मृगतृष्णा - एक मोहमाया
मृगतृष्णा - एक मोहमाया
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जीवन, मृत्यु और दौलत की मृगतृष्णा
प्रस्तावना –
जीवन का रहस्य और दौलत का मोह।।
“ये दौलत भी ले लो,
ये जागीर भी ले लो,
ये भला मेरे किस काम की…
माटी में जन्मे, माटी में पले
माटी में मिल जाएंगे
खाली हाथ आए हैं और
खाली हाथ ही जाएंगे।”
यह कुछ साधारण शब्द नहीं, बल्कि जीवन का परम सत्य हैं। मनुष्य जीवनभर जिस चीज़ के पीछे दौड़ता है, वही अंततः उसकी मुट्ठी से रेत की तरह फिसल जाती है। हम सब इसी संसार की मिट्टी से जन्म लेते हैं और उसी मिट्टी में विलीन हो जाते हैं। फिर प्रश्न यह उठता है कि जब सब कुछ यहीं छोड़ जाना है तो दौलत, जागीर, शोहरत, पद और प्रतिष्ठा का मोह किसलिए?
क्यों और किस बात का
इतना गुरूर हैं तुझको,
जो भी हमें मिलता हैं,
जो भी संजोए रखते
वों सब यही रह जाता है,
न कोई कुछ
साथ लेके आया था,
और न कोई कुछ
साथ लेके जाएगा ,
जो भी यहां पाता है,
वो सब यही रह जाता है।।
जीवन एक रहस्य है। वह रहस्य जो हर श्वास में छुपा है, हर जन्म में प्रकट होता है और हर मृत्यु में पुनः ढक जाता है।
जीवन का सार यह नहीं कि हम कितनी दौलतें कमाते हैं, कितनें सुख सुविधाओं को अपनाते हैं, अपने शानों शौंकत में खो जाते हैं, बल्कि यह कि हम कितनी आत्माओं को छूते हैं, कितने दिलों में जगाह पाते हैं, कितनों को अपनाते हैं और कितने अच्छे कर्म इस संसार को सौंपकर जाते हैं।
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जीवन और मृत्यु का शाश्वत चक्र
जन्म और मृत्यु – एक पड़ाव है, अंत नहीं।।
भारतीय दर्शन ने जीवन और मृत्यु को कभी अलग नहीं माना। उपनिषद कहते हैं – “जन्म मृत्यु के बीच की यात्रा मात्र है।” भगवद्गीता में श्रीकृष्ण ने स्पष्ट कहा है:
“न जायते म्रियते वा कदाचित्, नायं भूत्वा भविता वा न भूयः।”
अर्थात आत्मा कभी जन्म नहीं लेती और न ही कभी मरती है। वह केवल देह बदलती है।
मनुष्य का जीवन वस्तुतः किराये का घर है। जिस प्रकार यात्री किसी सराय में कुछ दिन रुककर आगे बढ़ जाता है, उसी प्रकार हम भी इस संसार में आते हैं, कुछ कर्म करते हैं और फिर चले जाते हैं। मृत्यु अंत नहीं, बल्कि परिवर्तन है।
बुद्ध और मृत्यु का सत्य
महात्मा बुद्ध ने जब अपने शिष्य आनन्द को समझाया कि मृत्यु भयावह नहीं है, तब उन्होंने कहा था:
“जैसे दीपक बुझता है और प्रकाश हवा में मिल जाता है, वैसे ही मनुष्य की आत्मा मृत्यु के बाद ब्रह्मांड में विलीन हो जाती है।”
महावीर और जीवन-दर्शन
महावीर स्वामी ने कहा – “जो जन्मा है, वह मरेगा। और जो मरेगा, वह पुनः जन्म लेगा।”
उनके अनुसार, मृत्यु एक अध्याय का अंत है, परंतु आत्मा की पुस्तक अनंत पन्नों तक चलती है।
जीवन का संक्षिप्त होना
यदि हम देखें तो जीवन एक क्षणभंगुर यात्रा है। सौ वर्ष भी यदि किसी ने जिया, तो वह भी ब्रह्मांड के अनंत काल के सामने एक बूँद से अधिक नहीं। इसीलिए संत कबीर ने कहा:
“कबीरा जब हम पैदा हुए, जग हंसे हम रोये।
ऐसी करनी कर चलो, हम हंसे जग रोये।”
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३. दौलत और मृगतृष्णा – धन की सीमाएँ
धन का आकर्षण
मानव इतिहास का सबसे बड़ा भ्रम धन और दौलत रहा है। मनुष्य यह मान बैठता है कि धन ही सब कुछ है—सुख, प्रतिष्ठा, अमरता। परंतु सच्चाई इसके ठीक उलट है।
सिकंदर महान का उदाहरण
सिकंदर महान ने पूरी दुनिया जीतने का सपना देखा। उसने असंख्य युद्ध लड़े, हजारों राजाओं को हराया और सोने-चाँदी से भरे खजाने अपने कब्जे में किए। लेकिन जब मृत्यु का समय आया तो उसने अपने सेवकों को आदेश दिया:
“जब मेरा अंतिम संस्कार हो, तो मेरे दोनों हाथ कफ़न से बाहर निकाल देना ताकि दुनिया देख सके कि जिसने पूरी दुनिया जीतने की चाह की, वह भी खाली हाथ ही चला गया।”
सम्राट अशोक का हृदय-परिवर्तन
