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कवि काव्यांश " यथार्थ "

Tragedy Classics Inspirational

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कवि काव्यांश " यथार्थ "

Tragedy Classics Inspirational

तृण का रहस्य ।

तृण का रहस्य ।

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🌸 तृण का रहस्य — माता जानकी जननी की अद्भुत दृष्टि 🌸
(एक भावात्मक, विचारशील, जागरूकता से भरी रचना)

एक बार की बात है।
अयोध्या का राजभवन...
महलों में उल्लास था, शांति थी, प्रेम था।
माता कौशल्या अपने पुत्रों को स्नेह से भोजन परोस रही थीं।
सीता जी – वह नववधू, वह जनकपुरी की रानी नहीं, समर्पण की प्रतिमा बन चुकी स्त्री – सबको खीर परोस रही थीं।
वह खीर… केवल दूध, चावल और शक्कर नहीं,
वह तो स्नेह, सेवा और श्रृद्धा से बनी थी।

जैसे ही भोजन आरंभ होने को आया,
अचानक एक तेज हवा का झोंका दरबार में आया,
पत्तलों में हलचल हुई, लोग संभल गए –
पर सीता जी की दृष्टि तो कहीं और ठहर गई।

राजा दशरथ की पत्तल में खीर पर कुछ गिरा था —
एक साधारण सा घास का तिनका।
पर जनकनंदिनी की दृष्टि साधारण कहाँ थी?
वह जानती थीं — यह भोजन की पवित्रता पर एक छाया है।

पर हाथ से हटाना अशिष्टता होती,
तब उन्होंने दूर से उस तिनके को देखा,
नहीं, यह देखना नहीं था...
यह वह दृष्टि थी जो ब्रह्मांड को गति दे सकती है,
वह दृष्टि जो एक तिनके को भी अग्नि बना दे।

तिनका राख बन गया...
और सीता ने चुपचाप सिर झुका लिया।
किसी ने देखा नहीं...
परंतु कोई था जो देख रहा था —
राजा दशरथ।

वे चुपचाप उठे,
खुद को वश में रखते हुए अपने कक्ष में गए,
और सीता जी को बुलवाया।

"बेटी," उन्होंने कहा,
"तुम कौन हो, ये बताने की आवश्यकता नहीं।
तुम्हारी दृष्टि में ब्रह्म की शक्ति है।
पर याद रखना,
उस दृष्टि से कभी किसी शत्रु को भी ना देखना...
वह दृष्टि संहार कर सकती है,
पर तुम्हारा धर्म पालन और करूणा कहीं अधिक बड़ी शक्ति है।"

और सीता मौन थीं।

यही कारण था...
जब जब रावण मां सीता के सामने आया,
जिसने उनका अपहरण किया, अपमान किया था,
फिर भी सीता ने उसकी ओर उसी दृष्टि से नहीं देखा।

उस घास के तिनके को उठाया,
जैसे वह प्रतीक हो संयम का, वचन का,
जैसे वह हो नारी की अंतर्निहित शक्ति का —
जो सब कुछ कर सकती है,
पर अपने प्रेम, वचन और मर्यादा के कारण मौन रह जाती है।

🌿 "तृण धर ओट कहत वैदेही, सुमिरि अवधपति परम् सनेही..." 🌿

जब भी रावण आया, सीता ने तिनका उठा लिया,
वचन की ओट में धर्म को थाम लिया,
आँखों में वह अग्नि थी,
पर ओठों पर केवल राम का नाम था।


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यह कथा क्यों आवश्यक है जानना?

क्योंकि यह शक्ति और संयम का संगम है।

क्योंकि यह बताती है कि हर स्त्री में अग्नि है — पर वह वचन में, प्रेम में, करुणा में बंधी रहती है।

क्योंकि यह हमें सिखाती है कि अधिकार से पहले कर्तव्य है, और शक्ति से पहले मर्यादा।

और सबसे महत्वपूर्ण —
कि नारी की दृष्टि केवल देखती नहीं,
वह जीवन बदल सकती है... और संहार भी कर सकती है। उनकी दृष्टि में वो शक्ति होती है कि अपने मनचाहे तरीके से किसी को भी अपने वश में कर सकती है और बदल सकती है।



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🌸 जय जननी जानकी।

🌸 जय मर्यादा पुरुषोत्तम राम।

🌸 जय संयम, शक्ति और सत्य की विजय।





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