एक इंसान की चुप्पी
एक इंसान की चुप्पी
शीर्षक: “एक इंसान की चुप्पी”
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भूमिका:
यह कहानी एक ऐसे पिता की है, जो समय से हार नहीं मानता, मगर अपनों की बेरुखी और समाज की बेरहमी के आगे टूट जाता है। यह कहानी आधुनिक दौर की उस त्रासदी को उजागर करती है, जहाँ तकनीक से पिछड़ते लोग इंसानियत से भी पिछड़ जाते हैं। यह कथा उस बाप की है, जो जीते जी सबका था, पर मरने के बाद ही उसकी अहमियत समझी गई। यह केवल एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि हर उस आम आदमी की कहानी है जो रोज़ अपने सपनों की बलि चढ़ाकर अपनों की ख़ुशियाँ खरीदने निकल पड़ता है।
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अध्याय 1: दयाल – एक आम इंसान।
दीनदयाल शर्मा, उम्र 45 वर्ष। पेशे से एक क्लर्क, स्वभाव से बेहद शांत, ज़िम्मेदार और आत्मसमीक्षक। वह न तो बहुत पढ़ा-लिखा था, न ही बहुत चतुर। मगर मेहनत में उसकी कोई कमी नहीं थी। अपनी ईमानदारी पर उसे गर्व था, पर शायद दुनिया अब ईमानदारों की नहीं रही।
नौकरी से तीसरी बार निकाले जाने का दुख कम नहीं था। खासकर जब बॉस ने सबके सामने जलील करके कहा था –
“तुम जैसे पुराने लोग अब बोझ हो। कंप्यूटर नहीं आता तो रिटायर हो जाओ, क्यों नहीं हो जाते हैं!”
उस दिन ऑफिस से निकले दयाल के पैरों में लचक और दिल में हूक थी। बाज़ार की एक बेंच पर बैठा वह पेड़ की छांव में खुद को ढूंढ रहा था। आँखें फोन की स्क्रीन पर थीं और उंगलियाँ उम्मीद की तलाश में घूम रहीं थीं।
कभी वह राकेश को कॉल करता, कभी हरीश को –
“भाई, कहीं काम हो तो बताना... कुछ भी चलेगा।”
लेकिन आजकल "कुछ भी" भी मिलना मुश्किल हो गया था।
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अध्याय 2: घर की आवाज़ें और दयाल की चुप्पी
रात के दस बजे वह घर पहुँचा तो दरवाजे पर नहीं, तानों की दीवार पर दस्तक दी थी।
पत्नी रेखा की तेज आवाज़ गूंज रही थी–
“कहाँ थे अब तक? किस औरत के साथ थे? शर्म नहीं आती? बच्चे जवान हो गए, उनकी शादी करनी है!”
वह चुप था। अब तानों का जवाब देना उसने बंद कर दिया था।
बेटी आंचल भागती हुई आई –
“पापा... मोबाइल लाए ना मेरे लिए? आपने सुबह प्रॉमिस किया था!”
दयाल ने सिर झुका लिया। क्या जवाब देता? उसी मोबाइल के लिए तो एडवांस मांगा था, और उसी दिन उसे नौकरी से हाथ धोना पड़ा था।
आंचल ने फोन दिखाते हुए कहा –
“देखो, ये ऑन करते ही हैंग हो जाता है! मुझे पढ़ाई करनी है। आप मेरी बात कभी नहीं सुनते!”
वह फिर भी चुप रहा। यह चुप्पी अब उसकी आदत बन गई थी।
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अध्याय 3: टूटी हड्डियों से नहीं, टूटी आत्मा से मरते हैं लोग।
पत्नी अब भी कमरे में मोबाइल देखती रही, पर ध्यान दयाल पर ही था।
“जब पैसे नहीं थे, तो उधार ले लेते! मोबाइल नहीं होगा तो आंचल पढ़ेगी कैसे?”