मौर्य सम्राट अशोक ने कलिंग युद्ध में लाखों लोगों को मरते देखा। वह स्वयं विजेता बना, परंतु उसके भीतर का मनुष्य हार गया। उसके महलों, सोने और सेना के बीच केवल पीड़ा और पश्चाताप रह गया। तब उसने तलवार छोड़ दी और बौद्ध धर्म अपना लिया।
उसने समझा कि सच्चा साम्राज्य भूमि या सोने पर नहीं, बल्कि दिलों पर होता है।
आधुनिक उदाहरण
आज अरबों डॉलर कमाने वाले उद्योगपतियों के संस्मरण पढ़ें तो स्पष्ट होता है कि जीवन के अंतिम समय में वे धन के बजाय अपने परिवार, शांति और सरलता की तलाश करते हैं। कुछ कहते हैं कि काश उन्होंने अधिक दान किया होता, दूसरों की मदद की होती। क्योंकि अंततः महल या बैंक-बैलेंस नहीं, बल्कि स्मृतियाँ और रिश्ते साथ जाते हैं।
कबीर, रहीम और तुलसीदास के संदेश
कबीर कहते हैं: “साईं इतना दीजिए, जामे कुटुंब समाय। मैं भी भूखा न रहूँ, साधु न भूखा जाय।”
रहीम लिखते हैं: “रहिमन धागा प्रेम का, मत तोड़ो चटकाय।”
तुलसीदास रामचरितमानस में कहते हैं: “धन्य धन्य जननी जसु जानी, जस अपुनी सुत के चरित बखानी।”
इन संत कवियों का स्पष्ट संदेश है कि धन साधन है, साध्य नहीं।
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४. सच्ची संपत्ति – करुणा, सेवा और सदाचार
मानवता की सर्वोच्चता
जब दौलत मिट्टी में मिल जाती है, तब केवल एक चीज बचती है—मानवता। जिसने जीवनभर दूसरों के लिए आशीर्वाद और प्रेम अर्जित किया, वही वास्तव में सबसे धनी है।
विवेकानंद का दृष्टिकोण
स्वामी विवेकानंद ने कहा था:
“इस जीवन का उद्देश्य केवल दूसरों की सेवा है। जो दूसरों के लिए जीता है, वही वास्तव में जीता है। जो केवल अपने लिए जीता है, वह मृतकों में गिना जाता है।”
गांधीजी का उदाहरण
महात्मा गांधी, जिनके पास कोई जागीर या दौलत नहीं थी, वे आज भी दुनिया के सबसे बड़े नेताओं में गिने जाते हैं। उनके पास केवल चरखा, एक धोती और एक सत्याग्रही आत्मा थी। लेकिन उनके सत्य और अहिंसा के विचार आज भी करोड़ों दिलों में जीवित हैं।
मदर टेरेसा की करुणा
मदर टेरेसा ने कहा: “यदि आप सौ लोगों की मदद नहीं कर सकते तो कम से कम एक की तो करें।”
उनके पास न महल था, न सोना-चाँदी, पर उनके पास करुणा की अपार पूँजी थी। यही उनकी सच्ची संपत्ति थी जिसने उन्हें अमर कर दिया।
लोकजीवन की मिसालें
एक किसान, जो अपने गाँव में निर्धन होते हुए भी राहगीरों को पानी पिलाता है, या एक माँ, जो अपने बच्चों को संस्कार और प्रेम देती है—वे अमर हो जाते हैं। उनके नाम भले इतिहास में न लिखे जाएँ, पर उनके कर्म पीढ़ियों तक गूंजते हैं।
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५. निष्कर्ष – मृत्यु के पार अमरता
मनुष्य मिट्टी से बना है और मिट्टी में ही लौट जाता है। लेकिन अंतर यह है कि कुछ लोग धूल बनकर खो जाते हैं और कुछ लोग खुशबू बनकर अमर हो जाते हैं। यह चुनाव हमारे हाथ में है।
दौलत, जागीर, शोहरत—सब मृगतृष्णा है। मरुभूमि में मृगतृष्णा देखने वाला हिरण प्यास से मर जाता है। वैसे ही दौलत की मृगतृष्णा के पीछे भागने वाला मनुष्य आत्मिक शांति से वंचित हो जाता है।
सच्चाई यह है कि:
धन से रोटी खरीदी जा सकती है, भूख नहीं मिटाई जा सकती।
धन से बिस्तर खरीदा जा सकता है, नींद नहीं।
धन से औषधि खरीदी जा सकती है, जीवन नहीं।
धन से मकान खरीदा जा सकता है, घर नहीं।
मनुष्य की सच्ची संपत्ति उसकी करुणा, सेवा, सदाचार और प्रेम है। यही वह ज्योति है जो मृत्यु के अंधकार के पार भी मार्ग को प्रकाशित करती है।
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अंतिम संदेश :
जीवन क्षणभंगुर है। सब कुछ यहीं छूट जाना है। क्या खोना और क्या पाना है
अतः जो भी कमाओ, उसे बाँटो।
जो भी पाओ, उसे सार्थक बनाओ।
और जो भी करो, उसमें मानवता की ज्योति जलाओ।
क्योंकि अंततः जब हमारी देह मिट्टी में मिल जाएगी, तब केवल यही ज्योति अमर होगी।
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स्वरचित, मौलिक, अप्रकाशित रचना
लेखक :-स्वाप्न कवि काव्यांश "यथार्थ" विरमगांव, गुजरात।
