झूठी अम्मा
झूठी अम्मा
शीर्षक: झूठी अम्मा ।
(एक मासूम का सच, जो दुनिया का आईना बन गया)
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भाग 1: बिखरे हुए रिश्ते
पांच साल का आरव अभी ठीक से "माँ" शब्द को समझ भी नहीं पाया था कि उसकी दुनिया ही बदल गई। माँ जो उसे लोरी गाकर सुलाया करती थी, उसकी नन्ही-नन्ही उँगलियाँ को पकड़ कर चलना सिखाया करती थी, उसके आँसू पोंछती, भूख से पहले ही उसके सामने खाना रख दिया करती थी।
मगर किस्मत को शायद यह सब मंजूर नहीं था।
एक दिन, जब आरव को बुखार था और माँ रातभर उसके सिर पर पट्टियाँ बदलती रही थी…सारी रात जागकर अपने बेटे को इस तरह तड़पता देख ईश्वर से बस प्रार्थना करती रही। और अगली सुबह वह उठ ही नहीं पाई।
आरव की माँ उसे हमेशा के लिए छोड़ कर चली गई।।
उस दिन से आरव का आंगन जैसे सूना हो गया, और उसके जीवन में एक ऐसा सन्नाटा उतर आया जिसे वह समझ नहीं पाता था।
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भाग 2: नई माँ का आगमन
कई महीनों बाद पिता ने दूसरी शादी कर ली। रिश्तेदारों ने कहा — "बच्चे को माँ चाहिए।"
शायद सही कहा था, मगर ये भी सच था कि "माँ" कोई वस्तु नहीं जो बदल दी जाए।
नई माँ आई। सुंदर, व्यवस्थित, थोड़ी सख्त। उसने कोशिश की — आरव से बात की, उसे खाना परोसा, उसे स्कूल भेजने की कोशिश की।
पर आरव के दिल में माँ का स्थान अब भी उस औरत के लिए था जो कहती थी —
"मस्ती करेगा तो खाना नहीं मिलेगा"
और फिर उसे मीलों ढूंढ कर वापस घर लाकर अपने हाथों से खाना खिलाती थी।
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भाग 3: वह मासूम सवाल
एक दिन पिता, जो अब तक अपने जीवन को फिर से पटरी पर लाने की कोशिश कर रहे थे, आरव को गोद में बिठा कर मुस्कराते हुए और बड़े प्यार से पूछा:
"बताओं तो, बेटा… तुम्हें पुरानी अम्मा अच्छी लगती थी या नई अम्मा ?"
पिता को लगा था — शायद बेटा अब नई माँ के पास खुश होगा। समय सब जख्म भर देता है।
मगर आरव ने बिना रुके, मासूम मुस्कान के साथ जवाब दिया —
"नई अम्मा सच्ची है। पुरानी अम्मा तो झूठ बोलती थी बाबा।"
पिता चौंक गए। जैसे किसी ने उनके दिल को चीर दिया हो। उन्होंने डांटते हुए कहा —
"क्या बकवास कर रहा है! तुझे जन्म देने वाली माँ झूठी है, और कल आई हुई माँ सच्ची?"
आरव की आँखें भर आईं। उसने बहुत सरलता से, जैसे कोई बड़ा रहस्य बता रहा हो, कहा —
"पुरानी अम्मा कहती थी, ‘अगर तू मस्ती करेगा तो खाना नहीं दूँगी।’
पर जब मैं सच में खाना नहीं खाता था, तो अम्मा मुझे ढूँढने निकल जाती थी। पूरे गाँव में, हर मोड़ पर, हर नुक्कड़ पर, और फिर गोद में लेकर घर लाती थी और अपने हाथों से खाना खिलाती थी।
और नई अम्मा भी वही कहती है, ‘मस्ती करेगा तो खाना नहीं दूँगी।’
पर आज पूरे तीन दिन हो गए बाबा… मैंने खाना नहीं खाया, भूखा हूँ। देखों न , कोई मुझे ढूँढने भी नहीं आया।"
पिता के चेहरे पर जैसे समय रुक गया हो।
वो अश्रु जो उन्होंने वर्षों से संभाल कर रखे थे, टूट कर बिखर पड़े।
आँखों में अश्रु की धारा बह निकली, होंठों पर जैसे सन्नाटा छा गया।
आज पहली बार मुझे ये एहसास हुआ कि एक औरत माँ तभी बनती है जब वह सिर्फ जन्म नहीं देती, बल्कि बच्चे के हर आँसू को अपना बना लेती है।
वो माँ जो “डर” के नाम पर भी प्यार करती है,
वो माँ जो “नाराज़” हो कर भी देखभाल करती है ,
वो माँ जो “झूठ” भी इसीलिए बोलती है कि बच्चा खाना खा ले,
वो झूठी नहीं होती — वो तो सबसे सच्ची और अच्छी मां होती है।
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संदेश: माँ का झूठ, दुनिया का सच
आरव की कहानी केवल एक कहानी नहीं है। यह उन लाखों बच्चों की सच्चाई है जिन्हें ‘माँ’ की परिभाषा दुबारा सिखाई जाती है, पर वो पहली परिभाषा कभी मिटती नहीं।
माँ का झूठ अकसर सच्चाई से भारी होता है —
क्योंकि वो भूख में भी खिलाती है,
गुस्से में भी दुलारती है,
और थकान में भी लोरी सुनाती है।
आज जब हम सब रिश्तों को शब्दों और समझौतों से तौलते हैं, तो आरव जैसा बच्चा हमें आईना दिखाता है —
कि प्यार कोई शर्त नहीं, एक आदत होती है जो ईश्वर की दी हुई एक अमूल्य दौलत होती हैं। प्यार, अपनापन, चिंता ये सब
ईश्वर एक मां को अपने संतानों के प्रति वफादारी के लिए प्रदान करती है ।
और माँ — वह सिर्फ शरीर से नहीं, आत्मा से भी माँ होती है।
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✨ अंतिम संदेश:
माँ के झूठ में भी एक सच होता है।
और कभी-कभी वह झूठ इतना पवित्र होता है कि वह बच्चे की यादों में अमर हो जाता है।
इसलिए —
कभी उस माँ को झूठी मत कहना जो तुम्हारे लिए सब कुछ छोड़ देती है… सिवाय तुम्हारे।
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स्वरचित, मौलिक, अप्रकाशित रचना लेखक :- कवि काव्यांश "यथार्थ"
विरमगांव, गुजरात।
