आख़िर सरपंच ने धीमे स्वर में कहा—
“अब हमारी सावित्री बहन नहीं रही, बेटा…
दो दिन पहले ही चली गई।
बहुत कमजोर हो गई थी।
और आखिरी रात…
वो बस तुम्हारा नाम लेती रही।
सावन आएगा…
मेरे भैया आएंगे…
मुझे लेकर जाएंगे…’
वो बुखार में भी तुम्हारी परछाईं तलाशती रही।
और तुम्हारा नाम लेते-लेते ही
उसकी साँसे चुप हो गईं।”


सावन वहीं चबूतरे पर निढाल हो गया।
ज़मीन से माथा टिकाकर रोने लगा—
जैसे वर्षों का ठहरा हुआ पश्चाताप
अंततः फूट पड़ा हो।
कांपती आवाज़ में वो बुदबुदाया—

"तूने बुलाया था बहना,
मैं बहुत देर से आया…
पर तूने मेरा इंतजार नहीं किया।
एक बार पुकार लेती…
एक बार डांट देती,
कि 'कहाँ रह गया था तू?'
तू तो कहती थी न,
भाई की कलाई सूनी नहीं होनी चाहिए…

माफ़ कर दे मुझे सावित्री…
तेरी राखी अधूरी रह गई…
मगर इस अधूरे धागे को
मैं जीवनभर अपने सीने से लगाए रखूंगा…"


उस दिन गांव की गलियों में
एक भाई का विलाप गूंजा,
जो बरसों से लापता नहीं था,
बल्कि वक्त और किस्मत से बिछड़ा हुआ था।

और दूर किसी सूखी दीवार पर,
अब भी एक राखी लटकी थी—
धूप में फटी, धूल में लिपटी,
मगर उसमें अब भी
बहन के प्यार की गंध बची थी।


और एक आख़िरी पंक्ति जो सावन की आत्मा में उतर गई:

 “भैया, राखी लौटती रही… पर उम्मीद मेरी कभी नहीं टूटी।
अगर तुम लौटे — तो ये राखियाँ तुम ही ले जाना। ये मात्र सिर्फ धागे नहीं — मेरी साँसें हैं, मेरा प्यार हैं, मेरी आस हैं, मेरा इंतज़ार है।”



🌸 समापन — पाठकों के लिए एक प्रश्न
 क्या आपने कभी किसी की राखी लौटाई है?
या क्या आपकी राखी किसी ने पढ़े बिना वापस कर दी?



तो एक बार रुकिए…
अपने रिश्तों की डोर को फिर से थामिए…
और कहिए:
“अब कोई राखी डाक से वापस नहीं लौटेगी…”

अब हर प्रतीक्षा का उत्तर मिलेगा।”


(तो ये था एक बहन का सच्चा प्रेम, और एक भाई का अमर पश्चाताप)
उम्मीद करता हूं आपके दिल की भावनाओं को अवश्य स्पर्श किया होगा।।
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इसके रचयिता और कोई नहीं एक टूटे हुए भटके हुए निराशा से ओत प्रोत इंसान की हैं जो कभी इंसानियत के नाम पर जीता एक अभागा पुरूष जो सदा पश्चाताप की आग में जीवन भर जलता रहा।।





स्वरचित, मौलिक, अप्रकाशित रचना लेखक :- कवि काव्यांश "यथार्थ"
              विरमगांव, गुजरात।


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