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कवि काव्यांश " यथार्थ "

Tragedy Classics Inspirational

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कवि काव्यांश " यथार्थ "

Tragedy Classics Inspirational

एक अंतिम इच्छा

एक अंतिम इच्छा

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ये किस्सा जो आज के इस दौर में अब आम होता जा रहा है।
आज के दौर के उपर एक प्रश्न चिह्न लग चुका है, अपने माता पिता के जिम्मेदारियों को प्रति।

प्रस्तावना:- 

  “मां की ममता और पिता की परछाईं—इनके बिना जीवन सूरज के बिना आकाश सा सूना होता है। पर अफ़सोस, यही आकाश आज अपनों की परछाईं से ख़ाली होता जा रहा है।”
 यह कोई नई बात नहीं रही कि आज की पीढ़ी अपने सपनों की उड़ान भरने के लिए माता-पिता को पीछे छोड़ देती है। बड़े-बड़े सपनों की तलाश में, ऊँचे पैकेज, चमकते कैरियर और विदेशी सुख-सुविधाओं के पीछे भागते युवा अकसर भूल जाते हैं कि जिस नींव पर उनका जीवन टिका है, वह अब भी इंतज़ार में है—कभी एक फ़ोन कॉल का, कभी एक मुस्कान का, कभी सिर्फ़ उनके लौट आने का। वे भूल जाते हैं कि उनके मजबूत पंख मां-बाप की छांव में ही पले हैं। उन हाथों को जो कभी थाम कर उन्हें चलना सिखाते थे, अब सहारे की ज़रूरत है।

वे आंखें जो कभी उनके भविष्य के सपने देखती थीं, आज दरवाज़े की ओर टकटकी लगाए देखती हैं कि कब वो लौटेंगे, कब कोई आवाज़ देगा—“मां, मैं आ गया... बाबा, अब से मैं यहीं रहूंगा।”

 यह कहानी महज़ एक पीड़ा नहीं, बल्कि आज की सामाजिक स्थिति का आईना है। यह चेतावनी है उस पीढ़ी को जो अपने माता-पिता को 'पुराने ज़माने की बात' समझकर छोड़ आती है वृद्धाश्रमों में या अकेलेपन की कब्र में। इस कथा के माध्यम से हम न केवल उस पीड़ा को शब्द देना चाहते हैं जो अनकही रह जाती है, बल्कि एक ऐसी चेतना को जन्म देना चाहते हैं जो हर बेटे-बेटी को यह समझाए कि माता-पिता केवल पालनकर्ता नहीं, हमारे जीवन के आधार भी हैं।

आईए हम एक छोटी सी इस घटना के माध्यम से  जानते हैं,समझते हैं, कि हम अपने भविष्य को संवारने में इतने मग्न हो जाते हैं कि अपने पीछे अकसर अपनी जिम्मेदारियों को भूल जाते हैं, और अपने माता पिता को एकांत में तड़पता छोड़ जाते हैं, उन माता पिता को जो अकसर तुम्हारे भविष्य को संवारने में अपने भविष्य को दांव पर लगा देते हैं।


🙏यह कोई काल्पनिक नहीं, वरन् जीवन के आँगन में घटित एक सच्ची और मार्मिक घटना है, जो केवल कथा नहीं, वरन् जीवन की स्याही से लिखी गई वह सच्चाई है, जो न केवल देखी जाती है, बल्कि महसूस की जाती है — हृदय के सबसे संवेदनशील कोने में।"

" जिसकी छाया अब भी समय की दीवारों पर जीवित है — पीड़ा, पश्चाताप और सीख बनकर।"🙏





रात के करीब 3:30 बजे
फोन की घंटी बजती है,
महिला... हेलो....हां जी कौन...?