दयाल जानता था, उधारी का बोझ पहले से ही उसकी कमर तोड़े हुए था। लेकिन अब उसने जवाब देने से ही रिश्ता तोड़ लिया था।
वह चुपचाप रसोई में गया, खुद थाली निकाली, खाना परोसा। खाने का स्वाद अब केवल पेट भरने भर का था, आत्मा को कोई स्वाद नहीं लगता था।
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अध्याय 4: बेटा और बेटी – ख्वाहिशों की अंधी दौड़।
बेटा विशाल – 24 साल का – आज फिर पीकर आया था।
एक दौर में दयाल ने उसे डांटने की कोशिश की थी, पर एक दिन बेटे ने उसका हाथ पकड़कर आँख दिखाई थी। उस दिन दयाल का बाप होना टूट गया था।
बेटी – 22 की – दिन भर सोशल मीडिया पर “study motivation” के रील्स देखती थी और खुद पढ़ाई से भागती थी।
दोनों बच्चे उसके जीते जी “अपनों” में नहीं रहे थे। वे अब उसके सिर पर रखी ज़िम्मेदारियाँ बन गए थे।
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अध्याय 5: अंतिम यात्रा – अनजानी मौत, पहचानी पीड़ा।
सुबह जल्दी उठकर दयाल काम की तलाश में निकल पड़ा। दिनभर भूखा-प्यासा दफ्तरों के चक्कर लगाता रहा।
एक दफ्तर में कहा गया –
“सर, आपका टाइम चला गया। हमारे पास यूथ की ज़रूरत है।”
एक जगह पर बोला गया –
“हमने अभी AI-सिस्टम लगाया है, आप ओवरक्वालिफाइड हैं... मतलब अयोग्य।”
शाम को लौटते हुए शरीर में कंपकंपी थी, आँखों के सामने धुंध।
चलते-चलते कब वह फुटपाथ से सड़क पर आ गया, उसे पता ही नहीं चला।
एक तेजी से आता हुआ ट्रोला आया और दयाल को कुचलता हुआ चला गया। समय भी नहीं दिया घटना स्थल पर ही मृत्यु हो गई।
उस दिन दयाल के जीवन की नहीं, अपितु एक ज़िम्मेदार पिता की भी मृत्यु हुई थी।
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अध्याय 6: मृत्यु के बाद का सच।
अंतिम संस्कार के बाद अब रेखा की आवाज हमेशा के लिए धीमी हो गई थी।
अब वह सजने-संवरने के बजाय, सिसकियों से खुद को सजाती थी।
बेटा विशाल अब 7 हज़ार की नौकरी करता था – कपड़े की दुकान पर।
बेटी आंचल 5 हज़ार की प्राइवेट स्कूल में पढ़ाती थी – उसी खराब मोबाइल से बच्चों को पढ़ाती जिसे वह एक दिन फेंक देना चाहती थी।
वो सब जो दयाल के होने पर अहमियत नहीं रखते थे, अब सबकुछ बन गए थे –
“नींद थी वो – अब रातें जागकर बीतती थीं।”
“रोटी था वो – अब जो मिल जाए वही खा लेते थे।”
“बाजार था वो – अब ख्वाहिशें फुटपाथ पर सो गई थीं।”
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अध्याय 7: अंत नहीं – एक सीख।
आज जब कोई पिता थक कर चुप होता है, तो समझ जाना कि वो हारा नहीं है, बल्कि खुद को बचा रहा है।
जब कोई पिता बिना कहे खाना खाता है, समझ लेना कि वो भूख नहीं, जिम्मेदारियों को निगल रहा है।
जब कोई पिता जवाब नहीं देता, समझ जाना कि वो हर जवाब को पहले ही खुद से पूछ चुका है।
दयाल की कहानी हम सबके घर में गूंजती है — कभी किसी दोस्त के पिता के रूप में, कभी अपने पिता की चुप्पी में, और कभी अपनी ज़िम्मेदारियों की परछाई में।
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अंतिम पंक्तियाँ – जो दिल को झकझोर दें:
पिता वो दरवाज़ा है, जो हमेशा खुला रहता है –
मगर भीतर दाखिल होने पर उसकी अहमियत समझ में आती है।
पिता वो धूप है, जो खुद जलकर परछाई बनाता है –
मगर हम अक्सर परछाई का नाम भी नहीं जानते।
उसके जाने के बाद जो अंधेरा आता है, वो सिर्फ घर में नहीं होता –
वो हमारी आत्मा में उतर जाता है।
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पाठकों के लिए संदेश:-
आज अगर आपका पिता चुपचाप खाना खा रहा है,
तो एक बार उसके पास बैठ जाइए
और कह दीजिए – "पापा, आप मेरे लिए सब कुछ हो, तुम्हारे बिना सब खुशियां अधूरी है..."
क्योंकि क्या पता कल शायद ये सब कहने का मौका ही न मिले।
– "एक दयाल के बेटे की कलम से "✍🏻