 एक बुजुर्ग की कपकपाती आवाज..... "बेटा मैं बाबूजी.... तुम्हारी मां की तबीयत बहुत खराब है! शायद तुम बिजली का बिल भरना भूल गए हो, लाइट कट गई है । पड़ोस वाले शर्मा जी की बेटी की शादी है, तो सभी पड़ोसी शादी में गए हैं। तुम्हारी मां की तबीयत खराब होने के कारण हम लोग नहीं जा पाए।"

"घर में राशन भी नहीं है। तुम कहां हो जल्दी से घर आ जाओ।"

 महिला:-...हेलो.... कौन बाबू जी?.... लगता है आपने कोई गलत नंबर मिला दिया है?

 बुजुर्ग:- बेटा माफ करना, हर बार मेरा बेटा ही मुझे फोन करता है, इसलिए मुझे अपने बेटे का नंबर नहीं पता,।
 "फोन डायरेक्टरी में से ढूंढ कर एक नंबर लगाया था, जो गलती से तुम्हें लग गया।"

 महिला:- बाबूजी आप परेशान ना हो, मैं अभी एंबुलेंस को फोन कर देती हूं, आप अपने घर का पता लिखवाइए l

 बुजुर्गों ने पता लिखवाया,

 महिला :- बाबूजी मैं भी जल्द ही इस पते पर आती हूं! महिला ने एंबुलेंस को फोन किया और घर से निकल गई।

 थोड़ी देर बाद एंबुलेंस से डॉक्टर का फोन आया, "हेलो मैडम ....आपने जो पता लिखवाया था, वहां पर एक बुजुर्ग दंपत्ति की लाश मिली है!"

 महिला भावुक हो गई, "डॉक्टर साहब आप थोड़ी देर रुकिए मैं जल्दी पहुंचती हूं।"

  महिला वहां पहुंची, बुजुर्ग महिला सोफे पर मृत पड़ी हुई थी।

 वह बूढ़ा व्यक्ति एक हाथ में मोबाइल दूसरे हाथ में फोन डायरेक्टरी लिए हुए जमीन पर मृत पड़ा था।
 महिला ने अपने मोबाइल से उन बुजुर्ग दंपत्ति की कुछ तस्वीरें ली। डॉक्टर के चेक करने के बाद यह पता चला कि, इन दोनों की मृत्यु लगभग 4 से 5 घंटे पहले ही हो चुकी थी।

 महिला:- "यह कैसे हो सकता है भला"?...
अभी कुछ देर पहले ही तो मुझसे बात हुई थीं, यह देखिए मेरा मोबाइल इसमें नंबर होगा, महिला ने अपने मोबाइल को देखा उसमें कोई नंबर ही नहीं था।

महिला आश्चर्यचकित हुई....
पुलिस की मदद से उसके बेटे का पता लगाया, सुबह पड़ोसी आए,पड़ोसियों ने बताया कि कई साल से बेटा घर नहीं आया है। वह बस हर महीने खर्चे के लिए रुपए भेज देता था।

उनकी हालत देख कर लग रहा था कि दो-तीन महीने से बेटे ने पैसे नहीं भेजे हैं। घर में कुछ राशन भी नहीं था, अपने बेटे की इज्जत छुपाने के लिए पड़ोसियों से यह सब बातें नहीं बताई थी।

 महिला ने बेटे को फोन किया और घटना की जानकारी दी। बेटे ने कहा मेरी आज बहुत जरूरी मीटिंग है, मैं नही आ सकता। आप अंतिम संस्कार कर दो। मैं दो-चार दिन में आकर प्रॉपर्टी का काम देख लूंगा।

 महिला ने गुस्से में कहा..... "मैं तुम्हें कुछ तस्वीरें भेज रही हूं, जिस हाल में तुम्हारे पिता की मृत्यु हुई है, वह शायद उनकी अंतिम इच्छा थी , कि वो तुमसे बात कर सके, इस फोटो को कभी डिलीट मत करना, यही तुम्हारा भविष्य होगा।"

 यह सब जानकर उसे बहुत ही दुख पहुंचता है किन्तु अब दुःख व्यक्त करके पश्चातापा कैसा। जब समय रहते आंखें नहीं खुल पाई, फिर! 
जो मां बाप अपने बेटे को खून पसीना बहा कर पढ़ाते लिखाते हैं, वही औलाद एक दिन अपने बुजुर्ग माता-पिता के अंतिम संस्कार के लिए भी नहीं आते है। अफसोस है ऐसी औलाद पर! एक बुजुर्ग दंपत्ति की अंतिम इच्छा, अपने बेटे से बात करने की।.... अधूरी रह गई.........
एक अन्तिम इच्छा...


जब कोई माता-पिता अपने ही पुत्र की छांव में जीवन की संध्या बिताने का स्वप्न देखते हैं,
तो वह स्वप्न केवल एक उम्मीद नहीं होता,
बल्कि वह उनके जीवन की अंतिम सांसे भी उसी पर टिक जाती हैं।

किन्तु...


यदि पुत्र होते हुए भी वे तड़प-तड़प कर
भूखे पेट, बेसहारा, अकेलेपन में,
अकाल मृत्यु को प्राप्त होते हैं,
तो उस पुत्र के होने और न होने में
क्या कोई फ़र्क रह जाता।
वह केवल एक देहधारी नाम भर रह जाता है, जिसकी आत्मा से करुणा, श्रद्धा और कर्तव्य का नाता टूट चुका होता है।

समय...


एक अदृश्य न्यायाधीश है —
कभी मौन, परंतु अचूक।
वह अपनी गति से चलता है,
पर जब लौटता है, तो अपने साथ
वो सब कुछ लाता है —
जो किसी ने दूसरों को दिया था।

तब आती है—
दुख की वर्षा,
कष्टों की आंधी,
तड़प की रातें,
वेदना के दिन,
अफसोस की सांसें,
और पश्चाताप की अग्नि।

उसी आग में जलता है वह व्यक्ति,
जो कभी अपने अहंकार की चादर में लिपटा था।
जो यह भूल गया था कि
माता-पिता कोई बोझ नहीं,
वरन् वे जीवन की जड़ें हैं,
जिनसे उसका अस्तित्व फूटा है।

जब समय दोहराता है स्वयं को,
तो यह दोहराव
सिर्फ घटनाओं का नहीं होता,
बल्कि
कर्मों का न्याय होता है।

तभी इंसान को अपनी औकात समझ में आती है —
वह जो खुद को खुदा समझ बैठा था,
उसे ज्ञात होता है कि
जिसे वह पीछे छोड़ आया था,
वह दरअसल वही था
जिसे उसे सबसे पहले करना चाहिए था।

तो हे मानव!
यदि तू पुत्र है,
तो उस शब्द की गरिमा को निभा,
वरना यह जीवन
तुझ पर स्वयं एक अभिशाप बनकर लौट आएगा।

🌿

"माता-पिता ईश्वर का जीवंत रूप हैं,
जिनकी सेवा से बढ़कर कोई तीर्थ नहीं है और ना ही होता है।"


इस प्रस्तावना का उद्देश्य केवल भावनाएं जगाना नहीं, बल्कि यह प्रेरणा देना है कि आने वाले समय में कोई और मां अकेले आंगन में बेटे की राह न देखे, कोई और पिता अपने ही जीवन के अंतिम सफर में अकेला न हो। हमें आज ही यह ठान लेना होगा कि हम अपने कर्तव्यों से नहीं भागेंगे, कि हम अपने माता-पिता के साथ न केवल खड़े रहेंगे, बल्कि उनका गर्व बनेंगे।

क्योंकि दुनिया में हम जहां भी पहुँचें, जिस भी ऊँचाई को छू लें—अगर हमारी जड़ें सूख चुकी हैं, तो हमारी उड़ान भी बेनूर है।



🙏आइए, एक नई शुरुआत करें—जहाँ बुजुर्गों की छांव में सम्मान हो, और संतानें अपनी जिम्मेदारियों को बोझ नहीं, वरदान समझें।🙏







स्वरचित, मौलिक, अप्रकाशित रचना लेखक :- कवि काव्यांश "यथार्थ"
             विरमगांव, गुजरात।


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